एक माँ का इंतज़ार

देहरादून की शांत वादियों के बीच बसा वह बड़ा सा पुश्तैनी घर अब और भी ज्यादा खामोश लगने लगा था। साठ साल की शांति देवी रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले उस पुरानी लकड़ी की आराम कुर्सी को साफ करती थीं, जिस पर बैठकर कभी उनके पति अखबार पढ़ा करते थे। घर के हर कोने में यादें बसी थीं, लेकिन उन यादों को साझा करने वाला अब कोई नहीं था। उनके पति को गुजरे हुए पाँच साल हो चुके थे और उनका इकलौता बेटा, विकास, अपनी पत्नी श्रुति और आठ साल के बेटे कबीर के साथ अमेरिका के सिएटल शहर में बस गया था।

घर के बाहर एक बड़ा सा जामुन का पेड़ था, जिसकी पत्तियाँ जब हवा से सरसराती थीं, तो शांति जी को लगता जैसे किसी के कदमों की आहट हो रही है। वह दौड़कर दरवाज़े पर जातीं, लेकिन वहां सिवाय सूनेपन के और कुछ नहीं होता था। घर में सुख-सुविधा की कोई कमी नहीं थी। विकास हर महीने एक मोटी रकम उनके बैंक खाते में भेज देता था। घर में बड़ा सा स्मार्ट टीवी था, हर कमरे में एसी लगा था, और काम करने के लिए दो नौकर थे। लेकिन शांति जी का दिन उस स्मार्ट टीवी के आगे नहीं, बल्कि उस छोटे से मोबाइल फोन को घूरते हुए कटता था, जो उनके बेटे ने उन्हें पिछली बार भारत आने पर दिया था।

आज रविवार था। एक समय था जब रविवार का दिन शांति जी के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था। सुबह से ही उनके चेहरे पर एक अलग सी चमक होती थी। वह जल्दी-जल्दी नहा-धोकर, पूजा पाठ निपटाकर फोन के पास बैठ जाती थीं। क्योंकि भारत के समय के अनुसार रविवार की सुबह विकास का वीडियो कॉल आता था। वह दौर शांति जी की जिंदगी का सबसे खूबसूरत दौर था, पति के जाने के बाद वही वीडियो कॉल्स उनके जीने का सहारा थे।

शुरुआती सालों में, जब विकास नया-नया अमेरिका गया था, तब वह हर छोटी-छोटी बात अपनी माँ को बताता था। “माँ, आज यहाँ बहुत बर्फ गिरी है”, “माँ, श्रुति ने आज बिलकुल आपके हाथों जैसी आलू की सब्जी बनाई है”, “माँ, कबीर ने आज स्कूल में पोयम सुनाई”। वह कबीर को स्क्रीन के सामने लाता था। छोटा सा कबीर अपनी तोतली जुबान में ‘दादी-दादी’ कहता तो शांति जी की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़ते थे। वह स्क्रीन पर ही अपने पोते का माथा चूम लेती थीं।

लेकिन फिर, जैसे-जैसे समय का पहिया घूमा, विकास की तरक्की होती गई और उसके पास समय की कमी होने लगी। जो कॉल्स हर रविवार आते थे, वे पंद्रह दिन में एक बार आने लगे। फिर वह सिलसिला महीने में एक बार का हो गया। शांति जी खुद को समझातीं कि बेटा परदेस में है, बड़ी कंपनी में काम करता है, जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। वह खुद को दिलासा देतीं कि कम से कम महीने में एक बार तो वह कबीर का चेहरा देख ही लेती हैं।

पर अब… पिछले आठ महीनों से हालात बिल्कुल बदल चुके थे। अब महीने में भी कॉल नहीं आता था। बस कभी दिवाली पर, तो कभी मदर्स डे पर एक ‘फॉरवर्डेड’ मैसेज आ जाता। शांति जी को तो अंग्रेजी पढ़नी भी ठीक से नहीं आती थी, वह काम वाली बाई से पूछतीं कि बेटे ने क्या लिखकर भेजा है। जब काम वाली बाई बताती कि ‘हैप्पी मदर्स डे’ लिखा है, तो वह उसी मैसेज को बार-बार देखती रहतीं, जैसे उस मैसेज में ही उनके बेटे की आवाज़ छुपी हो।

शाम के चार बज चुके थे। शांति जी ने अपनी सहेली और पड़ोसन, सुमित्रा को चाय पर बुलाया था। सुमित्रा भी अपनी उम्र के उसी पड़ाव पर थी, लेकिन उसका भरा-पूरा परिवार उसके साथ रहता था। सुमित्रा जब शांति जी के घर आई, तो उसने देखा कि शांति जी की आँखें लाल हैं और वे बार-बार अपने फोन की स्क्रीन को जलाकर देख रही हैं।

“क्या हुआ शांति? आज फिर विकास का फोन नहीं आया?” सुमित्रा ने सोफे पर बैठते हुए पूछा।

शांति जी ने एक गहरी सांस ली और अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी नम आँखें पोंछते हुए कहा, “नहीं सुमित्रा। सुबह से इंतज़ार कर रही हूँ। मैंने खुद भी तीन बार कॉल किया, लेकिन हर बार श्रुति ने फोन उठाया। पहली बार कहा कि विकास अभी सो रहा है। दूसरी बार कहा कि वह वीकेंड पर गोल्फ खेलने गया है। और तीसरी बार तो उसने बड़ी झुंझलाहट से कहा कि ‘मम्मी जी, विकास बहुत बिजी है, मंडे को उसकी एक बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है, वह तैयारी कर रहा है, हम आपको बाद में कॉल करेंगे।’ इतना कहकर उसने फोन काट दिया।”

सुमित्रा ने सांत्वना देते हुए शांति जी के हाथ पर अपना हाथ रखा।

शांति जी का दर्द अब शब्दों के रूप में बहने लगा था। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी टीस थी। “सुमित्रा, क्या कोई इंसान सच में इतना व्यस्त हो सकता है कि उसे अपनी जन्म देने वाली माँ से दो मिनट बात करने का भी वक्त न मिले? जब वह छोटा था और उसे बुखार आता था, तो मैं रात-रात भर नहीं सोती थी। मेरे पति ने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी, अपना पीएफ, सब कुछ दांव पर लगा दिया था ताकि विकास अमेरिका जाकर पढ़ सके। हमने कभी उसे अपनी परेशानियों की भनक तक नहीं लगने दी। और आज… आज उसके पास मेरे लिए दो मिनट नहीं हैं।”

वह थोड़ी देर रुकीं, फिर एक लंबी आह भरते हुए बोलीं, “शुरुआत में वह मुझे कबीर का चेहरा दिखाता था। मेरा पोता अब कितना बड़ा हो गया होगा, मुझे तो ठीक से याद भी नहीं। पिछली बार जब बात हुई थी, तो कबीर सिर्फ अंग्रेजी में बोल रहा था, उसे मेरी हिंदी समझ नहीं आ रही थी। मैंने उसे पुकारा, पर वह अपने वीडियो गेम में मगन था। श्रुति भी अब बस औपचारिकता निभाती है। वह मुझे ऐसे ट्रीट करती है जैसे मैं कोई आउटडेटेड मशीन हूँ जिसे बस मेन्टेन करना है, जिससे कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं रखना।”

सुमित्रा चुपचाप सुन रही थी। वह जानती थी कि शांति जी के इस दर्द का कोई इलाज नहीं है।

“तुम्हें पता है सुमित्रा,” शांति जी ने एक खोई हुई सी नज़र से कमरे में रखे महंगे फर्नीचर को देखते हुए कहा, “कल ही विकास ने मेरे खाते में पचास हज़ार रुपये भेजे हैं। पिछले महीने उसने मेरे लिए यह नया आईफोन भिजवाया था। पर मैं इन रुपयों का क्या करूँ? इस महंगे फोन का क्या करूँ जब इस पर मेरे बेटे की आवाज़ ही नहीं आती? जब इंसान बूढ़ा हो जाता है ना सुमित्रा, तो उसकी जरूरतें बहुत सिमट जाती हैं। उसे न तो महंगे रेशमी कपड़ों की चाहत रहती है, न ही बैंक में लाखों रुपयों की और न ही इस बड़े से खाली मकान की। इस उम्र में इंसान को सिर्फ अपनों के साथ की जरूरत होती है। उसे बस यह एहसास चाहिए होता है कि कोई है जो उसकी फिक्र करता है, जो उसके साथ बैठकर पुराने दिनों की बातें कर सके। दो प्यार भरे शब्द… बस यही तो चाहिए होता है।”

शांति जी फूट-फूट कर रोने लगीं। उनका बरसों का दबा हुआ दर्द आज सुमित्रा के सामने बह निकला था। “मैं इस बड़े से घर में अकेले भूतों की तरह घूमती हूँ। जब रात को सीने में दर्द होता है, तो डर लगता है कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। ये पैसे, ये ए.सी., ये टीवी मेरी बीमारी में मेरे सिरहाने बैठकर मेरे बाल नहीं सहला सकते। मुझे विकास का पैसा नहीं, मेरा बेटा चाहिए। मुझे उसका वक्त चाहिए।”

सुमित्रा ने शांति जी को गले लगा लिया। दोनों बुजुर्ग महिलाएं उस आलीशान लेकिन बेजान घर में एक-दूसरे के दर्द को साझा कर रही थीं।

कुछ दिन और बीत गए। हवाओं में हल्की ठंडक घुलने लगी थी और बाज़ारों में रौनक बढ़ने लगी थी। दिवाली का त्योहार अब बस कुछ ही दिन दूर था। पड़ोस के हर घर में रंग-रोगन, साफ़-सफ़ाई और दीयों की तैयारी चल रही थी, लेकिन शांति जी के मन में एक गहरा अंधकार छाया हुआ था। उन्होंने मन ही मन कठोर निर्णय ले लिया था कि इस बार वह दिवाली बिल्कुल नहीं मनाएंगी। उन्होंने काम वाली बाई को भी दीये या मिठाइयाँ लाने से मना कर दिया था।

“जब इस घर का असली चिराग ही मुझसे मुँह मोड़ चुका है, तो फिर ये मिट्टी के दीये जलाकर मैं किसके लिए रोशनी करूँ? जब मेरा अपना ही परिवार मेरे साथ नहीं है, तो यह त्योहार मेरे लिए किस काम का?” उन्होंने उदास और भारी मन से सोचा।

वह अपनी उसी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी इन्हीं ख्यालों में खोई थीं कि अचानक उनके हाथ में रखे फोन की घंटी ज़ोर से बज उठी। स्क्रीन पर ‘वीडियो कॉल’ चमक रहा था। शांति जी के हाथ कांपने लगे, दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उन्होंने जल्दी से चश्मा पहना और कॉल उठाया।

सामने स्क्रीन पर विकास, श्रुति और छोटा कबीर, तीनों के चेहरे खिले हुए थे।

“हैप्पी दिवाली माँ!” तीनों ने एक साथ मुस्कुराते हुए कहा।

शांति जी की आँखों से बेतहाशा आँसू छलक पड़े। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “कैसी दिवाली बेटा? तुम लोगों के बिना यहाँ सब सूना है। ये घर मुझे काटने को दौड़ता है।”

  “माँ, मुझे माफ़ कर दो। अब यह घर और सूना नहीं रहेगा। हम हमेशा के लिए आपके पास वापस आ रहे हैं।”

शांति जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह हतप्रभ रह गईं, “क्या… क्या कह रहा है तू? कुछ दिनों की छुट्टियों पर आ रहे हो?”

“नहीं माँ, हमेशा के लिए,” विकास ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “अमेरिका में इतने साल रहकर मैंने बहुत पैसे और नाम कमा लिया। मैं यहाँ एक बहुत बड़ा और कामयाब डॉक्टर तो बन गया, लेकिन अपनी जन्म देने वाली माँ का अच्छा बेटा नहीं बन पाया। मुझे अब जाकर यह एहसास हुआ है कि दुनिया की कोई भी कामयाबी, कोई भी बैंक बैलेंस या बड़ा घर अपनों के बिना पूरी तरह अधूरा है। हमने फैसला किया है कि हम वापस अपने शहर आ रहे हैं। मैं अब यहीं रहकर अपना खुद का क्लिनिक खोलूँगा, अपने देश के लोगों का इलाज करूँगा और सबसे ज़रूरी बात… हमेशा अपनी माँ के साये में रहूँगा।”

श्रुति ने भी प्यार से सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ माँ जी, हमें हमारी गलती का एहसास हो गया है। कबीर भी अब अपनी दादी के पास रहकर अपनी संस्कृति और संस्कार सीखेगा। हम अगले हफ्ते ही हमेशा के लिए इंडिया लौट रहे हैं।”

छोटा कबीर भी अपनी तोतली लेकिन प्यारी सी आवाज़ में बोल पड़ा, “दादी, मैं आ रहा हूँ आपके साथ दिवाली मनाने!”

यह सुनकर शांति जी के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उनका हृदय इतनी ज़ोर से धड़क रहा था मानो अभी सीने से बाहर आ जाएगा। उनके पिछले पंद्रह सालों का सारा अकेलापन, सारा दर्द, सारी शिकायतें और वह अंतहीन इंतज़ार उन चंद शब्दों के साथ ही जैसे हवा में कपूर की तरह उड़ गया। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके जीवन के सूखे और मुरझाए हुए पेड़ पर फिर से वसंत लौट आया हो।

आँखों से लगातार बहते खुशी के आँसुओं के बीच उन्होंने घर के मंदिर में रखी भगवान की मूर्ति की ओर देखा और दोनों हाथ जोड़ लिए। आज उन्हें लगा कि उनका जीवन सचमुच पूर्ण हो गया है। उनके सूने घर का चिराग हमेशा के लिए वापस लौट रहा था। अब उनके मन में कोई डर नहीं था। अब जब भी इस दुनिया से उनके विदा होने का वक्त आएगा, तो कम से कम उनके अपने, उनका परिवार उनके पास होगा, और वह एक असीम सुकून और खुशी के साथ इस दुनिया से विदा हो पाएंगी।

उन्होंने झट से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लाईं और बाई को आवाज़ लगाई, “अरी ओ सुन, बाज़ार जा और ढेर सारे दीये और मिठाइयाँ ले आ, इस बार की दिवाली मेरी ज़िंदगी की सबसे रोशन दिवाली होने वाली है!”

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लेखिका : सारा चंद्रा 

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