लखनऊ की सर्द और कोहरे में लिपटी हुई नवंबर की वह सुबह देवकी जी के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी। साठ पार कर चुकीं देवकी जी पिछले कई सालों से इस विशाल और पुराने पुश्तैनी मकान में नितांत अकेली रह रही थीं। उनके इकलौते बेटे सिद्धार्थ की नौकरी मर्चेंट नेवी में थी, जिसके चलते उसका अधिकांश समय समंदर की लहरों के बीच ही बीतता था। तीन साल पहले जब सिद्धार्थ ने अमेरिका में रहने वाली एक अनाथ लड़की अनन्या से कोर्ट मैरिज की थी, तो देवकी जी चाहकर भी अपने ख़राब स्वास्थ्य और वीज़ा की दिक्कतों के कारण उस शादी में शामिल नहीं हो पाई थीं। उस वक़्त उन्हें लगा था कि शायद उनका बेटा अब हमेशा के लिए उनसे दूर हो गया है। एक अनजान देश की, अनजान सी लड़की, जिसका रहन-सहन, संस्कृति सब कुछ अलग था, वह कैसे इस पुराने ख्यालों वाली सास को समझ पाएगी? यह सवाल देवकी जी के मन में अक्सर उठता था।
लेकिन वक़्त ने एक बिल्कुल ही अलग और खूबसूरत दास्तान रची। शादी के बाद अनन्या ने जब पहली बार देवकी जी को फोन किया था, तो उसकी उस सहमी हुई, लेकिन मीठी सी आवाज़ में एक ऐसी कशिश थी जिसने देवकी जी के मातृत्व को झकझोर दिया था। धीरे-धीरे वे फोन कॉल्स चंद मिनटों से घंटों में तब्दील होने लगे। बिना एक-दूसरे की शक्ल देखे, हज़ारों मील की दूरी से एक ऐसा पारिवारिक रिश्ता पनपने लगा जो नितांत नैसर्गिक और पवित्र था। उन दोनों के बीच सास-बहू जैसी कोई औपचारिकता या सत्ता का कोई संघर्ष नहीं था। अनन्या, जिसने बचपन से ही माता-पिता का प्यार नहीं देखा था, उसे देवकी जी की आवाज़ में एक ऐसी माँ मिल गई थी जो उसे बिना किसी शर्त के सुनती थी। और देवकी जी को एक ऐसी बेटी मिल गई थी, जिससे वे अपने मन की हर वह बात कह सकती थीं जो उन्होंने कभी सिद्धार्थ से भी नहीं कही थी। यह एक मानसिक स्तर पर दो एकाकी आत्माओं का चिर मिलन था, जहाँ एक-दूसरे से कोई भौतिक लालसा नहीं थी, बल्कि सिर्फ स्नेह और सम्मान का एक अथाह समंदर था जिसे दोनों भरपूर जी लेना चाहती थीं।
आज 15 नवंबर की तारीख थी, और अनन्या पहली बार भारत, अपने घर आ रही थी। सिद्धार्थ अपनी ड्यूटी पर था, इसलिए अनन्या ने देवकी जी के साथ कुछ महीने बिताने का फैसला किया था। प्रतीक्षा के वे पल देवकी जी के लिए किसी सदी की तरह बीत रहे थे। जहाँ एक तरफ बेटे की पत्नी से पहली बार मिलने का उत्साह था, वहीं मन के किसी कोने में एक अज्ञात सा डर भी छिपा था। क्या मैं उसे सच में पसंद आऊँगी? क्या मेरी पुरानी आदतें, मेरा यह पुराना सा घर उसे रास आएगा? फोन पर बनी हुई वह जादुई दुनिया कहीं हकीकत की ज़मीन पर आकर दरक तो नहीं जाएगी? यही सब उधेड़बुन करते-करते देवकी जी टैक्सी लेकर अमौसी एयरपोर्ट पहुँच चुकी थीं।
गोमती नगर के उनके घर से एयरपोर्ट तक का वह बीस किलोमीटर का रास्ता आज उन्हें बहुत छोटा लगा था। उन दोनों ने एक-दूसरे को पहचानने के लिए कोई खास कपड़े या कोई चिन्ह तय नहीं किया था। देवकी जी का मानना था कि जो रिश्ते आत्मा से जुड़ते हैं, उन्हें आँखों से ढूंढने की ज़रूरत नहीं पड़ती; दिल खुद-ब-खुद उन्हें पहचान लेता है। अराइवल गेट के बाहर खड़ी देवकी जी की नज़रें बेताबी से मुसाफिरों की भीड़ को टटोल रही थीं।
तभी गेट से एक युवा लड़की बाहर निकली। उसने एक बहुत ही सादा सा सूती सूट पहना हुआ था और उसके चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत और थकावट का मिश्रण था। देवकी जी ने उसे कभी तस्वीरों के अलावा सामने से नहीं देखा था, लेकिन उसे देखते ही उनके कदम अपने आप उसकी तरफ बढ़ गए। वह कोई और नहीं बल्कि उनके सपनों और आवाज़ों की दुनिया की अनन्या ही थी। देवकी जी को अपनी तरफ आता देख अनन्या भी ठिठक गई। उसके होंठों पर एक कांपती हुई मुस्कान तैर गई। बिना किसी औपचारिकता के देवकी जी ने पूछा, “अनन्या, मेरी बच्ची?” और अनन्या की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने कुछ कहे बिना ही आगे बढ़कर देवकी जी को कसकर गले लगा लिया। उस एक आलिंगन में सालों की तपस्या, अनकहे दर्द और एक-दूसरे को पा लेने का सुकून छिपा था।
वे दोनों टैक्सी में बैठ गए। देवकी जी टैक्सी के एक कोने में बैठी थीं और अनन्या दूसरे कोने में। जैसे फोन पर घंटों बात करने वाले दो लोग जब पहली बार मिलते हैं, तो एक मीठी सी झिझक उनके बीच आ खड़ी होती है, वैसा ही कुछ इस वक़्त टैक्सी के भीतर था। टैक्सी में एक सुकून भरी खामोशी छाई हुई थी। अनन्या कांच के बाहर लखनऊ की सड़कों को देखते हुए बीच-बीच में कनखियों से देवकी जी को निहार रही थी। वह सोच रही थी कि उसकी ‘माँ’ कितनी सरल, सादगीपूर्ण और निर्मल हैं। एक अत्यंत पवित्र हृदय जैसे उसके बहुत करीब धड़क रहा था।
अचानक अनन्या ने देवकी जी की तरफ देखा और अपनी वह मीठी, जानी-पहचानी आवाज़ में बड़ी ही शालीनता से मुस्कुरा कर कहा, “माँ… क्या घर में भी आप मुझसे यूँ ही दूर बैठेंगी?”
यह सुनते ही देवकी जी मन ही मन सिहर उठीं। ममता की एक सुखद बिजली सी उनके तन-बदन में दौड़ गई और उन्होंने भावुक होकर अपना सिर झुका लिया। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अनन्या ने खिसक कर उनका हाथ थाम लिया।
कुछ ही देर में वे घर पहुँच गए। वह पुराना घर जो सालों से खामोश पड़ा था, आज अनन्या के कदमों की आहट से जैसे जी उठा था। दोनों घर के दालान में बैठीं। सफर की थकान मानो कहीं गायब हो गई थी। वे घंटों यूँ ही बैठी ढेरों बातें करती रहीं—वही बातें जो वे फोन पर किया करती थीं, लेकिन आज उन बातों में स्पर्श का जादू भी शामिल था। देवकी जी को अपना नीरस और एकाकी जीवन बड़ा नया-नया सा लग रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे रात के सारे सितारे टूटकर उनके आंगन को रोशन कर रहे हों, जैसे पतझड़ में अचानक सारी ऋतुएं मिलकर फूल बरसा रही हों, जैसे घर के मंदिर की घंटियां किसी ईश्वरीय उपस्थिति में एक साथ बज उठी हों या फिर जैसे दिसंबर की कड़कती ठंड में अचानक कुनकुनी सी, राहत देने वाली धूप निकल आई हो।
अचानक बातें करते-करते अनन्या की आँखें भर आईं। उसने देवकी जी के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा, “माँ! आपको सामने से देखकर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं स्वयं के वजूद से, अपने उस परिवार से मिल ली हूँ जिसके लिए मैं बचपन से तरसती थी। फोन पर आप मेरी आवाज़ थीं, लेकिन आज आप मेरी आत्मा बन गई हैं। क्या आप भी ऐसा ही महसूस कर रही हैं?”
यह कहकर अनन्या ने अपनी उँगलियों में देवकी जी की उँगलियों को मज़बूती से जकड़ लिया था। देवकी जी के होंठ कुछ बोलने के लिए थरथरा उठे, पर भावनाओं के उस ज्वार में उनके कंठ से कोई शब्द न निकल सका। उन्होंने बस धीरे से, पूरी सहमति और प्यार के साथ अपना सिर हिला दिया। इस गहरी खामोशी में उन दोनों की आँखें आँसुओं से भीगती जा रही थीं। यह वो पल था जहाँ सारे डर, सारी दूरियां और सारे संशय मिट चुके थे। देवकी जी को महसूस हुआ कि उनके अकेलेपन के उस वीरान महाद्वीप पर अब खुशियों ने स्थायी रूप से कदम रख दिया है, और अब वे इस दुनिया में कभी अकेली नहीं होंगी।
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