“अरे… सुनते हो!”
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं सुनूँगा? कोई इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ हूँ। माना कि घुटनों में थोड़ा दर्द रहता है और अखबार पढ़ने के लिए चश्मे की जरूरत पड़ती है, पर मेरी जान… कान मेरे अभी भी सोलह साल वाले लड़के जैसे तेज हैं। बोलो, क्या हुक्म है सरकार का?”
रमा देवी अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए मुस्कुरा दीं। “हुक्म कुछ नहीं है। बस यह कह रही थी कि शाम ढलने को है, कॉलोनी के नुक्कड़ वाली दुकान से घर का कुछ जरूरी किराना और दवाइयाँ लानी थीं। पर्ची बना दूँ या याद रहेगा?”
“पर्ची की क्या दरकार है? तुम्हारी हर बात तो मेरे दिल के पन्नों पर दर्ज रहती है। थैला उठाओ, ताला मैं लगाता हूँ। थोड़ा खुली हवा में टहलना भी हो जाएगा और सामान भी आ जाएगा।” देवेश जी ने अपनी लाठी उठाई और मुस्कुराते हुए चप्पलें पहन लीं।
दोनों जैसे ही गेट से बाहर निकले, सामने से आ रहे उनके पुराने पड़ोसी माथुर साहब ने हाथ हिलाया, “अरे देवेश भाई! भाभी जी नमस्ते… कहाँ की तैयारी है शाम-शाम को?”
“नमस्ते माथुर साहब! बस यूँ ही पास के मार्केट तक जा रहे हैं। थोड़ा घर का सौदा-सुलफ लेना है और दोनों की शाम की सैर भी हो जाएगी।” देवेश जी ने खुशमिज़ाज लहजे में जवाब दिया।
शाम का बाज़ार हमेशा की तरह अपनी पूरी रफ़्तार में था। गाड़ियों का शोर, दुकानों की चकाचौंध और लोगों की भीड़। दोनों ने मेडिकल स्टोर से दवाइयाँ लीं और फिर परचून की दुकान से राशन का थैला भर लिया।
वापस लौटते हुए अचानक देवेश जी के कदम सड़क के दूसरी तरफ लगी एक छोटी सी चूड़ी वाली दुकान पर जाकर ठिठक गए। रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियाँ बिजली के बल्ब की रोशनी में चमक रही थीं।
देवेश जी का चेहरा खिल उठा, “अरे रमा! एक मिनट रुको… मैं अभी आया। तुम्हारी उन हरी कांच की चूड़ियों का नाप तो मुझे अच्छे से याद है। वो पिछली वाली टूट गई थीं न, मैं दो मिनट में सड़क पार करके लेकर आता हूँ।”
रमा ने घबराकर उनका हाथ पकड़ लिया, “अरे छोड़िए भी! इस उम्र में चूड़ी-कंगन का क्या करना? कहाँ इस भारी ट्रैफ़िक में सड़क पार करते फिरेंगे। वैसे भी शाम के वक्त गाड़ियों की तेज़ हेडलाइट्स से आपकी आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है। रहने दीजिए ना, इन सफेद बालों और झुर्रियों वाले हाथों में अब चूड़ियाँ अच्छी नहीं लगेंगी।”
“तुम भी न हर बात में उम्र का रोना रोने लगती हो! औरत के हाथ कभी चूड़ियों के बिना अच्छे नहीं लगते। तुम यहीं फुटपाथ पर खड़ी रहो, मैं पलक झपकते ही आया।” देवेश जी ने प्यार से रमा का हाथ थपथपाया और बिना सुने आगे बढ़ गए।
रमा सड़क किनारे खड़ी इंतज़ार करने लगी। मिनट बीते, फिर दस मिनट हो गए। शाम का अंधेरा अब गहराने लगा था। सड़क पर गाड़ियों की कतारें और हॉर्न की कानफाड़ू आवाज़ें बेचैनी बढ़ा रही थीं।
“इतनी देर क्यों लगा दी इन्होंने? कोई मिल गया होगा तो गप्पें लड़ाने बैठ गए होंगे। इस उम्र में भी बच्चों जैसी ज़िद करते हैं। खुद तो परेशान होते ही हैं, मुझे भी हलकान करके रख देते हैं।” रमा बुदबुदाई और अपने थैले से पुराना कीपैड फोन निकालकर देवेश जी का नंबर मिलाने लगी।
घंटी बजती रही… बजती रही। तीसरी बार में फोन उठ गया।
रमा ने राहत की सांस लेते हुए डांटने वाले लहजे में कहा, “कहाँ रह गए आप? इतनी देर से फोन क्यों नहीं उठा रहे थे?”
सामने से देवेश जी की नहीं, बल्कि एक घबराई हुई, अनजान लड़के की आवाज़ आई, “हेलो… अम्मा जी! आप इस फोन वाले अंकल की क्या लगती हैं?”
रमा के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई। “मैं… मैं उनकी पत्नी बोल रही हूँ। आप कौन हैं? मेरे पति कहाँ हैं?”
“अम्मा जी, जल्दी से सामने वाले चौक पर आइए… यहाँ एक तेज़ रफ़्तार कार ने अंकल को टक्कर मार दी है। बहुत खून बह रहा है… यह फोन उनके हाथ से छिटक कर गिरा था।”
फोन रमा के हाथ से छूटते-छूटते बचा। आँखों के आगे जैसे बिजली कौंध गई। वह पागलों की तरह अपनी साड़ी संभालते हुए, गिरती-पड़ती सड़क के उस पार दौड़ी। सामने भारी भीड़ जमा थी।
भीड़ को चीरते हुए जब वह आगे बढ़ी, तो पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
सड़क पर खून का एक बड़ा सा घेरा बना हुआ था। देवेश जी बेसुध पड़े थे। उनका एक हाथ छाती पर था, और उसी हाथ की मुट्ठी में अखबार की पुड़िया में लिपटी हरी कांच की चूड़ियाँ थीं। कुछ चूड़ियाँ टूटकर सड़क पर बिखर गई थीं और खून के लाल रंग में उनकी हरी चमक दब गई थी। उनकी आँखें पथराई हुई आसमान की तरफ खुली थीं।
“देवेश जी!” रमा के मुंह से एक चीख तक पूरी नहीं निकल पाई। कलेजा मुंह को आ गया, सांसें अटक गईं और वह वहीं सड़क पर उनके कदमों में अचेत होकर गिर पड़ी।
जब रमा की आँखें खुलीं, तो वह अस्पताल के सफेद, ठंडे और बदबूदार वॉर्ड में थी। सामने ड्रिप की बोतल लटक रही थी। सफेद कोट पहने डॉक्टर और खाकी वर्दी में दो पुलिसकर्मी उसके सिरहाने खड़े थे।
रमा ने शून्य नज़रों से कभी छत के पंखे को देखा तो कभी डॉक्टर को। डॉक्टर ने बहुत ही धीमे, भारी और सहानुभूति भरे स्वर में कहा, “अम्मा जी… हम बहुत शर्मिंदा हैं। उन्हें जब यहाँ लाया गया, तब तक उनकी नब्ज़ रुक चुकी थी। हेड इंजरी बहुत गंभीर थी… हम उन्हें बचा नहीं सके।”
यह सुनकर भी रमा की आँखों से एक आंसू नहीं टपका। डॉक्टर और नर्स हैरान थे। वह बस एकटक दीवार को घूर रही थी। ऐसा लगा जैसे उसके सारे जज़्बात, सारे अहसास उसी सड़क पर देवेश जी की टूटी चूड़ियों के साथ बिखर कर मर गए हों। कानों में अजीब सी सीटी बज रही थी, चारों तरफ एक भयावह, गहरा सन्नाटा पसर चुका था। रोने की आवाज़ भी अंदर ही कहीं घुट गई थी।
पुलिस इंस्पेक्टर ने आगे बढ़कर अपनी डायरी निकाली और बहुत अदब से पूछा, “माता जी, हमें कागज़ी कार्रवाई पूरी करनी है और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजना होगा। कृपया अपने किसी रिश्तेदार, बेटे या परिवार के किसी सदस्य का फोन नंबर दे दीजिए, ताकि हम उन्हें यहाँ बुला सकें।”
रिश्तेदार? परिवार? बेटा?
इन शब्दों ने रमा के सीने में दबे उस पुराने नासूर को फिर से कुरेद दिया जिसे उसने और देवेश जी ने चालीस सालों तक अपनी खामोशी की चादर में छुपा कर रखा था। वह किसे बुलाए? किस रिश्तेदार को?
चालीस साल पहले, जब उन्होंने अपने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह किया था, तब ससुराल वालों ने देवेश को कुल का कलंक कहकर हमेशा के लिए घर से बेदखल कर दिया था। देवेश की माँ ने चौखट पर खड़े होकर अपनी छाती पीटते हुए ऐसी कड़वी बददुआ दी थी, “जिस औलाद के लिए तूने मुझे छोड़ा है, भगवान करे तू कभी खुद औलाद का मुंह न देख सके!”
और वह बददुआ जैसे पत्थर की लकीर बन गई थी। रमा की गोद कभी हरी नहीं हुई। शादी के पंद्रह साल तक दर-दर मन्नतें मांगीं, मंदिरों के चक्कर काटे, डॉक्टरों की दवाइयाँ खाईं, पर कोख सूनी की सूनी ही रही। समाज के तानों और अकेलेपन से तंग आकर रमा के सगे भाई ने अपना दूसरा बेटा उन्हें यह कहकर सौंप दिया था कि यह बुढ़ापे में तुम्हारा सहारा बनेगा।
देवेश और रमा ने अपना पेट काटकर, अपनी सारी जमा-पूंजी उस बच्चे की पढ़ाई और परवरिश में झोंक दी। पर वह भी क्या सगा हुआ? जैसे ही उसके पंख निकले, वह अपनी बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर, अच्छी नौकरी के लालच में सात समंदर पार अमेरिका जा बसा। पहले साल कभी-कभार फोन आता था, फिर धीरे-धीरे उसने भी अपने माता-पिता को केवल पैसों का एक पुराना बैंक समझकर भूल जाना ही बेहतर समझा। पिछले पाँच सालों से उसका कोई अता-पता नहीं था।
आज इस वीरान अस्पताल के गलियारे में, अपने पति के बेजान जिस्म के सामने रमा अकेली खड़ी थी। उसके पास देने के लिए कोई नाम नहीं था, कोई नंबर नहीं था।
रमा ने कांपते हुए अपने हाथों को देखा। उन खाली, झुर्रियों वाले हाथों में न अब वो हरी चूड़ियाँ थीं और न ही उन्हें थामने वाला वो इंसान, जिसने दुनिया के हर तूफान के सामने ढाल बनकर उसे संभाला था। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर आकर वह समझ गई थी कि जब किस्मत साथ छोड़ती है, तो पूरी दुनिया की भीड़ के बीच भी इंसान सिर्फ और सिर्फ एक लावारिस साया बनकर रह जाता है।
जीवन के इस कड़वे सच पर आपकी क्या राय है? क्या एक गलती या बददुआ इंसान का पीछा ताउम्र नहीं छोड़ती, या फिर अपनों का मतलब सिर्फ मतलब तक ही सीमित रह जाता है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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