बबीता के परिवार में वो दो बहनें, तीन भाई, एक सबसे बड़ी बहन फिर तीन भाई फिर सबसे छोटी थी बबीता। बड़े ही लाड़ प्यार से माता-पिता ने परवरिश की उन सबकी । एक दूसरे को समझता, एक दूसरे पर निछावर, जान छिड़कता ऐसा था उनका परिवार। पिता मनोज जी सरकारी आफिसर माँ पार्वती घरेलू गृहणी बड़े ही सुव्यवस्थित सुचारू रूप से घर सम्भाल रखा था उन्होंने। सभी तीज त्यौहार पर बच्चों के लिए कपड़े खरीदतीं बड़े ही कुशलता चतुराई से खर्च करतीं। इतना सब के बाद भी थोड़ा वक्त बेवक्त के लिए अच्छा खासा बचा भी लिया करतीं ।
पार्वती जी अपने दो भाईयों की इकलौती बहन थी। रिश्तों को किस प्रकार निभाया जाता कोई उनसे सीखे। सँस्कार तो उनके रंग रंग में बसा था। एकदम नम्र स्वभाव, वो ज्यादा कहीं आती जाती तो नहीं, मगर हर वर्ष पहले अपने घर में बच्चों का रक्षाबंधन त्यौहार निपटा फिर दोपहर में रक्षाबंधन मनाने अपने निकट शहर जहां उनका मायका बराबर पहुँच जाया करती थीं।
फिर बड़े ही प्रेम से बारी बारी दोनों भाइयों के घर फल मिठाई राखी लेकर जातीं । उनका इतना प्रेम भाई भी बड़े ही जोश खरोश से उनका स्वागत करते। बरसों से उनके बच्चे, वो सभी भाई बहन सब देखते और ठीक वैसा ही वो भी अपने जीवन में उतारते। क्योंकि संँस्कार तो बच्चों को माता पिता से ही विरासत में मिलते हैं । उसके हावभाव बोलने का तरीका ही बता देता है इंसान कैसे खानदान से है। सभी मिलजुल राखी बांधते।
पार्वती जी हर रक्षाबंधन अपने बच्चों को कहतीं बड़े ही प्रेम से समझातीं बच्चों यह राखी के त्यौहार में राखी एकमात्र राखी का धागा कोई सूत ही नहीं है। यह धागा रक्षा, विश्वास प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहुत ताकत होती है। ये भाई बहन के पवित्र रिश्ते को और अधिक पवित्र व मजबूत बनाता है। इसलिए हमेशा इसका सम्मान करना चाहिए और इसकी पवित्रता पर आंच नहीं आने देनी चाहिए। एक खानदानी महिला ही इसके महत्व को समझ बरकरार रख सकती है। सभी बच्चे बड़े ध्यान से अपनी ‘माँ की बातें सुनते और उस पर अमल भी करते।
धीरे धीरे समय बीतता जाता है। घर का बड़ा बेटा अच्छी नौकरी पा विदेश जाकर बस जाता है । और कुछ समय बाद खबर मिलती है, उसने वहीं किसी अमीर विदेशी लड़की से ही विवाह कर लिया उसी के साथ रहने लगा । फिर कभी वापस न आने के इरादे से वहीं बस जाता है । शुरू शुरू में तीज त्यौहार पर पैसा भेजता मगर धीरे धीरे उसका भेजना बंद हो जाता है।
पिता अच्छी नौकरी पर तो पैसों की कोई खास कमी घर पर थी ही नहीं। ऊपर से पार्वती जी सुघड़ महिला तो परिवार आराम से चल रहा था। बबीता और उसकी बहन की शादी भी अच्छे घराने में हो जाती है। बड़ी बहन का पति वकील और बबीता के पति नामी बिजनेस मैन । पिता नौकरी से रिटायर हो जाते है । तब तक दोनों भाईयों के विवाह भी हो गये , दो बहुएं घर में आ जाती हैं…। शरीर का कोई भरोसा तो होता नहीं है । न ही गम्भीर बीमारी अपने पहले आने की सूचना देती है। एक दिन अचानक पिता मनोज जी को हृदयाघात होता है अस्पताल ले जाते रास्ते में ही उनका देहांत हो जाता है।
पार्वती जी मनोज जी के देहांत के बाद टूट जाती हैं। पति के जाने के बाद बीमार रहने लगतीं है। उनका स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरना शुरू हो जाता है।
समय बीतता है…पिता के जाने के बाद आज जब राखी का त्यौहार आता है, बबीता और उसकी बड़ी बहन दोनों साथ-साथ मिलकर भाईयों को राखी बांधने आतीं हैं। दोनों का विवाह आस पास इलाके में ही हुआ था। वो अपने माँ के दिए संस्कार का पालन-पोषण कर रहीं । बीमार माँ उनको राखी के दिन आया देखकर बहुत खुश होती है। लेकिन बड़ी बहु बेहद लालची नकचढ़ी किस्म की महिला ननदों को घर आया देखकर वो अपने पति से कहती हैं – ये तुम्हारी बहनों को भी और कोई काम-धाम नही है क्या ?
बहाना चाहिए कोई न कोई यहां आकर धमकने का और हमको लूटने का । जब देखो मुंह उठाये चली आतीं हैं यहां।
अब इनको कौन समझाए…”पैसा पेड़ पर तो लगता नहीं जो इन ऐरो गैरों पर हम लुटाते रहें ऐसे तो ये हमको खोखला कर देंगीं” ।
अब बड़ा भाई क्या कहता ? चुपचाप मुंह बन्द कर एक तरफ खड़े रहता है ।
वैसे भी ऐसी पत्नी के आगे कुछ बोलना समझाना घर में क्लेश करना ही होगा। वो चुप रहता है। और पत्नी की बातों का विरोध न कर उसकी हाँ में हाँ करता रहता।
लेकिन छोटे भाई की पत्नी नरम दिल घुल-मिल कर रहने वाली एकदम शान्त सौम्य व्यवहार वाली महिला । मगर उनका छोटा भाई बहुत छोटी नौकरी करता उसकी तो ज्यादा कमाई नहीं थी । पत्नी भी ज्यादा पढ़ी लिखी नही । जैसे तैसे गुजारा कर ही लेते थे दोनों पति-पत्नी लेकिन दोनों बहुत ही समझदार थे ।
दोनों बहनें पहले बड़े भाई के माथे पर टीका लगाती है राखी बांधती है, फिर छोटे भाई को बांधती है। सारे घर का हिसाब किताब बड़े भाई की पत्नी देखती पति की कमाई सभी रूपए पैसों को अपने पास रखती । तो बड़ा भाई अपनी पत्नी से कहता है “बहनों को गिफ्ट पैसे वगैरह दो, वो साड़ियां जो मै दोनों के लिए लाकर रखी जाकर जल्दी से वो ले आओ” ।
पत्नी बहुत ही लालची देने के नाम पर तो बहुत ही छोटे दिल वाली महिला। एकदम बोली साड़ियां कौन सी साड़ियां ?
पति बोला पिछले हफ्ते ही लेकर आया था राखी में गिफ्ट के लिए।
पत्नी नंदनी बोली अरे वो साड़ियां तो मैंने कहीं रख कर भूल गई हूँ,याद नहीं कहां रखी है । अब क्या फर्क पड़ता है ? बाद में दे देंगे। बहनें कौन सा कहीं भागी जा रही है ?
फिर एक पाँच, पाँच सो के नोट उनके दोनों के हाथ में पकड़ा देती है। कहते हुए अरे ये तो आती ही रहतीं हैं कौन सा ये इनका आखिरी रक्षाबंधन है… दे देंगे फिर कभी, ऐसी भी क्या जल्दी मची हुई है ?
बड़ा भाई तो पत्नी के आगे कुछ भी बोल नहीं पाता अब क्या कहता ? मजाल उसकी बात काट दे । जानता बैठे बैठाए तमाशा हो जाना है। कहता है ठीक है जैसा तुम सही समझो ।
जब छोटे भाई की देने की बारी आती है छोटे भाई की पत्नी जल्दी से अपने कमरे में जाकर दो साड़ियां ले आती है,और पति के हाथ में रख देती है। दोनों बहनों को देने के लिए। दोनों बहनों के लाख मना करने पर भी जिद करके लेने का आग्रह करती है। कहते हुए, कौन रक्षाबंधन बार बार आता साल भर का त्यौंहार है ज्यादा महंगी नहीं है साड़ियां। दोनों बहनें अपने छोटे भाई की परिस्थितियों को अच्छे से समझती लेकिन उस समय चुपचाप साड़ी रख लेतीं है।
पार्वती जी सब देख रही और आने वाले समय में बचे कूचे रिश्ते का अनुमान लगा रही । सोचती है अभी तो मैं जिन्दा हूं तब ये हाल है, कल मेरे न रहने पर तो ये बड़ा बेटा तो रिश्ते निभाने को बोझ ही समझने लगेगा ।
दो आँसू उनकी आँखों से रूढ़क कर गालों में समा जाते हैं। ये हैं मेरी परवरिश ..ऐसी शिक्षा तो नहीं दी मैंने इनको । ये तो शादी के बाद अपने सँस्कार अपने परिवार को ही भूल रहा है। ऐसे व्यवहार से रिश्ते कब मजबूत होते वो तो बिखर कर रह जाते है । बेटियां तो मेरी व्यवहार कुशल अच्छे खासे कमाते घरों में गई है। उनको क्या कमी है ? ऐसा ही व्यवहार करेगा भाई तो वो क्यों आयेंगी भला ? रिश्ते तो दोनों तरफ से निभते हैं।
सावित्री जी की पारखी नजर को रिश्ते टूटने के कगार पर नजर आ रहे थे उनको ।
वो जानती थी बड़ा बेटा पिता की तरह सरकारी नौकरी पर है और अच्छा खासा कमाता है। मगर नीयत और नियति तो बदली नहीं जा सकती। अन्दर से भले ही वो जानता होगा गलत हो रहा है मगर क्या फायदा ? जब उसके दिए सँस्कारों की विरासत आगे न बढाई जा सके ।
पार्वती जी दोनो बेटियों के वापस ससुराल जाने से पहले अपने पास बुलाकर गुपचुप कुछ सलाह मशवरा करतीं हैं। और कहतीं हैं उनका स्वास्थ्य अब सही नहीं रहता वो आज हैं कल नहीं। उनके जाने के बाद छोटे भाई का ख्याल रखना। वो और उसकी पत्नी दोनों नेकदिल सीधे साधे इंसान हैं। मेरी भी बहुत देखभाल करते हैं।
बहनें त्यौहार के बाद अपने घर के लिए विदा हो जाती है। कुछ ही दिनों पश्चात सावित्री जी का देहांत हो जाता है। दोनों बहनें आतीं हैं अभी तेरहवीं के बाद सभी कुछ ठीक से, घर व्यवस्थित भी नहीं हुआ बड़ी बहु नंदनी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये। दोनों बहनों के सामने ही कह दिया वो अलग रहेगी । उनसे तुम लोगों का बार बार आना बर्दाश्त से बहार रहेगा । और अपने देवर और देवरानी को भी धमका कर अलग रहने को कहा ।और कहती तुम कहीं और जाकर रहो । हम बड़े हैं तो घर पर हमारा ही हक बनता है। इतने समय से हम ही इसको सम्भाल रहे हैं। और दोनों ननदों को कहती हैं अब तुम भी अपने अपने घर जाओ।
दोनों बहनें कहती हैं ठीक है वो अपनी माँ की वसीयत के बारे में बतातीं है । अपनी मां द्वारा तैयार वसीयत के आधार पर बड़ी को ऊपर वाला हिस्सा और छोटे को मकान का नीचे का हिस्सा और बीच के दो कमरे जो उनके दोनों बहनों के हिस्से में थे कहतीं हैं अब इनका क्या करना ? हम दोनों बाद में सोचेंगे दुबारा आयेंगे विचार करके फिर बतायेंगे उनका क्या करेंगे ?
सास द्वारा तैयार वसीयत को सुनकर बड़ी बहु नंदनी पहले तो बड़ा एतराज़ करती है मगर वकील को बुलवाने पर उसके कहने पर उसको राजी हो जाना पड़ता है। और चुपचाप अपने ऊपर के हिस्से में चली जाती है।
दोनों बहनें छोटे भाई से कहती हैं भाई तुम चिन्ता मत करो हम तुम्हारे साथ है। तुमको घर से बड़ी भाभी नहीं निकाल सकतीं । मां को पहले ही अंदेशा था वो वसीयत करवा कर गई है। छोटा भाई कहता है बहनों मैं तो पढ़ने लिखने में ज्यादा होशियार नहीं था इसलिए छोटी सी नौकरी है मगर हम दोनों खुश हैं। तुम्हारा भी रूखे सूखे से स्वागत कर लेंगे। लेकिन तुम दोनों बहनें आते जाते रहना। दोनों बहनें हाँ में हामी भर फिर अपने घर चली जाती है।
माँ के स्वर्गवास होने के बाद इस बार रक्षाबंधन पर दोनों बहनें फिर भाईयों के घर आतीं हैं। बड़ी बहु नंदनी तो पहले ही सुबह सुबह पति को लेकर अपने मायके चली जाती है। बबीता और उसकी बहन का, छोटा भाई और उसकी पत्नी बहुत अच्छे से स्वागत करते हैं। दोनों बहनें भाई के माथे पर टीका लगा राखी बांधती है। और जैसे ही छोटी बहु उनको देने के लिए दो साड़ियां लेकर आतीं है। बबीता कहती हैं भाभी माना की मैं घर में सबसे छोटी हूँ लेकिन आज मुझे इस राखी के धागे की कीमत समझानी है । मुझे पता है आप विशाल दिल की है आपको जो साड़ियां आपके मायके से अपने भाईयों से मिलती वो आप सम्भाल कर रख लेती हमको देने के लिए। हम बहनें बहुत खुश हैं हमको आप जैसी भाभी मिली । आप ने हमारी माँ के संस्कारों को आगे बढ़ाने में जो सहयोग दिया अपनाया हम तो बस उसी में खुश हैं हमको और कुछ नहीं चाहिए। बस आप दोनों अपना प्यार और अपनापन ऐसे ही बनाए रखना ।
हाँ तो अब हमारी बात ध्यान से सुनें। आपके पास नीचे दो कमरे हैं ही । इसलिए हम दोनों ने सोच समझकर बीच के अपने हिस्से के दो कमरे जो आप दोनों को देने की नजर से ही हमने अपने नाम करवाये । वरना बड़ी भाभी सब हथिया लेती। आज वो दोनों कमरे हम किराये में दे रहीं हैं। दो लड़कियां जिनको आपके पीजी गैस्ट रूप में हमने रखने को बुलाया है। उससे आपकी बहुत अच्छी खासी कमाई भी हो जायेगी । बस आपको उनको सुबह का नाश्ता देना होगा । बाकी वो अपने ऑफिस में इंतजाम कर लेंगी । हाँ अगर रात का खाना कहें या मांगें तो आपको उसी हिसाब से वो अलग से पैसा देंगीं । इससे आपका घर भी आसानी से चल जायेगा। और हाँ वो दोनों लड़कियां हमारे परिचित अच्छे खानदान की बेटियां हैं यहीं पास में ही नोकरी करतीं। आप चिंता मत कीजिएगा हम सब घटनाओं पर बराबर नजर रखेंगे।
छोटा भाई और उसकी पत्नी आश्चर्यजनक मुद्रा में दोनों बहनों का मुंह ताकने लगते हैं। बहनों का उनके बारे में इतना सोचना दोनों पति-पत्नी को द्रवित कर जाता है । दोनों बहनें फिर अपने बैग में से प्यारी सुन्दर साड़ियां निकाल छोटी भाभी के हाथ में रख देतीं है । फिर एक रेशमी राखी का धागा उनके हाथ में बांधकर कहती हैं… ये राखी का धागा दिखने में हल्का मामूली सा मगर हकीकत में बहुत मजबूत होता है। जो भाई ही नहीं भाभी के हाथ में उतनी ही शोभा देता है। क्योंकि भाभी इसकी असली हकदार हैं जो इसको मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वो चाहे तो इसका सम्मान करवा ले न चाहे तो इसका कोई महत्व ही नहीं रह जाता ।
आप इसकी असली हकदार हैं कहकर बबीता छोटी भाभी के गले लगा गई । सभी के दिल खिल जाते हैं, उनमें खुशी की कोई सीमा नहीं रहती । और रक्षाबंधन का त्यौहार घर की रौनक को चार चांद लगा देता है। बड़ी बहन कहती हैं चलो अब माता-पिता से आशीर्वाद ले लेते हैं। सभी घर के एक तरफ लगी माता पिता की तस्वीर के आगे खड़े होकर प्रणाम करते हैं। सभी एकटक तस्वीर को निहार रहे तभी सभी को ऐसा महसूस होता हैं माता पिता की तस्वीर मानो आशीर्वाद की झड़ियां बरसा रही हो ।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया