सुमेधा सुबह विकास के उठने से पहले ही घर से निकल जाती और दोपहर तक वापस आ जाती। विकास को लगता कि वह बच्चों को स्कूल छोड़ने या किसी सहेली के घर जाती है। लेकिन एक दिन, नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। विकास अपने एक पुराने दोस्त से नौकरी के सिलसिले में मिलने उसी कमर्शियल इलाके में गया था। दोनों एक चाय की टपरी पर खड़े होकर बातें कर रहे थे, तभी विकास के दोस्त की नजर सड़क के दूसरी तरफ लगे एक छोटे से खाने के स्टॉल पर पड़ी। वहां काफी भीड़ थी। दोस्त ने आंखें सिकोड़ते हुए कहा, “यार विकास, वो सामने जो औरत राजमा-चावल बेच रही है, वो बिल्कुल तुम्हारी पत्नी सुमेधा भाभी जैसी लग रही है। क्या बात है, कोई हमशक्ल है क्या?”
सुबह की हल्की धूप ने शहर की ऊंची इमारतों को अपनी चादर में लपेटना शुरू ही किया था, लेकिन विकास के घर में पिछले छह महीनों से जैसे एक अजीब सा अंधेरा छाया हुआ था। विकास एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर था। उसकी जिंदगी एक सेट पैटर्न पर चल रही थी – सुबह कार से ऑफिस जाना, शाम को थका-हारा लौटना और वीकेंड पर परिवार के साथ किसी महंगे रेस्टोरेंट में डिनर करना। लेकिन कोरोना महामारी के बाद आई आर्थिक मंदी ने उसकी कंपनी को भी अपनी चपेट में ले लिया और एक झटके में विकास की वह शानदार नौकरी चली गई। शुरुआत में विकास को लगा कि उसके अनुभव और काबिलियत के दम पर उसे जल्द ही दूसरी नौकरी मिल जाएगी। लेकिन दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदल गए। कई इंटरव्यू देने के बाद भी जब निराशा ही हाथ लगी, तो विकास का आत्मविश्वास टूटने लगा। ईएमआई, बच्चों की स्कूल की फीस, घर का राशन और रोजमर्रा के खर्चे सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे थे। बैंक का बैलेंस खत्म होने की कगार पर था, लेकिन विकास का वो सफेदपोश अहंकार अब भी बरकरार था। वह छोटी कंपनियों या कम सैलरी वाली नौकरी को अपनी शान के खिलाफ मानता था।
उसकी पत्नी, सुमेधा, एक बेहद समझदार और व्यवहारिक महिला थी। उसने कई बार विकास को समझाने की कोशिश की कि जब तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल जाती, तब तक उसे कोई भी काम या छोटी नौकरी कर लेनी चाहिए ताकि घर का खर्च निकल सके। लेकिन विकास हमेशा यह कहकर बात टाल देता कि “मैं कोई मामूली क्लर्क नहीं हूँ जो ऐसी छोटी-मोटी नौकरियां करूँ। मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच मेरी क्या इज्जत रह जाएगी? लोग क्या कहेंगे कि इतना बड़ा मैनेजर आज ये काम कर रहा है?” सुमेधा चुप रह जाती, क्योंकि वह जानती थी कि समाज के तानों का डर विकास के मन में बहुत गहराई तक बैठ चुका था। लेकिन सुमेधा यह भी देख रही थी कि बच्चों की फीस जमा न होने के कारण स्कूल से बार-बार नोटिस आ रहे थे, घर में जरूरत का सामान खत्म हो रहा था, और रिश्तेदार अब उधार मांगने के डर से फोन उठाना बंद कर चुके थे। सुमेधा को एहसास हो गया था कि अब उसे ही कुछ करना होगा। अगर वह भी विकास की तरह समाज की सोच और झूठी शान की चिंता में बैठी रही, तो उनका परिवार सड़क पर आ जाएगा।
सुमेधा के हाथों में जादू था। वह बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती थी, खासकर उसके बनाए राजमा-चावल और छोले-भटूरे की तो पूरी कॉलोनी दीवानी थी। उसने फैसला किया कि वह अपने इस हुनर को ही अपनी ताकत बनाएगी। घर में बचे कुछ थोड़े से पैसों से उसने राशन खरीदा और अगली ही सुबह भोर में उठकर उसने बड़े-बड़े बर्तनों में खाना तैयार किया। उसने घर के पुराने स्कूटर पर अपना सारा सामान बांधा और शहर के सबसे व्यस्त कमर्शियल इलाके के एक नुक्कड़ पर जाकर अपना एक छोटा सा खाने का स्टॉल लगा लिया। सुमेधा के लिए यह सब इतना आसान नहीं था। पहली बार जब वह सड़क किनारे खड़ी होकर ग्राहकों का इंतजार कर रही थी, तो उसे बहुत झिझक महसूस हो रही थी। लेकिन जैसे ही उसे अपने बच्चों के मासूम चेहरे और घर के हालात याद आए, उसकी सारी झिझक उड़न छू हो गई। खाने की महक से जल्द ही आस-पास के दफ्तरों में काम करने वाले लोग, ऑटो वाले और राहगीर उसके स्टॉल पर जुटने लगे। सुमेधा के हाथों का स्वाद और उसके परोसने का प्यार भरा अंदाज लोगों को इतना पसंद आया कि पहले ही दिन दोपहर तक उसका सारा खाना बिक गया। जब सुमेधा घर लौटी, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और आंखों में आत्मविश्वास की चमक थी। उसने विकास को कुछ नहीं बताया और चुपचाप अगले दिन की तैयारियों में जुट गई।
यह सिलसिला लगभग एक हफ्ते तक यूं ही चलता रहा। सुमेधा सुबह विकास के उठने से पहले ही घर से निकल जाती और दोपहर तक वापस आ जाती। विकास को लगता कि वह बच्चों को स्कूल छोड़ने या किसी सहेली के घर जाती है। लेकिन एक दिन, नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। विकास अपने एक पुराने दोस्त से नौकरी के सिलसिले में मिलने उसी कमर्शियल इलाके में गया था। दोनों एक चाय की टपरी पर खड़े होकर बातें कर रहे थे, तभी विकास के दोस्त की नजर सड़क के दूसरी तरफ लगे एक छोटे से खाने के स्टॉल पर पड़ी। वहां काफी भीड़ थी। दोस्त ने आंखें सिकोड़ते हुए कहा, “यार विकास, वो सामने जो औरत राजमा-चावल बेच रही है, वो बिल्कुल तुम्हारी पत्नी सुमेधा भाभी जैसी लग रही है। क्या बात है, कोई हमशक्ल है क्या?”
विकास ने जैसे ही उस तरफ मुड़कर देखा, उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह कोई हमशक्ल नहीं, बल्कि सुमेधा ही थी। वह एक एप्रन पहने, मुस्कुराते हुए लोगों को प्लेटों में खाना परोस रही थी और लोग उसे पैसे दे रहे थे। विकास का चेहरा गुस्से, शर्मिंदगी और अपमान से लाल हो गया। उसके कानों में जैसे सीटी बजने लगी। “मेरी पत्नी… एक सीनियर मैनेजर की पत्नी… सड़क पर खड़ी होकर ढाबे वालों की तरह खाना बेच रही है? मेरे दोस्त क्या सोचेंगे? मेरी इज्जत का तो कचरा हो गया!” विकास के मन में बवंडर उठने लगा। वह बिना अपने दोस्त को कुछ कहे, तेजी से सड़क पार करके सुमेधा के स्टॉल की तरफ बढ़ा।
भीड़ को चीरता हुआ जब विकास सुमेधा के पास पहुंचा, तो उसने लगभग फुफकारते हुए सुमेधा की बांह पकड़ ली और उसे पीछे खींचते हुए बोला, “ये क्या तमाशा लगा रखा है तुमने सुमेधा? चलो घर! अभी के अभी!” उसकी आवाज में गुस्सा और शर्मिंदगी साफ छलक रही थी।
सुमेधा ने पहले तो अचानक हुए इस हमले से घबराकर विकास को देखा, लेकिन फिर उसने बहुत ही शांति से अपना हाथ विकास की पकड़ से छुड़ाया। उसने वहां खड़े ग्राहकों से नम्रतापूर्वक कहा, “भैया, आप लोग दो मिनट रुकिए, मैं अभी आपको खाना देती हूँ।” फिर वह विकास की आंखों में आंखें डालकर, बिना किसी डर या झिझक के, बेहद शांत और दृढ़ स्वर में बोली, “कैसा तमाशा विकास? मैं कोई तमाशा नहीं कर रही हूँ, मैं अपना काम कर रही हूँ। मेहनत की रोटी कमा रही हूँ।”
विकास ने चारों तरफ देखा, लोग उन्हें ही देख रहे थे। वह फुसफुसाते हुए बोला, “तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम क्या कर रही हो? मेरी नौकरी चली गई है, इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम सड़क पर बैठकर ये… ये मामूली काम करने लगोगी! मैं छोटी-मोटी नौकरियां इसलिए नहीं कर रहा क्योंकि मैं अपने रुतबे से समझौता नहीं कर सकता, और तुमने यहां मेरी इज्जत सरेआम नीलाम कर दी! क्या सोचेंगे लोग कि विकास की बीवी सड़क पर खाना बेच रही है? इसमें मुझे कितनी शर्मिंदगी महसूस हो रही है, इसका एहसास है तुम्हें?”
सुमेधा के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान तैर गई। उसने एक गहरी सांस ली और विकास से कहा, “शर्मिंदगी? विकास, कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। काम तो बस काम होता है, जो पेट की आग बुझाता है और परिवार को पालता है। तुम्हें इस काम में शर्मिंदगी नजर आ रही है? मुझे तो शर्मिंदगी तब महसूस हो रही थी जब हमारे बच्चों को स्कूल में फीस न भरने के कारण पूरी क्लास के सामने खड़ा किया गया था। मुझे शर्मिंदगी तब महसूस हो रही थी जब राशन वाले भैया ने उधार देने से मना करते हुए हमें ताना मारा था। मुझे शर्मिंदगी तब होती है जब हम हट्टे-कट्टे होकर भी हालातों के सामने घुटने टेक देते हैं और अपनी झूठी शान के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने या भीख मांगने की नौबत ले आते हैं।”
सुमेधा रुकी नहीं, उसकी आवाज में एक अजीब सी खनक थी जिसने आस-पास खड़े लोगों को भी शांत कर दिया था। “तुम कहते हो कि तुम्हारी नौकरी चली गई और तुम छोटा काम नहीं करना चाहते। तो क्या तुम्हारे इस ‘बड़े रुतबे’ और इस ‘झूठे अहंकार’ से हमारे बच्चों का पेट भर जाएगा? क्या तुम्हारा ये ‘लोग क्या कहेंगे’ वाला डर हमारी ईएमआई चुका देगा? विकास, जब इंसान भूखा होता है न, तो उसे रुतबा नहीं, रोटी चाहिए होती है। मैं यहां कोई चोरी नहीं कर रही, किसी को धोखा नहीं दे रही। मैं अपनी मेहनत का, अपने पसीने का पैसा कमा रही हूँ। मैंने अपने परिवार को बचाने के लिए यह कदम उठाया है, और मुझे अपने इस काम पर गर्व है, शर्मिंदगी नहीं। असली शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए जो काम करने से कतराते हैं, जो मेहनत करने से जी चुराते हैं। अगर तुम मेरा साथ नहीं दे सकते, तो कम से कम मुझे मेरा काम तो करने दो।”
सुमेधा की बातें किसी तेज तीर की तरह विकास के सीने में चुभ रही थीं। उसका सारा गुस्सा, सारा अहंकार सुमेधा के इन सच्चे और कड़वे शब्दों के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह गया। उसने पलट कर देखा, वहां खड़े लोग सुमेधा को सम्मान भरी नजरों से देख रहे थे। एक बुजुर्ग ग्राहक ने आगे बढ़कर कहा, “बेटा, तुम्हारी पत्नी बहुत ही स्वाभिमानी और मेहनती है। आज के जमाने में ऐसी जीवनसाथी किस्मत वालों को मिलती है जो बुरे वक्त में कंधे से कंधा मिलाकर चले। तुम्हें तो इस पर गर्व होना चाहिए।”
विकास की आंखें भर आईं। उसे अचानक अपने आप पर घिन आने लगी। वह पिछले छह महीनों से सिर्फ अपने अहंकार को पाल रहा था, जबकि उसकी पत्नी घर को बिखरने से बचाने के लिए इतनी बड़ी लड़ाई लड़ रही थी। उसे याद आए वे सारे रिजेक्शन लेटर, वे सारे ताने जो उसने सहे थे, और फिर भी वह अपनी झूठी शान में अंधा बना हुआ था। उसने देखा कि सुमेधा कितनी शिद्दत से पसीने में भीगकर भी मुस्कुराते हुए ग्राहकों को खाना दे रही थी।
विकास ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी शर्ट की आस्तीन ऊपर चढ़ाई और चुपचाप सुमेधा के पास जाकर खड़ा हो गया। सुमेधा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। विकास ने एक प्लेट उठाई और उसमें राजमा-चावल डालकर एक ग्राहक की तरफ बढ़ाते हुए सुमेधा से कहा, “तुम ठीक कह रही हो सुमेधा। काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। असली शर्मिंदगी तो काम से भागने में है। मुझे माफ कर दो, मेरा वो झूठा अहंकार मेरी आंखों पर पट्टी बांधे हुए था। आज से हम दोनों मिलकर यह काम करेंगे।”
सुमेधा की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उसने विकास की तरफ देखकर एक सुकून भरी मुस्कान दी। उस दिन उस छोटे से खाने के स्टॉल पर सिर्फ राजमा-चावल ही नहीं बिक रहे थे, बल्कि एक पति-पत्नी के रिश्ते की एक नई और मजबूत नींव रखी जा रही थी। विकास को अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि सड़क से गुजरने वाला कौन उसे देख रहा है या कौन क्या सोच रहा है। उसे बस इतना पता था कि मेहनत की रोटी में जो सुकून और जो इज्जत है, वह दुनिया के किसी भी झूठे रुतबे या दिखावे में नहीं हो सकती। उस दिन से विकास और सुमेधा ने मिलकर उस स्टॉल को चलाया। विकास की मार्केटिंग की समझ और सुमेधा के हाथों के स्वाद ने जल्द ही उस छोटे से स्टॉल को इलाके की सबसे मशहूर खाने की जगह बना दिया। विकास ने समझ लिया था कि असली सफलता ऊंचे ओहदों में नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में हार न मानने और ईमानदारी से पसीना बहाने में है।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद