शुचिता जब ब्याह कर ससुराल आई,तब उसे अपने आप को नए परिवेश में ढालने में समय लगा। मायके में सबसे बड़ी और लाड़ली बेटी।पढ़ने में सदा अव्वल,सुंदर और सुशील।दादी तो तब आशीर्वाद देतीं थीं जब शुचिता पांचवीं कक्षा में थी”महारानी बनकर राज करेगी मेरी मोना।” शुचिता ने रानी बनने के ख्वाब तो नहीं देखे थे, पर अनुशासनप्रियता ने उसे और अधिक मजबूत बना दिया था।
अपनी मां को देखकर कई बार शुचिता ने जानना चाहा”मां,तुम्हारी क्या मजबूरी थी?तुमने क्यों किया समझौता परिस्थितियों से।कहां कलकत्ता जैसा आधुनिक शहर,और कहां कैमोर एक छोटा सा तहसील।ना तो ज्यादा सुविधाएं हैं यहां,और ना ही करने को कुछ।क्यों हां कर दी थी तुमने शादी के लिए?”
मां वास्तव में अब तक अपने कलकत्ता को भूल नहीं पाईं थीं।वहां का स्कूल,स्कूल में साड़ी पहनकर और दो चोटी करके जाना।हर शनिवार सभी का पिक्चर देखने जाना,बहुत याद आता था मां को।हमेशा कहतीं”तेरी शादी मैं बंगाल में ही करवाऊंगीं।ननिहाल के पास।
जब तेरा मन ना लगे वहां जा तो सकती है।यहां की जिंदगी से वहां की जिंदगी बिल्कुल अलग है।तू मत करना समझौता मेरी तरह।हमारे समय तो लड़कियों से उनकी पसंद के बारे में पूछा ही नहीं जाता था।तेरे नाना नानी ने पसंद किया,हो गई शादी।अब ज़िंदगी भर इस समझौते को मानकर चलना पड़ेगा।”
इस” समझौता “शब्द से बड़ी चिढ़ होती थी शुचिता को।शादी के बाद समझौते के नाम पर एक औरत को अस्तित्व ही बदलना क्यों पड़ता है? मैं तो नहीं करूंगी कोई भी समझौता।शादी के बाद देखा , तब जाना कि मायके में जो रुतबा था उसका, उससे कहीं ज्यादा रौब शुचिता के पति(सुबोध) का था।गुस्सा एक दम नाक पर।अपने परिवार से प्यार तो बहुत करते थे, पर अपने पौरुष से कभी समझौता करते नहीं देखा।
शरीर दुबला पतला था , पर अकड़ में कोई कमी नहीं थी।वो भी परिवार के बड़े बेटे थे।यह भाग्य का ही विधान था कि दोनों बड़ी संतानों को एक दूसरे के साथ बंधन में बंधना पड़ा। समझौता के नाम से चिढ़ने वाली शुचिता ने ना जाने कब इस विपरीत ध्रुव वाले व्यक्ति से समझौता कर लिया, समझ ही नहीं आया।जो नाज नखरे शुचिता के भाई बहन उसके लिए उठाते थे, अब वह वहीं कर रही है अपने पति के लिए।यदि समझौता ना करो तो , घर में क्लेष और अशांति।
पहली बार जब मां आईं तो ,अपनी बेटी के बदले स्वरूप को देख अचंभित कम हताश ज्यादा हुईं।समय मिलते ही पूछ बैठीं”तू मेरी शुचिता तो नहीं लगती अब।क्या बन गई है ससुराल में।मायके में जहां तेरे सामने तेरे भाई -बहन आपस में जोर से बात नहीं करते थे,यहां दामाद जी चिल्ला देते हैं तुझ पर हर बात में,और तू उत्तर भी नहीं मांगती ऐसे व्यवहार का।क्यों?”
शुचिता तब मां को समझाती”मां,यह समझौता तो सभी लड़कियों को करना पड़ता है।ससुराल में बहुत सारे रिश्ते निभाने पड़ते हैं।सारे बड़े जटिल होते हैं।इन संबंधों को यदि बांधकर रखना है,तो मुझे सरल होना पड़ेगा ना?” मां कभी खुश नहीं हो पाती थी ,उसकी बातें सुनकर।
धीरे-धीरे समय के साथ समझौता जीवन का एक अमिट अंग ही बन गया।पर हैरानी की बात यह थी कि शुचिता को कभी हैरानी या गुस्सा नहीं आया।वह अपने दांपत्य को मजबूती देने में जुटी रही।
शुचिता की सास अपने जमाने में बड़ी दबंग थीं।शादी के ठीक पहले होने वाले पति का पैर सेना में नौकरी करते समय जख्मी हो जाने से काटना पड़ा ,बिल्कुल जांघ से।सास को उनके घरवालों ने शादी से मना कर देने का दवाब दिया।तो उन्होंने अपने भाग्य से समझौता कर उसी इंसान से शादी की।
उन्होंने ही बातों बातों में बताया था एक दिन” पता है बहू,मेरा बहुत बड़ा सिलाई का सेंटर था।तुम्हारे ससुर के पैर कट जाने के बाद सभी ने मुझे शादी ना करने की सलाह दी,पर मैंने परिस्थितियों से समझौता नहीं किया।मुझे अपने आप पर भरोसा था।
मैंने जिस आदमी से शादी की,उसने कभी मुझे किसी तरह की तकलीफ़ नहीं होने दी।कमाई पूरी मेरे हांथ में रखीं उन्होंने।घर चलाने की जिम्मेदारी मुझे सौंप कर वो निश्चिंन्तहो गए।बहुत भरोसा किया उन्होंने मुझ पर,बदले में मैंने अगर थोड़ा सा समझौता कर लिया तो भी घाटे में तो नहीं हूं।तीन -तीन बच्चों की मां हूं।अपने तरीके से बच्चों की परवरिश की है मैंने।मुझे कोई अफसोस नहीं है उस समझौते के लिए।”
सास की कहानी सुनकर तो शुचिता को पूरा यकीन हो गया कि समझौते की कीमत जितनी बड़ी होती है, संतुष्टि भी उतनी ज्यादा मिलती है।जिस औरत ने अपने नारीत्व को समझौते की बिसात पर रख दिया हो,
उससे ज्यादा ,समझौता तो और कुछ नहीं हो सकता।शादी के बाद बेटे को जबरदस्ती बहू के साथ बाहर घूमने भेजना,ज्यादा से ज्यादा समय बहू को बेटे के साथ बिताने का ज्ञान देना यह भी तो समझौतों के भिन्न रूप हैं।
अब धीरे-धीरे सास की उम्र बढ़ रही है, साथ में शुचिता की भी।
अब उम्र के इस पड़ाव में छोटी-छोटी बातों से ही खिसियाहट होने लगती।बच्चे बड़े हो रहे थे।सबके पसंद का खाना बनाओ अलग-अलग,फिर खुद भी स्कूल जाओ।स्कूल से आते ही शाम की चाय बनाओ।थकान होने लगती थी शुचिता को जब ज्यादा।कभी बच्चे आपस में जोर से बात करते, तो शुचिता की क्रोध अग्नि धधकने लगती।बड़बड़ाते हुए बच्चों को वही डायलॉग बोलने लगी थी
अब शुचिता, “शादी के बाद से ही कितना समझौता किया है मैंने। कहीं बाहर एप्लाई नहीं कर पाई,कि इन बुजुर्गों को दिक्कत हो जाएगी।ना कभी छुट्टियों में समुद्र तट तक पहुंच पाई ना ही शिमला मनाली जा पाई कभी।बस बैठकर घर संभालने में ही पूरी जिंदगी चली गई मेरी।”
सुबोध ने कभी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की,बस चुपचाप वहां से चले जाते।एक सास ही थीं,जो तसल्ली देने से कभी नहीं चूकती थीं।हमेशा ढांढ़स बधाते हुए कहतीं”बस कुछ ही सालों की बात है बेटा।बच्चे बड़े होकर खुद ही समझदार हो जाएंगे।तुम्हारा हांथ बंटाएंगे।तुम्हारे मन की हर साध पूरी करेंगे वो,देखना।ये जो हम औरतें समझौता करती रहतीं हैं ना,
अंत में ईश्वर ब्याज सहित हमें सुख लौटा ही देतें हैं।तुम गुस्से में अपना मन उदास ना करो।” तब उनकी बातें मानो जले पर नमक छिड़कने का काम करती।उन्हें कह भी दिया था कितनी बार शुचिता ने”आपको तो अच्छे पति मिल गए,अच्छे बच्चे भी मिल गए।मेरे तो पति ही नहीं समझते मेरी परेशानी।
जब देखो तब नाक में गुस्सा सवार रहता है।एक मिनट के लिए फुर्सत में मेरा बैठना नहीं भाता उन्हें।मेरी कीमत जब उन्हें ही नहीं,तो किसी और से क्या उम्मीद करना।पता नहीं कब तक ऐसे ही समझौता कर -कर के जीना पड़ेगा।मां ठीक कहती थी,शुरू से ढील दे दो,तो सब सर पर सवार हो जातें हैं।”
शुचिता के जवाब से मां खुश तो नहीं होती थीं,पर ज्यादा बात को बढ़ाती भी नहीं थी।थोड़े समय के बाद शुचिता फिर से सामान्य होकर अपने काम में जुट जातीं।
बीतते हुए सालों के साथ बहू और सास से कब दोनों मां-बेटी बन गईं पता ही नहीं चला।सुबोध के रहते ही ननदों ने जब-जब सास से अपने घर आकर रहने को कहा, उन्होंने मना ही किया था।शुचिता ने जब भी जोर दिया बेटियों के पास जाकर कुछ दिन रहकर आने के लिए, उन्होंने मना कर दिया।
बेटियों के फोन आने पर ही उनसे बात करते देखा था, शुचिता ने।कभी कभार शुचिता ही नंबर मिलाकर बात करने को कहती,तो बड़े ही सहज भाव से वो कहतीं” बेटियां अपने -अपने परिवार में व्यस्त रहती हैं।उन्हें जब मेरी याद आएगी,ख़ुद ही लगा लेंगी,मैं किसी को क्यों परेशान करूं?मैं खुश हूं यहां।तुम भाभी हो,मन हो तो बात कर लिया करो।” अब धीरे-धीरे शुचिता को समझ आने लगा कि,असली समझौता तो सासू मां ने किया।
पिछली चार पीढ़ियों के साथ सहज और सहर्ष समझौता करके ज़िंदगी खुशहाल जी रहीं हैं।पहले अपने भाग्य और मायके से समझौता करके,एक पैर के व्यक्ति से शादी की।उस शादी को उन्होंने सहानुभूति कभी नहीं बनने दिया,बल्कि प्रेम और सम्मान से निभाया।फिर समझौता किया,
अपने बच्चों के साथ।तीसरी बार समझौता किया अपनी बहू के साथ।इकलौते बेटे की शादी करवाकर कभी उन्होंने उस पर हक नहीं जताया।बेटे-बहू की जिंदगी में कभी दखलअंदाजी नहीं की।बहू के मायके से लोग आते थे,तो उन्हें ससम्मान स्वीकार किया।
पोते -पोतियों को कलेजे से लगाकर पाला।रातों को जग-जग कर उनके बॉटलों में दूध भरा,नैपी बदली।बदले में कभी शिकायत नहीं की।बहू के नौकरी करने पर समाज और परिवार में,बहू की तारीफ भी उन्होंने बिना किसी प्रत्याशा के की।अब चौथी पीढ़ी के साथ भी खुशी -खुशी दिन बिता रही हैं।पति और बेटे के जाने के बाद अब मानो,पोते में ही उनकी जान बसती है।
बचपन से दादी के साथ सोने वाला पोता अब जवान हो गया है।सोते समय उसे पंखा तेज चाहिए।शुचिता ने कहा एक दिन उनसे”आपको तो ठंड लग जाती है, इतनी तेज हवा में।पोते को हॉल में सोने को कह दूंगी,
आप पंखा बिना चलाए सो सकती हैं।” उन्होंने तब भी हंसकर कहा”अरे, नहीं-नहीं।जवान बच्चा है, उसे तो गर्मी लगेगी ही।मैं मोटा चादर ले लूंगी।उसे वहीं सोने दो, जहां शुरू से सो रहा है।”
अब शुचिता ने वास्तव में मान लिया कि समझौता उसने तो कभी किया ही नहीं।ससुराल में भी अपने अस्तित्व को बिना गंवाए,एक मजबूत वट वृक्ष की छांव में सर उठाकर गर्व के साथ अपनी जिंदगी जी है उसने।बच्चों को उनकी दादी को सौंपकर कोई समझौता नहीं किया था उसने, बल्कि एक कुशल कार्यशाला में दाखिला करवाया था।
जहां उन्हें दादी से संस्कार भी मिले और शिक्षा भी।रामायण और महाभारत शुचिता ने कभी नहीं पढ़कर सुनाया, ना ही कहानी सुनानी पड़ी।
वो तो उनकी दादी ने ही सोते समय लगातार सुनाया था।सोनी पर प्रसारित कौन बनेगा करोड़पति के प्रश्न सुनकर शुचिता का बेटा झट से दादी के पास ऐसे ही नहीं पहुंचता था।वो थीं ही एनसाइक्लोपीडिया अपने जमाने की।आज भी अखबार पढ़कर पूरी दुनिया में होने वाली घटनाओं की जानकारी वही देतीं हैं।वहीं हमारी गूगल , चैट-जी टी और जैमिनी हैं।
शुचिता को अपने बेटे के साथ कार में जाते हुए देखकर हमेशा खुश ही होतीं हैं,कभी यह नहीं कहतीं कि मेरे बेटे की गाड़ी है।अपनी जिंदगी की ढलती सांझ में भी वो शुचिता के घर के आंगन की तुलसी को निहारकर कहती हैं”एक छोटा सा बांस का टुकड़ा ला देना, मैं बांध दूंगीं।
सुबोध की कमाई, शुचिता की कमाई और ना ही अब अपने पोते की कमाई पर कभी हक जताया उन्होंने, बल्कि अपने सुखों की लिस्ट कम कर दी है ।एक वैसलीन, नारियल वाली टॉफी, पैराशूट नारियल तेल, गूगली बिस्किट और हाजमोला में ही उनकी संतुष्टि देखकर, शुचिता अब प्रायश्चित करना नहीं भूलती ईश्वर के सामने।
समझौता कहकर हम जो महान बनने का स्वांग रचते हैं, यह समझौता नहीं भविष्य के सुख के खजाने की पेशगी है। उन्होंने जितने भी समझौते किए हों, कभी गिनाया नहीं।शायद इसीलिए वो गंगाजल की तरह अथाह और पवित्र सरिता सी बह रहीं हैं, बिना रुके, बिना झुके।पहाड़ समान दुख भी उनका रोस्ता रोक नहीं पाए।
“पांच बज गए बेटा,टी वी चला देना जरा।बाबू(पोता)नहीं आया क्या अभी तक ड्यूटी से?फोन करके पता करो,बहुत देर हो गई।” शुचिता को अब उठना पड़ेगा।फोन भी करना ही पड़ेगा दादी के पोते को।ये बड़ी नहीं हैं घर की , बल्कि बड़प्पन से भरी हुई हैं।शुचिता भी समझौता नहीं करती समन्वय करने का प्रयास करती है।
शुभ्रा बैनर्जी
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