एक कठोर हृदय का पश्चाताप

 कांता बुआ ने पल्लवी के सिर पर हाथ फेरा और गहरी सांस लेते हुए बोलीं, “पल्लवी बिटिया, मैं पिछले दस दिनों से इस घर का तमाशा देख रही हूँ। तू दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती है। मेरी बहन सुमित्रा की हर जायज-नाजायज मांग पूरी करती है। फिर भी उसके मुंह से तेरे लिए कभी एक मीठा शब्द नहीं निकलता। आज सुबह भी उसने सबके सामने तुझे बात-बात पर जलील किया। तू इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार है, तू यह सब क्यों सहती है बेटी? अगर सुमित्रा ने तुझे अपनी बहू नहीं माना है, तो तू भी क्यों उसके पीछे अपनी जान खपा रही है? मुझे तो सुमित्रा की इस पत्थरदिली पर बहुत गुस्सा आता है। मैं आज शाम को उसके आने पर उसे अच्छी तरह खरी-खोटी सुनाऊंगी। उसे समझाऊंगी कि इंसानियत भी कोई चीज होती है।”

 सुमित्रा देवी को अपने खानदान, अपनी परंपराओं और अपनी पसंद पर बड़ा गुरूर था। उन्होंने अपने इकलौते बेटे, वेदांत के लिए अपने ही रुतबे वाले एक परिवार की लड़की पसंद कर रखी थी। उनके ख्यालों में उनकी होने वाली बहू एक ऐसी मूरत थी जो उनके इशारों पर चले और उनके हर उसूल को आंख मूंदकर मान ले।

लेकिन सुमित्रा देवी के अरमानों पर उस दिन पानी फिर गया, जब वेदांत ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह विवाह करेगा तो सिर्फ अपनी सहपाठी और प्रेमिका, पल्लवी से। पल्लवी एक बहुत ही साधारण, मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। उसके पिता एक स्कूल में मामूली शिक्षक थे। सुमित्रा देवी ने आसमान सिर पर उठा लिया, खूब हंगामा हुआ, लेकिन वेदांत के आगे उनकी एक न चली। आखिरकार भारी मन और समाज की लाज रखने के लिए सुमित्रा देवी को इस शादी के लिए हामी भरनी पड़ी।

विवाह संपन्न तो हो गया और पल्लवी इस बड़े घर की बहू बनकर आ भी गई, लेकिन सुमित्रा देवी ने उसे कभी अपने दिल से और अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं किया। उनके मन का वह गुबार, जो वेदांत के फैसले से उठा था, अब पल्लवी पर तानों और तिरस्कार के रूप में बरसने लगा था। पल्लवी घर में चाहे जितना भी काम कर ले, चाहे जितनी भी सेवा कर ले, सुमित्रा देवी की नजरें केवल उसकी गलतियां ही ढूंढती थीं।

“अरे ओ महारानी! ये चाय बनाई है या मीठा पानी? हमारे खानदान में ऐसी चाय नौकरों को भी नहीं दी जाती। तुम्हारे मायके में तो शायद चाय की पत्ती गिनकर डाली जाती होगी, लेकिन यहाँ कंजूसी नहीं चलती,” सुमित्रा देवी अक्सर सुबह-सुबह पल्लवी के हाथ की बनी चाय का प्याला मेज पर झटकते हुए कहती थीं।

पल्लवी चुपचाप, बिना किसी शिकायत के वह प्याला उठाती और दोबारा उनके लिए चाय बनाने रसोई में चली जाती।

सुमित्रा देवी का बस नहीं चलता था कि वह पल्लवी को किस तरह नीचा दिखाएं। मोहल्ले की दूसरी औरतों के सामने वे जानबूझकर पल्लवी की तुलना अपनी पड़ोसन की बहू से करतीं। “अरे विमला जी, आपकी बहू तो साक्षात अन्नपूर्णा है। क्या सलीका है उसके बात करने का। एक हमारे कर्म फूट गए कि ऐसी बहू मिली है जिसे न तो घर संभालना आता है और न ही बड़ों के सामने उठने-बैठने का कोई ढंग है। पता नहीं मेरे सीधे-सादे बेटे पर कौन सा जादू कर दिया इस लड़की ने।”

पल्लवी ये सब सुनती, उसकी आंखें भर आतीं, लेकिन वह कभी पलटकर जवाब नहीं देती। उसके माता-पिता ने उसे हमेशा यही संस्कार दिए थे कि बड़ों का सम्मान हर हाल में करना चाहिए, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। वेदांत अक्सर अपनी माँ के इस बर्ताव पर गुस्सा हो जाता। वह कई बार सुमित्रा देवी से बहस करने पर उतारू हो जाता, लेकिन हर बार पल्लवी ही उसे रोक देती।

“वेदांत, प्लीज तुम माँ जी से कुछ मत कहो। उन्हें वक्त लगेगा मुझे अपनाने में। आखिर मैंने उनके बुने हुए सपनों की जगह ली है, उनका नाराज होना स्वाभाविक है। मैं अपने प्यार और सेवा से एक दिन उनका दिल जरूर जीत लूंगी,” पल्लवी अक्सर वेदांत को समझाते हुए कहती।

दिन, हफ्ते और महीने बीतते गए। पल्लवी सुबह पांच बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक घर के हर काम में जुटी रहती। सुमित्रा देवी के पैरों में दर्द होता तो वह घंटों उनके पैर दबाती। उनकी दवाइयों से लेकर उनके खान-पान का पूरा ध्यान रखती, लेकिन सुमित्रा देवी के दिल की बर्फ पिघलने का नाम ही नहीं ले रही थी।

एक दिन सुमित्रा देवी की दूर की मौसेरी बहन, कांता बुआ कुछ दिनों के लिए बनारस आईं। कांता बुआ स्वभाव से बहुत ही स्पष्टवादी और पारखी नजर वाली महिला थीं। घर में आते ही उन्होंने पल्लवी की शालीनता, उसकी मेहनत और घर के प्रति उसके समर्पण को भांप लिया। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी देख लिया कि सुमित्रा देवी का व्यवहार अपनी बहू के प्रति कितना कड़वा और अपमानजनक था।

कांता बुआ से यह सब देखा नहीं गया। उन्हें पल्लवी पर बहुत तरस आता था। एक दिन दोपहर के समय सुमित्रा देवी किसी रिश्तेदार के यहाँ गृह-प्रवेश के कार्यक्रम में गई हुई थीं। वेदांत भी ऑफिस गया हुआ था। घर में केवल कांता बुआ और पल्लवी ही थे। पल्लवी रसोई का सारा काम निबटा कर कांता बुआ के कमरे में उनके लिए फल काटकर लाई और उनके पैर दबाने लगी।

कांता बुआ ने पल्लवी के सिर पर हाथ फेरा और गहरी सांस लेते हुए बोलीं, “पल्लवी बिटिया, मैं पिछले दस दिनों से इस घर का तमाशा देख रही हूँ। तू दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती है। मेरी बहन सुमित्रा की हर जायज-नाजायज मांग पूरी करती है। फिर भी उसके मुंह से तेरे लिए कभी एक मीठा शब्द नहीं निकलता। आज सुबह भी उसने सबके सामने तुझे बात-बात पर जलील किया। तू इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार है, तू यह सब क्यों सहती है बेटी? अगर सुमित्रा ने तुझे अपनी बहू नहीं माना है, तो तू भी क्यों उसके पीछे अपनी जान खपा रही है? मुझे तो सुमित्रा की इस पत्थरदिली पर बहुत गुस्सा आता है। मैं आज शाम को उसके आने पर उसे अच्छी तरह खरी-खोटी सुनाऊंगी। उसे समझाऊंगी कि इंसानियत भी कोई चीज होती है।”

यह सुनकर पल्लवी अचानक कांता बुआ के पैरों के पास से उठी और उनके हाथ पकड़कर बहुत ही नम्रता से बोली, “बुआ जी, आपसे हाथ जोड़कर विनती है, आप माँ जी से कुछ मत कहिएगा। और न ही उनके बारे में ऐसी कोई बात सोचिएगा।”

कांता बुआ हैरान रह गईं। “अरी पगली! वो तुझे दिन-रात ताने मारती है, तेरा अपमान करती है, और तू उसी की तरफदारी कर रही है?”

पल्लवी के चेहरे पर एक शांत और पवित्र मुस्कान थी। उसने कहा, “बुआ जी, ताने वही मारता है जो अपना समझता है। अपमान नहीं, वो उनका गुस्सा है जो एक माँ के अधिकार से बाहर आता है। जब मायके में कोई बेटी गलती करती है, तो क्या उसकी अपनी माँ उसे डांटती नहीं है? क्या कोई बेटी अपनी सगी माँ के डांटने पर बुरा मानकर घर छोड़ देती है? नहीं ना! मेरे लिए माँ जी मेरी अपनी माँ जैसी ही हैं। अगर उन्होंने मुझे डांटा है, तो इसका मतलब है कि उन्होंने अवचेतन रूप से ही सही, मुझे इस घर का हिस्सा मान लिया है। जिस दिन वो मुझे डांटना बंद कर देंगी और मुझसे बेगानों की तरह मीठा बोलने लगेंगी, उस दिन मुझे लगेगा कि मैं इस घर के लिए पराई हूँ। उनका कठोर स्वभाव उनका आवरण हो सकता है, लेकिन वो मेरे पति की माँ हैं, इस घर की नींव हैं। मेरा कर्तव्य है उनकी सेवा करना। वो मुझे क्या देती हैं, यह उनका नजरिया है, लेकिन मैं उन्हें क्या देती हूँ, यह मेरे संस्कार हैं। इसलिए बुआ जी, आप कृपया मेरी माँ जी के बारे में एक भी गलत शब्द न कहें, यह सुनकर मुझे बहुत पीड़ा होगी।”

कांता बुआ पल्लवी की बातें सुनकर स्तब्ध रह गईं। उन्होंने अपनी जिंदगी में ऐसा समर्पण और ऐसी सोच कभी नहीं देखी थी।

तभी कमरे के दरवाजे पर कुछ गिरने की आवाज़ आई। पल्लवी और कांता बुआ ने चौंककर दरवाजे की तरफ देखा। वहाँ सुमित्रा देवी खड़ी थीं और उनके हाथों से उनके चश्मे का केस और पर्स फर्श पर गिर चुका था। दरअसल, कार्यक्रम जल्दी खत्म होने के कारण सुमित्रा देवी समय से पहले घर लौट आई थीं और उन्होंने कमरे के बाहर खड़े होकर कांता बुआ और पल्लवी की सारी बातें सुन ली थीं।

सुमित्रा देवी बुत बनकर खड़ी थीं। पल्लवी के एक-एक शब्द उनके कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे। पच्चीस सालों का उनका घमंड, उनका रुतबा और उनकी झूठी शान, सब कुछ उस सीधी-सादी लड़की के ऊंचे संस्कारों के सामने बौना पड़ गया था। उन्हें याद आने लगा कि कैसे उन्होंने हर छोटी बात पर इस लड़की का दिल दुखाया था। कैसे उन्होंने उसे पराया एहसास कराने की हर मुमकिन कोशिश की थी। और बदले में इस लड़की ने क्या किया? पीठ पीछे भी उनकी इज्जत की रक्षा की, उन्हें अपनी सगी माँ का दर्जा दिया और उनके तानों को अपना आशीर्वाद मान लिया।

सुमित्रा देवी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उनके पैर लड़खड़ाए और वे धीरे-धीरे पल्लवी की तरफ बढ़ीं।

पल्लवी घबरा गई, “माँ जी! आप कब आईं? आप रो क्यों रही हैं? क्या मुझसे कोई भूल हो गई?”

सुमित्रा देवी ने अपने दोनों हाथ बढ़ाए और पल्लवी को कसकर अपने सीने से लगा लिया। वे फूट-फूट कर रोने लगीं। “भूल तुझसे नहीं… इस अभागी सास से हुई है बेटी। मैं अपने गुरूर में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे एक हीरे की परख ही नहीं रही। मैं तुझे पत्थर समझकर ठोकरें मारती रही, और तू मेरा हर वार सहकर भी निखरती रही।”

पल्लवी की आंखें भी छलक आई थीं, उसने सुमित्रा देवी की पीठ सहलाई।

सुमित्रा देवी ने पल्लवी का माथा चूमते हुए कांपती आवाज़ में कहा, “आज तूने मुझे हरा दिया पल्लवी। तूने अपनी अच्छाई से मेरी बरसों की नफरत को खत्म कर दिया। सचमुच, तेरे माता-पिता ने तुझे ऐसे संस्कार दिए हैं कि तूने आज इस घर को हमेशा के लिए अपना बना लिया। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… तेरी ये पापी माँ आज तुझसे अपने किए की क्षमा मांगती है।”

पल्लवी ने रोते हुए सुमित्रा देवी के पैर छुए, जिसे सुमित्रा देवी ने तुरंत रोककर उसे गले से लगा लिया। कांता बुआ भी यह सब देखकर अपनी आंखों के आंसू नहीं रोक पाईं। उस दिन उस बड़े से घर की दीवारें एक सास-बहू के मिलन की गवाह बनीं। सुमित्रा देवी का घमंड टूट चुका था और उस घर में अब सिर्फ एक माँ और बेटी का रिश्ता बाकी था, जिसकी बुनियाद पल्लवी के अटूट प्रेम और संस्कारों ने रखी थी।

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