एक ही आँगन की दो उड़ानें

दीनानाथ जी ने आगे कहा, “एक बात हमेशा याद रखना सावित्री, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। रोहन आज अगर इतनी शांति से अपना काम कर पा रहा है, तो इसलिए क्योंकि पीछे से मीरा ने घर को एक मजबूत खंभे की तरह संभाल रखा है। अगर मीरा खुश नहीं रहेगी, तो तुम यह कैसे सोच सकती हो कि तुम्हारा बेटा सुखी रहेगा? बहू के दिल को दुखाकर तुम कभी अपने बेटे के हिस्से में खुशी नहीं डाल सकती। घर की लक्ष्मी जब तरक्की करती है, तो घर का भाग्य बदलता है। हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि हमारे आंगन में आज एक नहीं, बल्कि दो-दो सफलताएं आई हैं।”

शहर के एक व्यस्त मोहल्ले में दीनानाथ जी का दो मंजिला मकान था। घर में उनकी पत्नी सावित्री देवी, बेटा रोहन, बहू मीरा और छह साल की पोती आरोही रहते थे। घर देखने में जितना शांत और सुखी लगता था, उसके भीतर पुरानी और नई सोच के बीच की एक खामोश कशमकश हमेशा चलती रहती थी। सावित्री देवी अपने जमाने की एक सख्त विचारों वाली महिला थीं। उनका मानना था कि औरत चाहे कितना भी पढ़-लिख ले, बाहर की दुनिया में कितने भी झंडे गाड़ ले, लेकिन उसकी असली जगह और उसकी असली पहचान उसके घर की चारदीवारी और रसोई से ही होती है। दूसरी तरफ उनकी बहू मीरा, जो शहर के एक नामी बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत थी, अपने घर और बाहर की दुनिया को बेहद खूबसूरती से साधने की कोशिश में लगी रहती थी।

मीरा की सुबह अलार्म बजने से पहले ही शुरू हो जाती थी। सुबह पाँच बजे उठकर पूरे परिवार के लिए चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, आरोही को स्कूल के लिए उठाना, उसका टिफिन पैक करना और फिर खुद भी तैयार होकर बैंक भागना—यह उसकी दिनचर्या का एक अटूट हिस्सा था। शाम को जब वह थक-हार कर लौटती, तो उसके लिए आराम का कोई वक्त नहीं होता था। उसे सीधे रसोई में जाना पड़ता और रात के खाने की तैयारियों में जुटना पड़ता। रोहन एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। वह स्वभाव से बहुत समझदार और अपनी पत्नी से बेइंतहा प्यार करने वाला इंसान था। वह मीरा की मेहनत को देखता था और अक्सर घर के कामों में हाथ बंटाने की कोशिश करता, लेकिन सावित्री देवी को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं था। उन्हें लगता था कि बेटा दिन भर ऑफिस में खट कर आता है, उसे घर आकर आराम मिलना चाहिए।

एक दिन शाम का वक्त था। सावन की हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मौसम में एक अजीब सी ठंडक और सुकून घुला हुआ था। दीनानाथ जी और सावित्री देवी बरामदे में बैठकर चाय पी रहे थे। तभी रोहन की गाड़ी दरवाजे पर आकर रुकी। आज रोहन के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। वह गाड़ी से उतरा तो उसके हाथों में मिठाई के दो बड़े डिब्बे थे। वह लगभग दौड़ता हुआ अंदर आया और सीधे अपनी माँ के गले लग गया। “माँ, बाबूजी! आज मेरा प्रमोशन हो गया है। मुझे कंपनी ने सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर बना दिया है और साथ ही मेरी सैलरी भी काफी बढ़ गई है।”

यह सुनते ही सावित्री देवी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने रोहन का माथा चूमा, उसकी आरती उतारने के लिए पूजा घर से थाली ले आईं और दीनानाथ जी ने भी गर्व से बेटे की पीठ थपथपाई। सावित्री देवी ने तुरंत अपने मायके, ननद और पड़ोसियों को फोन घुमाना शुरू कर दिया। “अरे, हमारे रोहन का प्रमोशन हुआ है, साहब बन गया है वो अपनी कंपनी में। कल शाम को आ जाओ सब, जश्न मनाएंगे।” पूरे घर में उत्साह का माहौल था।

ठीक आधे घंटे बाद मीरा भी बैंक से घर लौटी। आज उसके कदमों में भी एक अलग सी स्फूर्ति थी और उसके हाथ में भी एक छोटा सा मिठाई का डिब्बा था। उसने आते ही देखा कि घर में उत्सव का माहौल है। रोहन ने मीरा को देखते ही अपनी खुशी साझा की। मीरा ने बहुत प्यार से रोहन को बधाई दी और फिर अपना डिब्बा आगे बढ़ाते हुए थोड़ी झिझक के साथ बोली, “माँ जी, बाबूजी… आज मेरे लिए भी बहुत बड़ा दिन है। बैंक ने मेरे काम और पिछले साल की परफॉरमेंस को देखते हुए मुझे ब्रांच मैनेजर के पद पर प्रमोट कर दिया है। अब मुझे पूरी ब्रांच हेड करनी है।”

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। रोहन खुशी से उछल पड़ा और उसने मीरा को गले लगा लिया, “अरे वाह मीरा! यह तो डबल सेलिब्रेशन का मौका है। आई एम सो प्राउड ऑफ यू!” दीनानाथ जी ने भी मुस्कुराकर बहू को आशीर्वाद दिया।

लेकिन सावित्री देवी के चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जो चंद मिनटों पहले बेटे की सफलता सुनकर आई थी। उन्होंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, “चलो, अच्छी बात है। पर बहू, एक बात याद रखना। ब्रांच मैनेजर बन गई हो, इसका मतलब यह नहीं कि घर की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लोगी। औरत का असली घर तो उसका परिवार ही होता है। अब तो तुम्हारी जिम्मेदारियां और बढ़ जाएंगी, ऑफिस में भी और यहाँ भी। मुझे तो चिंता इस बात की है कि तुम आरोही को और घर को कैसे संभालोगी? रोहन की नौकरी बड़ी है, उसकी जिम्मेदारियां ज्यादा हैं, तुम्हें तो बस घर खर्च में थोड़ी मदद करनी होती है।”

यह सुनकर मीरा का दिल बैठ गया। जो खुशी उसके चेहरे पर कुछ पल पहले तैर रही थी, वह अचानक आंसुओं के बोझ तले दब गई। वह बिना कुछ कहे मिठाई का डिब्बा मेज पर रखकर अपने कमरे में चली गई और बाथरूम में जाकर रोने लगी। उसे इस बात का दुख नहीं था कि उसकी सास ने उसे ताना मारा, दुख इस बात का था कि उसकी सालों की मेहनत, उसके संघर्ष और उसकी सफलता का इस घर में कोई मोल नहीं था।

रोहन से मीरा की यह उदासी देखी नहीं गई। वह अपनी माँ की इस दोहरी मानसिकता से अच्छी तरह वाकिफ था, लेकिन आज पानी सिर से ऊपर जा चुका था। वह सीधा बरामदे में अपनी माँ के पास गया।

“माँ, आज आपने मीरा के साथ जो किया, वह बहुत गलत है,” रोहन ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।

सावित्री देवी ने हैरान होते हुए पूछा, “मैंने क्या किया? मैंने तो बस उसे उसकी जिम्मेदारी याद दिलाई। मैं कोई गलत बात तो नहीं कह रही। घर तो औरत को ही देखना पड़ता है ना।”

रोहन ने गहरी सांस ली और बोला, “माँ, आप मुझे एक बात बताइए। जब मैं सुबह ऑफिस के लिए निकलता हूँ, तो मैं सिर्फ अपने ऑफिस की टेंशन लेकर जाता हूँ। मुझे नहीं पता होता कि नाश्ते में क्या बना है, आरोही की यूनिफॉर्म कहाँ है, या शाम को खाने में क्या पकेगा। लेकिन मीरा? वह सुबह उठकर पूरे घर का काम करती है, फिर आठ घंटे की शिफ्ट में सौ तरह के ग्राहकों का सिरदर्द झेलती है, बैंक का करोड़ों का हिसाब मिलाती है, और फिर घर आकर वापस उसी चूल्हे-चौके में लग जाती है। माँ, अगर कोई इंसान इस घर में मुझसे ज्यादा मेहनत कर रहा है, तो वह मीरा है।”

सावित्री देवी चुप रहीं। रोहन आगे बोला, “आप कहती हैं कि उसकी नौकरी सिर्फ मदद के लिए है। माँ, अगर हम घर के हर उस काम का हिसाब लगाएं जो एक औरत बिना किसी छुट्टी के, बिना किसी सैलरी के करती है, तो आप यकीन मानिए, वह दुनिया के किसी भी मैनेजर से कहीं ज्यादा कमा रही है। उसकी सफलता मेरी सफलता से कहीं ज्यादा बड़ी है क्योंकि उसने यह मुकाम बेड़ियों को पहनकर हासिल किया है, जबकि मैं खुले आसमान में उड़ रहा था। क्या बहू की खुशियों में हमारा कोई हिस्सा नहीं है? क्या बहू की तरक्की इस घर की तरक्की नहीं है?”

तभी पीछे से दीनानाथ जी की भारी और गंभीर आवाज आई। “रोहन बिल्कुल सही कह रहा है सावित्री।” दीनानाथ जी अपनी कुर्सी से उठकर सावित्री देवी के पास आए। “तुम एक बात सोचो भाग्यवान, अगर यही खुशखबरी आज हमारी बेटी श्रुति लेकर आती, तो क्या तुम्हारा यही रवैया होता? क्या तुम तब भी उसे यही ताना मारती कि घर कैसे संभालोगी? नहीं ना? तुम पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटती और गर्व से कहती कि मेरी बेटी अफसर बन गई है। तो फिर बहू के मामले में यह दोहरा मापदंड क्यों? जब बेटी अपनी होती है, तो बहू पराई क्यों लगने लगती है?”

सावित्री देवी नजरें नहीं मिला पा रही थीं।

दीनानाथ जी ने आगे कहा, “एक बात हमेशा याद रखना सावित्री, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। रोहन आज अगर इतनी शांति से अपना काम कर पा रहा है, तो इसलिए क्योंकि पीछे से मीरा ने घर को एक मजबूत खंभे की तरह संभाल रखा है। अगर मीरा खुश नहीं रहेगी, तो तुम यह कैसे सोच सकती हो कि तुम्हारा बेटा सुखी रहेगा? बहू के दिल को दुखाकर तुम कभी अपने बेटे के हिस्से में खुशी नहीं डाल सकती। घर की लक्ष्मी जब तरक्की करती है, तो घर का भाग्य बदलता है। हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि हमारे आंगन में आज एक नहीं, बल्कि दो-दो सफलताएं आई हैं।”

पिता और पुत्र की इन बातों ने सावित्री देवी के मन के भीतर के जाले साफ कर दिए। रात भर वह बिस्तर पर करवटें बदलती रहीं। उन्हें मीरा का वह चेहरा याद आ रहा था जब वह बीमार पड़ी थीं, और कैसे मीरा ने रात-रात भर जागकर उनके पैर दबाए थे और सुबह उठकर फिर ऑफिस गई थी। उन्हें एहसास हुआ कि उनकी अपनी संकीर्ण सोच के कारण उन्होंने अपनी ही उस बहू का दिल दुखाया है, जिसने कभी उन्हें अपनी सगी माँ से कम नहीं समझा।

अगली सुबह रविवार का दिन था। मीरा की आँख खुली तो वह हड़बड़ा कर उठी, उसे लगा आज काम में बहुत देर हो गई है। लेकिन जब वह बाहर आई तो देखकर हैरान रह गई। रसोई में सावित्री देवी चाय बना रही थीं और आरोही डाइनिंग टेबल पर प्लेटें लगा रही थी।

मीरा दौड़कर रसोई में गई, “माँ जी, आप क्यों तकलीफ कर रही हैं? मुझे जगा दिया होता।”

सावित्री देवी ने मुस्कुराकर मीरा की तरफ देखा और उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उनकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे। “आज तू मुझे कोई काम नहीं करने देगी बहू। आज इस घर की सबसे बड़ी अफसर का दिन है। मैंने कल जो भी कहा, उसके लिए मुझे माफ कर दे। सच में, मैं बुढ़िया अपनी पुरानी सोच में फंसी रह गई और यह भूल गई कि मेरी बहू कोई आम औरत नहीं, बल्कि इस घर का सबसे मजबूत स्तंभ है।”

मीरा की आंखें छलक आईं। उसने झट से अपनी सास के पैर छू लिए। सावित्री देवी ने उसे गले से लगा लिया।

शाम को सावित्री देवी ने घर में एक छोटी सी पूजा और एक शानदार दावत का आयोजन किया। जब सारे रिश्तेदार और पड़ोसी आए, तो सावित्री देवी ने खुद खड़े होकर सबको बताया, “आज हम सिर्फ रोहन का नहीं, बल्कि हमारी बहू मीरा की कामयाबी का भी जश्न मना रहे हैं। मेरी बहू आज ब्रांच मैनेजर बन गई है, और मुझे इस बात का बहुत घमंड है।”

यह सुनकर मीरा ने रोहन की तरफ देखा। रोहन की आंखों में भी खुशी के आंसू थे और वह अपनी माँ को गर्व से देख रहा था।

दावत के बाद, जब सब लोग जाने लगे, तो सावित्री देवी ने अपनी छह साल की पोती आरोही को अपने पास बुलाया। “बेटा आरोही, एक बात हमेशा याद रखना। तुम्हारी माँ दिन भर बाहर काम करती है और घर के लिए बहुत मेहनत करती है। अब तुम बड़ी हो रही हो, तुम्हें भी अपनी माँ का पूरा ख्याल रखना है और अपने छोटे-छोटे काम खुद करने हैं। तुम्हारी माँ सुपरवुमन है, लेकिन वो थक भी जाती है।”

आरोही ने मासूमियत से सिर हिलाया और बोली, “प्रॉमिस दादी, मैं मम्मा का पूरा ध्यान रखूंगी, और मैं भी बड़ी होकर मम्मा जैसी मैनेजर बनूंगी!”

पूरा घर इस बात पर खिलखिला कर हंस पड़ा। उस रात, उस घर की बुनियाद एक बार फिर से नई और मजबूत हो गई थी। अब वहां कोई भेदभाव नहीं था, बल्कि एक दूसरे के लिए सच्चा सम्मान था।

दोस्तों, सच यही है कि जब तरक्की घर का दरवाजा खटखटाती है, तो वह यह नहीं देखती कि वह बेटे के नाम से आई है या बहू के नाम से। दोनों की सफलता घर को ही ऊपर उठाती है। अगर हम अपनी बेटियों की सफलता पर गर्व महसूस कर सकते हैं, तो बहुओं की सफलता पर भी हमारा सीना उतना ही चौड़ा होना चाहिए। परिवार एक गाड़ी की तरह है, जिसके दोनों पहिए जब बराबर सम्मान और प्यार पाते हैं, तभी जिंदगी का सफर सुहाना और कामयाब होता है।

क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में आज भी बहू और बेटी की सफलता को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है? इस विषय पर अपनी राय कमेंट करके जरूर बताएं।

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