यह पढ़ते ही दोनों ननद-भौजाई एक दूसरे के गले लगकर जोर-जोर से रोने लगीं। सुमित्रा जी ने अपनी मौत की तैयारी भी जैसे पहले से ही कर रखी थी, ताकि जाने के बाद भी उनके बच्चों को कोई तकलीफ न हो। रोने की आवाज सुनकर विकास और पीछे-पीछे रघुनाथ जी भी भारी कदमों से कमरे में आ गए।
“क्या हुआ? तुम दोनों इस तरह क्यों रो रही हो?” विकास ने पूछा।
निधि ने बिना कुछ कहे वह चिट्ठी और वह रानी रंग की साड़ी अपने पिता रघुनाथ जी के हाथों में रख दी। साड़ी को देखते ही रघुनाथ जी के चेहरे का रंग उड़ गया। उनके हाथ बुरी तरह कांपने लगे और जो आंसू सुबह से उनकी आंखों में जमे हुए थे, वो अब बांध तोड़कर बह निकले। वह धड़ाम से वहीं जमीन पर बैठ गए और साड़ी को छाती से लगाकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे।
घर का वह बड़ा सा दालान, जो हमेशा मेहमानों की चहल-पहल, बच्चों की किलकारियों और सुमित्रा जी की मीठी डांट से गूंजता रहता था, आज श्मशान जैसी डरावनी शांति ओढ़े हुए था। ड्राइंग रूम से सोफे, कुर्सियां और सेंटर टेबल हटाकर बाहर बरामदे में रख दिए गए थे। फर्श पर बिछी मोटी दरियों के ऊपर सफेद चादरें बिछा दी गई थीं। घर के हर कोने में एक अजीब सी शून्यता और अगरबत्ती के धुएं की उदास महक तैर रही थी। किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि चौबीसों घंटे चरखी की तरह घूमने वाली सुमित्रा जी अचानक इतनी शांत कैसे हो सकती हैं।
निधि कल रात ही दूसरे शहर से अपने पति और बच्चों के साथ बदहवास हालत में पहुंची थी। घर की चौखट पर कदम रखते ही वह अपने पिता के गले लगकर ऐसे फफक कर रोई थी कि वहां खड़े हर शख्स की आंखें नम हो गई थीं। “पापा, मां ऐसे कैसे जा सकती हैं? उन्होंने तो मुझे बताया था कि अगले महीने वो मेरे पास रहने आएंगी…” कहते-कहते निधि निढाल होकर फर्श पर गिर पड़ी थी। बेटा विकास और बहू आरती भी गहरे सदमे में थे। किसी के भी गले से नीचे पानी की एक बूंद नहीं उतर रही थी। कल दोपहर तक तो सब कुछ सामान्य था। सुमित्रा जी रसोई में सबके लिए खाना बना रही थीं, तभी अचानक उनके सीने में तेज दर्द उठा और अस्पताल ले जाने से पहले ही उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। डॉक्टरों ने बताया कि यह एक तीव्र हृदयाघात (मैसिव हार्ट अटैक) था, जिसने संभलने का कोई मौका ही नहीं दिया।
सुमित्रा जी की उम्र पैंसठ वर्ष की थी, लेकिन उन्होंने कभी खुद को बूढ़ा नहीं माना। पूरे घर की धुरी उन्हीं पर टिकी थी। आरती के दोनों बच्चों को पालने से लेकर विकास के टिफिन और घर के बड़े-बुजुर्गों की देखभाल तक, हर काम वह खुद अपने हाथों से करती थीं। किसी ने भी उन्हें कभी दिन में बिस्तर पर लेटकर आराम करते नहीं देखा था। जब भी बच्चे कहते कि “मां, अब थोड़ा आराम कर लिया करो,” तो वह हंसकर टाल देती थीं और कहती थीं, “अरे, जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, तब तक काम कर लेने दो। चारपाई पर पड़ गई तो तुम लोगों को ही परेशानी होगी।” भगवान ने उनकी यह बात जैसे सचमुच सुन ली थी। वह किसी पर बोझ बने बिना, चलते-फिरते ही अपनी जीवन लीला समेट कर चली गई थीं।
आज उस सजे हुए कमरे में हर कोई सुमित्रा जी के पार्थिव शरीर को मौन आंखों से निहार रहा था। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जैसे जीवन भर की थकान अब मिट गई हो। घर के मुखिया और सुमित्रा जी के पति, रघुनाथ जी, एक कोने में दीवार के सहारे शून्य में ताकते हुए बैठे थे। उनकी आंखों से आंसू नहीं बह रहे थे, लेकिन उनका पूरा वजूद जैसे किसी गहरे सदमे में जम गया था। रघुनाथ जी एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे। उनका स्वभाव हमेशा से बहुत कड़क और अनुशासन प्रिय रहा था। उन्होंने जीवन भर अपनी पत्नी को कभी प्यार के दो मीठे बोल नहीं बोले थे। हर बात पर नुक्स निकालना, दूसरों के सामने सुमित्रा जी को नीचा दिखाना और उनके किए गए किसी भी काम की सराहना न करना रघुनाथ जी की आदत बन चुकी थी। इसके बावजूद सुमित्रा जी ने कभी उफ तक नहीं की। वह एक साए की तरह उनके हर सुख-दुख में साथ खड़ी रहीं, लेकिन रघुनाथ जी ने कभी उस साए की अहमियत नहीं समझी। आज जब वह साया हमेशा के लिए उठ गया था, तो रघुनाथ जी के भीतर एक ऐसा तूफान उठ रहा था जिसे वह किसी से बांट भी नहीं पा रहे थे।
अंतिम संस्कार का समय नजदीक आ रहा था। रीति-रिवाजों के अनुसार, सुमित्रा जी को उनकी अंतिम यात्रा के लिए तैयार करना था। आरती और निधि नम आंखों से सुमित्रा जी के कमरे की तरफ बढ़ीं। उन्हें अलमारी से एक नई साड़ी निकालनी थी, जिसमें वे अपनी मां को विदा कर सकें।
अलमारी खोलते ही दोनों फूट-फूट कर रो पड़ीं। उस अलमारी में चंदन और नेफ्थलीन बॉल्स की वही जानी-पहचानी खुशबू थी, जो हमेशा मां के कपड़ों से आया करती थी। हर साड़ी, हर सूट सलीके से तह करके रखा हुआ था। सुमित्रा जी का जीवन बहुत सादगी भरा था, इसलिए उनकी अलमारी में ज्यादातर सूती या साधारण साड़ियां ही थीं।
“दीदी, मां को कौन सी साड़ी पहनाएं?” आरती ने रोते हुए पूछा।
निधि ने आंसू पोंछते हुए कहा, “मां को गहरा रंग पसंद था न? कोई लाल या मैरून साड़ी देख। शायद कोई नई साड़ी रखी हो।”
आरती ने अलमारी के निचले हिस्से को टटोलना शुरू किया। “मुझे तो कभी नहीं पता चला कि मां को कौन सा रंग पसंद है। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ मांगा ही नहीं। जब भी बाजार जाओ, बस हम लोगों के लिए या बच्चों के लिए ही कुछ लाने को कहती थीं।”
कपड़े हटाते समय आरती का हाथ पीछे रखे एक पुराने लोहे के छोटे से ट्रंक पर पड़ा। वह ट्रंक हमेशा कपड़ों के पीछे छिपा रहता था। आरती ने उसे बाहर निकाला। उस पर कोई ताला नहीं था। जैसे ही उन्होंने ट्रंक का ढक्कन खोला, दोनों हैरान रह गईं। उसके अंदर बहुत ही करीने से लाल सूती कपड़े में लपेटी हुई एक साड़ी रखी थी। जब उन्होंने उस कपड़े को खोला, तो उसमें से एक बेहद खूबसूरत, सुनहरे गोटे वाली ‘रानी रंग’ (मैजेंटा) की रेशमी साड़ी निकली। वह साड़ी बिल्कुल नई लग रही थी, लेकिन उसकी तहें बता रही थीं कि उसे सालों से सहेज कर रखा गया था।
साड़ी के ठीक ऊपर एक सफेद लिफाफा रखा था। निधि ने कांपते हाथों से वह लिफाफा उठाया। उस पर सुमित्रा जी की लिखाई में कुछ लिखा था। निधि ने लिफाफा खोला, उसमें एक पुरानी सी चिट्ठी थी और साथ में घर के हर सदस्य के नाम का एक छोटा सा पैकेट था।
चिट्ठी में लिखा था:
“मेरी अंतिम यात्रा के लिए मुझे इसी रानी रंग की साड़ी में सजाना।”
यह पढ़ते ही दोनों ननद-भौजाई एक दूसरे के गले लगकर जोर-जोर से रोने लगीं। सुमित्रा जी ने अपनी मौत की तैयारी भी जैसे पहले से ही कर रखी थी, ताकि जाने के बाद भी उनके बच्चों को कोई तकलीफ न हो। रोने की आवाज सुनकर विकास और पीछे-पीछे रघुनाथ जी भी भारी कदमों से कमरे में आ गए।
“क्या हुआ? तुम दोनों इस तरह क्यों रो रही हो?” विकास ने पूछा।
निधि ने बिना कुछ कहे वह चिट्ठी और वह रानी रंग की साड़ी अपने पिता रघुनाथ जी के हाथों में रख दी। साड़ी को देखते ही रघुनाथ जी के चेहरे का रंग उड़ गया। उनके हाथ बुरी तरह कांपने लगे और जो आंसू सुबह से उनकी आंखों में जमे हुए थे, वो अब बांध तोड़कर बह निकले। वह धड़ाम से वहीं जमीन पर बैठ गए और साड़ी को छाती से लगाकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे।
उनका यह रूप देखकर बच्चे घबरा गए। उन्होंने अपने पिता को जीवन में कभी इस तरह रोते या जज्बाती होते नहीं देखा था। विकास ने उन्हें संभालते हुए पूछा, “पापा, क्या हुआ? आप ऐसे क्यों रो रहे हैं? यह साड़ी…”
रघुनाथ जी ने सिसकते हुए कहना शुरू किया, “यह साड़ी… यह साड़ी मैंने तुम्हारी मां को हमारी शादी के दूसरे साल में लाकर दी थी। मुझे मेरी पहली पक्की नौकरी का पहला बोनस मिला था। मैंने कभी किसी के लिए कोई तोहफा नहीं खरीदा था, लेकिन उस दिन बाजार में यह रानी रंग की साड़ी देखकर मुझे तुम्हारी मां का चेहरा याद आ गया था। मैं बहुत चाव से इसे घर लाया था।”
रघुनाथ जी कुछ देर के लिए रुके, उनकी आवाज आंसुओं में डूब रही थी। “पर… पर उसने यह साड़ी कभी पहनी ही नहीं। जब भी मैं पूछता, वो बात टाल देती। मुझे लगा कि उसे मेरी पसंद अच्छी नहीं लगी या शायद वो मेरी गरीबी का मजाक उड़ा रही है। मेरे अहंकार को इतनी गहरी चोट लगी कि मैंने कसम खा ली कि जिंदगी में कभी सुमित्रा के लिए कोई तोहफा नहीं लाऊंगा। मैंने जीवन भर उसे ताने मारे, उसकी पसंद-नापसंद को नजरअंदाज किया, उसे हर बात पर नीचा दिखाया, क्योंकि मेरे दिल में यह बात बैठ गई थी कि उसे मेरी दी हुई चीज की कद्र नहीं है। लेकिन… लेकिन मुझे क्या पता था…”
रघुनाथ जी ने कांपते हाथों से चिट्ठी का दूसरा पन्ना खोला, जो लिफाफे के अंदर ही रह गया था। उसमें सुमित्रा जी ने आगे लिखा था:
“मेरे पति, मेरे देवता। आप हमेशा मुझसे नाराज रहे कि मैंने आपके द्वारा दी गई पहली निशानी कभी नहीं पहनी। मैं आपको कैसे समझाती कि वह साड़ी मेरे लिए कपड़ों का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद थी। मुझे डर लगता था कि अगर मैंने उसे पहना, तो घर के काम-काज में या चूल्हे की कालिख से वह गंदी हो जाएगी, उसके धागे टूट जाएंगे। आपकी दी हुई उस पहली और आखिरी निशानी को मैं मैला नहीं करना चाहती थी। मैंने उसे अपनी जान से भी ज्यादा संभाल कर रखा, इस दिन के लिए। जब मैं इस घर से अपनी अंतिम विदाई लूंगी, तो आपके प्रेम की इसी निशानी को ओढ़कर जाना चाहती हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए था, बस यह एहसास कि आपने एक बार तो मुझे प्यार से कुछ दिया था, मेरे पूरे जीवन को काटने के लिए काफी था। हो सके तो मेरी गलतियों को माफ कर दीजिएगा।”
चिट्ठी के शब्द जैसे रघुनाथ जी के सीने में खंजर की तरह उतर गए। जिस औरत को वह जिंदगी भर पत्थर और भावनाहीन समझते रहे, वह तो उनके प्यार की एक छोटी सी बूंद को ही अपनी जिंदगी का सागर मान बैठी थी। सुमित्रा जी ने जीवन भर उनके रूखेपन, उनके तानों और उनके तिरस्कार को सहा, लेकिन कभी अपने पति के लिए मन में मैल नहीं रखा।
ट्रंक के अंदर कुछ और छोटे पैकेट थे। एक पर निधि का नाम था, जिसमें सुमित्रा जी ने उसके पैदा होने पर बनवाई गई छोटी सी चांदी की पायल सहेज कर रखी थी। आरती के पैकेट में उसकी मुंहदिखाई की एक पुरानी गिन्नी थी, जिसे उन्होंने बहू के बुरे वक्त के लिए बचा कर रखा था। विकास के पैकेट में उसके बचपन का पहला टूटा हुआ दांत और एक मोरपंख था। सुमित्रा जी ने अपने पीछे सिर्फ यादें नहीं, बल्कि प्यार का एक ऐसा समंदर छोड़ा था, जिसे वो लोग उनके जीते जी कभी देख ही नहीं पाए थे।
आज रघुनाथ जी को चुप कराना नामुमकिन था। उन्हें अपनी उस भूल का एहसास हो रहा था जिसकी अब कोई माफी नहीं थी। वो पछतावे की उस आग में जल रहे थे, जिसे सुमित्रा जी की मौत भी नहीं बुझा सकती थी। इंसान की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह अक्सर अपने पास मौजूद सबसे कीमती चीज की कद्र तब करता है, जब वह हमेशा के लिए उसके हाथों से फिसल जाती है। सुमित्रा जी तो अपना हर फर्ज निभा कर, हर कर्ज चुका कर और अपने पति की पहली भेंट को अपने साथ समेट कर उस दुनिया में चली गईं, जहां से कोई वापस नहीं आता। पीछे रह गया था तो बस एक सूना घर, रोते हुए बच्चे और एक ऐसा पति, जिसकी आत्मा जीवन भर उस रानी रंग की साड़ी के बोझ तले दबी रहने वाली थी।
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#वह रानी रंग की साड़ी: एक खामोश प्रेम की गवाही
लेखिका : मीरा महेश