खामोशी की गहराई

अमन रोते हुए बोला, “जीजाजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख हूँ। मैंने हमेशा आपको गलत समझा। मुझे लगा कि जो लोग मीठी-मीठी बातें करते हैं, हंसी-मजाक करते हैं, वही अच्छे होते हैं। मैं आपको बोरिंग और घमंडी समझता रहा। लेकिन आज मुझे समझ आया कि बातें तो कोई भी कर सकता है, लेकिन जब मुसीबत आती है, तो वही काम आता है जिसके दिल में सच में प्यार होता है। आपने मेरे पिताजी को बचा लिया। आपने हम सबको बचा लिया। आज अगर आप नहीं होते, तो मैं अनाथ हो गया होता।”

अमन हमेशा से घर की रौनक रहा था। उसकी आदत थी हर किसी से बात करना, चुटकुले सुनाना और महफ़िल में जान डाल देना। घर में किसी की भी शादी हो या कोई छोटा-मोटा जश्न, अमन के बिना सब सूना लगता था। उसके लिए दुनिया का मतलब था—शोर, हंसी-मजाक, और खुलकर अपनी भावनाओं का इज़हार करना। लेकिन जब उसकी बड़ी बहन, शिखा की शादी हुई, तो अमन को एक बहुत बड़ा झटका लगा। शिखा के पति, यानी अमन के जीजाजी, सुशांत बिल्कुल अमन के विपरीत स्वभाव के थे। सुशांत एक बहुत ही शांत, गंभीर और कम बोलने वाले इंसान थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक ठहराव रहता था और वो केवल तभी बोलते थे जब बहुत जरूरी हो।

शादी के कुछ महीनों बाद जब शिखा और सुशांत पहली बार कुछ दिनों के लिए अमन के घर रहने आए, तो अमन ने पूरी तैयारी कर रखी थी। उसने सोचा था कि वो अपने नए जीजाजी के साथ खूब गपशप करेगा, उन्हें शहर घुमाएगा और उनके साथ दोस्तों की तरह रहेगा। लेकिन सुशांत के आते ही अमन के सारे अरमानों पर पानी फिर गया।

ड्राइंग रूम में सब बैठे थे। अमन लगातार सुशांत से बातें करने की कोशिश कर रहा था। “जीजाजी, आपने वो नई फिल्म देखी? बहुत ही शानदार है!” या फिर “जीजाजी, आपके शहर में तो बहुत अच्छी-अच्छी जगहें होंगी घूमने की, कभी हमें भी ले चलिए।”

सुशांत बस हल्की सी मुस्कान के साथ “हाँ” या “नहीं” में जवाब देते और फिर से शांत हो जाते। उनका ध्यान या तो अखबार में होता या फिर वे चुपचाप सबकी बातें सुनते रहते। अमन को यह बात बहुत अजीब और अपमानजनक लगी। उसे लगा कि सुशांत घमंडी हैं और उसे इग्नोर कर रहे हैं।

जब सुशांत नहाने गए, तो अमन तुरंत रसोई में अपनी बहन शिखा और माँ के पास पहुँच गया। उसका मुँह फूला हुआ था।

“दीदी, ये जीजाजी ऐसे ही हैं क्या? मतलब, इंसान थोड़ा तो बोलता है! मैं तब से उनके सामने बकबक कर रहा हूँ और वो हैं कि बस एक शब्द में जवाब देकर चुप हो जाते हैं। मुझे तो लग रहा है जैसे मैं किसी दीवार से बात कर रहा हूँ,” अमन ने झल्लाहट में कहा।

शिखा मुस्कुराई और बोली, “अरे अमन, वो स्वभाव से ही थोड़े शांत हैं। उन्हें ज्यादा बात करना पसंद नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि वो घमंडी हैं।”

“दीदी, शांत होना अलग बात है, लेकिन ये तो बिल्कुल बोरिंग हैं! मेरे दोस्त के जीजाजी को देखो, जब वो आते हैं तो पूरे घर में रौनक आ जाती है। हमारे साथ क्रिकेट खेलते हैं, बाहर खाने पर ले जाते हैं, खूब हंसी-मजाक करते हैं। और एक हमारे जीजाजी हैं, लगता है जैसे कोई सरकारी अफसर मुआयना करने आया हो। सच में दीदी, आप बोर नहीं हो जाती इनके साथ?” अमन ने अपनी निराशा जाहिर की।

तभी पीछे से अमन के पिताजी की आवाज़ आई, “बेटा अमन, इंसान की पहचान उसकी बातों से नहीं, उसके व्यवहार से होती है। हर किसी का अपना स्वभाव होता है। सुशांत बहुत ही सुलझे हुए और समझदार इंसान हैं।”

अमन ने पिताजी की बात सुनकर सिर तो हिला दिया, लेकिन उसके मन में सुशांत के लिए एक धारणा बन गई थी कि वे एक नीरस, घमंडी और भावनाहीन इंसान हैं। उन चार दिनों में अमन ने सुशांत से दूरी ही बनाए रखी। जब शिखा और सुशांत वापस जाने लगे, तो भी अमन ने औपचारिकता के तौर पर ही उन्हें विदा किया।

समय अपनी गति से बीतता रहा। साल दर साल गुजरते गए। अमन अब कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके अपना एक छोटा सा बिज़नेस शुरू कर चुका था। वह अभी भी वैसा ही वाचाल और चुलबुला था। शिखा और सुशांत कभी-कभार त्योहारों पर आते, लेकिन अमन की सुशांत से कभी कोई खास बातचीत नहीं हो पाई। उसके मन में आज भी सुशांत के लिए वही पुरानी छवि थी—एक बोरिंग इंसान, जिसके पास भावनाओं के नाम पर कुछ नहीं है।

लेकिन फिर, जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया जिसने अमन की पूरी सोच, उसकी पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।

सर्दियों की एक रात थी। अमन के पिताजी को अचानक सीने में तेज़ दर्द हुआ। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वे फर्श पर गिरकर बेहोश हो गए। अमन और उसकी माँ के तो जैसे हाथ-पैर फूल गए। पड़ोसियों की मदद से उन्हें तुरंत शहर के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि उन्हें एक बहुत बड़ा हार्ट अटैक आया है और उनकी हालत बेहद नाजुक है। अगले अड़तालीस घंटों के भीतर एक बहुत बड़ा ऑपरेशन करना होगा, जिसका खर्च लगभग दस लाख रुपये आएगा। इसके अलावा, उन्हें एक खास ग्रुप के खून की भी तुरंत जरूरत थी।

अमन की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई। उसका नया बिज़नेस अभी ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ था। घर की सारी जमा-पूंजी मिलाकर भी इतने पैसों का इंतजाम करना असंभव लग रहा था। अमन ने रात भर अपने उन सभी रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन किया, जो हमेशा बड़ी-बड़ी बातें करते थे। कोई कहता, “अरे यार, अभी तो मैंने पैसे कहीं फंसा दिए,” तो कोई कहता, “मैं सुबह आकर देखता हूँ, हिम्मत रख।” जो रिश्तेदार हर शादी-ब्याह में सबसे आगे खड़े होकर गपशप करते थे, वे आज अस्पताल का रास्ता भूल गए थे।

सुबह के चार बज रहे थे। अस्पताल के ठंडे और सुनसान गलियारे में अमन अकेला एक कुर्सी पर सिर पकड़े रो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह पैसों का इंतजाम कैसे करेगा, खून का इंतजाम कैसे करेगा। अपनी माँ के आंसुओं को देखकर उसका कलेजा फटा जा रहा था। उसे लगा कि वह अपनी दुनिया में बिल्कुल अकेला है और बातें बनाने वाले लोग सिर्फ अच्छे वक्त के साथी होते हैं।

तभी, गलियारे के दूसरे छोर से तेज कदमों की आवाज़ आई। अमन ने सिर उठाकर देखा तो सामने सुशांत खड़े थे। उनके बाल बिखरे हुए थे, आँखों में नींद नहीं थी और चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और चिंता थी। शिखा उनके पीछे दौड़ती हुई आ रही थी। सुशांत को देखते ही अमन फूट-फूट कर रो पड़ा।

सुशांत ने अमन से कुछ नहीं कहा। उन्होंने न तो कोई दिलासा दिया, न ही कोई लंबी-चौड़ी बातें कीं, जैसी लोग अक्सर ऐसे मौकों पर करते हैं। उन्होंने बस अपने दोनों हाथ अमन के कंधों पर रखे और एक हल्का सा दबाव दिया, मानो कह रहे हों, “मैं हूँ न।”

उसके बाद सुशांत सीधे रिसेप्शन की तरफ गए। अगले कुछ घंटों में अस्पताल के उस ठंडे माहौल में बहुत कुछ बदल गया। सुशांत ने बिना किसी को बताए, अपनी सारी एफडी तुड़वाकर ऑपरेशन के पैसे जमा कर दिए थे। पिताजी के ब्लड ग्रुप का इंतजाम करने के लिए उन्होंने अपने ऑफिस के संपर्कों का इस्तेमाल किया और सुबह सात बजे तक ब्लड बैंक से दो यूनिट खून अस्पताल पहुँच चुका था।

अमन बस खड़ा-खड़ा यह सब देख रहा था। जो सुशांत कभी घर में दो शब्द नहीं बोलते थे, वे आज अस्पताल के डॉक्टरों से, स्टाफ से पूरी अथॉरिटी के साथ बात कर रहे थे। वे एक चट्टान की तरह वहां खड़े थे। पूरे दिन, पूरी रात सुशांत अस्पताल के उसी बेंच पर बैठे रहे। उन्होंने एक पल के लिए भी अपनी आंखें नहीं झपकाईं। जब माँ को भूख लगी, तो वे चुपचाप कैंटीन से उनके लिए खाना ले आए। जब शिखा रोने लगी, तो उन्होंने बहुत ही शांति से उसे गले लगा लिया।

ऑपरेशन सफल रहा। डॉक्टर ने बाहर आकर कहा, “अगर समय पर पैसे और खून का इंतजाम नहीं होता, तो मरीज को बचाना मुश्किल था। आप लोगों ने बहुत फुर्ती दिखाई।”

यह सुनकर अमन की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह भागकर उस कोने में गया जहाँ सुशांत दीवार से सिर टिकाकर आंखें मूंदे बैठे थे। पिछले अड़तालीस घंटों से यह इंसान सोया नहीं था। अमन उनके पैरों में गिर पड़ा।

सुशांत हड़बड़ा कर उठे, “ये क्या कर रहे हो अमन? उठो!”

अमन रोते हुए बोला, “जीजाजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख हूँ। मैंने हमेशा आपको गलत समझा। मुझे लगा कि जो लोग मीठी-मीठी बातें करते हैं, हंसी-मजाक करते हैं, वही अच्छे होते हैं। मैं आपको बोरिंग और घमंडी समझता रहा। लेकिन आज मुझे समझ आया कि बातें तो कोई भी कर सकता है, लेकिन जब मुसीबत आती है, तो वही काम आता है जिसके दिल में सच में प्यार होता है। आपने मेरे पिताजी को बचा लिया। आपने हम सबको बचा लिया। आज अगर आप नहीं होते, तो मैं अनाथ हो गया होता।”

सुशांत ने पहली बार बहुत ही कोमलता से मुस्कुराते हुए अमन को उठाया और अपने गले से लगा लिया। उनकी आंखें भी नम थीं। उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, “अमन, परिवार में शब्दों की जरूरत नहीं होती, सिर्फ साथ की जरूरत होती है। पिताजी सिर्फ तुम्हारे नहीं, मेरे भी पिता हैं। मैंने वही किया जो एक बेटे को करना चाहिए था। इसमें एहसान या माफी जैसी कोई बात नहीं है।”

उस दिन अमन को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक मिला था। उसे समझ आ गया था कि उथले बर्तन हमेशा ज्यादा शोर करते हैं, लेकिन गहराइयों में हमेशा खामोशी होती है। सुशांत का प्यार उस गहरे समंदर की तरह था, जो शांत तो था, लेकिन उसमें पूरा परिवार समा सकता था।

कुछ हफ़्तों बाद जब पिताजी ठीक होकर घर आ गए, तो घर में एक छोटी सी पूजा रखी गई। शिखा और सुशांत भी वहां थे। आज अमन सुशांत के इर्द-गिर्द ऐसे घूम रहा था जैसे कोई छोटा भाई अपने सबसे बड़े और आदरणीय भाई के पीछे चलता है।

सुशांत सोफे पर बैठकर चाय पी रहे थे। अमन उनके पास गया और मुस्कुराकर बोला, “जीजाजी, आपको पता है, मेरे दोस्त के जीजाजी बहुत बातें करते हैं, लेकिन कल जब मैंने उसे बताया कि मेरे जीजाजी ने बिना एक शब्द कहे मेरी पूरी दुनिया बचा ली, तो वो भी आपकी तरह खामोश हो गया।”

शिखा ने यह सुना तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी। सुशांत ने भी अपनी वही चिर-परिचित, शांत मुस्कान बिखेरी, लेकिन आज उस मुस्कान में अमन को कोई दूरी नहीं, बल्कि एक अनदेखा, गहरा अपनापन नजर आ रहा था।

आज अमन जान चुका था कि इंसान की असली कीमत उसके शब्दों से नहीं, उसके कर्मों से आंकी जाती है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो कभी चिल्ला-चिल्ला कर अपना होने का दावा नहीं करते, लेकिन जब दुनिया पीठ दिखा देती है, तब वो साये की तरह आपके साथ खड़े होते हैं।

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