रिश्तों की वसीयत

कृतिका अचानक सास को वहां देखकर हक्की-बक्की रह गई। वह लड़खड़ाती जुबान से बोली, “मां… मां जी, मेरा वो मतलब नहीं था। मैं तो बस यह कह रही थी कि दीदी का फायदा हो गया। आखिर उन्होंने दो साल आपकी सेवा जो की है, उसका फल तो उन्हें मिलना ही था।”

“सेवा का फल?” कावेरी देवी की आंखों में आंसू और गुस्सा एक साथ तैर गए। “तुम्हारी नज़रों में हर रिश्ता सिर्फ एक व्यापार है कृतिका। तुम भूल गई क्या कि जब तुम इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थीं, तब मैंने अपने हिस्से की सारी ज़मीन बेचकर विकास के बिजनेस और तुम्हारी उन महंगी गाड़ियों के लिए पैसे दिए थे? उस वक्त मैंने कोई हिसाब नहीं रखा था क्योंकि एक मां अपने बच्चों से हिसाब नहीं मांगती। लेकिन तुमने क्या किया?”

शाम ढल चुकी थी  वैभव और प्रेरणा के नए बंगले ‘शांति-कुंज’ में मेहमानों की गहमागहमी थी। आज उनके गृह-प्रवेश का शुभ अवसर था। पूरा घर गेंदे के फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजा हुआ था। प्रेरणा एक खूबसूरत बनारसी साड़ी में सजी, चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान लिए हर मेहमान का स्वागत कर रही थी। तभी मुख्य द्वार से प्रेरणा के देवर-देवरानी, यानी विकास और कृतिका ने प्रवेश किया। कृतिका ने एक बेहद महंगी डिज़ाइनर साड़ी पहनी हुई थी और उसकी चाल में एक अजीब सा गुरूर था। उसके चेहरे पर इस भव्य घर को देखकर एक छिपी हुई ईर्ष्या साफ झलक रही थी।

कृतिका हमेशा से ही खुद को प्रेरणा से श्रेष्ठ समझती थी। जब विकास की अच्छी नौकरी लगी थी, तब उन्होंने सबसे पहले शहर में फ्लैट लिया था, जबकि वैभव और प्रेरणा सालों तक एक छोटे से किराए के मकान में रहे थे। उस समय उनकी सास, कावेरी देवी, विकास और कृतिका के साथ ही रहती थीं। लेकिन पिछले दो सालों से कावेरी देवी प्रेरणा और वैभव के साथ रह रही थीं।

पूजा संपन्न होने के बाद जब सभी लोग हॉल में बैठे थे, तब कावेरी देवी अपनी व्हीलचेयर पर धीरे-धीरे वहां आईं। प्रेरणा तुरंत उनके पास गई और उनके पैरों पर शॉल ठीक किया। कावेरी देवी ने प्यार से प्रेरणा के सिर पर हाथ फेरा और फिर अपने पास रखा एक पुराना, मखमली लाल डिब्बा निकाला।

हॉल में अचानक शांति छा गई। कावेरी देवी ने अपने कांपते हाथों से उस डिब्बे को खोला। उसमें एक बेहद प्राचीन और बेशकीमती कुंदन का पुश्तैनी हार था, जिसकी चमक से सबकी आंखें चौंधिया गईं। यह वो हार था जिसे कावेरी देवी ने सालों से बैंक के लॉकर में संभाल कर रखा था और जिसके बारे में कृतिका अक्सर सोचा करती थी।

कावेरी देवी ने वह हार निकाला और प्रेरणा के गले में पहनाते हुए बोलीं, “बेटी, इस नए घर में तुम्हारे कदम शुभ हों। यह सिर्फ एक हार नहीं, मेरे आशीर्वाद और इस परिवार की गरिमा का प्रतीक है। आज से तुम ही इस घर की और इन पुश्तैनी धरोहरों की असली हकदार हो।”

यह नज़ारा देखकर कृतिका के तन-बदन में आग लग गई। उसकी मुट्ठियां कस गईं और चेहरा तमतमा उठा। उसे लगा जैसे किसी ने उसका हक छीन लिया हो। जैसे-तैसे उसने पार्टी खत्म होने का इंतज़ार किया। जब ज्यादातर मेहमान जा चुके थे और सिर्फ परिवार के लोग बचे थे, तब कृतिका से रहा नहीं गया। वह प्रेरणा के पास गई, जो उस वक्त रसोई में कुछ काम समेट रही थी।

कृतिका ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ प्रेरणा से कहा, “वाह जेठानी जी! आज तो आपकी लॉटरी लग गई। इतनी शांति और मासूमियत का नाटक करके आपने मां जी की तिजोरी की सबसे कीमती चीज़ अपने नाम करवा ली। मुझे तो पता भी नहीं था कि मां जी के पास इतना बेशकीमती हार है, वरना मैं…”

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि दरवाजे पर कावेरी देवी की व्हीलचेयर आकर रुकी। वे वहां सब सुन रही थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी निराशा और कठोरता थी।

कावेरी देवी ने गंभीर और भारी आवाज़ में कहा, “वरना तुम क्या करतीं कृतिका? क्या तुम मुझे अपने घर में कुछ दिन और बर्दाश्त कर लेतीं? या मेरी दवाओं के बिल में कुछ और कटौती कर देतीं?”

कृतिका अचानक सास को वहां देखकर हक्की-बक्की रह गई। वह लड़खड़ाती जुबान से बोली, “मां… मां जी, मेरा वो मतलब नहीं था। मैं तो बस यह कह रही थी कि दीदी का फायदा हो गया। आखिर उन्होंने दो साल आपकी सेवा जो की है, उसका फल तो उन्हें मिलना ही था।”

“सेवा का फल?” कावेरी देवी की आंखों में आंसू और गुस्सा एक साथ तैर गए। “तुम्हारी नज़रों में हर रिश्ता सिर्फ एक व्यापार है कृतिका। तुम भूल गई क्या कि जब तुम इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थीं, तब मैंने अपने हिस्से की सारी ज़मीन बेचकर विकास के बिजनेस और तुम्हारी उन महंगी गाड़ियों के लिए पैसे दिए थे? उस वक्त मैंने कोई हिसाब नहीं रखा था क्योंकि एक मां अपने बच्चों से हिसाब नहीं मांगती। लेकिन तुमने क्या किया?”

कमरे में सन्नाटा छा गया था। वैभव और विकास भी वहां आ चुके थे, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ बोलने की। कावेरी देवी ने कृतिका की आंखों में आंखें डालते हुए आगे कहा,

“जब मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे उस बड़े से फ्लैट में रहती थी, तो तुमने मुझे एक कोने के कमरे में समेट दिया था। तुम यह सोचती थीं कि मुझ पर तुम्हारे कितने पैसे खर्च हो रहे हैं। जब मैं बीमार पड़ती थी, तो तुम्हारे चेहरे पर चिंता से ज्यादा इस बात की सिकुड़न होती थी कि अस्पताल का बिल कितना आएगा। मेरे रिश्तेदारों के आने पर तुम्हें लगता था कि तुम्हारे घर का राशन खत्म हो रहा है। तुमने मुझे तीन साल अपने पास रखा, लेकिन एक दिन भी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह मेरा अपना घर है। तुमने सिर्फ मेरी जायदाद देखी, मेरा बुढ़ापा और मेरा अकेलापन नहीं।”

कृतिका का सिर शर्म से झुक गया था। कावेरी देवी ने प्रेरणा की तरफ देखते हुए कहा, “और जब वैभव और प्रेरणा मुझे अपने उस छोटे से किराए के घर में लेकर आए थे, तब इनके पास खुद के खर्चे पूरे करने के लिए पैसे नहीं होते थे। लेकिन प्रेरणा ने कभी उफ तक नहीं की। इसने अपनी पुरानी साड़ियां पहनकर मेरे लिए नई दवाएं खरीदीं। इसने मुझे वक्त दिया, प्यार दिया। प्रेरणा ने मुझे अपनाते समय कोई नफा-नुकसान नहीं देखा। उसने यह नहीं सोचा कि बुढ़िया को रखने से क्या फायदा होगा। और तुम कह रही हो कि प्रेरणा फायदे में रही?”

कृतिका के पास कोई जवाब नहीं था। वह ज़मीन की तरफ देख रही थी, लेकिन उसकी अकड़ अभी भी पूरी तरह से नहीं गई थी। उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, “लेकिन मां जी, पुश्तैनी जेवर पर तो दोनों बहुओं का बराबर का हक होता है ना?”

इस बार प्रेरणा, जो अब तक खामोश थी, आगे आई। उसने बड़ी ही शांति से गले से वह पुश्तैनी हार उतारा और कृतिका के हाथों में रख दिया। कृतिका हैरान रह गई।

प्रेरणा ने बेहद सहजता से कहा, “कृतिका, अगर तुम्हें लगता है कि इस हार में ही सारे रिश्ते और सारी खुशियां बसी हैं, तो तुम इसे रख लो। मुझे इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। मेरी असली वसीयत और मेरी सबसे बड़ी कमाई यह है कि मां जी आज मेरे साथ खुश हैं, वो रात को बिना किसी चिंता के सो पाती हैं।”

कृतिका के हाथ में वह बेशकीमती हार था, लेकिन पहली बार उसे वह हार आग के गोले जैसा महसूस हो रहा था।

प्रेरणा ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “तुमने तीन साल मां जी के साथ बिताए, लेकिन तुमने उस वक्त का इस्तेमाल सिर्फ यह गिनने में किया कि तुम्हारा कितना नुकसान हो रहा है। अगर मैं तुम्हारी जगह होती और नफा-नुकसान ही देखती, तो जब मां जी तुम्हारे घर में थीं, तभी मैं समाज में जाकर हंगामा करती और अपना हिस्सा मांगती। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। रिश्ते जब सौदेबाज़ी बन जाते हैं ना कृतिका, तो इंसान भले ही बैंक बैलेंस से कितना भी अमीर हो जाए, लेकिन अंदर से वो बिल्कुल कंगाल हो जाता है।”

कावेरी देवी ने प्रेरणा के हाथ से हार वापस लिया और उसे फिर से प्रेरणा के गले में पहना दिया। उन्होंने कृतिका से कहा, “यह हार सिर्फ उसी के गले में सजेगा जिसने इस परिवार को पिरो कर रखा है, जिसने इसे टूटने से बचाया है। जिस दिन तुम पैसों से ऊपर उठकर रिश्तों की अहमियत समझोगी, उस दिन तुम्हें खुद समझ आ जाएगा कि तुमने क्या खोया है।”

अब कृतिका से और खड़ा नहीं रहा गया। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसे अपने उन तमाम दिनों की याद आ गई जब उसने कावेरी देवी को सिर्फ एक बोझ समझा था। उसे याद आया कैसे वह उन्हें ताने मारती थी, कैसे उनकी छोटी-छोटी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करती थी। आज प्रेरणा के उस बड़े दिल और सास की खरी बातों ने उसके अहंकार को चकनाचूर कर दिया था।

वह अचानक कावेरी देवी के पैरों में गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दीजिए मां जी। मैं सच में अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि मैं बहुत चालाक हूं, लेकिन मैं तो सबसे बड़ी बेवकूफ निकली। मैंने हीरे जैसी सास और दीदी का प्यार खो दिया। प्लीज मुझे एक मौका दे दीजिए।”

विकास की आंखों में भी आंसू थे। वह भी अपनी पत्नी की गलतियों पर हमेशा पर्दा डालता रहा था, लेकिन आज उसे भी अपनी कायरता पर शर्म आ रही थी।

प्रेरणा ने झुककर कृतिका को उठाया और उसे गले से लगा लिया। माहौल की सारी कड़वाहट जैसे प्रेरणा के इस एक स्पर्श से पिघल गई। प्रेरणा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे पगली, रोती क्यों है? घर परिवार में यह सब तो चलता रहता है। इंसान अपनी गलतियों से ही तो बड़ा होता है। अगर हम सिर्फ यह देखेंगे कि किसने हमारे साथ क्या बुरा किया, तो हम कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। कल को हमारे बच्चे भी तो हमें यही सब करते देखेंगे। यह घर जितना मेरा है, उतना ही तुम्हारा भी है। जब तुम्हारा मन करे, यहां आओ, रहो और मां जी का आशीर्वाद लो।”

कुछ देर बाद जब कृतिका और विकास वापस अपने घर जाने के लिए कार में बैठे, तो वे बिल्कुल बदले हुए इंसान थे। उनके मन का मैल धुल चुका था और वहां अब सिर्फ रिश्तों के लिए सम्मान था।

सब मेहमानों और देवर-देवरानी के जाने के बाद, कावेरी देवी ने प्रेरणा को अपने पास बिठाया। उन्होंने प्यार से उसका माथा चूमते हुए पूछा, “प्रेरणा, एक बात बता। कृतिका ने तुम्हारे साथ हमेशा बुरा बर्ताव किया, मुझे भी खून के आंसू रुलाए। फिर भी तुमने उसे इतनी आसानी से कैसे माफ कर दिया? तुम्हारे मन में ज़रा भी कड़वाहट नहीं आई?”

प्रेरणा ने एक गहरी और सुकून भरी सांस ली। उसने कावेरी देवी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “मां जी, जब मैं स्कूल में थी, तो मेरे पिताजी हमेशा एक बात कहते थे। वो कहते थे कि अगर कोई तुम्हारे ऊपर कीचड़ उछाले, तो उसे साफ करने के लिए तुम्हें भी कीचड़ में उतरने की ज़रूरत नहीं है। अगर मैं कृतिका की बातों का जवाब उसी की भाषा में देती, तो मुझमें और उसमें क्या फर्क रह जाता? अगर हम पुरानी बातों की गांठ बांधकर बैठे रहेंगे, तो हमारा अपना ही दम घुटने लगेगा। माफ कर देने से सामने वाले को अपनी गलती का एहसास भी होता है और हमारा मन भी हल्का रहता है। मैंने अपने मन की शांति के लिए उसे माफ किया, और देखिए, अंत में जीत तो परिवार की ही हुई ना।”

पास ही दरवाज़े पर खड़े वैभव ने अपनी पत्नी की यह बात सुनी और उसकी आंखों में प्रेरणा के लिए इज़्ज़त और भी बढ़ गई। उसने यह जान लिया था कि एक सच्चा इंसान वही है जो टूटे हुए धागों को फिर से जोड़ने का हुनर जानता हो, क्योंकि रिश्ते कभी भी अहंकार की ज़मीन पर नहीं, बल्कि क्षमा और प्यार के आसमान तले ही फलते-फूलते हैं।

दोस्तों, क्या आपको लगता है कि प्रेरणा का कृतिका को इतनी आसानी से माफ़ कर देना सही था? क्या असल ज़िंदगी में लोग इतनी जल्दी अपनी गलतियों का अहसास कर लेते हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं, हमें आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा!

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