नैना ने राधिका की आँखों में देखते हुए आगे कहा, “राधिका, तुमने मुझे हमेशा अपनी बड़ी बहन माना है ना? तो आज से मेरे ये दोनों भाई, तुम्हारे भी भाई हुए। इस घर की दहलीज के अंदर अगर मैंने तुम्हें अपनी बहन मान लिया है, तो मायके से आए ये मेरे भाई आज से तुम्हारे भी उतने ही सगे हैं, जितने मेरे।”
अनिकेत और चिराग, जो कुछ पल के लिए हैरान थे, अब पूरी स्थिति को समझ चुके थे। अनिकेत मुस्कुराते हुए अपनी जगह से उठा, उसने राधिका के सिर पर हाथ रखा और कहा, “अरे वाह! दिल्ली से चले थे एक बहन से राखी बंधवाने, और यहाँ तो भगवान ने हमें दो-दो बहनें दे दीं। ये तो हमारा सौभाग्य है। लाओ राधिका, अब जल्दी से हमें भी राखी बांधो, और हाँ, तुम्हारे लिए तोहफा हम अगली बार पक्का लेकर आएंगे, इस बार तो हमें पता ही नहीं था कि बनारस में हमारी एक और छोटी बहन हमारा इंतज़ार कर रही है।”
सावन का महीना अपनी पूरी रंगत पर था। आसमान में काले-कले बादलों की आवाजाही लगी हुई थी और रह-रह कर फुहारें पड़ रही थीं। बनारस के एक पुराने, लेकिन बेहद खूबसूरत और विशाल आंगन वाले घर में इन दिनों एक अलग ही रौनक छाई हुई थी। यह घर था शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी पंडित दीनानाथ जी का। दीनानाथ जी के दो बेटे थे—बड़े बेटे का नाम सूरज और छोटे का नाम विकास था। सूरज की शादी को पाँच साल हो चुके थे और उसकी पत्नी का नाम नैना था। नैना स्वभाव से बहुत ही सुलझी हुई, समझदार और पूरे घर को एक धागे में पिरो कर रखने वाली स्त्री थी। वहीं, विकास की शादी को अभी मुश्किल से छह महीने ही बीते थे। उसकी पत्नी राधिका अभी इस नए घर, नए माहौल और नए रिश्तों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही थी।
कल रक्षाबंधन का पावन त्योहार था। पूरे घर में साफ-सफाई, मिठाइयों की खुशबू और मेहमानों के स्वागत की तैयारियां जोरों पर थीं। नैना की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था, क्योंकि उसके दोनों सगे भाई, अनिकेत और चिराग, जो कि दिल्ली में रहकर नौकरी करते थे, इस बार पूरे दो साल बाद राखी बंधवाने बनारस आ रहे थे। नैना सुबह से ही रसोई में जुटी हुई थी। कभी बेसन के लड्डू बन रहे थे, तो कभी भाइयों की पसंद की नमकीन मठरियां। राधिका भी अपनी जेठानी का पूरा हाथ बंटा रही थी। दोनों देवरानी-जेठानी के बीच बहुत ही कम समय में एक मीठा सा रिश्ता बन गया था। नैना बड़ी बहन की तरह राधिका का मार्गदर्शन करती थी, और राधिका भी अपनी जेठानी का हर कहना मानती थी।
रसोई में काम करते हुए नैना बीच-बीच में चहकते हुए अपने भाइयों के किस्से सुना रही थी। “पता है राधिका, अनिकेत भैया को ना मीठा बहुत पसंद है, लेकिन चिराग को तीखा खाने की आदत है। दोनों जब साथ होते हैं, तो पूरे घर को सिर पर उठा लेते हैं। कल देखना, इस शांत आंगन में कैसी रौनक आ जाएगी।” नैना की आँखों में एक अजीब सी चमक थी—वही चमक जो मायके वालों के आने की खबर सुनकर हर शादीशुदा लड़की की आँखों में आ जाती है।
राधिका मुस्कुराते हुए सब सुन रही थी, लेकिन उसकी उस मुस्कान के पीछे एक गहरी उदासी छिपी थी। राधिका अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसका कोई भाई या बहन नहीं था। बचपन से ही रक्षाबंधन का दिन उसके लिए किसी खालीपन से कम नहीं होता था। जब स्कूल में उसकी सहेलियां अपने भाइयों की कलाइयों पर बंधी राखियों की बातें करतीं, या जब मोहल्ले की लड़कियां सज-धज कर अपने भाइयों को टीका लगातीं, तो राधिका अपने घर की खिड़की से उन्हें चुपचाप देखती रहती। उसके हिस्से में हमेशा वो सूनापन ही आया था। शादी के बाद उसे लगा था कि शायद ससुराल के बड़े परिवार में आकर उसका यह सूनापन भर जाएगा। लेकिन त्योहारों का एक सच यह भी है कि वो आपको आपके अपनों की, और जो आपके पास नहीं है, उसकी सबसे ज्यादा याद दिलाते हैं।
रात गहराने लगी थी। घर के सभी लोग खाना खाकर अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। दीनानाथ जी और उनकी पत्नी भी सो गए थे। सूरज और विकास कल अपनी बुआ के घर जाकर राखी बंधवाने की तैयारियों में लगे थे। राधिका अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर बारिश की बूंदों को देख रही थी। कल का दिन उसके लिए फिर से वही परीक्षा का दिन होने वाला था—दूसरों की खुशियों को देखकर खुश होने का नाटक करना और अपने अंदर के सूनेपन को छिपाना।
अगली सुबह, रक्षाबंधन का दिन। सुबह से ही घर में गहमगहमी शुरू हो गई। सूरज और विकास तैयार होकर अपनी बुआ के घर जाने के लिए निकल गए। सास-ससुर आंगन में बिछी कुर्सियों पर बैठे थे। तभी दरवाजे पर एक गाड़ी आकर रुकी। अनिकेत और चिराग गाड़ी से उतरे। दोनों के हाथों में ढेर सारे तोहफे, मिठाइयों के डिब्बे और फलों की टोकरियां थीं। नैना दौड़कर दरवाजे तक गई। भाइयों को देखते ही उसकी आँखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। दोनों भाइयों ने अपनी बहन के पैर छुए, फिर नैना ने उन्हें गले से लगा लिया।
पूरा घर हंसी-ठहाकों से गूंज उठा। नैना ने अपने भाइयों को आंगन में बैठाया। राधिका अंदर रसोई में चाय और नाश्ता तैयार कर रही थी। वह ट्रे में चाय के कप और नाश्ते की प्लेटें सजाकर बाहर लाई। नैना ने बड़े ही प्यार से राधिका का परिचय अपने भाइयों से करवाया। “भैया, ये हमारी राधिका है, विकास की पत्नी। घर में सबसे छोटी और सबकी लाडली।”
अनिकेत और चिराग ने हाथ जोड़कर राधिका का अभिवादन किया। राधिका ने भी सिर झुकाकर मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया। नाश्ते के दौरान दोनों भाई अपनी बहन से बचपन की बातें, ससुराल की बातें और दुनिया भर की गपशप करते रहे। राधिका एक किनारे खड़ी यह सब देख रही थी। उसे एक पल के लिए महसूस हुआ कि काश! उसका भी कोई भाई होता, जो ऐसे ही उसके लिए तोहफे लाता, जो उससे ऐसे ही बेफिक्र होकर लड़ता-झगड़ता। उसकी आँखें भर आईं। उसने अपनी भावनाओं को छिपाने के लिए नजरें झुका लीं और बहाने से वापस रसोई में चली गई, ताकि कोई उसके आंसू न देख ले।
लेकिन नैना की पारखी नजरों से कुछ नहीं छिप सका। एक स्त्री जब दूसरी स्त्री को सच में अपना मान लेती है, तो वह उसके बिना कहे ही उसके दिल का दर्द पढ़ लेती है। नैना जानती थी कि राधिका का कोई भाई नहीं है। उसने पिछले कुछ दिनों से राधिका की उस खामोशी को, उस उदासी को बहुत करीब से महसूस किया था, जो त्योहार की रौनक के बीच उसके चेहरे पर तैर जाती थी।
शुभ मुहूर्त का समय हो गया था। आंगन में एक सुंदर सी चौकी सजाई गई। उस पर रेशमी कपड़ा बिछाया गया। आरती की थाली में कुमकुम, चावल, दीया, मिठाइयां और दो बेहद खूबसूरत राखियां सजी हुई थीं। अनिकेत और चिराग चौकी पर बैठ गए। नैना ने बड़े प्यार से दोनों भाइयों के माथे पर कुमकुम और चावल का तिलक लगाया, उनकी आरती उतारी और फिर उनकी कलाई पर राखी बांधी। दोनों भाइयों ने अपनी बहन के पैर छुए और उसे आशीर्वाद के साथ-साथ ढेरों तोहफे दिए।
यह पूरा दृश्य देखकर राधिका, जो एक खंभे के पास खड़ी थी, अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई। उसने जल्दी से पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं। वह वहां से अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ने ही वाली थी कि तभी नैना की आवाज़ पूरे आंगन में गूंजी।
“राधिका! जरा इधर आना।”
राधिका ठिठक गई। उसने खुद को संभाला और धीरे-धीरे चलकर नैना के पास आई। “जी दीदी, कुछ चाहिए?” राधिका ने अपनी कांपती हुई आवाज़ को सामान्य करने की कोशिश करते हुए पूछा।
नैना अपनी जगह से उठी। उसने अपनी पूजा की थाली के ठीक नीचे रखे एक छोटे से लाल मखमली डिब्बे को खोला। उसमें दो बहुत ही सुंदर, मोतियों वाली राखियां रखी हुई थीं। नैना ने वो दोनों राखियां निकालीं और राधिका के हाथों में रख दीं। राधिका हैरान थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि नैना ये क्या कर रही है।
नैना ने राधिका के कंधे पर हाथ रखा और अपने भाइयों की तरफ देखते हुए बहुत ही भावुक आवाज़ में कहा, “अनिकेत, चिराग, तुम दोनों हर साल मेरी कलाई को तो खुशियों से भर देते हो, लेकिन आज से तुम्हें एक और जिम्मेदारी उठानी होगी। जब कोई लड़की शादी करके एक नए घर में आती है, तो वो सिर्फ उस घर के बेटे से नहीं जुड़ती, बल्कि उस घर के हर रिश्ते को अपना बना लेती है। मेरी देवरानी ने मुझे बड़ी बहन का दर्जा दिया है, मुझे अपनी सगी बहन की तरह माना है। तो क्या ये मेरा फर्ज नहीं बनता कि मैं भी इसके जीवन के सूनेपन को दूर करूं?”
नैना ने राधिका की आँखों में देखते हुए आगे कहा, “राधिका, तुमने मुझे हमेशा अपनी बड़ी बहन माना है ना? तो आज से मेरे ये दोनों भाई, तुम्हारे भी भाई हुए। इस घर की दहलीज के अंदर अगर मैंने तुम्हें अपनी बहन मान लिया है, तो मायके से आए ये मेरे भाई आज से तुम्हारे भी उतने ही सगे हैं, जितने मेरे।”
अनिकेत और चिराग, जो कुछ पल के लिए हैरान थे, अब पूरी स्थिति को समझ चुके थे। अनिकेत मुस्कुराते हुए अपनी जगह से उठा, उसने राधिका के सिर पर हाथ रखा और कहा, “अरे वाह! दिल्ली से चले थे एक बहन से राखी बंधवाने, और यहाँ तो भगवान ने हमें दो-दो बहनें दे दीं। ये तो हमारा सौभाग्य है। लाओ राधिका, अब जल्दी से हमें भी राखी बांधो, और हाँ, तुम्हारे लिए तोहफा हम अगली बार पक्का लेकर आएंगे, इस बार तो हमें पता ही नहीं था कि बनारस में हमारी एक और छोटी बहन हमारा इंतज़ार कर रही है।”
चिराग ने भी हंसते हुए कहा, “बिल्कुल! और अब से जो भी शिकायत हो, सीधे हमें फोन करना। हम दिल्ली से दौड़े चले आएंगे अपनी छोटी बहन के लिए।”
राधिका को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसके हाथ कांप रहे थे और आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली थी, लेकिन ये आंसू अब उदासी के नहीं, बल्कि उस असीम खुशी के थे जो उसे आज पहली बार महसूस हो रही थी। एक जीवनभर की शून्यता, जो वो बचपन से ढो रही थी, आज उसकी जेठानी ने एक झटके में खत्म कर दी थी।
सास-ससुर भी यह नज़ारा देखकर भावुक हो गए थे। दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखकर संतुष्टि भरी मुस्कान के साथ कहा, “आज सच में हमारे घर में लक्ष्मी और सरस्वती का वास है। जिस घर की बहुएं आपस में इतना प्यार करती हों, वहां कभी कोई दुख नहीं आ सकता।”
राधिका ने झट से नैना के हाथ से आरती की थाली ली। उसने अपने कांपते हाथों से अनिकेत और चिराग की आरती उतारी, उनके माथे पर तिलक लगाया और पूरी श्रद्धा और प्यार के साथ उनकी कलाई पर राखी बांधी। दोनों भाइयों ने भी उसे मिठाई खिलाई और उसे आशीर्वाद दिया।
उस दिन उस बनारस वाले घर के आंगन में सिर्फ कच्चे धागों का त्योहार नहीं मनाया गया, बल्कि रिश्तों की एक नई और पक्की नींव रखी गई थी। नैना ने साबित कर दिया था कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल से, अहसास से और एक-दूसरे का दर्द समझने से बनते हैं। राधिका, जिसे लगता था कि ससुराल सिर्फ एक पराया घर होता है, उसे आज समझ आ गया था कि अगर प्यार और अपनापन हो, तो ससुराल ही सबसे बड़ा मायका बन जाता है। सच में, नैना जैसी जेठानी ने राधिका को सदा के लिए अपना लिया था और उसे वो खुशी दे दी थी, जिसके लिए वो पूरी जिंदगी तरसी थी।
क्या आपको भी लगता है कि अगर परिवार में नैना जैसी समझदार और दिलदार जेठानी हो, तो कोई भी लड़की ससुराल में कभी खुद को अकेला महसूस नहीं करेगी? क्या आपके जीवन में भी ऐसा कोई पल आया है जब किसी ऐसे इंसान ने आपको अपनापन दिया हो जिससे आपका खून का रिश्ता ना हो? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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#कच्चे धागों का पक्का रिश्ता
लेखिका : कृतिका भण्डारी