रेत के निशानों पर हौसले की उड़ान

गौरी, उम्र यही कोई पंद्रह बरस की रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी समझ थी जो उम्र से बहुत पहले आ जाती है। राजस्थानी गाँव के उस रूखे और रेतीले माहौल में भी वह किसी खिले हुए पलाश के फूल जैसी लगती थी। साँवला सलोना रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, और हवा में उड़ते उसके रूखे लेकिन घने बाल। जो भी उसे देखता, बस देखता रह जाता। ऐसा लगता था जैसे विधाता ने उसे फुर्सत में गढ़ा हो, जैसे किसी कुशल चित्रकार ने अपनी पूरी कल्पना कैनवास पर उकेर दी हो। लेकिन किस्मत की विडंबना देखिए, विधाता ने रूप तो छप्पर फाड़ कर दिया, मगर तकदीर लिखते वक्त उसकी कलम की स्याही शायद सूख गई थी। बचपन में ही पोलियो की क्रूर बीमारी ने गौरी के बाएँ पैर की ताकत हमेशा के लिए छीन ली थी। अब एक पुरानी सी लकड़ी की बैसाखी ही उसका एकमात्र सहारा थी, जिसके सहारे वह अपनी ज़िंदगी का बोझ ढोती थी।

घर के हालात किसी नरक से कम नहीं थे। पिता, जग्गू, गाँव के सबसे बड़े पियक्कड़ थे। सुबह आँख खुलते ही उन्हें देसी शराब चाहिए होती थी और रात को नशे में धुत होकर घर लौटना उनका रोज़ का काम था। और बड़ा भाई, बिरजू, गाँव के आवारा और निकम्मे लड़कों के साथ ताश खेलने, जुआ खेलने और छोटी-मोटी चोरियाँ करने में मगन रहता था। घर की पूरी ज़िम्मेदारी गौरी और उसकी माँ, रज्जो, के कमज़ोर कंधों पर थी। रज्जो दिन भर दूसरों के खेतों में मज़दूरी करती, चिलचिलाती धूप में पसीना बहाती और शाम को घर लौटने पर जग्गू की बेतहाशा गालियाँ और मार खाती। यह उनके आँगन का रोज़ का तमाशा था। गरीबी, मुफलिसी और भूख ने गौरी को बचपन से ही दुनिया की वो कड़वी सच्चाइयाँ सिखा दी थीं, जो बड़े-बड़े ज्ञानी मोटी-मोटी किताबों में भी नहीं सीख पाते। उसने बहुत कम उम्र में ही समझ लिया था कि इस दुनिया में कमज़ोर का कोई अपना नहीं होता, और अगर आप गरीब के साथ-साथ अपाहिज और एक लड़की भी हों, तो हर कदम पर समाज के गिद्ध आपको नोचने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। शायद ही ऐसा कोई दिन गुज़रता हो जब गौरी अपनी किस्मत पर बिना रोए या घर के किसी भारी क्लेश के बिना सोई हो। फिर भी, इन घने अंधेरों के बीच गौरी का मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी माँ के लिए जीने की इकलौती उम्मीद था।

हर रोज़ की तरह, आज भी गौरी अपनी कुछ बकरियों को चराने और घर के चूल्हे के लिए सूखी लकड़ियाँ बीनने गाँव से काफी दूर, सूखी नदी के उस पार वाले बीहड़ की तरफ निकल गई थी। यह रास्ता बेहद ऊबड़-खाबड़ और रेतीला था, जहाँ कटीली झाड़ियाँ उग आई थीं। आम लोगों का यहाँ आना-जाना कम ही होता था। बैसाखी के सहारे उस ढीली रेत में चलना गौरी के लिए ज़रा भी आसान नहीं था, लेकिन बचपन से माँ के साथ जंगलों में घूमते हुए यही उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। आसमान में सूरज आग उगल रहा था, लेकिन गौरी को उसकी परवाह नहीं थी। वह अपनी बकरियों को हांकती हुई, खयालों में डूबी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि केवल सूखी पत्तियों के टूटने की आवाज़ आ रही थी। तभी अचानक पीछे से किसी के भारी कदमों की आहट और एक भद्दी सी आवाज़ ने उस सन्नाटे को चीर दिया।

“अरे ओ बंजारन! इतनी चिलचिलाती धूप में लंगड़ाते हुए कहाँ भागी जा रही है? जरा छाँव में बैठकर हमसे भी तो दो बातें कर ले।”

गौरी ठिठक गई। उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसने मुड़कर देखा। सामने गाँव के सबसे रसूखदार ईंट-भट्ठा मालिक का बिगड़ैल बेटा, समर सिंह खड़ा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी वहशियाना चमक थी और होंठों पर एक घिनौनी मुस्कान तैर रही थी। औरतों और लड़कियों को लेकर समाज के इस ताकतवर तबके का नज़रिया हमेशा से ही गौरी को खटकता था। और आज यह खौफनाक खतरा साक्षात उसके सामने खड़ा था। समर सिंह धीरे-धीरे उसके करीब आने लगा। उसकी नीयत में छुपे ज़हर को भाँपने में गौरी को एक सेकंड भी नहीं लगा। लड़कियाँ, चाहे वे महलों में पली हों या झोपड़ियों में, चाहे उनकी उम्र पंद्रह हो या पचास, वो एक गलत नज़र और खतरे की आहट को तुरंत पहचान लेती हैं।

गौरी ने अपनी बैसाखी पर अपनी पकड़ मज़बूत की। उसने डर को अपने चेहरे पर हावी नहीं होने दिया और अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसे घूरते हुए सख्त लहज़े में कहा, “मैं कहीं भी जाऊँ, तुझे उससे क्या मतलब? अपने रास्ते जा समर! मुझे तुझसे कोई बात नहीं करनी।” यह कहकर गौरी अपनी बकरियों को ज़ोर-ज़ोर से হাঁकते हुए आगे की तरफ बढ़ने लगी।

समर ज़ोर से हँसा। उसकी वह खोखली और वीभत्स हँसी उस वीराने में किसी खूंखार जानवर की तरह गूँजी। “अरे गौरी, सुन तो मेरी बात! इतना भी क्या गुरूर!” यह कहते हुए वह दौड़कर गौरी के ठीक सामने आ खड़ा हुआ और उसका रास्ता रोक लिया।

गौरी के भीतर डर का एक भयानक सैलाब उठ खड़ा हुआ। दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि मानो पसलियाँ तोड़ कर बाहर आ जाएँगी। उसे अनहोनी का पक्का अंदेशा हो गया। नियति ने भी उसके साथ कैसा क्रूर मज़ाक किया था, उसे बचने के लिए पैर तो दिए थे, लेकिन दौड़ने की ताकत छीन ली थी। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी पूरी ताकत से अपनी बैसाखी को ज़मीन पर पटका और समर को पीछे धकेलने की कोशिश करते हुए वहाँ से भागने का फैसला किया।

यह कोई आम दौड़ नहीं थी। यह एक अपाहिज लड़की की अपने वजूद, अपनी अस्मत को बचाने की एक बेतहाशा और जानलेवा जद्दोजहद थी। वह बैसाखी के सहारे रेत और नुकीले पत्थरों पर ऐसे भाग रही थी जैसे कोई घायल हिरणी शेर के जबड़े से बचकर भागती है। छोटे-छोटे कदम, लेकिन उसके हौसले की उड़ान बहुत ऊँची थी। वह पूरी तरह से बावली होकर भाग रही थी। बैसाखी की ‘ठक-ठक’ की आवाज़ उस खामोश सन्नाटे में उसकी तेज़ धड़कनों के साथ ताल मिला रही थी। पीछे से समर की भारी कदमों की आहट आ रही थी, जो गौरी के खौफ को और भी भयंकर बना रही थी।

गर्म हवा के थपेड़े उसके चेहरे से टकरा रहे थे। डर और भागने की थकान के कारण वह पसीने से पूरी तरह भीग चुकी थी। उसके खराब पैर की नसें दर्द से फटने को हो रही थीं और साँसें किसी लुहार की धौंकनी की तरह धधक रही थीं। उसका शरीर काँप रहा था। आस-पास के पेड़ों पर बैठी चिड़ियों का अचानक से उड़ना और शोर मचाना, सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट, ये सब मिलकर उस माहौल को और भी डरावना और दमघोंटू बना रहे थे। कई बार उसका संतुलन बिगड़ा, वह लड़खड़ाई, लेकिन गिरी नहीं। उसे अपनी बेबस माँ का वो चेहरा याद आ रहा था, जो हर रात मार खाने के बाद भी सुबह उठकर उसके लिए रोटी बनाती थी। उसे लगा कि अगर वह आज इस दरिंदे का शिकार हो गई, तो उसकी माँ जीते जी मर जाएगी।

बकरियाँ कब की पीछे छूट गई थीं, और वह लड़का भी शायद इतनी दूर तक इस भयानक धूप में भागने की हिम्मत हार चुका था। रास्ता धुंधला होने लगा था, लेकिन गौरी रुकी नहीं। वह तब तक भागती रही, जब तक कि वह गाँव की सुरक्षित सीमा में दाखिल नहीं हो गई और बस्ती के लोगों की हलचल उसे सुनाई नहीं देने लगी। पीछे मुड़कर देखने की उसमें हिम्मत नहीं थी। हाँफती, काँपती और पसीने में तर-बतर गौरी जब बस्ती के किनारे पहुँची, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी जीत की चमक थी। एक ऐसी जीत, जिसने साबित कर दिया था कि कमज़ोर पैर इंसान की चाल धीमी कर सकते हैं, लेकिन उसकी हिम्मत और उड़ान को कभी नहीं रोक सकते।

क्या आपको भी लगता है कि समाज में आज भी ऐसी ही ना जाने कितनी गौरियाँ हर रोज़ ऐसे भेड़ियों का सामना करती होंगी? क्या गरीबी और शारीरिक अक्षमता को समाज के कुछ लोग अपनी जागीर समझ लेते हैं?

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