ज़िंदगी का असली सुकून

अचानक काव्या के मन का सारा मलाल, सारा गुस्सा और सारी मायूसी एक झटके में कहीं बह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके तपते हुए मन पर सुकून की ठंडी फुहार डाल दी हो। जिस नौकरी को वह कुछ घंटों पहले एक बोझ समझ रही थी, आज उसी ने उसे वो खुशी दी थी जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। उसे एहसास हुआ कि जब वह अपनी बेटी का जन्मदिन मनाने के लिए तड़प रही थी, तब ईश्वर ने उसे कई और बेटियों और बेटों की ज़िंदगी बचाने के लिए चुना था।

 डॉ. काव्या के घर के भीतर एक अजीब सी गर्माहट और उत्साह का माहौल था। आज उनकी इकलौती बेटी, मिष्टी का छठा जन्मदिन था। पूरे घर को गुब्बारों, रंग-बिरंगी लाइटों और फूलों से सजाया गया था। काव्या ने खुद अपने हाथों से मिष्टी के लिए उसका पसंदीदा चॉकलेट केक बेक किया था। ओवन से आती केक की मीठी महक पूरे घर में फैल रही थी। मिष्टी अपनी नई गुलाबी फ्रॉक में किसी नन्ही परी जैसी लग रही थी और पूरे घर में चहकती हुई दौड़ रही थी। काव्या अपने पति सुमेध के साथ मिलकर आखिरी सजावट पूरी कर रही थी। महीनों की व्यस्तता, अनगिनत रातों की ड्यूटी और लगातार ऑपरेशनों के बाद, आज का दिन काव्या ने सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार के लिए निकाला था। उसने अपना फोन भी साइलेंट पर डाल दिया था ताकि कोई भी अस्पताल का काम आज के इस खूबसूरत पल में खलल न डाल सके। वह मिष्टी को अपनी बाहों में भरकर उसे चूमने ही वाली थी कि अचानक टेबल पर रखा उसका फोन लगातार वाइब्रेट होने लगा। स्क्रीन पर चमकता नाम देखकर काव्या के चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई।

वह अस्पताल के डीन डॉ. माथुर का नंबर था। काव्या जानती थी कि अगर डॉ. माथुर ने उसे उसकी छुट्टी वाले दिन कॉल किया है, तो बात यकीनन बहुत गंभीर होगी। काव्या ने गहरी सांस ली और मिष्टी को सुमेध की गोद में थमाकर फोन उठाया। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से एक बेहद घबराई हुई और तेज़ आवाज़ आई, “काव्या, मुझे पता है आज तुम्हारी छुट्टी है और मिष्टी का जन्मदिन भी है, लेकिन तुम्हें इसी वक्त अस्पताल पहुँचना होगा। हाईवे पर एक स्कूल बस और ट्रक की भयानक टक्कर हो गई है। बस में तीस से ज़्यादा बच्चे थे। हालात बहुत नाज़ुक हैं, हमारे पास सर्जन कम पड़ रहे हैं। हमें तुम्हारी सख्त ज़रूरत है।” काव्या का दिल धक से रह गया, लेकिन दूसरी ही पल उसके भीतर एक अजीब सी झुंझलाहट और मायूसी भर गई। उसने किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा, “जी सर, मैं बस पंद्रह मिनट में पहुँच रही हूँ।” फोन रखते ही काव्या धम्म से सोफे पर बैठ गई।

उसकी आँखों में आंसू तैरने लगे। वह रुआंसी होकर खुद से ही बड़बड़ाने लगी, “क्या फायदा इस कामयाबी का? चीफ सर्जन की कुर्सी, शहर का सबसे बड़ा अस्पताल, शानदार सैलरी और शहर भर में नाम… लेकिन हकीकत क्या है? हकीकत ये है कि मेरी अपनी ज़िंदगी अब मेरी रही ही नहीं। जब देखो बस इमरजेंसी, खून, चीख-पुकार और अस्पताल की वो सफ़ेद दीवारें। एक दिन, सिर्फ एक दिन माँगा था मैंने अपनी बेटी के लिए, लेकिन वो भी मुझे नसीब नहीं हुआ। प्रमोशन और ओहदे के साथ इंसान की निजी खुशियां कैसे छिन जाती हैं, ये कोई मुझसे पूछे। ऐसा लगता है जैसे अपनी ही ख्वाहिशों का गला घोंटकर मैंने ये मुकाम हासिल किया है।” काव्या का मन भारी हो गया था। उसे लग रहा था जैसे उसकी सारी मेहनत और लगन आज उसे ही चिढ़ा रही है।

सुमेध जो पास खड़ा सब सुन रहा था, उसने धीरे से काव्या के कंधे पर हाथ रखा। वह काव्या के दर्द को समझता था। उसने बहुत ही नरमी से कहा, “काव्या, मिष्टी का जन्मदिन हम कल भी मना सकते हैं, लेकिन उन बच्चों की ज़िंदगी शायद कल का इंतज़ार न कर सके। तुम एक डॉक्टर हो, और ये तुम्हारा पहला धर्म है। जाओ, उन्हें तुम्हारी ज़रूरत है।” सुमेध की बातों ने काव्या को थोड़ा हौसला दिया। उसने मिष्टी के माथे को चूमा, आँखों से गिरते आंसुओं को पोंछा और अपना कोट पहनकर तुरंत अस्पताल के लिए निकल गई। रास्ते भर वह यही सोचती रही कि आखिर कब तक उसे अपनी पारिवारिक खुशियों की बलि ऐसे ही चढ़ानी पड़ेगी। कार ड्राइव करते हुए भी उसके मन में एक अजीब सा रोष था अपने प्रोफेशन को लेकर।

जैसे ही काव्या अस्पताल पहुँची, वहाँ का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए। इमरजेंसी वॉर्ड के बाहर लोगों की भारी भीड़ थी। रोते-बिलखते माता-पिता, स्ट्रेचर पर खून से लथपथ कराहते बच्चे और नर्सों की भागदौड़। पूरे अस्पताल में खौफ और दर्द का एक ऐसा मंज़र था जिसने पल भर में काव्या के मन की सारी शिकायतें और निजी दुख को कहीं पीछे धकेल दिया। एक पल पहले तक जो काव्या अपनी बेटी के जन्मदिन की पार्टी छूट जाने का अफ़सोस कर रही थी, वह अचानक एक निडर और बेहद ज़िम्मेदार सर्जन में तब्दील हो गई। उसने तुरंत अपना एप्रन पहना, दस्ताने चढ़ाए और सीधा ऑपरेशन थियेटर की तरफ दौड़ पड़ी।

वहाँ एक सात साल के बच्चे, आर्यन की हालत बहुत गंभीर थी। उसके सिर और सीने में गहरी चोटें आई थीं और काफी खून बह चुका था। आर्यन के पिता बाहर ज़मीन पर बैठकर बदहवास रो रहे थे, उनके कपड़े फटे हुए थे और वे एक दिहाड़ी मज़दूर लग रहे थे। काव्या ने बिना एक सेकंड बर्बाद किए आर्यन का ऑपरेशन शुरू किया। अगले चार घंटे अस्पताल के उस बंद कमरे में ज़िंदगियों को मौत के मुंह से खींच लाने की एक खामोश लेकिन भयंकर जंग चलती रही। काव्या का पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर था। उसकी उंगलियां मशीन की तरह काम कर रही थीं, लेकिन उसका दिल एक माँ की तरह धड़क रहा था।

ऑपरेशन के दौरान कई बार आर्यन की पल्स गिरी, लेकिन काव्या ने हार नहीं मानी। उसने अपने सालों के तजुर्बे और पूरी ताकत को उस बच्चे की जान बचाने में झोंक दिया। आखिरकार, चार घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद मॉनिटर पर आर्यन की दिल की धड़कनें सामान्य होने लगीं। ऑपरेशन सफल रहा था। जब काव्या पसीने से लथपथ होकर ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकली, तो बाहर खड़े आर्यन के माता-पिता की निगाहें उस पर टिक गईं। उनकी आँखों में जो डर था, वह काव्या से छिपा नहीं था। काव्या ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “आपका बच्चा अब खतरे से बाहर है। हमने उसे बचा लिया है।”

यह सुनते ही आर्यन के पिता फूट-फूट कर रोने लगे। वे भागकर आए और सीधे काव्या के पैरों में गिर पड़े। “डॉक्टर साहब, आप इंसान नहीं, हमारे लिए साक्षात भगवान हैं। मेरा तो एक ही सहारा था, अगर इसे कुछ हो जाता तो हम जीते जी मर जाते। आपने मुझे मेरी ज़िंदगी वापस लौटा दी है।” आर्यन की माँ भी हाथ जोड़े लगातार रोते हुए काव्या को दुआएं दे रही थी। काव्या ने जल्दी से उन्हें उठाया और ढांढस बंधाया।

उसी पल, काव्या को वॉर्ड के अंदर से गुज़रते हुए कई और माता-पिता दिखे जिनके बच्चों की जान आज काव्या और उसकी टीम ने बचाई थी। उन अनजान चेहरों पर अपनी संतानों को सुरक्षित देखकर जो राहत और खुशी के भाव थे, उसने काव्या के दिल के सबसे गहरे कोने को छू लिया। उन नम आँखों में जो कृतज्ञता थी, जो दुआएं थीं, वे दुनिया की किसी भी मोटी सैलरी या प्रमोशन से कहीं ज़्यादा कीमती थीं।

अचानक काव्या के मन का सारा मलाल, सारा गुस्सा और सारी मायूसी एक झटके में कहीं बह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके तपते हुए मन पर सुकून की ठंडी फुहार डाल दी हो। जिस नौकरी को वह कुछ घंटों पहले एक बोझ समझ रही थी, आज उसी ने उसे वो खुशी दी थी जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। उसे एहसास हुआ कि जब वह अपनी बेटी का जन्मदिन मनाने के लिए तड़प रही थी, तब ईश्वर ने उसे कई और बेटियों और बेटों की ज़िंदगी बचाने के लिए चुना था।

रात के तीन बज चुके थे। काव्या थकी हुई लेकिन एक असीम शांति के साथ अस्पताल के बाहर निकली। सर्द हवा अब भी चल रही थी, लेकिन अब वो उसे चुभ नहीं रही थी। पार्किंग में सुमेध और मिष्टी कार में उसका इंतज़ार कर रहे थे। मिष्टी आधी नींद में थी, लेकिन काव्या को देखते ही उसकी आँखें चमक उठीं। उसने अपनी आधी खाई हुई एक छोटी सी पेस्ट्री काव्या की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “हैप्पी बर्थडे मम्मा, आप मेरे सुपरहीरो हो!” काव्या ने मिष्टी को सीने से लगा लिया। आज उसे अपनी ज़िंदगी, अपनी नौकरी और अपने हर फैसले पर गर्व हो रहा था। अब उसके मन में न कोई शिकायत थी, न कोई रोष। उसका थका हुआ मन किसी मोर की तरह खुशी से थिरक रहा था, क्योंकि आज उसने जाना था कि किसी की उजड़ती हुई दुनिया को फिर से आबाद करने में जो सुकून है, वो दुनिया की किसी भी निजी खुशी से बहुत बड़ा है।

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लेखिका : सावित्री मल्होत्रा 

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