सुलोचना देवी टूट कर रोने लगीं। वे लड़खड़ाते कदमों से प्रेरणा के पास गईं और उसके दोनों हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैं सोने की चमक में अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि जो पैसे वाला है, वही सच्चा है। मैं यह भूल गई कि असली जेवर सोना-चांदी नहीं, बल्कि इंसान का चरित्र और उसके संस्कार होते हैं। मैंने पत्थर को हीरा समझा और मेरे घर में जो असली हीरा था, उसे मैं रोज़ पैरों तले कुचलती रही।”
शहर के एक शांत मोहल्ले में देवराज जी और उनकी पत्नी सुलोचना देवी का भरा-पूरा परिवार रहता था। उनके दो बेटे थे, बड़ा बेटा सुधीर और छोटा बेटा अमित। सुधीर की शादी एक बड़े व्यापारी की बेटी रश्मि से हुई थी, जबकि अमित की पत्नी प्रेरणा एक बहुत ही साधारण और मध्यम वर्गीय परिवार से आई थी। रश्मि अपने साथ ढेर सारा दहेज, महंगे कपड़े और जेवर लेकर आई थी, वहीं प्रेरणा के माता-पिता सिर्फ अपनी बेटी को अच्छे संस्कार ही दे पाए थे। सुलोचना देवी के मन में यह अमीर-गरीब का भेद बहुत गहराई तक बैठा हुआ था। वे हमेशा रश्मि की तारीफों के पुल बांधती रहती थीं और प्रेरणा को हर छोटी-बड़ी बात पर ताने मारना उनका रोज का काम बन गया था।
रश्मि बहुत ही चतुर और मीठी छुरी थी। उसने अपनी बातों के जाल में सुलोचना देवी को ऐसे फंसा रखा था कि घर की तिजोरी से लेकर हर छोटे-बड़े फैसले में रश्मि की ही मर्जी चलती थी। “माँ जी, आप क्यों तिजोरी और चाबियों का बोझ उठाती हैं, लाइए ये सब मुझे दे दीजिए, आप बस आराम कीजिए,” कहकर रश्मि ने बहुत पहले ही घर की सारी चाबियां अपने कब्जे में ले ली थीं। सुलोचना देवी भी खुशी-खुशी अपनी अमीर बहू पर अंधा विश्वास कर बैठी थीं।
दूसरी तरफ प्रेरणा थी, जो सुबह पांच बजे उठकर पूरे घर की सफाई करने से लेकर सबके लिए खाना बनाने तक का सारा काम अकेले संभालती थी। उसे घर में कभी वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। सुलोचना देवी हमेशा कहतीं, “रश्मि तो हमारे घर की लक्ष्मी है, जब से आई है, इसके मायके से हर त्योहार पर कुछ न कुछ कीमती आता ही रहता है। और एक यह प्रेरणा है, जिसके मायके वालों ने आज तक एक सूती साड़ी भी ढंग की नहीं भेजी।” प्रेरणा चुपचाप यह सब सुनती और अपनी किस्मत को कोस कर रह जाती। उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की और ना ही कभी घर के किसी गहने या पैसे पर अपना हक जताया।
एक दिन सुलोचना देवी का साठवां जन्मदिन था। घर में एक छोटी सी पूजा रखी गई थी। पूजा के बाद रश्मि ने सबके सामने एक लाल रंग का मखमली डिब्बा सुलोचना देवी के हाथों में रख दिया। जब उन्होंने डिब्बा खोला तो उसमें सोने के दो बहुत ही भारी और खूबसूरत कंगन चमक रहे थे। सुलोचना देवी की आंखें फटी की फटी रह गईं।
“अरे बहू! इतने महंगे कंगन?” सुलोचना देवी ने खुश होते हुए पूछा।
रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ जी, मेरे पापा ने कहा था कि मेरी प्यारी समधन जी का साठवां जन्मदिन है, तो यह तोहफा तो कुछ भी नहीं है। उन्होंने खास आपके लिए यह कंगन बनवा कर भेजे हैं।”
सुलोचना देवी ने गर्व से पूरे मोहल्ले की औरतों को वो कंगन दिखाए और रश्मि के मायके वालों की जमकर तारीफ की। फिर उन्होंने तिरछी नजर से प्रेरणा की तरफ देखा, जिसने अपने हाथों से बुना हुआ एक शॉल अपनी सास को भेंट किया था। सुलोचना देवी ने उस शॉल को एक तरफ फेंकते हुए कहा, “बस यही औकात है तुम्हारे मायके वालों की। मेरी बड़ी बहू को देखो, सोने से लाद दिया है मुझे।” प्रेरणा की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन वह बिना कुछ कहे वहां से रसोई में चली गई।
देवराज जी यह सब चुपचाप देख रहे थे। वे स्वभाव से बहुत शांत थे, लेकिन उन्हें रश्मि का यह दिखावा कुछ अजीब लगता था।
कुछ दिनों बाद, देवराज जी बाजार में अपने एक पुराने दोस्त मदनलाल से मिलने गए। मदनलाल जी शहर के एक जाने-माने सुनार थे और उनकी देवराज जी के परिवार से पुरानी जान-पहचान थी। बातों-बातों में मदनलाल जी ने कहा, “यार देवराज, एक बात तो माननी पड़ेगी, तुम्हारी बड़ी बहू रश्मि की पसंद बहुत अच्छी है। पिछले हफ्ते वो जो तुम्हारी पुश्तैनी भारी वाली सोने की करधनी (कमरबंद) लेकर आई थी, उसे गलवा कर उसने जो कंगन के डिजाइन पसंद किए, वो वाकई कमाल के थे। तुम्हारी पत्नी को वो कंगन पसंद तो आए ना?”
यह सुनते ही देवराज जी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। “पुश्तैनी करधनी? कंगन?” देवराज जी ने हक्के-बक्के रह कर पूछा।
मदनलाल ने सहज भाव से कहा, “हाँ भाई, वही करधनी जो तुम्हारी दादी की थी। रश्मि कह रही थी कि अब वो पुराने डिजाइन कोई पहनता नहीं है, इसलिए सुलोचना जी ने ही उसे गलवा कर अपने जन्मदिन के लिए नए कंगन बनवाने को कहा है।”
देवराज जी का सिर चकराने लगा। वह करधनी परिवार की सबसे कीमती निशानी थी, जिसे उन्होंने अपनी तिजोरी के सबसे अंदर वाले हिस्से में संभाल कर रखा था। देवराज जी बिना कुछ कहे तेजी से घर की तरफ लौट पड़े। रास्ते भर उन्हें रश्मि का वो मासूम चेहरा याद आता रहा जब वह कहती थी कि “पापा जी, आपको तिजोरी खोलने की क्या जरूरत है, मुझे बता दीजिए मैं निकाल दूंगी।”
घर पहुंचते ही देवराज जी ने सीधे सुलोचना देवी को आवाज लगाई। “सुलोचना! जरा अपनी बड़ी बहू से तिजोरी की चाबी मांगना, मुझे कुछ जरूरी कागजात देखने हैं।”
रश्मि वहां आई और थोड़ी घबराई हुई आवाज में बोली, “पापा जी, कागजात तो मैं ही निकाल देती हूँ, आप क्यों परेशान होते हैं?”
देवराज जी ने कड़कती आवाज में कहा, “नहीं! चाबी मुझे दो।”
रश्मि ने कांपते हाथों से चाबी दे दी। देवराज जी ने तिजोरी खोली और सीधे उस लाल रंग के छोटे संदूक को निकाला जिसमें पुश्तैनी गहने रखे रहते थे। संदूक खाली था। वहां ना करधनी थी, और ना ही सुलोचना देवी के पुराने कंगन।
देवराज जी ने वह खाली संदूक सुलोचना देवी के सामने फेंक दिया। “सुलोचना, पूछो अपनी इस लाडली और अमीर बहू से कि घर की पुश्तैनी करधनी कहां गई?”
सुलोचना देवी घबरा गईं, “क्या मतलब? वो तो यहीं रखी थी।”
तभी देवराज जी ने मदनलाल सुनार की सारी बात घर वालों के सामने रख दी। उन्होंने बताया कि कैसे रश्मि ने घर के पुश्तैनी गहनों को चुराकर उन्हें गलवाया और फिर उन्हीं गहनों के पैसों से सुलोचना को कंगन गिफ्ट करके अपने मायके वालों का नाम लगा दिया।
यह सच सामने आते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया। रश्मि का चेहरा पीला पड़ गया था और वह शर्म से नजरें नहीं मिला पा रही थी।
“रश्मि! यह क्या सुन रही हूँ मैं?” सुलोचना देवी रो पड़ीं। “तुमने मेरे ही घर के गहने चुराकर मुझे ही तोहफे में दे दिए? और मैं मूर्ख, तुम्हारे मायके की अमीरी के गुण गाती रही!”
रश्मि रोते हुए बोली, “माँ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मेरे पापा के व्यापार में घाटा हो गया था, वो मुझे कुछ नहीं दे पा रहे थे, और मुझे घर में अपनी झूठी शान बनाए रखनी थी। इसलिए मैंने… मैंने यह सब किया।”
सुलोचना देवी को आज अपनी सबसे बड़ी भूल का एहसास हो रहा था। उन्होंने पलट कर रसोई के दरवाजे पर खड़ी प्रेरणा को देखा। वह प्रेरणा, जो फटे हुए सूती कपड़े पहनकर भी घर का सारा काम हंसते हुए करती थी। जिसने कभी घर की एक सुई तक पर अपना हक नहीं जमाया। जिसे उसकी सास ने हमेशा गरीबी का ताना मारा, लेकिन उसने कभी पलट कर जवाब नहीं दिया।
सुलोचना देवी टूट कर रोने लगीं। वे लड़खड़ाते कदमों से प्रेरणा के पास गईं और उसके दोनों हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैं सोने की चमक में अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि जो पैसे वाला है, वही सच्चा है। मैं यह भूल गई कि असली जेवर सोना-चांदी नहीं, बल्कि इंसान का चरित्र और उसके संस्कार होते हैं। मैंने पत्थर को हीरा समझा और मेरे घर में जो असली हीरा था, उसे मैं रोज़ पैरों तले कुचलती रही।”
प्रेरणा की आंखों से भी आंसू बह निकले। उसने अपनी सास को गले लगा लिया और कहा, “माँ जी, आप ऐसा मत कहिए। आप मेरी माँ समान हैं।”
उस दिन के बाद से उस घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। सुलोचना देवी ने तिजोरी की चाबियां रश्मि से लेकर प्रेरणा के हाथों में सौंप दीं, हालांकि प्रेरणा ने बहुत मना किया। घर में अब अमीरी-गरीबी का कोई भेदभाव नहीं था। सुलोचना देवी को समझ आ गया था कि दिखावे की चमक ज्यादा दिन नहीं टिकती, लेकिन सच्चाई और ईमानदारी जीवन भर साथ निभाती है।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
#रिश्तों का आईना