वो अनचाही नेमत: एक बेटी का वजूद

“माँ! ओ माँ! कहाँ हो आप? जल्दी से बाहर आइए, मेरा शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है। आज मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है, मुझे अपने हाथों से दही-चीनी खिलाकर विदा कीजिए।” घर के आंगन में गूंजती यह चहकती हुई आवाज़ डॉ. नव्या की थी।

रसोई से अपने पल्लू में हाथ पोंछती हुई सुमित्रा जी बाहर आईं। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर वो गर्व जो सिर्फ एक माँ ही महसूस कर सकती है। नव्या ने आज पहली बार शहर के सबसे बड़े अस्पताल के मुख्य सर्जन के रूप में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। सुमित्रा जी ने कांपते, लेकिन प्यार भरे हाथों से नव्या के मुंह में दही-चीनी का चम्मच रखा। मीठा खाते ही नव्या ने झट से झुककर अपनी माँ के पैर छू लिए और फिर पास ही खड़े अपने पिता, राघव जी के भी चरण स्पर्श किए।

“अरे-अरे! यह क्या कर रही है पगली? हमारे समाज में बेटियां कभी माँ-बाप के पैर नहीं छूतीं। तू तो हमारी लाडो है, बस गले लग जा और हमारा सारा आशीर्वाद तेरा है,” राघव जी ने नव्या को उठाते हुए भारी आवाज़ में कहा।

नव्या ने अपने माता-पिता दोनों को एक साथ अपनी बांहों में भर लिया और मुस्कुराते हुए बोली, “पापा, आप ही तो बचपन से कहते आए हैं कि मैं आपकी बेटी नहीं, आपका बेटा हूँ। फिर बेटों वाले अधिकार मुझे क्यों नहीं मिल सकते? सच कहूँ तो आप दोनों मेरे लिए सिर्फ माँ-बाप नहीं, मेरे भगवान हैं। मेरा वजूद, मेरी ये सफलता, मेरा यह डॉक्टर का कोट… सब कुछ आपकी ही तो देन है। अगर आप दोनों का त्याग और विश्वास न होता, तो आज मैं इस मुकाम पर कभी नहीं पहुँच पाती।”

“अच्छा-अच्छा, अब सुबह-सुबह हमें रुलाने का इरादा है क्या? जा जल्दी, वरना पहले ही दिन अस्पताल पहुँचने में देर हो जाएगी। तेरा इंतज़ार बहुत से मरीज़ कर रहे होंगे,” सुमित्रा जी ने अपनी छलकती आँखों को छिपाते हुए कहा।

नव्या ने अपनी कार की चाबी उठाई और हाथ हिलाती हुई बाहर निकल गई। कार के स्टार्ट होकर दूर जाने तक सुमित्रा जी दरवाज़े पर ही खड़ी रहीं। नव्या के जाने के बाद घर में अचानक एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी धीरे से आकर सोफे पर बैठ गईं। घर का यह कोना हमेशा उन्हें अतीत के उन पन्नों की ओर खींच ले जाता था, जिन्हें वो कभी-कभी भूलना चाहती थीं, लेकिन वो यादें उनके जहन में किसी अमिट स्याही की तरह छपी थीं। आज से अट्ठाईस साल पहले का वो दौर उनकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह चलने लगा।

वह समय राघव जी के लिए बहुत कठिन था। उनका पुश्तैनी कपड़े का व्यापार अचानक बहुत बड़े घाटे में चला गया था। घर की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन चरमराती जा रही थी। सुमित्रा और राघव की पहले से ही दो बेटियां थीं—आकृति और प्राची। दोनों बहुत प्यारी थीं, लेकिन समाज और रिश्तेदारों की नज़रें हमेशा उन पर सवालों के तीर छोड़ती रहती थीं। ऐसे ही एक दिन राघव जी के एक दूर के चाचा घर आए, जिन्हें ज्योतिष का बहुत ज्ञान होने का दावा था। उन्होंने राघव की जन्मकुंडली देखकर एक ऐसा बीज बोया, जिसने सुमित्रा की रातों की नींद उड़ा दी।

चाचा जी ने बड़े आत्मविश्वास से कहा था, “राघव, तेरे व्यापार में जो यह ग्रहण लगा है, वो तब तक नहीं हटेगा जब तक तेरे घर में कुलदीपक जन्म नहीं लेता। बेटियां तो पराया धन हैं, वो तेरा भाग्य कैसे बदल सकती हैं? तुझे एक बेटे की ज़रूरत है, जो तेरा वंश भी बढ़ाएगा और तेरे सोए हुए भाग्य को भी जगाएगा।”

उस समय राघव जी व्यापार के नुकसान से इतने टूट चुके थे कि उन्हें हर वो बात सही लगने लगी थी, जो उन्हें इस मुसीबत से बाहर निकाल सके। वे चाचा जी की बातों में आ गए। उन्होंने सुमित्रा को इस बात के लिए मना लिया कि उन्हें एक और संतान के लिए कोशिश करनी चाहिए। सुमित्रा ने बहुत समझाया कि वे अपनी दो बेटियों के साथ खुश हैं, और एक और बच्चे का खर्च उठाना इस स्थिति में संभव नहीं है। लेकिन राघव जी के मन में बेटे की लालसा और व्यापार के सुधरने की आस इतनी गहरी बैठ गई थी कि सुमित्रा को अंततः झुकना पड़ा।

कुछ महीनों बाद जब सुमित्रा गर्भवती हुईं, तो पूरे घर में खुशियों से ज्यादा एक तनाव का माहौल था। हर कोई बस एक ही प्रार्थना कर रहा था कि इस बार लड़का ही हो। सुमित्रा के मन में एक अनजाना सा डर घर कर गया था कि अगर इस बार भी लड़की हुई, तो क्या होगा? क्या यह परिवार, जो सिर्फ एक बेटे की आस लगाए बैठा है, उस तीसरी बच्ची को अपना पाएगा?

तनाव का यह पहाड़ तब और बड़ा हो गया, जब राघव जी की बड़ी बहन, विमला बुआ, घर आईं। विमला बुआ की शादी को पंद्रह साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने एक ऐसा प्रस्ताव रखा, जिसने सुमित्रा के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। विमला बुआ ने राघव जी से कहा, “देख राघव, मैं जानती हूँ तेरी हालत ठीक नहीं है। तीन-तीन बेटियों की शादी और पढ़ाई का खर्च तू कैसे उठाएगा? अगर इस बार तेरे घर लड़का होता है, तो तू उसे रख लेना, तेरा वारिस हो जाएगा। लेकिन अगर लड़की हुई, तो उसे जन्मते ही मुझे सौंप देना। मैं उसे अपनी बेटी बनाकर पालूंगी। इससे तेरा बोझ भी कम हो जाएगा और मेरी सूनी गोद भी भर जाएगी।”

राघव जी उस वक़्त अपनी परेशानियों में इतने अंधे हो चुके थे कि उन्होंने बिना सुमित्रा से पूछे अपनी बहन को वचन दे दिया। जब सुमित्रा को यह बात पता चली, तो वह फूट-फूट कर रोई। वह एक माँ थी। उसके गर्भ में पल रहा बच्चा, चाहे वह लड़का हो या लड़की, उसके खून का कतरा था। वह कैसे अपने जिगर के टुकड़े को किसी और की झोली में डाल सकती थी?

महीने बीतते गए। सुमित्रा का हर दिन एक खौफ के साए में गुज़रता था। जब भी बच्चा पेट में हलचल करता, सुमित्रा की आँखों से आंसू बहने लगते। वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती कि या तो चमत्कार हो और लड़का हो जाए, ताकि उसका बच्चा उसी के पास रहे, या फिर भगवान उसे ही उठा ले, क्योंकि वह अपने बच्चे को किसी और को सौंपकर ज़िंदा नहीं रह पाएगी।

वह रात सुमित्रा को आज भी याद है। अगले दिन सुबह उसे अस्पताल जाना था, डॉक्टर ने डिलीवरी का समय दे दिया था। घर में सब तैयारी कर रहे थे। विमला बुआ भी आ चुकी थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब सी उत्सुकता थी। लेकिन उस रात सुमित्रा सो नहीं पाई। वह रात भर अपने सूजे हुए पेट पर हाथ फेरती रही। अचानक, रात के तीसरे पहर, उसके अंदर की वो डरी हुई औरत मर गई और एक शेरनी जैसी माँ जाग उठी। उसने तय कर लिया कि अब चाहे जो हो जाए, वह अपने खून का सौदा नहीं होने देगी।

सुबह होते ही, अस्पताल जाने से ठीक पहले, सुमित्रा ने अपना बैग ज़मीन पर रखा और पूरे परिवार के सामने एक बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में घोषणा की। “मैं अस्पताल तभी जाऊंगी, जब आप सब मेरी एक बात सुन लेंगे। मेरे कोख से चाहे बेटा जन्म ले या बेटी, वो सिर्फ और सिर्फ मेरा होगा। मैं अपना बच्चा किसी को नहीं दूंगी। अगर आप लोगों को मेरा यह फैसला मंज़ूर नहीं है, तो मैं अभी इसी वक़्त अपनी दोनों बेटियों को लेकर अपने मायके चली जाऊंगी और वहीं इस बच्चे को जन्म दूंगी। लेकिन मेरा बच्चा मुझसे दूर नहीं होगा।”

सुमित्रा का यह रौद्र रूप देखकर सब सन्न रह गए। राघव जी ने पहली बार अपनी पत्नी की आँखों में इतना दर्द और इतना साहस एक साथ देखा था। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। एक खोखले विश्वास और झूठी लालसा के पीछे वे अपनी पत्नी की भावनाओं का कत्ल कर रहे थे। राघव जी ने आगे बढ़कर सुमित्रा का हाथ पकड़ लिया और कहा, “मुझे माफ़ कर दो सुमित्रा। मैं परेशानियों में अंधा हो गया था। यह बच्चा हमारा है, चाहे बेटा हो या बेटी, यह इसी घर में रहेगा और हमारे साथ पलेगा।” विमला बुआ भी यह देखकर चुप रह गईं।

उस दिन अस्पताल में नव्या का जन्म हुआ। तीसरी बेटी। लेकिन इस बार सुमित्रा की आँखों में डर नहीं, बल्कि सुकून था। और हैरानी की बात यह रही कि नव्या के जन्म के कुछ महीनों बाद ही राघव जी का व्यापार धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा। चाचा जी की वो बात कि ‘बेटियां भाग्य नहीं बदल सकतीं’, पूरी तरह से गलत साबित हुई। नव्या उनके लिए सच में साक्षात लक्ष्मी बनकर आई थी।

“लो, चाय पी लो। कहाँ खो गई हो सुबह-सुबह?” राघव जी की आवाज़ ने सुमित्रा जी को उनके ख्यालों की दुनिया से बाहर खींच लिया।

सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए चाय का कप हाथ में लिया और बोलीं, “बस, पुरानी बातें याद आ रही थीं। सोच रही थी कि अगर उस दिन मैंने नव्या को किसी और को दे दिया होता, या बेटियों को बोझ मान लिया होता, तो आज हमारा क्या होता?”

राघव जी भी पास ही बैठ गए और गहरी सांस लेते हुए बोले, “सही कह रही हो। हम तो समाज के तानों और रूढ़ियों के शिकार हो गए थे। लेकिन हमारी इस बेटी ने हमें जो सम्मान और प्यार दिया है, वो शायद दस बेटे भी मिलकर नहीं दे पाते।”

सुमित्रा जी की आँखों में एक बार फिर नमी आ गई। आकृति और प्राची, दोनों बड़ी बेटियां, अपनी पढ़ाई पूरी करके सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनीं और विदेश में बस गईं। एक अमेरिका में है और एक लंदन में। दोनों अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हैं। वे साल में एक बार मिलने आती हैं या महीने में कुछ पैसे भेज देती हैं, लेकिन इस बुढ़ापे में, जब शरीर और मन दोनों को सहारे की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, तब उनके पास सिर्फ उनकी वो तीसरी बेटी, नव्या ही है।

नव्या ने जानबूझकर विदेश के कई बड़े ऑफर्स ठुकरा दिए थे। उसने अपने माता-पिता के करीब रहने के लिए इसी शहर में अपना करियर बनाया। इतना ही नहीं, जब भी उसकी शादी की बात चलती, तो वह बहुत स्पष्ट शब्दों में कह देती थी, “मैं उसी इंसान से शादी करूंगी, जो मेरे माता-पिता को अपना परिवार माने। या तो वो हमारे साथ आकर रहेगा, या हम शादी के बाद उनके घर के पास ही रहेंगे ताकि मैं रोज़ उनका ध्यान रख सकूं। मेरे माता-पिता ने मेरे लिए दुनिया से लड़ाई लड़ी है, मैं उन्हें उनके बुढ़ापे में अकेला नहीं छोड़ सकती।”

राघव जी ने सुमित्रा जी का हाथ अपने हाथ में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारी उस दिन की हिम्मत ने हमारी ज़िंदगी संवार दी सुमित्रा। हमारी बेटियां हमारी कमज़ोरी नहीं, हमारी सबसे बड़ी ताक़त हैं। नव्या ने यह साबित कर दिया है कि वजूद लड़के या लड़की होने से नहीं, बल्कि संस्कारों और प्रेम से बनता है।”

चाय का घूंट भरते हुए सुमित्रा जी के होठों पर एक बहुत ही गहरी और संतुष्ट मुस्कान थी। घर के बाहर से आती ताज़ी हवा का झोंका मानो उन्हें बता रहा था कि उन्होंने अपने जीवन का सबसे सही फैसला लिया था।

क्या आपको भी लगता है कि आज के समय में बेटियां बेटों से कहीं आगे बढ़कर अपने माता-पिता का सहारा बन रही हैं? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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