“पापा… ये क्या हो गया? आपने बताया क्यों नहीं कि आपकी तबीयत खराब है? आपको कोई परेशानी थी तो मुझसे कहना चाहिए था, आख़िर मैं आपका बेटा हूँ!” अभिनव के आँसू श्रीनाथ जी के हाथों पर गिर रहे थे।
श्रीनाथ जी ने एक बहुत ही फीकी, लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी और हांफती हुई थी। “कब कहता बेटा…? कब कहता? तुम तो हमेशा अपनी उस स्क्रीन के पीछे व्यस्त रहते हो। तुम्हारा दरवाज़ा तो हमेशा बंद ही रहता है।”
अभिनव ने सफाई देनी चाही, “पापा, वो मेरी ड्यूटी… मेरा काम…”
श्रीनाथ जी ने अपना हाथ धीरे से अभिनव के सिर पर रखा और बोले, “मुझे याद है बेटा, जब मैं दफ़्तर से लौटता था… घंटों बस के धक्के खाकर, पसीने में लथपथ। मेरे पैर दुख रहे होते थे। लेकिन जैसे ही मैं दरवाज़े पर पहुँचता, तू दौड़ कर मेरे गले लग जाता था। तू ज़िद करता था कि पापा मुझे कंधे पर बिठाकर घुमाने ले चलो। और मैं अपनी सारी थकान भूलकर, बिना आराम किए तुझे पार्क ले जाता था। फिर तेरी बहन कहती कि पापा मेरी ड्राइंग की कॉपी ख़त्म हो गई है, मैं तुरंत बाज़ार भागता था। तेरी माँ घर के काम बताती थी। उस वक़्त मेरे पास पैसा कम था, समय भी कम था, लेकिन मैंने कभी तुम्हें यह नहीं कहा कि मैं ‘बिज़ी’ हूँ।”
महानगर की एक पॉश सोसायटी के चौदहवें माले पर स्थित वह फ्लैट हर तरह की आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस था। इस घर में पच्चीस वर्षीय अभिनव, उसके पिता श्रीनाथ जी और माँ सुमित्रा रहते थे। अभिनव एक नामी मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में सीनियर डेवलपर था। उसकी बड़ी बहन की शादी बहुत पहले ही हो चुकी थी, जब अभिनव कॉलेज के प्रथम वर्ष में था। श्रीनाथ जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी एक साधारण सरकारी क्लर्क के रूप में बिता दी थी। उनकी आमदनी बहुत सीमित थी, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश और शिक्षा में कभी कोई कमी नहीं आने दी। आज परिस्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी। अभिनव लाखों का पैकेज ले रहा था, घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन इस पैसे ने घर की उस पुरानी गर्माहट को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया था।
अभिनव की ड्यूटी अमेरिकी समयानुसार होती थी। वह शाम को लॉग-इन करता और सुबह भोर में सोता था। जब श्रीनाथ जी और सुमित्रा सुबह की चाय पी रहे होते, तब अभिनव गहरी नींद में होता। और जब दोपहर ढले अभिनव की सुबह होती, तब तक श्रीनाथ जी पार्क में टहलने या अपने हमउम्र दोस्तों के साथ समय बिताने चले जाते। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी पिता और पुत्र की मुलाकात कई-कई दिनों तक नहीं हो पाती थी। सप्ताहांत में जब अभिनव की छुट्टी होती, तो वह या तो अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने चला जाता या फिर अपने कमरे में बंद होकर हफ़्ते भर की नींद पूरी करता। घर में सब कुछ था, सिवाय उस संवाद के, जो एक परिवार को जोड़ कर रखता है। अभिनव ने अपने माता-पिता के लिए बड़ा स्मार्ट टीवी, ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन और महंगे फोन ला दिए थे। उसे लगता था कि उसने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है। सुख-सुविधाएं देना ही उसके नज़रिए से प्यार जताने का एकमात्र तरीका बन चुका था।
एक दिन अभिनव की शिफ्ट बहुत थका देने वाली थी। किसी बड़े प्रोजेक्ट की डिलीवरी थी, जिसके चलते वह लगातार बारह घंटे सिस्टम के सामने बैठा रहा। सुबह सात बजे वह सीधा बिस्तर पर गिरा और गहरी नींद में सो गया। दोपहर के करीब तीन बज रहे थे जब उसकी नींद अचानक टूटी। उसने महसूस किया कि घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। आमतौर पर इस समय उसकी माँ रसोई में कुछ न कुछ बना रही होती थीं और बर्तनों की हल्की खटपट सुनाई देती थी। अभिनव ने आँख मलते हुए पानी पीने के लिए हॉल की तरफ कदम बढ़ाया। घर में कोई नहीं था। मुख्य द्वार पर बाहर से ताला लगा हुआ था, जिसकी चाबी जाली वाले दरवाजे के पास टंगी थी।
उसे थोड़ा अजीब लगा। उसने तुरंत अपना फोन उठाया जो साइलेंट मोड पर था। स्क्रीन देखते ही उसके होश उड़ गए। सुमित्रा के पंद्रह मिस्ड कॉल थे और उसकी बहन के भी चार कॉल थे। अभिनव का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। वह समझ गया कि कुछ बहुत भयानक हुआ है। कांपते हाथों से उसने अपनी माँ को फोन मिलाया। पहली ही घंटी में फोन उठ गया। उधर से माँ की सुबकती हुई आवाज़ आई, “बेटा… जल्दी से सिटी अस्पताल के आईसीयू वॉर्ड में आ जा। तेरे पापा की हालत बहुत नाज़ुक है।”
अभिनव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने बिना सोचे-समझे जो कपड़े सामने मिले, पहने और गाड़ी की चाबी लेकर पागलों की तरह अस्पताल की ओर भागा। रास्ते का हर एक मिनट उसे सदियों जैसा लग रहा था। अस्पताल पहुँचते ही वह सीधा आईसीयू की तरफ दौड़ा। बाहर उसकी माँ सुमित्रा बेसुध सी एक कुर्सी पर बैठी रो रही थीं।
“माँ! क्या हुआ पापा को?” अभिनव ने उनके पास घुटनों के बल बैठते हुए पूछा।
सुमित्रा ने रोते हुए बताया, “सुबह नाश्ता करते हुए अचानक उनके सीने में तेज़ दर्द उठा और वो वहीं गिर पड़े। तू इतनी गहरी नींद में था और तेरा कमरा अंदर से बंद था। मैंने बहुत आवाज़ें दीं, दरवाज़ा पीटा, पर तुझे कुछ सुनाई नहीं दिया। आखिर में पड़ोस के शर्मा जी की मदद से मैं इन्हें यहाँ लेकर आई। डॉक्टर कह रहे हैं कि मैसिव हार्ट अटैक है…”
अभिनव को लगा जैसे किसी ने उसे ज़ोरदार तमाचा मार दिया हो। वह अपने ही घर में था, और उसकी माँ मदद के लिए चीखती रही, लेकिन उसके कानों पर लगे नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन्स ने उसे अपने ही परिवार की चीखों से बहरा कर दिया था।
“तू जा… डॉक्टर ने कहा है कि वो तुझे देखना चाहते हैं। एक बार मिल ले उनसे,” माँ ने रोते हुए कहा।
अभिनव भारी कदमों से आईसीयू के अंदर दाखिल हुआ। मॉनिटर की बीप-बीप की आवाज़ डरावनी लग रही थी। ढेरों नलियों और तारों के बीच घिरे श्रीनाथ जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। उनकी आँखें आधी खुली थीं। अभिनव अपनी रुलाई नहीं रोक पाया और उनके बिस्तर के पास जाकर उनका कमज़ोर हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया।
“पापा… ये क्या हो गया? आपने बताया क्यों नहीं कि आपकी तबीयत खराब है? आपको कोई परेशानी थी तो मुझसे कहना चाहिए था, आख़िर मैं आपका बेटा हूँ!” अभिनव के आँसू श्रीनाथ जी के हाथों पर गिर रहे थे।
श्रीनाथ जी ने एक बहुत ही फीकी, लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी और हांफती हुई थी। “कब कहता बेटा…? कब कहता? तुम तो हमेशा अपनी उस स्क्रीन के पीछे व्यस्त रहते हो। तुम्हारा दरवाज़ा तो हमेशा बंद ही रहता है।”
अभिनव ने सफाई देनी चाही, “पापा, वो मेरी ड्यूटी… मेरा काम…”
श्रीनाथ जी ने अपना हाथ धीरे से अभिनव के सिर पर रखा और बोले, “मुझे याद है बेटा, जब मैं दफ़्तर से लौटता था… घंटों बस के धक्के खाकर, पसीने में लथपथ। मेरे पैर दुख रहे होते थे। लेकिन जैसे ही मैं दरवाज़े पर पहुँचता, तू दौड़ कर मेरे गले लग जाता था। तू ज़िद करता था कि पापा मुझे कंधे पर बिठाकर घुमाने ले चलो। और मैं अपनी सारी थकान भूलकर, बिना आराम किए तुझे पार्क ले जाता था। फिर तेरी बहन कहती कि पापा मेरी ड्राइंग की कॉपी ख़त्म हो गई है, मैं तुरंत बाज़ार भागता था। तेरी माँ घर के काम बताती थी। उस वक़्त मेरे पास पैसा कम था, समय भी कम था, लेकिन मैंने कभी तुम्हें यह नहीं कहा कि मैं ‘बिज़ी’ हूँ।”
श्रीनाथ जी को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, अभिनव ने उन्हें रोकना चाहा, लेकिन उन्होंने इशारा करके अपनी बात जारी रखी।
“मैंने अपनी पूरी जवानी तुम्हारी हर छोटी-बड़ी ज़रूरतें पूरी करने में लगा दी। मैंने कभी अपने लिए कुछ नहीं जिया। लेकिन आज… आज तुम लोगों से क्या कहूँ? तुमने खुद को एक छोटे से कमरे और एक लैपटॉप में समेट लिया है। तुम्हें इस बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता कि बाहर वाले कमरे में तुम्हारे बूढ़े माँ-बाप किस हाल में हैं। क्या तुमने पिछले एक महीने में कभी पाँच मिनट मेरे पास बैठकर यह पूछा कि ‘पापा, आपके घुटने का दर्द कैसा है?’ कभी तुमने कहा कि ‘पापा, आज संडे है, चलो हम सब साथ में बैठकर चाय पीते हैं?'”
अभिनव की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। पिता का एक-एक शब्द उसके सीने में तीर की तरह चुभ रहा था।
“बेटा,” श्रीनाथ जी ने गहरी सांस ली, “जब एक ही घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख नहीं जानते, तो वो घर ईंट-पत्थर का मकान बन जाता है। ज़िंदगी सिर्फ कोडिंग करने, पैसा कमाने और बड़े गैजेट्स खरीदने का नाम नहीं है। जो ज्ञान तुम अपनी स्क्रीन्स और किताबों में ढूंढते हो, वो तुम्हें वहाँ नहीं मिलेगा। परिवार, रिश्ते, अपनों का स्पर्श… ये वो खुली किताबें हैं जिन्हें पढ़ा नहीं, महसूस किया जाता है। आज तुम्हारे पास बहुत पैसा है, साल का लाखों कमाते हो तुम। लेकिन क्या वो पैसा आज मेरी साँसें खरीद पा रहा है? क्या वो पैसा मुझे वो समय लौटा सकता है जो मैं तुम्हारे साथ बिताना चाहता था?”
अभिनव फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दीजिए पापा… मैं सब ठीक कर दूँगा। मैं नौकरी छोड़ दूँगा, हम साथ रहेंगे। बस आप ठीक हो जाइए।”
श्रीनाथ जी की आँखें अब बंद हो रही थीं। “रिश्तों को समय देना सीखो बेटा… पैसे से तुम बिस्तर खरीद सकते हो, सुकून की नींद नहीं। पैसे से तुम महँगा इलाज खरीद सकते हो, लेकिन अपनों का साथ नहीं…”
और इसके साथ ही मॉनिटर की वह टेढ़ी-मेढ़ी रेखा एकदम सीधी हो गई। एक लंबी बीप की आवाज़ ने कमरे में मौत का सन्नाटा भर दिया। श्रीनाथ जी हमेशा के लिए जा चुके थे। अभिनव वहीं ज़मीन पर बैठ गया। वह अपने पिता के सीने से लगकर चीख रहा था, लेकिन अब सुनने वाला कोई नहीं था।
कुछ दिनों बाद, जब घर में लोग शोक जताकर जा चुके थे, अभिनव अपने पिता के कमरे में अकेला खड़ा था। उसे वहां पिता का पुराना चश्मा और एक डायरी मिली। डायरी के आख़िरी पन्ने पर लिखा था, “आज अभिनव ने मुझे एक नई घड़ी लाकर दी है। घड़ी बहुत महँगी है, लेकिन काश… वो मुझे इस घड़ी में से थोड़ा सा ‘वक़्त’ भी दे पाता।”
अभिनव उस डायरी को सीने से लगाकर रोता रहा। काश, उसने समय रहते अपनों की कीमत समझी होती। काश, दौलत कमाने की इस अंधी दौड़ में वह इतना आगे न निकल गया होता कि पीछे छूट गए रिश्तों की पुकार उसे सुनाई ही न दी।
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