घुटन भरे रिश्ते से आज़ादी – तन्वी

क्या कभी तुम्हें ऐसा लगा है कि तुम सांस ले रही हो पर जी नहीं रही हो? रिया के साथ हर दिन वही होता था।

लोग कहते हैं लड़कियां पराया धन होती हैं पर रिया को लगता था कि वह धन नहीं, एक पिंजरा है जिसमें सिर्फ उसकी सांसें घुट रही थीं।

रिया 20 साल की, 12वीं पास लड़की थी। एक ऐसी लड़की जिसका ना कोई दोस्त था और सिर्फ चारदीवारी में कैद ज़िन्दगी थी। उसका सपना था अध्यापिका बनने का पर घरवालों की बातें उसे अंदर ही अंदर खा जाती थीं।

रिया के घरवालों ने उसे अंदर से बिल्कुल खोखला कर दिया था। रोक-टोक करना, विश्वास ना करना। वो समझ ही नहीं पाती थी कि घरवाले चाहते क्या हैं। उसको पढ़ाना तो चाहते हैं पर कैद करके उन चार दीवारों में।

रिया की माँ भी जब रिया फोन देख रही होती थी तो धीरे से कहती, “ज्यादा फोन मत देख, पापा डांटेंगे। लेट मत काम कर वरना पापा डांटेंगे।”

रिया के पापा का उससे पूछा गया एक सवाल “तुझमें काबिलियत क्या है” जो उसे अंदर से पूरी तरह तोड़ देता था। वह तब कुछ बोल ना पाई पर मन में खुद से कहा कि अगर मैं 10 मिनट कहीं आने में देरी हो जाऊं तो 10 सवाल खड़े हो जाते हैं।

घरवाले बोलते तो हैं कि हम हैं पर उनसे कुछ कहने में डर लगता था, मानो वो रिया को ही गलत कर देते।

रिया उम्र से 20 साल की थी पर दिमाग कभी खाली नहीं रहता था। घर का प्रेशर, सबको गलत लगने वाली रिया। सबको छोड़ने का कई बार सोचती और खुद से कहती कि सबको बाहर लगी चोट तो दिखाई देती है पर जो अंदर से उसे खत्म कर रहा था वो कभी कोई नहीं सोचता।

वह इन सब से पूरी तरह से थक चुकी थी। पर वो इसी को अपनी ज़िन्दगी मान चुकी थी। धीरे-धीरे अपने मन को मना चुकी थी उन चार दीवारों में कैद होने के लिए। खुद से बातें करना, सवाल करना और खुद को जवाब देना। सबके सामने नॉर्मल होना।

फिर एक दिन रिया ने अपनी डायरी में लिखा नहीं, अपने पापा से कहा। उसने कहा – “पापा आप पूछते हो मुझमें काबिलियत क्या है, तो सुनो। काबिलियत ये है कि इतनी घुटन में भी मैं ज़िंदा हूँ। आप लोगों को बाहर की चोट दिखती है, अंदर से मैं रोज़ मरती हूँ वो कोई नहीं देखता।”

उस दिन घर में सन्नाटा छा गया। पापा ने कुछ नहीं कहा। अगली सुबह पापा ने खुद उसके लिए एक छोटी सी टेबल लायी और कहा – “ले, ये तेरी ट्यूशन की पहली क्लास के लिए।”

रिया समझ गयी, आज़ादी कोई देता नहीं, अपनी आवाज़ से लेनी पड़ती है। आज वो चार दीवारें अब भी हैं, पर अब उनमें एक खिड़की है, जो रिया ने खुद खोली है।

तन्वी

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