विदाई की वह रात: माँ के तीन अनोखे उपहार

अनन्या ने वह डिब्बी अपने सीने से लगा ली और माँ के गले लगकर बोली, “माँ, मुझे अब कोई डर नहीं लग रहा। आपने मुझे गृहस्थी को जोड़ने और खुद को न टूटने देने का जो अचूक मंत्र दिया है, मैं उसे अपनी सांसों में बसा कर रखूंगी। मैं पहले सबको समझूंगी, बिना वजह न किसी की बुराई करूंगी और न सुनूंगी। लेकिन मैं आपसे वादा करती हूँ कि गलत होते हुए देखकर कभी अपनी आँखें बंद नहीं करूंगी। मैं आपकी एक मजबूत बेटी बनकर दिखाऊंगी।”

सुजाता की आँखों से अब खुशी और गर्व के आंसू बह निकले। उन्होंने अपनी बेटी का माथा चूमा और कहा, “मुझे तुमसे यही उम्मीद थी मेरी बच्ची। अब मुझे तुम्हारी विदाई की कोई फिक्र नहीं है, क्योंकि मेरी बेटी अब एक नए घर को स्वर्ग बनाने और अपने वजूद को कायम रखने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

विवाह वाले घर में रात के दो बजे भी एक अजीब सी हलचल होती है। कहीं दूर बजती शहनाई की गूंज अब थम चुकी थी, लेकिन आंगन में अभी भी रिश्तेदारों की धीमी-धीमी बातचीत और खनखनाते बर्तनों की आवाजें तैर रही थीं। घर के एक कोने में बने उस छोटे से कमरे में खामोशी का साम्राज्य था, जहां अनन्या अपने सूटकेस में कुछ आखिरी सामान रख रही थी। कल सुबह उसकी विदाई थी। वह एक ऐसे घर में जा रही थी, जिसके बारे में उसने सिर्फ सुना था—’रायजादा परिवार’, शहर का एक नामी और विशाल संयुक्त परिवार। अनन्या, जो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी, जिसने हमेशा एक एकाकी और शांत माहौल में जीवन बिताया था, आज एक अनजाने डर से कांप रही थी। उसके मन में सवालों का बवंडर उठ रहा था। क्या वह इतने बड़े परिवार में खुद को ढाल पाएगी? क्या इतने सारे लोगों के अलग-अलग मिजाज के बीच उसका अपना वजूद कहीं खो तो नहीं जाएगा?

तभी दरवाजे पर एक हल्की सी आहट हुई। अनन्या की माँ, सुजाता, हाथ में हल्दी वाले दूध का गिलास लिए खड़ी थीं। सुजाता के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था, लेकिन उनकी आँखों के कोनों में वह नमी साफ झलक रही थी जो हर माँ अपनी बेटी की विदाई से पहले महसूस करती है। माँ को देखते ही अनन्या की आँखों से आंसू छलक पड़े। वह दौड़कर अपनी माँ के गले लग गई। सुजाता ने अपनी बेटी के माथे को चूमा और उसे बिस्तर पर बिठाते हुए दूध का गिलास उसके हाथों में थमा दिया। कुछ देर तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई, सिर्फ खामोशी थी जो उनके दिलों के शोर को बयां कर रही थी।

सुजाता ने अनन्या के आंसुओं को अपने पल्लू से पोंछते हुए कहा, “मैं जानती हूँ मेरे बच्चे, तुम्हारे मन में क्या चल रहा है। तुम घबराई हुई हो। तुम्हें लग रहा है कि तुम एक नई दुनिया में जा रही हो, जहां सब कुछ तुम्हारे लिए नया है, लोग नए हैं, उनके तौर-तरीके नए हैं।” अनन्या ने सिसकते हुए हामी भरी और बोली, “माँ, मैंने हमेशा आपके और पापा के लाड-प्यार में दुनिया देखी है। मुझे नहीं पता कि मुझे वहां कैसे रहना है। अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो? अगर कोई मेरी बात का बुरा मान गया तो? मैंने सुना है कि बड़े परिवारों में छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बन जाता है। मैं वहां खुद को कैसे साबित कर पाऊंगी?”

सुजाता मुस्कुराईं। उन्होंने अपनी साड़ी की कमर से बंधा चाबियों का गुच्छा एक तरफ किया और अपने हाथ में पकड़ी एक छोटी सी, बेहद खूबसूरत नक्काशीदार लकड़ी की डिब्बी अनन्या के सामने रख दी। अनन्या ने हैरानी से उस डिब्बी को देखा और पूछा, “यह क्या है माँ? मेरे गहने तो आपने कल ही मेरे सूटकेस में रख दिए थे।” सुजाता ने डिब्बी खोलते हुए कहा, “ये सोने-चांदी के गहने नहीं हैं बेटा। ये वो गहने हैं जो तुम्हारी गृहस्थी को हमेशा महकाए रखेंगे। आज मैं तुम्हें विदाई में कुछ ऐसा देना चाहती हूँ, जो उम्र भर तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा।”

अनन्या ने उत्सुकता से उस डिब्बी के अंदर झांका। उसमें तीन चीजें रखी हुई थीं—एक छोटा सा चांदी का ताला, रुई के कुछ फाहे जो एक कांच की छोटी शीशी में बंद थे, और एक चांदी के तार में पिरोया हुआ खुली आँख के आकार का पेंडेंट। अनन्या कुछ समझ नहीं पाई। उसने सवालिया नजरों से अपनी माँ की तरफ देखा।

सुजाता ने सबसे पहले वह चांदी का छोटा सा ताला उठाया और अनन्या की हथेली पर रखते हुए कहा, “बेटा, यह ताला तुम्हारी जुबान के लिए है। तुम जिस घर में जा रही हो, वहां कई तरह के लोग होंगे। किसी का स्वभाव नरम होगा, तो किसी की बोली में कड़वाहट होगी। तुम्हें हर तरह की बातें सुनने को मिलेंगी। लेकिन तुम्हें यह याद रखना है कि बिना सोचे-समझे अपनी जुबान न खोलो। जब तक किसी बात की पूरी सच्चाई न जान लो, तब तक अपनी कोई पक्की राय मत बनाना। दूसरों की बुराई में कभी शामिल मत होना। अगर कोई तुम्हारे सामने किसी तीसरे की निंदा कर रहा हो, तो अपनी जुबान पर यह ताला लगा लेना। याद रखना, शब्द एक बार मुँह से निकल जाएं तो वापस नहीं आते, और बड़े परिवारों में यही शब्द रिश्तों में दरार डाल देते हैं। जहाँ जरूरी हो, बस वहीं बोलना।”

अनन्या ने उस ताले को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसे अपनी माँ की बात में बहुत गहराई नजर आ रही थी। इसके बाद सुजाता ने वह कांच की शीशी उठाई जिसमें रुई के फाहे रखे थे। “यह रुई तुम्हारे कानों के लिए है,” सुजाता ने कहा। “गृहस्थ जीवन में, खासकर एक सम्मिलित परिवार में, तुम्हें कई बार ऐसी बातें सुनने को मिलेंगी जो तुम्हारे दिल को चुभ सकती हैं। कोई तुम्हारे काम में नुख्स निकालेगा, कोई तुम्हारे मायके वालों पर ताना कसेगा, तो कोई बेवजह तुम्हें नीचा दिखाने की कोशिश करेगा। ऐसे वक्त में, तुम्हें अपने कानों में यह रुई डाल लेनी है। हर नकारात्मक बात को दिल से लगाने की जरूरत नहीं होती। जो बातें तुम्हारे आत्मसम्मान को न कुचलें, लेकिन सिर्फ तुम्हें उकसाने के लिए कही गई हों, उन्हें एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देना। अगर तुम हर ताने का जवाब देने लगोगी, तो अपनी ही मानसिक शांति खो बैठोगी। कुछ बातों को अनसुना कर देना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।”

अनन्या सब कुछ बहुत ध्यान से सुन रही थी। उसने मन ही मन ठान लिया था कि वह इन बातों को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाएगी। लेकिन अभी तीसरी चीज बाकी थी।

सुजाता ने डिब्बी में से वह चांदी का खुली आँख वाला पेंडेंट उठाया। इस पेंडेंट को देखकर सुजाता के चेहरे के भाव थोड़े गंभीर हो गए। उन्होंने अनन्या का हाथ अपने हाथों में लिया और कहा, “मेरी सबसे जरूरी सीख इस पेंडेंट में छिपी है। हमारे समाज में हमेशा से लड़कियों को सिखाया जाता है कि ससुराल जाकर कुछ भी गलत देखो तो आँखें बंद कर लो, अनदेखा कर दो, सहन कर लो। लेकिन मैं तुम्हारी माँ हूँ, और मैं तुम्हें आँखें बंद करना नहीं सिखाऊंगी। यह खुली आँख का पेंडेंट इस बात का प्रतीक है कि तुम्हें हमेशा अपनी आँखें खुली रखनी हैं। तुम्हें चौकन्ना रहना है। अगर तुम देखती हो कि घर में कुछ गलत हो रहा है, किसी के साथ अन्याय हो रहा है, या तुम्हारे अपने आत्मसम्मान को कुचला जा रहा है, तो उस वक्त तुम्हें चुप नहीं रहना है। गलत को चुपचाप सहना भी गलत करने वाले का साथ देना ही होता है। समय बदल गया है मेरी बच्ची। तुम्हें एक आदर्श बहू बनना है, लेकिन एक गूंगी-बहरी और अंधी बहू नहीं। बुराई मत देखो, यह पुरानी बात हो गई; मेरी सीख यह है कि बुराई को देखो, उसे पहचानो और उसके खिलाफ डटकर खड़ी रहो। तुम्हारी प्राथमिकता तुम्हारा स्वाभिमान और सत्य होना चाहिए।”

यह सुनकर अनन्या की आँखों में एक नई चमक आ गई। रात का वह डर और घबराहट अब एक अजीब से आत्मविश्वास में बदल गई थी। उसे समझ आ गया था कि उसकी माँ ने उसे सदियों पुरानी कहावतों को नए सांचे में ढालकर जीवन जीने का कितना बड़ा फलसफा सिखा दिया था। जुबान पर संयम, कानों से फालतू बातों का त्याग, लेकिन आँखों में अन्याय को पहचानने की तेज रौशनी।

अनन्या ने वह डिब्बी अपने सीने से लगा ली और माँ के गले लगकर बोली, “माँ, मुझे अब कोई डर नहीं लग रहा। आपने मुझे गृहस्थी को जोड़ने और खुद को न टूटने देने का जो अचूक मंत्र दिया है, मैं उसे अपनी सांसों में बसा कर रखूंगी। मैं पहले सबको समझूंगी, बिना वजह न किसी की बुराई करूंगी और न सुनूंगी। लेकिन मैं आपसे वादा करती हूँ कि गलत होते हुए देखकर कभी अपनी आँखें बंद नहीं करूंगी। मैं आपकी एक मजबूत बेटी बनकर दिखाऊंगी।”

सुजाता की आँखों से अब खुशी और गर्व के आंसू बह निकले। उन्होंने अपनी बेटी का माथा चूमा और कहा, “मुझे तुमसे यही उम्मीद थी मेरी बच्ची। अब मुझे तुम्हारी विदाई की कोई फिक्र नहीं है, क्योंकि मेरी बेटी अब एक नए घर को स्वर्ग बनाने और अपने वजूद को कायम रखने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

उस रात के बाद सवेरा हुआ, शहनाइयां फिर से बजीं, और अनन्या जब विदा होकर रायजादा परिवार की दहलीज पर खड़ी हुई, तो उसके चेहरे पर कोई अनजाना खौफ नहीं था। उसके पास उसके सूटकेस में रखे महंगे कपड़ों और गहनों से भी ज्यादा कीमती वह लकड़ी की डिब्बी थी, जो उसे हर कदम पर सही राह दिखाने वाली थी। उसने अपने नए जीवन का पहला कदम एक अटूट आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ाया।

क्या आपको भी लगता है कि हर माँ को अपनी बेटी को ऐसे ही संस्कार देने चाहिए? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं!

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