इधर रोजी के लिए तीन सप्ताह मानो तीन दिन की भांति उड़े जा रहे थे। जिस दिन संबंध तय हुआ रोजी की मनःस्थिति बिल्कुल बदल गई। अब तक जिसे वह लापरवाही से ले रही थी, आज वही बात जीवन की सबसे गंभीर घटना बन गई। विवाह का क्या अर्थ होता है, वह पापा-मम्मी के जीवन से सीख चुकी है। अब रोजी को लगने लगा कि वह संभवतः इतनी शीघ्र इसके लिए तैयार नहीं थी। उन्नीसवर्षीय रोजी शरद के साथ हुई दो-तीन संक्षिप्त भेंटों में कोई तार नहीं जोड़ पाई। इधर रोजी खोई-खोई…, उधर शरद चुप-चुप, कुछ सतर्क। भाषा, परिवेश, अमरीका , भारत ने खासी दखलंदाजी की दोनों के बीच।
अपने-अपने संसार में खोए दो प्राणियों का विवाह घर के आंगन में बनी विशाल वेदी पर हो गया। तन जुड़ना अधिक मायने नहीं रखता, यदि मन न जुड़ा हो। यूं भी रोजी को शीघ्र ही लौटना था। शरद के लिए ‘ वीसा’ के लिए कागज तैयार करने थे। शरद को भी अपनी नौकरी से त्यागपत्र देना था।
नाम था उसका रोजी…। वास्तविक नाम था ‘ राजेश्वरी सिन्हा ‘। परन्तु रोजी नाम सबकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि वह सबके लिए रोजी ही बन गई। ‘ राजेश्वरी सिन्हा’ नाम कानूनी दस्तावेजो मे सिमट गया। हम भारतवासी भी अजूबे हैं। अग्रेज चले गए, अग्रेजियत कुछ इस तरह हमारी व्यवस्था पर छा गई कि हम और परतंत्र हो गए। इसलिए गोरा रंग श्वेत वर्ण बहुत लुभावना लगता है। विवाह के विज्ञापन में सांवली कन्या को माता-पिता गोरी या श्वेतवर्णी ही दिखाते हैं। अंग्रेजी नाम भी बड़े भाव से रखे जाते हैं। अतः जूली, रोजी, पिंकी, स्वीटी, बेबी आदि नाम बच्चों से लेकर कुत्तों तक के मिल जाएंगे।
तो सिन्हा दम्पति ने बड़े चाव से अपनी गहरी सांवली कन्या का नाम रोजी रखा था। यह तो मात्र संयोग था कि रोजी जब दो वर्ष की थी तब सिन्हा साहब को अमरीका आने का अवसर मिला। बीस वर्ष पूर्व सिन्हा परिवार अमरीका के छोटे से नगर में आकर बस गया। साथ में आए थोड़े कपड़े लत्ते… रामचरितमानस की प्रति, दीपक, पूजा की सामग्री, मिठाई, अचार, गरम मसाले, पापड़, हींग…। तब यहां यह सब सुलभ नहीं था। बिना हींग के दाल कैसे बनेगी, श्रीमती सिन्हा के लिए यह चिंता का विषय था। जो भी हो, सिन्हा परिवार नवीन वातावरण में र-बस गया।
दो वर्ष की रोजी अपनी मम्मी के साथ घर पर रहती थी। मम्मी की बिहारी एवं टी.वी. की अँग्रेजी में तालमेल बिठाती रहती। सिन्हा दम्पति जब भारत से चले थे, तब टी.बी. का एक ही चैनल आता था । बिजली की अनियमितता के कारण आधे कार्यक्रम देखे भी नहीं जाते थे। अमरीका में रंगीन टी.वी., उस पर बीस-बीस चैनल, सारे दिन तरह-तरह के कार्यक्रम। यह तो भूखे के आगे हलवा रख देने वाली बात हुई। तो रोजी का प्रथम साथी बना टी.वी. और कार्टून पात्र। यह टी.वी. भी चोर की तरह सेंध लगाकर हमारी बुध्धि में प्रवेश करता है और बुद्धि को कब निष्क्रिय बनाकर सोच की शक्ति चुरा ले जाता है, इसका पता बाद में लगता है।
हमारी रोजी भी धीरे-धीरे हिन्दी-बिहारी भूलने लगी। अंग्रेजी बोलने लगी। पांच-छह वर्ष की होते-होते रोजी ने अपने पापा-मम्मी को अंग्रेजी में बात करने के लिए बाध्य कर दिया। जब चार वर्ष बाद सिन्हा परिवार भारत गया, तब रोजी का सिर्फ अंग्रेजी बोलना बहुत ही असुविधाजनक रहा। दादी-नानी से मौसी-बुआ से मेलमिलाप हो ही नहीं सका।
हां तो रोजी का नाम अमरीका में रोजी ही रहा। अब उसका सांवला चेहरा सचमुच गुलाब की भांति गोरे चेहरों के बीच चमकता था। उसका रंग प्रशंसा का पात्र था और काले घने लम्बे बाल सराहने के माध्यम बने।
रोजी अमरीका-भारत, घर-बाहर, हिन्दी-अंग्रेजी के बीच झूलती बड़ी होती गई। पहला झटका सिंहा दंपती को तब लगा, जब बारहवर्षीय रोजी ने बताया कि उसकी सहेली ‘डैबी’ ‘डेट’ पर जाती है। बात कुछ इस प्रकार बढ़ी कि शुक्रवार की शाम को रोजी अकेली, उदास बैठी थी। मम्मी ने कहा कि पड़ोस में जाकर खेल आ।
रोजी ने झुंझलाकर उत्तर दिया, ‘डैबी डेट पर गई है।’
रोजी तब तेरह वर्ष की थी। यह डेट क्या होती है? कहां से शुरु होकर कहां पहुंचती है? कितनी लम्बी होती है आदि प्रश्न श्रीमती सिन्हा को मथरहे थे। मैं डेट पर क्यों नहीं जा सकती हूं? क्या फर्क है मुझमें और डैबी में ? यदि वह डेट पर जाएगी तो कौन-सा लड़का उसके साथ होगा? वह डेट पर जाना भी चाहती है या नहीं? ये प्रश्न रोजी को भीतर-बाहर उछाल रहे थे। श्रीमती सिन्हा इसी उधेड़बुन में थीं कि यदि रोजी ने डेट पर जाने की इच्छा प्रकट की तो वो किस तर्क से उसे रोकेंगी।
इस घटना के पश्चात् सिन्हा दंपति रोजी पर सूक्ष्म दृष्टि रखने लगे। श्रीमती सिन्हा टी.वी. देखते समय रोजी के पास बैठतीं। क्या कार्यक्रम वह देखती है, फोन पर कितनी लम्बी बात करती है, कौन-से उसकमित्र हैं, किस तरह के परिवार से आते हैं? कभी-कभी रोजी का स्कूल बैग झाड़ लेती थीं, कमरे की सफाई के बहाने कमरे की तलाशी ले लेती थी।
कहते हैं कि संकट में हम अपनी मां को याद करते हैं। प्रवासी भारतीय संकट में अपने धर्म और संकट में अपनी संस्कृति मां को याद करते हैं। रोजी को हिन्दू-धर्म और संस्कृति समझाने और पढ़ाने के प्रयास हुए। आस-पास भारतीय परिवारों के समवयस्क बच्चों की खोज जारी हुई। रविवार को पूजा के कार्यक्रम निर्धारित किए गए।
श्रीमान सिन्हा ने पढ़ रखा था कि बच्चों से सीधा वार्तालाप होते रहना चाहिए। प्रायः शाम को रोजी के साथ बैठते, बातचीत का सिलसिला आरंभ करते, भारतीय विवाह के मूल्यों, अन्य सामाजिक मूल्यों के विषय में समझाते। बाजार ले जाते आइसक्रीम खाने के बहाने रोजी का हृदय टटोलते।
इस तरह पूर्व-पश्चिम की दो नावों पर चलते-चलते रोजी हाईस्कूल में पहुंच गई। समयानुसार अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन रोजी में दिखाई देने लगे। नित नवीन केश सज्जा, नए-नए रंग के लिपस्टिक , छोटे बेढंगे परिधान, ऊंची हील की सैंडिल में अपनी ही बेटी अपरिचित लगने लगती। षोडशी रोजी अपनी मां से लम्बी थी। बार-बार श्रीमती सिन्हा को टोकना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन एक टीस सी उनके हृदय में थी। उनका मन करता कि रोजी के इधर-उधर छितरे बालों को बांधकर चुटिया बना दें। उसकी उंची ड्रेस खींचकर लंबी कर दें। पर वह अधिक कुछ कह नहीं पाती थीं।
उस समय अमरीका में अधिक भारतीय परिवार बसे हुए नहीं थे। अतः रोजी के अधिकतर मित्र अमेरिकन ही थे, जिनके विचार पारिवारिक मूल्य, विवाह के प्रति निष्ठा सिन्हा परिवार के बिल्कुल विपरीत थी। दसवीं कक्षा तक आते-आते होम कमिंग, प्राम आदि एवं डांस पार्टी शुरु हो जाते हैं। रोजी उनमें जाने के लिए सदैव उत्साहित रहती। सिन्हा दंपति कभी हां करते, कभी ना करते। तहकीकात रखते कि रोजी किस लड़के के साथ जा रही है? कितने बजे वापस आएगी? कभी-कभी माता-पिता से छिपकर भी रोजी अपने मित्रों के साथ बाहर घूम आती। सिन्हा दम्पति के लिए यही संतोष था कि रोजी किसी लड़के से अंतरंग मित्रता नहीं हुई थी। कालेज में आकर भी रोजी में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। कभी-कभी डांस पार्टी तक ही सीमित रहा। रोजी के उन्नीस वर्ष में लगते ही सिन्हा दंपति ने रोजी को भारत से आए दो तीन रिश्तों के लिए बताया। उन्होंने दबाव देने के साथ-साथ तर्कसहित समझाया कि अपने धर्म, अपने देश में विवाह करना उचित रहता है। भारत के डाक्टर दामाद की कद्र अमरीका का प्रत्येक गृहस्थ जानता है।
उसी गर्मियों में सिन्हा परिवार ने भारत जाने का कार्यक्रम बना डाला। लड़के वालों को भी आने की सूचना दे दी। श्रीमती सिन्हा ने परोक्ष रूप से विवाह की तैयारी भी कर ली।
इस बार सिन्हा दंपति का उत्साह चौगुना एवं तैयारी दस गुना थी। वे तो मानो दामाद को अपने साथ लेकर आने की तैयारी में थे। जैसे-जैसे समय निकट आ रहा था, रोजी की मनःस्थिति विचित्र हो रही थी। वह स्वयं को उलझन में बंधा हुआ महसूस कर रही थी। एक ओर भारतयात्रा का चाव तो दूसरी ओर माता-पिता का अतिरिक्त उत्साह रोजी के ठहरे हुए मन को उद्वेलित कर रहा था। उसे यह तो आभास था कि उसके रिश्ते की बात होगी, संभवतः वह अपने भावी जीवन-साथी से मिलेगी. परन्तु क्या वही उसके सपनों का साकार रूप होगा? कैसी सूरत होगी, पापा जैसा दीखता होगा या छोटो मामा जैसा, कैसा उसका व्यवहार होगा? चाचा जैसी ऊटपटांग अंग्रेजी बोलेगा तो उसके दोस्त हंसेंगे। क्या उसके दोस्त ‘ फिल’ जैसा होगा? नहीं, नहीं! उसके जैसा कैसे हो सकता है? जैसे पापा-मम्मी से व्यवहार करते हैं क्या वह भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेगा? वह न तो स्वयं को मम्मी के चौखटे में खड़ा कर पा रही थी और न ही किसी लड़के को पापा के चौखटे में। इसी उहापोह में रोजी के दिन बीत रहे थे।
रोजी ने देख-सुन रखा था कि भारतीय पुरुष घर के काम में सहयोग नहीं करते हैं। वहां अधिकार जमाते हैं। परंतु उसे यह भी ज्ञात था कि भारतीय पुरुष नारी को सुरक्षा-कवच पहनाते हैं। रोजी को या उसकी मम्मी को यह भय नहीं था कि आज शाम पापा वापस घर नहीं आएंगे। या अपनी महिला मित्र लेकर आ जाएंगे और कह देंगे कि तुम्हारा-हमारा कोई संबन्ध नहीं है।
हवाई जहाज में बैठकर रोजी को यही लगा कि वह अथाह सागर के बीच एक छोटी-सी नाव में बैठी है। लहरों से घिरी उसकी नाव डगमगा रही है। सुदूर किनारे पर एक धुंधली-सी आकृति उसका आवाहन कर रही है; परन्तु वह वहां तक पहुंचना भी चाह रही है या नहीं, इसका निर्णय नहीं कर पा रही है।
डगमग नैया में बैठी रोजी भारत पहुंची। सर्वत्र उसके विवाह की चर्चा थी। मामी-मौसी, चाची-बुआ और विशेष रूप से नाना-नानी, दादा-दादी में इस संबंध में अद्भुत उत्साह था। घर-बाहर मानो शहनाई-सी बज रही थी।
श्रीमती सिन्हा ने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि सब कार्य रोजी के सुविधानुसार हों. दो-तीन लड़कों की फोटो देखकर बात आगे बढ़ाने के लिए चुना गया। रोजी को ध्यान है , जिस रोज शरद को आना था। हां वही तो था उसके सपनों का बसंत या पतझड़…। रोजी ने स्पष्ट कह दिया था कि वह सलवार कुर्ता ही पहनेगी। उसके सर्वत्र फैले बालों को बांधा गया। श्रीमती सिन्हा ने विशेष हिदायत दी की पटर-पटर करके जल्दी से मत चली आना। आंखें उठाकर, सीधे बात मत करना। लड़के वाले भी काफी संवेदनशील थे। सिंहा दंपति के लिए लड़का डाक्टर था एवं शिक्षित परिवार से था। लड़के वालों के लिए रोजी अमरीका की नागरिक थी। यह पर्याप्त था। चूंकि रोजी ने ‘न’ नहीं किया था, अतः विवाह की तिथि निश्चित हो गई। समयाभाव के कारण तीन सप्ताह बाद ही विवाह होना निश्चित हुआ।
इधर रोजी के लिए तीन सप्ताह मानो तीन दिन की भांति उड़े जा रहे थे। जिस दिन संबंध तय हुआ रोजी की मनःस्थिति बिल्कुल बदल गई। अब तक जिसे वह लापरवाही से ले रही थी, आज वही बात जीवन की सबसे गंभीर घटना बन गई। विवाह का क्या अर्थ होता है, वह पापा-मम्मी के जीवन से सीख चुकी है। अब रोजी को लगने लगा कि वह संभवतः इतनी शीघ्र इसके लिए तैयार नहीं थी। उन्नीसवर्षीय रोजी शरद के साथ हुई दो-तीन संक्षिप्त भेंटों में कोई तार नहीं जोड़ पाई। इधर रोजी खोई-खोई…, उधर शरद चुप-चुप, कुछ सतर्क। भाषा, परिवेश, अमरीका , भारत ने खासी दखलंदाजी की दोनों के बीच।
अपने-अपने संसार में खोए दो प्राणियों का विवाह घर के आंगन में बनी विशाल वेदी पर हो गया। तन जुड़ना अधिक मायने नहीं रखता, यदि मन न जुड़ा हो। यूं भी रोजी को शीघ्र ही लौटना था। शरद के लिए ‘ वीसा’ के लिए कागज तैयार करने थे। शरद को भी अपनी नौकरी से त्यागपत्र देना था।
अमरीका पहुंचकर रोजी ने कालेज जाना शुरु कर दिया। शरद को बुलाने के सारे कागज श्रीमान सिन्हा ने तुरंत बनवाने आरंभ कर दिए। वे चाहते थे कि शरद अतिशीघ्र अमरीका आकर अपना घर बसाए। रोजी ने एक-दो बार फोन भी किया। फिर दोनों 12 हजार मील दूर अपने संसार में रम गए। जहां शरद अमरीका जाने के दिन उत्कंठा से गिन रहा था, वहीं रोजी निकट आते प्रत्येक दिन को संदेह की दृष्टि से देख रही थी।
एक दिन रोजी अपने मित्रों के साथ पिजा हट गई। वहां का मैनेजर परिचित लगा। यह तो बिलावल है। एक-दो क्लास साथ-साथ ली थीं। तीस वर्षीय विलावल में कैसा आकर्षण था कि उनका प्रथम परिचय शाम के भोजन, शनिवार इतवार को साथ-साथ घूमने से लेकर शयनकक्ष तक ले गया। कहते हैं प्रेम अंधा होता है। यदि मैं कहूं कि प्रेम गूंगा-बहरा भी होता है तो अतिशयोक्ति न होगी।
एक दिन अचानक श्रीमती सिन्हा ने रोजी पर शरद के आगामी रविवार को आने का शुभ समाचार सुनाकर वज्रपात कर दिया। वह तो भूल ही गई थी शरद को…इधर श्रीमती सिन्हा दामाद के आने की तैयारी में तत्पर थीं। उधर रोजी क्या करे, क्या न करे की इसी उलझन में थी। कितना भी वह शरद का चेहरा देखने का प्रयत्न करती , बिलावल का चेहरा उसे ढक लेता। बिलावल ही रोजी के तन-मन पर चिन्हित था। अब वह यह तन-मन शरद को कैसे सौंप दे? तो क्या रोजी विवाह…पति…भारतीय मर्यादा के अर्थ भूल चुकी है? पति भावात्मक ही नहीं सामाजिक सेहरा भी है। विवाहोपरान्त किसी पुरुष का ध्यान भी आना सर्वथा निषेध है। पति के अतिरिक्त किसी का स्थान हो ही नहीं सकता है।
रोजी को यही चिंता थी कि शनिवार को जब उसे शरद के कमरे में धकेल दिया जाएगा तो वह क्या करेगी? यह तन-मन अब शरद को सौंपना, शरद एवं बिलावल दोनों के साथ अन्याय होगा।
आज रोजी के अमरीकन संस्कार मुखरित हो रहे थे। अब तक ओढ़े हुए भारतीय संस्कारों को वह उतार फेंकना चाह रही थी। भीतर-बाहर बिलावल के चुंबकीय आकर्षण में बिंधी रोजी अपना अमरीकन होना दिखाना चाह रही थी। प्रथम रात्रि में ही उसने शरद को जता दिया कि वह अभी किसी प्रकार का संबंध बनाने या बनाए हुए संबंध बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसे कुछ समय और चाहिए।
शरद के लिए तो अमरीका, पत्नीगृह या श्वसुरगृह में प्रथम रात्रि थी। क्या-क्या देखना होगा उसे? लंबी यात्रा के बीच संजोई मधुर कल्पनाएँ प्रश्नचिन्ह बन गईं। दिन बीतते गए। रोजी की चाल-ढाल सिन्हा दंपति को खटकने लगी। जितना वे रोजी को शरद के साथ रहने को प्रोत्साहित करते उतना ही रोजी पढ़ाई नौकरी के बहाने दूर भागती।
वह दिन श्रीमती सिन्हा के लिए सबसे अधिक दुखदायी था, जब उन्होंने रोजी बिलावल को हाथ में हाथ लिए देखा। श्रीमती सिन्हा को तो मानो पर्वत-शिखर से सागर तल में धकेल दिया गया हो। शरद रेजिडेंसी खोजने में लगा हुआ था, तन-धन से सिन्हा परिवार पर आश्रित था। रोजी के रवैये ने मन तो कूट-कूटकर मिट्टी में मिला ही दिया था। रोजी-बिलावल के प्रेम-प्रसंग ने जब घर के भीतर प्रवेश किया तो घर धुँआ-धुँआ चिता-सा जल उठा और घर को मरघट बना दिया।
सिन्हा साहब तो न स्वयं को मुंह दिखाने लायक रह गए, न अपने दामाद को। बेटी ने उन्हे हृदय रोग दिया। उच्च रक्तचाप की पीड़ा दी।
शरद के संस्कार-पोषित व्यक्तित्व ने विशालता का परिचय देते हुए कहा ‘मैं छह महीने तुम्हारे लिए प्रतीक्षा कर सकता हूँ। मेरे हृदय के द्वार अभी तक खुले हैं।’
सिन्हा दंपति के लिए विवाह एक अटूट बंधन है, पावन संस्था है। रोजी को शरद के पास आना ही होगा अन्यथा उससे कोई संबंधनहीं रहेगा।
रोजी बिलावल के आगोश में इस तरह डूबी हुई थी कि ‘ मैं बिलावल के अतिरिक्त किसी और व्यक्ति की अपनी जिन्दगी में कल्पना नही कर सकती हूं। विवाह मेरा शरद के साथ हो गया था, परन्तु प्यार मैं बिलावल से ही करती हूं।’
रोजी तुरंत तलाक देने के लिए कोर्ट में अपील करने को व्याकुल थी। सिन्हा साहब ने उसे एक वर्ष तक रोके रखा। जब तक शरद को रेजिडेंसी नहीं मिल जाती एवं ग्रीन कार्ड पक्का नहीं हो जाता है, तब तक रोजी कोर्ट में नहीं जाएगी।
शरद अपनी नौकरी पर भूतपूर्व सास-ससुर के चरण स्पर्श कर अकेला चला गया। रोजी बिलावल के साथ जकर रहने लगी। सिन्हा दंपती अपने नीड़ में अकेले रह गए। अमरीका का यह प्रसाद सिन्हा दंपति को मिल ही गया।
आज हर प्रवासी भारतीय डरे मन से स्वयं से यही प्रश्न कर रहा है कि यदि उनकी बेटी ने भी उनके साथ यही किया तो…!
लेखिका : रेणु ‘राजवशी’ गुप्ता