शालिनी के पास इस मासूम लेकिन तीर की तरह चुभते हुए सच का कोई जवाब नहीं था। वह पत्थर की मूरत बनकर खड़ी रही। तभी नीरज, जो अब तक चुपचाप यह सारा तमाशा देख रहा था, आगे आया। उसने रोती हुई निधि को अपनी गोद में उठाया, उसे चुप कराया और फिर शालिनी की तरफ बेहद सख्त और गहरी नज़रों से देखते हुए कहा, “सुन लिया शालिनी? बच्चे वही बोलते हैं और सीखते हैं, जो वो अपने घर की चारदीवारी में अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। ये तुम्हारे ही बोए हुए बीज हैं, तुम्हारे ही सिखाए हुए शब्द हैं, जो आज तुम्हें ही सुनने पड़ रहे हैं।”
नीरज और शालिनी का घर शहर के सबसे महंगे और पॉश इलाके में था। शालिनी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी और बहुत ही आधुनिक विचारों वाली महिला थी। उसे हर चीज़ में परफेक्शन चाहिए होता था—चाहे वह घर की सजावट हो, कपड़े हों या फिर खाना खाने का तरीका। इसी शानदार घर के एक कमरे में नीरज की बूढ़ी माँ, सुमित्रा देवी भी रहती थीं। सुमित्रा देवी ने अपना पूरा जीवन एक छोटे से गाँव में बिताया था। नीरज के पिता के गुज़र जाने के बाद, नीरज अपनी माँ को शहर ले आया था। लेकिन शालिनी और सुमित्रा देवी की जीवनशैली में ज़मीन-आसमान का अंतर था।
सुमित्रा देवी बहुत ही सादगी पसंद महिला थीं। उन्हें डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठकर कांटे-चम्मच से खाना खाना कभी रास नहीं आया। वे अक्सर रसोई के पास ज़मीन पर एक छोटी सी चटाई बिछाकर, अपनी पुरानी पीतल की थाली में खाना खाती थीं। उन्हें चाय भी कप की बजाय तश्तरी (प्लेट) में डालकर सुड़क-सुड़क कर पीने की आदत थी, क्योंकि गाँव में गरम चाय को ऐसे ही ठंडा करके पिया जाता था। शालिनी को अपनी सास का यह रहन-सहन बिल्कुल नहीं भाता था। उसे लगता था कि सास की इन आदतों की वजह से उसके हाई-सोसाइटी दोस्तों के बीच उसकी नाक कट जाएगी।
शालिनी अक्सर अपनी छह साल की बेटी, निधि के सामने सुमित्रा देवी को ‘देहाती’, ‘पिछड़ी’ या ‘गंवार’ कह दिया करती थी। “माँ जी, आप भी ना… मेहमानों के सामने ऐसे ज़मीन पर मत बैठा कीजिए। और ये तश्तरी से आवाज़ करके चाय पीना बंद कीजिए। लोग क्या कहेंगे कि हमारी माँ को तमीज़ नहीं है। बिल्कुल गंवारों जैसी हरकतें हैं आपकी,” शालिनी अक्सर मुँह बनाते हुए और झिड़कते हुए कह देती। सुमित्रा देवी चुपचाप सुन लेतीं, क्योंकि उन्हें अपने बेटे के घर में कोई क्लेश नहीं चाहिए था। वे अपनी बहू की कड़वी बातों को पी जाती थीं और अपनी पोती निधि को प्यार से निहारती रहती थीं।
निधि अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों से यह सब रोज़ देखती थी। बच्चों का मन एक कोरी स्लेट की तरह होता है, उस पर जो लिखा जाए, वह हमेशा के लिए छप जाता है। निधि भी धीरे-धीरे यह समझने लगी थी कि जो लोग ज़मीन पर बैठते हैं, हाथ से खाना खाते हैं या तश्तरी में चाय पीते हैं, वे ‘गंवार’ होते हैं, क्योंकि उसकी पढ़ी-लिखी मम्मा रोज़ यही तो कहती थीं।
समय बीतता गया। एक दिन निधि का छठा जन्मदिन था। शालिनी ने घर पर एक बहुत बड़ी पार्टी रखी थी। शहर के कई नामी लोग, शालिनी की किटी पार्टी की सहेलियाँ और नीरज के ऑफिस के बॉस भी आए हुए थे। घर को विदेशी फूलों और खूबसूरत रोशनियों से सजाया गया था। सुमित्रा देवी एक साधारण सी सूती साड़ी पहनकर एक कोने में चुपचाप बैठी थीं, ताकि शालिनी को कोई एतराज़ न हो और पार्टी का मज़ा न किरकिरा हो।
पार्टी पूरे शबाब पर थी। हर कोई निधि के लिए महंगे-महंगे तोहफे लेकर आया था। थोड़ी देर में केक काटने का समय हुआ। निधि ने एक बहुत ही खूबसूरत पिंक कलर की गाउन पहनी हुई थी और वह किसी परी से कम नहीं लग रही थी। सबने ताली बजाई और ‘हैप्पी बर्थडे’ का गीत गाया गया। निधि ने केक काटा। सबसे पहले उसने अपने पापा नीरज को केक खिलाया। फिर शालिनी खुशी से आगे बढ़ी, उसने केक का एक बड़ा सा टुकड़ा अपने हाथ में लिया और बहुत ही प्यार से निधि के मुँह की तरफ ले गई।
तभी निधि ने अचानक शालिनी का हाथ ज़ोर से झटक दिया। वहाँ खड़े सभी लोग हैरान रह गए। निधि ने अपना मुँह बनाते हुए बहुत ही स्पष्ट और तेज़ आवाज़ में कहा, “छी मम्मा! आप मुझे अपने हाथ से केक क्यों खिला रही हो? आप चम्मच का यूज़ क्यों नहीं करतीं? आप भी दादी की तरह ‘गंवार’ हो गई हो क्या?”
पूरे हॉल में पल भर में एक भयानक सन्नाटा छा गया। शालिनी का हाथ वहीं हवा में रुक गया। उसके चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया जैसे किसी ने उसका सारा खून निचोड़ लिया हो। उसके कानों में अपनी ही बेटी के शब्द बार-बार गूंज रहे थे—’गंवार’। जिन वीआईपी मेहमानों और सहेलियों के सामने शालिनी हमेशा अपनी आधुनिकता, तमीज़ और ऊंचे स्टेटस का दिखावा करती थी, आज उन्हीं के सामने उसकी अपनी ही छोटी सी बेटी ने उसे सरेआम ज़लील कर दिया था। मेहमान एक-दूसरे का मुँह देखने लगे और कुछ औरतें फुसफुसाने लगीं।
गुस्से, अपमान और शर्मिंदगी से तिलमिलाई शालिनी ने बिना सोचे-समझे निधि के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। “ये क्या बकवास कर रही हो तुम? भरी महफ़िल में ये सब किसने सिखाया तुम्हें?” शालिनी बेतहाशा चिल्लाई।
निधि अपना गाल पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और सुबकते हुए बोली, “मैंने कोई बकवास नहीं की मम्मा। आप ही तो हमेशा दादी से कहती हो कि जो लोग हाथ से खाते हैं, वो देहाती और गंवार होते हैं। जब मैंने आपसे पूछा था कि गंवार क्या होता है, तो आपने ही तो कहा था कि दादी जैसे लोग होते हैं। दादी रोज़ हाथ से रोटी खाती हैं तो आप उन्हें गंवार बोलती हो। आज आपने भी तो हाथ से केक उठाया, तो आप भी तो गंवार हुई ना मम्मा!”
शालिनी के पास इस मासूम लेकिन तीर की तरह चुभते हुए सच का कोई जवाब नहीं था। वह पत्थर की मूरत बनकर खड़ी रही। तभी नीरज, जो अब तक चुपचाप यह सारा तमाशा देख रहा था, आगे आया। उसने रोती हुई निधि को अपनी गोद में उठाया, उसे चुप कराया और फिर शालिनी की तरफ बेहद सख्त और गहरी नज़रों से देखते हुए कहा, “सुन लिया शालिनी? बच्चे वही बोलते हैं और सीखते हैं, जो वो अपने घर की चारदीवारी में अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। ये तुम्हारे ही बोए हुए बीज हैं, तुम्हारे ही सिखाए हुए शब्द हैं, जो आज तुम्हें ही सुनने पड़ रहे हैं।”
नीरज ने आगे कहा, “मेरी माँ ने तो उम्र भर मेरी खातिर तुम्हारी कड़वी बातें, तुम्हारे ताने और तुम्हारा अपमान सहा। वो चुप रहीं क्योंकि वो घर जोड़ना चाहती थीं। लेकिन तुम… तुम्हें तो आज अपनी ही बेटी के मुँह से अपने लिए ये शब्द सुनने को मिल गए। मेरी माँ तो ये सब सुनती आई हैं, लेकिन तुम्हें आज अपनी ही परछाईं देखकर कैसा लग रहा है?”
शालिनी की आँखें आंसुओं से भर गईं। शर्मिंदगी के मारे उसकी नज़रें ज़मीन में गड़ गई थीं और उससे किसी से भी आँखें मिलाई नहीं जा रही थीं। जिस आधुनिकता और झूठी शान का उसे इतना घमंड था, वह आज एक ही पल में चकनाचूर हो गया था। उसे एहसास हो गया था कि असली ‘गंवारपन’ हाथ से खाने या ज़मीन पर बैठने में नहीं, बल्कि बड़ों का सम्मान न करने और अपनों को नीचा दिखाने वाली सोच में होता है। आज एक छोटी सी बच्ची ने उसे जीवन का सबसे बड़ा और कड़वा पाठ पढ़ा दिया था।
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