एहसास का आईना

कौशल्या देवी की आंखों से पछतावे के आंसू बह निकले। वे वहीं जमीन पर बैठ गईं और रोने लगीं। “मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई दीनानाथ जी। सच में, मैं अपनी सत्ता और अधिकार के नशे में इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने यह सोचने की कोशिश ही नहीं की कि श्रुति के माता-पिता के दिल पर क्या गुजरी होगी। मैं अपनी बेटी का दर्द तो समझ गई, लेकिन उस बेटी का दर्द नहीं समझ पाई जिसे मैं अपने घर की बहू बनाना चाहती थी।”

दीनानाथ जी ने आगे बढ़कर कौशल्या देवी को उठाया और कहा, “गलती का अहसास होना ही सुधार की पहली सीढ़ी है, कौशल्या। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है।”

कौशल्या देवी अपने शहर की एक जानी-मानी और प्रतिष्ठित महिला थीं। उनके पति, दीनानाथ जी, एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी थे और उनका परिवार समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनके दो बच्चे थे—बड़ा बेटा प्रतीक और छोटी बेटी रिया। रिया की शादी पिछले ही साल दिल्ली के एक बहुत ही संपन्न परिवार में हुई थी। उसका पति एक बड़ी कंपनी में डायरेक्टर था और रिया अपने वैवाहिक जीवन में बेहद खुश थी। दूसरी ओर, प्रतीक हैदराबाद में एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। उसकी अच्छी खासी तनख्वाह थी और वह हर मायने में एक योग्य कुंवारा लड़का था। घर में अब बस प्रतीक की शादी की ही चर्चा रहती थी।

प्रतीक के लिए कई जगह से रिश्ते आ रहे थे, लेकिन कौशल्या देवी को कोई भी लड़की आसानी से पसंद नहीं आती थी। उनकी मांगें बहुत स्पष्ट थीं—लड़की पढ़ी-लिखी होनी चाहिए, संस्कारी होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात, उसे परिवार को साथ लेकर चलना आना चाहिए। कई महीनों की तलाश के बाद, दीनानाथ जी के एक पुराने मित्र ने कानपुर के एक परिवार का जिक्र किया। लड़की का नाम श्रुति था। श्रुति ने एमबीए किया था और वह एक प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर काम कर रही थी। फोटो देखने पर श्रुति सबको बहुत पसंद आई। वह बहुत ही सौम्य और सुंदर लग रही थी। प्रतीक ने भी फोटो देखकर अपनी सहमति दे दी थी।

अगले रविवार को कौशल्या देवी, दीनानाथ जी और प्रतीक, श्रुति को देखने के लिए कानपुर पहुंच गए। श्रुति का परिवार बहुत ही साधारण लेकिन संस्कारी था। श्रुति के पिता, रामसेवक जी, एक स्कूल के प्रिंसिपल थे और उनकी मां एक गृहिणी थीं। मेहमानों का स्वागत बहुत ही आदर-सत्कार के साथ किया गया। चाय और नाश्ते के बाद श्रुति को कमरे में बुलाया गया। उसने हल्के गुलाबी रंग का एक बहुत ही सुंदर सूट पहना हुआ था और उसके चेहरे पर एक स्वाभाविक सी मुस्कान थी। कौशल्या देवी ने श्रुति से कई सवाल पूछे—उसकी पढ़ाई, उसकी नौकरी, खाना बनाने की उसकी कला और भविष्य को लेकर उसकी योजनाओं के बारे में। श्रुति ने हर सवाल का बहुत ही सधा हुआ और समझदारी भरा जवाब दिया। प्रतीक और श्रुति को भी अकेले में बात करने के लिए थोड़ा समय दिया गया। दोनों की सोच काफी मिलती-जुलती थी और प्रतीक को श्रुति की सादगी और आत्मविश्वास बहुत भा गया।

रिश्ता लगभग पक्का सा लग रहा था। रामसेवक जी के चेहरे पर भी एक सुकून नजर आ रहा था कि उनकी बेटी के लिए इतना अच्छा परिवार मिल गया है। तभी अचानक कौशल्या देवी ने अपना गला साफ किया और एक गंभीर स्वर में बोलीं, “भाई साहब, हमें आपकी बेटी बहुत पसंद है। श्रुति बहुत ही गुणी और समझदार बच्ची है। लेकिन, हमारी एक शर्त या यूं कह लीजिए कि एक इच्छा है, जिसे हम शादी से पहले ही स्पष्ट कर देना चाहते हैं।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। रामसेवक जी ने थोड़ी घबराहट के साथ पूछा, “जी बहन जी, कहिए। आपकी क्या इच्छा है?”

कौशल्या देवी ने बिना किसी संकोच के कहा, “देखिए, हमारा बेटा प्रतीक हैदराबाद में रहता है। उसकी नौकरी ऐसी है कि उसे अक्सर प्रोजेक्ट्स के सिलसिले में विदेश भी जाना पड़ता है। ऐसे में श्रुति उसके साथ वहां जाकर क्या करेगी? वह वहां अकेली बोर हो जाएगी। हम पति-पत्नी अब बूढ़े हो रहे हैं। हमारी इच्छा है कि शादी के बाद श्रुति अपनी नौकरी का ट्रांसफर हमारे शहर लखनऊ में करवा ले। वह हमारे साथ इसी घर में रहेगी। घर की जिम्मेदारियां संभालेगी, हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगी और अपनी नौकरी भी करती रहेगी। प्रतीक जब भी छुट्टियों में आएगा, या वीकेंड पर, तो वह श्रुति से मिलने लखनऊ आ जाया करेगा। आखिर बहू घर की रौनक होती है, अगर वह भी बेटे के साथ बाहर चली जाएगी तो इस बड़े से घर का क्या होगा?”

रामसेवक जी और उनकी पत्नी यह सुनकर सन्न रह गए। उन्हें कौशल्या देवी की यह बात बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं लगी। रामसेवक जी ने बहुत ही विनम्रता से अपनी बात रखते हुए कहा, “बहन जी, आप जो कह रही हैं, मैं उसका सम्मान करता हूं। लेकिन शादी का मतलब तो दो लोगों का साथ रहना होता है। अगर पति-पत्नी शादी के तुरंत बाद ही अलग-अलग शहरों में रहेंगे, तो उनके बीच आपसी समझ और प्रेम कैसे विकसित होगा? बच्चे शादी के बाद एक-दूसरे के साथ समय बिताना चाहते हैं। श्रुति अगर प्रतीक के साथ हैदराबाद में रहेगी, तो वहां भी उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी। और जहां तक आपकी देखभाल का सवाल है, तो बच्चे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं, वे आपके लिए भी समय निकालेंगे।”

कौशल्या देवी को रामसेवक जी का यह जवाब बिल्कुल रास नहीं आया। उनका अहंकार जाग उठा। उन्होंने तीखे स्वर में कहा, “भाई साहब, हमने अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए लगा दी। क्या अब हमारा इतना भी हक नहीं बनता कि हमारी बहू हमारी सेवा करे? आजकल की लड़कियों को बस पति के साथ घूमना-फिरना पसंद है, सास-ससुर की जिम्मेदारी कोई नहीं उठाना चाहता। अगर श्रुति हमारे साथ नहीं रह सकती, तो फिर इस रिश्ते का कोई मतलब नहीं है।”

दीनानाथ जी ने कौशल्या देवी को शांत करने की कोशिश की, लेकिन रामसेवक जी ने भी हाथ जोड़ लिए। “माफ कीजिएगा बहन जी, लेकिन हम अपनी बेटी की शादी इसलिए नहीं कर रहे हैं कि वह अपने पति से दूर रहकर सिर्फ एक केयरटेकर का काम करे। हम यह रिश्ता नहीं कर सकते।”

कौशल्या देवी गुस्से में तमतमाती हुई वहां से उठ खड़ी हुईं और अपने पति और बेटे को लेकर वहां से चली आईं। रास्ते भर वह रामसेवक जी और श्रुति को कोसती रहीं। “देखा आपने! कितने घमंडी लोग हैं। एक तो हम उनके घर रिश्ता लेकर गए, ऊपर से हमारी एक छोटी सी बात नहीं मानी। आज-कल के लोगों में तो संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं बची है।”

प्रतीक चुप था, लेकिन उसे अपनी मां का व्यवहार बहुत बुरा लगा था। वह श्रुति को पसंद करने लगा था, लेकिन वह अपनी मां के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

अगले दिन सुबह कौशल्या देवी हॉल में बैठी अपनी पड़ोसन को कानपुर वालों की ‘बदतमीजी’ के किस्से सुना रही थीं, तभी दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खुला तो सामने उनकी बेटी रिया खड़ी थी। रिया के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और उसकी आंखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। उसके हाथ में एक सूटकेस था।

कौशल्या देवी अपनी बेटी की यह हालत देखकर घबरा गईं। वे दौड़कर रिया के पास गईं और उसे गले लगा लिया। “क्या हुआ मेरी बच्ची? तू ऐसे अचानक बिना बताए कैसे आ गई? और तेरी यह हालत कैसे हुई? दामाद जी कहां हैं?”

रिया फूट-फूटकर रोने लगी। उसे सोफे पर बिठाया गया और पानी पिलाया गया। थोड़ा शांत होने पर रिया ने जो बताया, उसे सुनकर कौशल्या देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

रिया ने सुबकते हुए कहा, “मां, मेरी सास और ससुर पीछे पड़ गए हैं कि मैं राहुल (रिया का पति) के साथ दिल्ली में नहीं रहूंगी। वे कह रहे हैं कि राहुल का काम बहुत ज्यादा है और वह अक्सर टूर पर रहता है। इसलिए वे चाहते हैं कि मैं राहुल का दिल्ली वाला फ्लैट छोड़कर उनके साथ उनके पुश्तैनी घर, मेरठ में जाकर रहूं। उनका कहना है कि वे अब बूढ़े हो गए हैं और उन्हें मेरी जरूरत है। जब मैंने इस बात का विरोध किया और राहुल से बात की, तो मेरी सास ने बहुत हंगामा किया। उन्होंने कहा कि अगर मैं उनकी बात नहीं मानूंगी, तो वे राहुल से मेरा तलाक करवा देंगे। राहुल भी अपनी मां के दबाव में कुछ नहीं बोल पा रहा है। मैं वहां घुट-घुट कर मर जाऊंगी मां। मैं राहुल से प्यार करती हूं, मैं उसके बिना मेरठ में उनके साथ कैसे रह सकती हूं?”

यह सुनते ही कौशल्या देवी का खून खौल उठा। उनका मातृत्व पूरी तरह से जाग गया और वे गुस्से से कांपने लगीं। “उनकी इतनी हिम्मत! वे मेरी पढ़ी-लिखी, होनहार बेटी को एक गांव में कैद करना चाहते हैं? शादी क्या राहुल से हुई है या उनके खानदान की सेवा करने के लिए हुई है? पत्नी का असली स्थान उसके पति के पास होता है। पति-पत्नी साथ रहेंगे तभी तो उनका परिवार आगे बढ़ेगा! मैं अभी राहुल की मां को फोन करती हूं और उन्हें खरी-खोटी सुनाती हूं। अगर उन्होंने मेरी बेटी पर दबाव डाला, तो मैं पुलिस में शिकायत कर दूंगी!”

कौशल्या देवी फोन उठाने के लिए तेजी से मेज की तरफ बढ़ीं, तभी पीछे से एक शांत और गंभीर आवाज आई। “रुक जाओ कौशल्या।”

वह आवाज दीनानाथ जी की थी, जो अभी-अभी अपने कमरे से बाहर आए थे और उन्होंने रिया की सारी बातें सुन ली थीं। कौशल्या देवी ने झिझकते हुए मुड़कर देखा। “आप मुझे रोक क्यों रहे हैं? आपने सुना नहीं कि उन लोगों ने हमारी बेटी के साथ क्या किया है?”

दीनानाथ जी सोफे पर रिया के पास आकर बैठे और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “मैंने सब सुना कौशल्या। लेकिन मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि तुम राहुल की मां पर इतना गुस्सा क्यों हो रही हो? उन्होंने वही तो कहा है, जो तुमने कल रामसेवक जी से कहा था।”

कौशल्या देवी सन्न रह गईं। उनके हाथ से फोन छूटकर सोफे पर गिर गया।

दीनानाथ जी ने अपनी बात जारी रखी, “कल जब श्रुति के पिता ने तुमसे कहा था कि पति-पत्नी का साथ रहना जरूरी है, तब तुमने उनकी बात को उनका घमंड बता दिया था। तुमने कहा था कि बहू का काम सिर्फ सास-ससुर की सेवा करना है, भले ही इसके लिए उसे अपने पति से दूर क्यों न रहना पड़े। आज जब वही नियम, वही शर्त तुम्हारी खुद की बेटी पर लागू की जा रही है, तो तुम्हें यह अन्याय लग रहा है? तुम्हें पुलिस की याद आ रही है?”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। रिया भी आंसू भरी आंखों से अपनी मां को देख रही थी। कौशल्या देवी के पास कोई जवाब नहीं था। उनका अपना ही बुना हुआ जाल अब उन्हें जकड़ रहा था।

“कौशल्या, बेटियां चाहे हमारे घर की हों या किसी और के घर की, उनकी भावनाएं, उनके सपने और उनका दर्द एक जैसा ही होता है,” दीनानाथ जी ने बहुत ही कोमलता से लेकिन दृढ़ता के साथ कहा। “श्रुति भी किसी की रिया है। अगर रिया का अपने पति के साथ रहना उसका अधिकार है, तो श्रुति का अपने पति के साथ रहना उसका अधिकार क्यों नहीं हो सकता? जब हम अपनी बेटी के लिए यह सहन नहीं कर सकते कि वह अपने पति से अलग रहे, तो हम किसी और की बेटी को यह सजा कैसे दे सकते हैं? बहू और बेटी के बीच यह दोहरा मापदंड आखिर कब तक चलेगा?”

दीनानाथ जी के हर एक शब्द ने कौशल्या देवी के मन पर पड़े अज्ञान और अहंकार के पर्दों को फाड़ कर रख दिया था। उन्हें अचानक उस दृश्य की याद आई जब रामसेवक जी बहुत ही शालीनता से अपनी बेटी के अधिकारों की बात कर रहे थे, और कैसे उन्होंने (कौशल्या ने) अपने झूठे रुतबे के घमंड में उस पिता का अपमान किया था। उन्हें अहसास हुआ कि अगर श्रुति की जगह रिया होती, तो एक मां के तौर पर उन पर क्या गुजरती।

कौशल्या देवी की आंखों से पछतावे के आंसू बह निकले। वे वहीं जमीन पर बैठ गईं और रोने लगीं। “मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई दीनानाथ जी। सच में, मैं अपनी सत्ता और अधिकार के नशे में इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने यह सोचने की कोशिश ही नहीं की कि श्रुति के माता-पिता के दिल पर क्या गुजरी होगी। मैं अपनी बेटी का दर्द तो समझ गई, लेकिन उस बेटी का दर्द नहीं समझ पाई जिसे मैं अपने घर की बहू बनाना चाहती थी।”

दीनानाथ जी ने आगे बढ़कर कौशल्या देवी को उठाया और कहा, “गलती का अहसास होना ही सुधार की पहली सीढ़ी है, कौशल्या। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है।”

कौशल्या देवी ने उसी वक्त अपने आंसू पोंछे। उन्होंने सबसे पहले राहुल को फोन लगाया और बहुत ही सख्त लहजे में उसे समझाया कि एक पति के रूप में उसकी क्या जिम्मेदारियां हैं। उन्होंने राहुल की मां से भी बात की और उन्हें बहुत ही शालीनता से लेकिन स्पष्ट रूप से बता दिया कि रिया मेरठ में नहीं, बल्कि दिल्ली में ही राहुल के साथ रहेगी।

इसके बाद, कौशल्या देवी ने गहरी सांस ली और रामसेवक जी का नंबर डायल किया। रामसेवक जी ने फोन उठाया, तो उनकी आवाज में एक उदासी थी।

“भाई साहब, मैं कौशल्या बोल रही हूं,” कौशल्या देवी की आवाज कांप रही थी। “मैं आपसे और श्रुति से माफी मांगना चाहती हूं। कल मैंने जो भी कहा, वह मेरे अहंकार और अज्ञान का नतीजा था। आज जब मेरी अपनी बेटी पर वही परिस्थिति आई, तब मुझे समझ में आया कि मैंने आपके साथ कितना बड़ा अन्याय किया था। मैं कोई शर्त नहीं रखना चाहती। श्रुति और प्रतीक शादी के बाद वहीं रहेंगे जहां उनकी खुशियां बसती हैं। मैं बस इतना चाहती हूं कि आप हमें अपनी बेटी के माता-पिता बनने का अवसर दें।”

फोन के उस पार रामसेवक जी अवाक रह गए, लेकिन एक मां के इस सच्चे पश्चाताप को सुनकर उनका दिल पसीज गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “बहन जी, जो इंसान अपनी गलती मान ले, वह सबसे बड़ा होता है। हमें यह रिश्ता मंजूर है।”

कुछ ही महीनों बाद प्रतीक और श्रुति की शादी बहुत ही धूमधाम से हुई। श्रुति विदा होकर हैदराबाद चली गई, लेकिन उसने यह सुनिश्चित किया कि वह हर रोज अपनी सास से वीडियो कॉल पर बात करे। कौशल्या देवी को अब एक ऐसी बहू मिल गई थी, जो मीलों दूर रहकर भी उनके दिल के सबसे करीब थी। उन्होंने जान लिया था कि रिश्ते शर्तों से नहीं, बल्कि समझ, सम्मान और प्यार से चलते हैं।

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