हमारी इस नई कॉलोनी में शिफ्ट हुए मुश्किल से एक महीना ही बीता था, लेकिन मेरी सास, सावित्री देवी जी, और सामने वाले फ्लैट की विमला आंटी के बीच जो दोस्ताना परवान चढ़ा था, उसे देखकर ऐसा लगता था मानो वो पिछले जन्म की सहेलियाँ हों। हमारे फ्लैट्स की बालकनी एक-दूसरे के बिल्कुल आमने-सामने थीं।
बीच में बस एक छोटी सी पक्की सड़क का फासला था। हर शाम चार बजते ही, जैसे किसी घड़ी के अलार्म की तरह, दोनों अपनी-अपनी बालकनी में चाय का कप लेकर हाज़िर हो जाती थीं। दोनों के बीच दुनिया भर के विषयों पर चर्चा होती। कभी महंगाई का रोना, कभी रिश्तेदारों की चुगलियाँ, तो कभी टीवी सीरियल्स की कहानियाँ।
मैं, यानी सुहानी, अक्सर किचन में काम करते हुए या ड्राइंग रूम से गुज़रते हुए उनकी बातों के कुछ अंश सुन लिया करती थी। शुरुआत में मुझे यह सब बहुत सामान्य और अच्छा लगता था कि चलो, इस बहाने मम्मी जी का मन तो लगा रहता है।
लेकिन पिछले कुछ दिनों से मैंने एक अजीब सा बदलाव महसूस किया। मम्मी जी की चाय की वो सुकून भरी बैठक अब उनके लिए एक मानसिक तनाव का कारण बनती जा रही थी। और इसका सीधा असर मेरे ऊपर भी पड़ने लगा था। असल में, जब से विमला आंटी ने अपनी नई-नवेली बहू, कविता की तारीफों के पुल बाँधने शुरू किए थे, तब से हमारे घर की शांति जैसे कहीं छूमंतर हो गई थी।
कल शाम की ही बात है। मैं किचन में रात के खाने की तैयारी कर रही थी और बालकनी का दरवाज़ा खुला था। विमला आंटी अपनी भारी और खनकती आवाज़ में मम्मी जी से कह रही थीं, “अरे सावित्री बहन, क्या बताऊँ अपनी बहू के बारे में! साक्षात अन्नपूर्णा है मेरी कविता। सुबह पाँच बजे उठ जाती है।
नहा-धोकर पूजा-पाठ करेगी, फिर पूरे परिवार के लिए नाश्ता बनाएगी। और नाश्ता भी ऐसा-वैसा नहीं! कभी भरवाँ पराठे, कभी ताज़ी कचौड़ियाँ तो कभी इडली-डोसा। उसके हाथ में तो मानो जादू है। दिन भर किचन में खटती रहती है, मजाल है जो कभी माथे पर एक शिकन भी आए। कल तो उसने अकेले दम पर पंद्रह लोगों का खाना बना दिया। बाहर का खाना तो वो घर में घुसने ही नहीं देती।”
मैं अंदर सब्जियाँ काटते हुए बस मुस्कुरा रही थी, लेकिन जब मैं चाय का कप लेने बालकनी में गई, तो देखा कि मम्मी जी का चेहरा उतरा हुआ था। उनके चेहरे पर वही भाव थे जो किसी बच्चे के हाथ से उसका पसंदीदा खिलौना छिन जाने पर होते हैं। वो बस ‘हाँ, हाँ, बहुत अच्छी बात है’ कहकर विमला आंटी की बातें सुन रही थीं।
उस शाम के बाद से ही घर का माहौल थोड़ा भारी-भारी सा हो गया। मम्मी जी हर बात में कमियाँ निकालने लगीं। मैं एक वर्किंग वूमेन हूँ और ऑफिस के साथ-साथ घर भी संभालती हूँ। मैं मानती हूँ कि मैं सुबह पाँच बजे उठकर कचौड़ियाँ नहीं तल सकती, लेकिन मैं कोशिश करती हूँ कि परिवार को पौष्टिक और अच्छा खाना मिले। पर विमला आंटी के ‘कविता पुराण’ ने मम्मी जी के दिमाग में एक ऐसा भ्रम पैदा कर दिया था जिससे मैं अचानक एक ‘नाकाबिल’ बहू बन गई थी।
आज सुबह जब मैंने नाश्ते में ओट्स और सैंडविच बनाए, तो मम्मी जी ने प्लेट को ऐसे देखा जैसे मैंने उन्हें कोई कड़वी दवा परोस दी हो। एक गहरी साँस लेते हुए वो धीरे से बड़बड़ाईं, “आजकल की लड़कियों को तो बस यही सब आता है। दो ब्रेड सेंक दिए और हो गया नाश्ता। कहाँ वो ज़माना था जब बहुएँ सुबह-सुबह घर को पकवानों की महक से भर देती थीं। किसी के घर में तो रोज़ दावत उड़ रही है और हमारे नसीब में ये घास-फूस है।”
उनके इस ताने ने सीधे मेरे दिल पर वार किया। मैं समझ गई थी कि यह विमला आंटी की फेंकी हुई वही गुगली है जिस पर मम्मी जी क्लीन बोल्ड हो चुकी हैं। मुझे बुरा तो बहुत लगा, लेकिन मैं चुप रही। मैं जानती थी कि इस वक्त कुछ भी कहना आग में घी डालने जैसा होगा। मैंने अपना लैपटॉप उठाया और ऑफिस के काम में लग गई, लेकिन दिमाग में वही बातें घूम रही थीं। क्या सच में मैं इतनी बुरी हूँ? क्या सच में कविता एक सुपरवूमन है?
दोपहर का समय था। वीकेंड होने की वजह से मैं घर पर ही थी। मम्मी जी अपने कमरे में आराम कर रही थीं। मुझे याद आया कि मैंने छत पर अचार के जार धूप में रखे थे। मौसम थोड़ा खराब हो रहा था, तो मैं उन्हें नीचे लाने के लिए छत पर गई। हमारी छत से विमला आंटी के घर का पिछला हिस्सा और उनकी सर्विस लेन बिल्कुल साफ दिखाई देती थी।
मैं अचार के जार उठा ही रही थी कि मेरी नज़र विमला आंटी के घर की पिछली गली पर पड़ी। मैंने देखा कि एक मशहूर लोकल रेस्टोरेंट का डिलीवरी बॉय अपनी बाइक पर वहाँ खड़ा था। तभी विमला आंटी के घर का पिछला दरवाज़ा बहुत ही सावधानी से खुला। वहाँ कविता खड़ी थी! वो कविता, जो ‘साक्षात अन्नपूर्णा’ थी और जिसके घर में ‘बाहर का खाना नहीं आता था’।
मैं ठिठक कर वहीं रुक गई। दीवार की आड़ में खड़ी होकर मैं यह नज़ारा देखने लगी। कविता ने बहुत ही फुर्ती से उस डिलीवरी बॉय से दो बड़े-बड़े पैकेट लिए। उसने ऑनलाइन पेमेंट किया और पैकेट लेकर अंदर जाने लगी। लेकिन तभी उसने जो किया, उसे देखकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने वो एल्युमिनियम फॉयल वाले सारे डिब्बे खोले, उनमें से शाही पनीर, दाल मखनी और नान निकालकर अपने घर के चमचमाते स्टील के डोंगे (बर्तनों) में पलटे, और बाहर के उन डिब्बों और पन्नियों को चुपके से गली के कूड़ेदान में डाल दिया। यह सब इतनी सफाई और तेज़ी से हुआ मानो यह उसका रोज़ का काम हो। इसके बाद उसने बहुत ही मासूमियत से दरवाज़ा बंद कर लिया।
मेरे चेहरे पर एक बहुत बड़ी मुस्कान फैल गई। मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। यह वही ‘मशीन’ थी जो सुबह चार बजे उठकर पकवान बनाती थी! मैं मन ही मन हँसते हुए अचार के जार लेकर नीचे आई। मेरा मन हल्का हो चुका था। मेरी सारी हीन भावना हवा हो गई थी।
मैं सीधे मम्मी जी के कमरे में गई। वो अभी भी थोड़ी उदास सी लेटी हुई थीं। मैंने जार टेबल पर रखे और उनके पास बैठ गई।
“मम्मी जी,” मैंने अपनी हँसी को बमुश्किल रोकते हुए कहा, “आज तो कमाल ही हो गया। मैंने अभी-अभी साक्षात ‘अन्नपूर्णा’ माता के दर्शन किए हैं।”
मम्मी जी ने अजीब सी नज़रों से मुझे देखा। “क्या बकवास कर रही है? कौन सी अन्नपूर्णा?”
“वही मम्मी जी, सामने वाली विमला आंटी की सुघड़ और संस्कारी बहू कविता।”
“तो इसमें क्या कमाल हो गया? होगी वो किचन में, बेचारी दिन भर काम जो करती है।” मम्मी जी ने मुँह बनाते हुए कहा।
“अरे मम्मी जी, वो किचन में नहीं, बल्कि सर्विस लेन में खड़ी थी। और उसके हाथों में बेलन नहीं, बल्कि ‘चुन्नू ढाबे’ के बड़े-बड़े पार्सल थे।” इसके बाद मैंने मम्मी जी को छत से देखा गया पूरा दृश्य अक्षरशः सुना दिया। कैसे उसने पार्सल लिए, कैसे खाना अपने बर्तनों में पलटा और कैसे सबूत मिटाने के लिए डिब्बे बाहर फेंक दिए।
जैसे-जैसे मैं कहानी सुना रही थी, मम्मी जी की आँखें बड़ी होती जा रही थीं। उनका मुँह आधा खुला का खुला रह गया था। पहले तो उन्हें मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन जब मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि मैंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है, तो कमरे का माहौल ही बदल गया।
कुछ सेकंड की गहरी शांति के बाद, मम्मी जी के चेहरे पर जो भाव आए, वो देखने लायक थे। उनके चेहरे की वो उदासी, वो जलन, वो चिड़चिड़ापन अचानक एक ज़ोरदार ठहाके में बदल गया। वो इतना हँसीं कि उनकी आँखों में पानी आ गया। मैं भी उनके साथ हँसने लगी। हमारा वो ठहाका जैसे पिछले कई दिनों की घुटन को बाहर निकाल रहा था।
हँसते-हँसते मम्मी जी ने अपने आँसू पोंछे और बोलीं, “हे भगवान! और वो विमला मुझे ऐसे सुनाती थी जैसे उसकी बहू के हाथों में साक्षात जादू हो। मैं भी कितनी पागल हूँ जो उसकी बातों में आ गई। मुझे लगा कि मैं ही अभागी हूँ जिसे पकी-पकाई रोटियां नसीब नहीं होतीं।”
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “मम्मी जी, दूर के ढोल हमेशा सुहावने ही लगते हैं। हर घर की अपनी एक सच्चाई होती है। दिखावे की चाशनी में लिपटी हुई बातें सुनने में तो बहुत मीठी लगती हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है।”
मम्मी जी ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा। “तू सही कह रही है सुहानी। मुझे अपनी बहू पर नाज़ होना चाहिए जो बिना किसी दिखावे के, पूरी ईमानदारी से अपना काम और घर, दोनों संभालती है। मुझे नकली अन्नपूर्णा नहीं, अपनी सच्ची सुहानी ही चाहिए।”
उस शाम जब विमला आंटी फिर से बालकनी में आईं, तो मम्मी जी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी कुर्सी पर बैठी थीं। विमला आंटी ने अपनी आदत के अनुसार फिर शुरू किया, “सावित्री बहन, आज तो कविता ने घर पर ही बिल्कुल रेस्टोरेंट जैसा शाही पनीर बनाया है, तुम भी टेस्ट करना।”
मम्मी जी ने मेरी तरफ देखकर एक शरारती मुस्कान बिखेरी और बहुत ही शांति से विमला आंटी से कहा, “अरे रहने दे विमला! आजकल के बच्चों को कहाँ इतनी मेहनत करने की फुरसत है। और वैसे भी, ‘चुन्नू ढाबे’ का शाही पनीर तो हमारे यहाँ भी बहुत आसानी से डिलीवर हो जाता है। कभी-कभार बाहर का खा लेना भी अच्छा ही होता है, है ना?”
विमला आंटी का चेहरा देखने लायक था। उनका रंग एकदम उड़ गया। वो बिना कुछ कहे जल्दी से चाय का कप लेकर अंदर चली गईं। मैं और मम्मी जी बालकनी में बैठकर बहुत देर तक मुस्कुराते रहे। उस दिन के बाद से विमला आंटी ने कभी अपनी बहू की झूठी तारीफों के पुल नहीं बाँधे, और मेरे घर में फिर से वही पुरानी शांति और मिठास लौट आई।
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मूल लेखिका : मीनाक्षी चौहान