सूरज की यह बात सुनकर दीनदयाल सन्न रह गया। एक छोटा सा बच्चा, जो खुद ठंड से कांप रहा है, वह अपने भविष्य, अपनी पढ़ाई और अपनी मां के सपनों के लिए अपने शरीर को गर्माहट देने वाले इकलौते सहारे को बेचने निकल पड़ा था। दीनदयाल को अचानक अपना वो बेटा याद आ गया, जिसे उसने अपनी हैसियत से बढ़कर हर सुख-सुविधा दी, लेकिन उसने कभी पढ़ाई की कद्र नहीं की। और यहां यह गरीब बच्चा पढ़ाई के लिए अपनी सबसे कीमती चीज कुर्बान कर रहा था।
दीनदयाल का गला भर आया। उसने अपने खुरदरे हाथों से सूरज के आंसू पोंछे।
“बेटा, इंसान बड़ा अपने कपड़ों से नहीं, अपनी सोच और अपने इरादों से बनता है। तूने तो आज ही साबित कर दिया कि तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा,” दीनदयाल ने भरे हुए गले से कहा।
दिसंबर का महीना था और शहर में कड़ाके की ठंड पड़ने लगी थी। सूरज ढलते ही बर्फीली हवाएं हड्डियों तक को कंपा देने लगती थीं। शहर के बाहरी इलाके में बसी ‘रामनगर’ कॉलोनी और उससे सटी हुई ‘मजदूर बस्ती’ के बीच एक चौड़ी सड़क गुजरती थी। इसी सड़क के किनारे दीनदयाल अपनी पुरानी साइकिल पर एक चलता-फिरता स्टॉल लगाया करता था। दीनदयाल की साइकिल के पीछे एक बड़ा सा लकड़ी का बक्सा बंधा रहता था, जिसमें वह बच्चों के लिए पुरानी किताबें, कॉपियां, सस्ते पेन, पेंसिल और छोटे-मोटे खिलौने रखकर बेचा करता था। जिंदगी के साठ वसंत देख चुके दीनदयाल का अपना कोई परिवार नहीं था। सालों पहले एक बीमारी ने उसकी पत्नी को छीन लिया था और इकलौता बेटा गलत संगति में पड़कर घर छोड़कर चला गया था। अब यह साइकिल, उस पर रखी किताबें और आस-पास खेलते बच्चे ही दीनदयाल की दुनिया थे। वह दिन भर रामनगर कॉलोनी के चक्कर लगाता और शाम को बस्ती के मुहाने पर खड़ा हो जाता, जहां बस्ती के गरीब बच्चे उसकी रंग-बिरंगी किताबों और खिलौनों को ललचाई नजरों से देखते थे।
उस शाम ठंड कुछ ज्यादा ही थी। हवा में गलन थी और सड़क पर लोगों की आवाजाही कम होने लगी थी। दीनदयाल भी अपनी साइकिल के हैंडल पर रखे मफलर को कान पर लपेटते हुए घर लौटने की तैयारी कर रहा था। आज दिन भर में कुछ खास कमाई नहीं हुई थी। वह अपने गल्ले के चिल्लर गिन ही रहा था कि तभी उसे लगा जैसे कोई उसकी साइकिल के पास खड़ा है। उसने पलट कर देखा तो एक दस-ग्यारह साल का दुबला-पतला सा लड़का वहां खड़ा था। ठंड के मारे वह हल्का-हल्का कांप रहा था, क्योंकि उसने सिर्फ एक घिसी हुई सूती कमीज और एक ढीला ढाला पैंट पहना हुआ था। लेकिन उसके हाथों में एक बहुत ही सुंदर, चमचमाती हुई नीले रंग की गर्म जैकेट थी। वह जैकेट बिल्कुल नई लग रही थी और उस गरीब बस्ती के माहौल से बिल्कुल मेल नहीं खा रही थी।
लड़के ने दीनदयाल की तरफ देखते हुए झिझकते हुए कहा, “बाबा… ओ बाबा! क्या आप पुराने सामान के बदले पैसे देते हो?”
दीनदयाल ने अपनी ऐनक को नाक पर टिकाते हुए उस लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा। बस्ती के ज्यादातर बच्चों को वह चेहरे से पहचानता था, लेकिन यह लड़का शायद कभी उसकी दुकान पर नहीं आया था।
“मैं पुरानी किताबें लेता हूं बेटा, और उसके बदले दूसरी किताबें या थोड़े बहुत पैसे दे देता हूं। पर तुम क्या बेचना चाहते हो?” दीनदयाल ने पूछा।
लड़के ने अपने हाथों में पकड़ी वह नई नीले रंग की जैकेट दीनदयाल की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “बाबा, यह जैकेट ले लो। यह बहुत गर्म है। आप इसे बेचोगे तो आपको अच्छे पैसे मिल जाएंगे। इसके बदले मुझे सौ रुपये दे दो।”
दीनदयाल की आंखें उस जैकेट पर टिक गईं। वह जैकेट किसी अच्छे शोरूम की लग रही थी। उसका कपड़ा और सिलाई बता रहे थे कि वह काफी महंगी होगी। दीनदयाल के मन में तुरंत शक पैदा हुआ। इतनी महंगी जैकेट इस गरीब बस्ती के लड़के के पास कहां से आई? कहीं इसने किसी बड़े घर से चोरी तो नहीं की है? समाज के कड़वे अनुभवों ने दीनदयाल को हमेशा सतर्क रहना सिखाया था।
“तेरा नाम क्या है रे? और सच-सच बता, यह जैकेट तूने कहां से चुराई है? अगर झूठ बोला तो अभी पुलिस को बुला लूंगा,” दीनदयाल ने थोड़ी सख्त आवाज में कहा।
दीनदयाल की डांट सुनकर लड़के की आंखें भर आईं। वह घबराकर पीछे हटने लगा, लेकिन फिर उसने अपने आंसू पोंछे और अपनी ठुड्डी को ऊपर उठाते हुए कहा, “मेरा नाम सूरज है बाबा। मैं चोर नहीं हूं। मेरी मां रामनगर कॉलोनी के बड़े वाले बंगले में बर्तन मांजने का काम करती है। यह जैकेट कल ही उस बंगले वाली मालकिन ने मेरी मां को दी थी… मेरे लिए। मालकिन के बेटे को यह छोटी हो गई थी, लेकिन यह बिल्कुल नई है। मैंने इसे एक बार भी नहीं पहना है।”
“जब मालकिन ने तेरे पहनने के लिए दी है, और इतनी कड़ाके की ठंड पड़ रही है तू कांप भी रहा है, तो फिर इसे बेच क्यों रहा है पागल लड़के?” दीनदयाल का शक अब हैरानी में बदल चुका था।
सूरज की आंखों से अब आंसू बहने लगे। उसने कांपते होठों से कहना शुरू किया, “बाबा, मुझे पैसों की बहुत जरूरत है। मुझे एक किताब खरीदनी है। अगर कल मैंने वह किताब स्कूल में नहीं दी, तो मास्टर जी मुझे परीक्षा में नहीं बैठने देंगे।”
“किताब? कौन सी किताब? और स्कूल की किताब के लिए जैकेट बेचने की क्या जरूरत आन पड़ी? तेरी मां से पैसे मांग लेता,” दीनदयाल ने पूछा, उसके मन में अब इस बच्चे के प्रति एक अजीब सी हमदर्दी पैदा होने लगी थी।
सूरज ने गहरी सांस ली और बोला, “बाबा, मैं सरकारी स्कूल में पढ़ता हूं। हमारे स्कूल के मास्टर जी ने मुझे ‘नवोदय विद्यालय’ की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए एक बहुत मोटी और अच्छी किताब दी थी। मास्टर जी कहते हैं कि अगर मैं वह परीक्षा पास कर लूंगा, तो मुझे एक बहुत बड़े और अच्छे स्कूल में पढ़ाई करने का मौका मिलेगा, वह भी बिल्कुल मुफ्त। वहां रहने-खाने का भी पैसा नहीं लगता। मैं खूब मन लगाकर उस किताब से पढ़ाई कर रहा था। मेरी मां दिन भर दूसरों के घरों में काम करती है ताकि मुझे और मेरी छोटी बहन गुड़िया को पढ़ा सके। मैं पढ़-लिखकर एक बड़ा अफसर बनना चाहता हूं ताकि अपनी मां को एक पक्का घर बनाकर दे सकूं।”
दीनदयाल बिना पलक झपकाए उस नन्हे से बच्चे की बड़ी-बड़ी बातें सुन रहा था। उस बच्चे की आंखों में जो चमक और संकल्प था, वह उसने बड़े-बड़े लोगों में भी नहीं देखा था।
“तो फिर किताब का क्या हुआ?” दीनदयाल ने पूछा।
सूरज का चेहरा उतर गया। “बाबा, आज सुबह मां काम पर गई थी और मुझे गुड़िया का ध्यान रखने को कह गई थी। गुड़िया अभी सिर्फ चार साल की है। मैं धूप में बैठकर उस किताब से गणित के सवाल हल कर रहा था कि तभी गुड़िया खेलते-खेलते वहां आ गई। उसके हाथ में पानी से भरा एक डिब्बा था। अचानक उसका पैर फिसला और वह डिब्बे का सारा पानी मेरी उस किताब पर गिर गया। किताब पूरी तरह भीग गई और उसके पन्ने गल कर फट गए। जब मैंने देखा तो मुझे बहुत गुस्सा आया, मैंने गुड़िया पर हाथ भी उठाया, लेकिन फिर वह रोने लगी तो मुझे बुरा लगा। गलती उसकी नहीं थी, वह तो नासमझ है। लेकिन अब मैं मास्टर जी को क्या जवाब दूंगा? वह किताब सौ रुपये से भी ज्यादा की थी। मेरी मां के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह नई किताब दिला सके। अगर मैं कल किताब लेकर नहीं गया, तो मेरा नाम उस परीक्षा से कट जाएगा। मेरा बड़ा आदमी बनने का सपना टूट जाएगा बाबा। इसलिए… इसलिए मैं यह जैकेट बेचने आया हूं। ठंड तो मैं किसी तरह सह लूंगा, लेकिन अनपढ़ रह गया तो मेरी मां की मेहनत बेकार हो जाएगी।”
सूरज की यह बात सुनकर दीनदयाल सन्न रह गया। एक छोटा सा बच्चा, जो खुद ठंड से कांप रहा है, वह अपने भविष्य, अपनी पढ़ाई और अपनी मां के सपनों के लिए अपने शरीर को गर्माहट देने वाले इकलौते सहारे को बेचने निकल पड़ा था। दीनदयाल को अचानक अपना वो बेटा याद आ गया, जिसे उसने अपनी हैसियत से बढ़कर हर सुख-सुविधा दी, लेकिन उसने कभी पढ़ाई की कद्र नहीं की। और यहां यह गरीब बच्चा पढ़ाई के लिए अपनी सबसे कीमती चीज कुर्बान कर रहा था।
दीनदयाल का गला भर आया। उसने अपने खुरदरे हाथों से सूरज के आंसू पोंछे।
“बेटा, इंसान बड़ा अपने कपड़ों से नहीं, अपनी सोच और अपने इरादों से बनता है। तूने तो आज ही साबित कर दिया कि तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा,” दीनदयाल ने भरे हुए गले से कहा।
उसने सूरज के हाथ से वह नीली जैकेट ली और उसे सूरज के कंधों पर पहनाकर उसकी चेन बंद कर दी। फिर उसने अपने लकड़ी के बक्से के नीचे रखा लोहे का गल्ला खोला। आज दिन भर की कमाई मिलाकर उसमें मुश्किल से एक सौ बीस रुपये थे। दीनदयाल ने बिना एक पल की देरी किए उसमें से सौ रुपये का एक कड़क नोट निकाला और सूरज के हाथ पर रख दिया।
“बाबा… यह क्या कर रहे हैं आप? आपने तो जैकेट ली ही नहीं,” सूरज ने अचरज से कहा।
दीनदयाल मुस्कुराया, उसकी झुर्रियों में एक अजीब सा सुकून तैर रहा था। “यह जैकेट तेरे लिए ही है बेटा, इसे पहन कर रख वरना बीमार पड़ जाएगा। और यह सौ रुपये मेरी तरफ से उधार समझ ले। जब तू बड़ा अफसर बन जाएगा न, तो मुझे ढूंढ़कर मेरे ये पैसे वापस कर देना। और हां, अपनी उस छोटी बहन गुड़िया को कभी मत डांटना। वह नासमझ है, पर तू तो समझदार है।”
सूरज की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत झुककर दीनदयाल के पैर छू लिए। “बाबा, मैं आपका यह अहसान कभी नहीं भूलूंगा। मैं आपको जरूर पैसे लौटाऊंगा। मैं आपको अफसर बनकर दिखाऊंगा।”
सूरज सौ रुपये मुट्ठी में भींचे, अपनी नई जैकेट पहने खुशी-खुशी बस्ती की तरफ दौड़ पड़ा। दीनदयाल काफी देर तक उस बच्चे को जाते हुए देखता रहा। आज उसका गल्ला लगभग खाली था, आज उसे शायद सूखी रोटी खाकर ही सोना पड़े, लेकिन उसके दिल में जो अमीरी और जो सुकून आज महसूस हो रहा था, वह दुनिया की किसी भी दौलत से बढ़कर था। उसने एक मासूम के टूटे हुए सपनों को फिर से जोड़ दिया था, और अनजान होते हुए भी इंसानियत का एक ऐसा रिश्ता कायम कर दिया था जो हमेशा उसके दिल को गर्माहट देता रहेगा।
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मूल लेखक : – डॉ. रामकुमार घोटड़