रक्त की रोटी और नियति का क्रूर खेल

चिंटू अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी मां की छाती से चिपका हुआ था। वह बार-बार अपना छोटा सा मुंह अपनी मां के स्तनों पर मार रहा था, इस उम्मीद में कि शायद उसकी क्षुधा शांत करने के लिए वहां से दूध की कोई बूंद छलक पड़े। लेकिन एक मां, जिसके अपने ही पेट में पिछले कई दिनों से अन्न का कोई अंश न गया हो, उसकी छाती में दूध की धारा कहां से फूटती? जानकी की धंसी हुई आंखें अपने बच्चे की इस व्यर्थ की जद्दोजहद को देखकर पथरा सी गई थीं। वह बेबस थी। एक मां के लिए इस दुनिया में सबसे बड़ा दर्द यही होता है कि वह अपने बच्चे को भूख से तड़पता हुआ देखे और कुछ न कर सके।

महानगर की उस विशाल और चमचमाती अस्पताल की इमारत के बाहर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जबकि भीतर जिंदगी और मौत के बीच एक अनवरत जंग चल रही थी। उस वातानुकूलित और साफ-सुथरे गलियारे के एक कोने में रामदीन अपनी फटी हुई कमीज और मैली धोती में सिकुड़ा हुआ बैठा था। उसकी धंसी हुई आँखें और गालों की उभरती हुई हड्डियां चीख-चीख कर उसकी उस दरिद्रता की गवाही दे रही थीं, जिसने पिछले चार दिनों से उसके पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं जाने दिया था। तभी एक सफेद कोट पहने हुए कम्पाउंडर ने आकर उसे अंदर बुलाया। अंदर एक बहुत बड़े व्यापारी के इकलौते बेटे की सर्जरी चल रही थी और उसे ‘ओ नेगेटिव’ रक्त की सख्त आवश्यकता थी। रामदीन का रक्त समूह यही था। सेठ के मुनीम ने उसे खून देने के एवज में एक मोटी रकम का लालच दिया था।

रामदीन जानता था कि उसका शरीर इस वक्त एक कतरा खून देने की स्थिति में भी नहीं है। कमजोरी के कारण उसकी आँखों के सामने रुक-रुक कर अंधेरा छा रहा था, लेकिन जैसे ही उसे अपने घर में भूख से बिलखते बच्चों और अपनी पत्नी जानकी का मुरझाया हुआ चेहरा याद आया, उसने बिना एक पल गंवाए अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ा दी। सुई जब उसकी नस में चुभी, तो उसे दर्द का अहसास तक नहीं हुआ। शायद पेट की भूख की आग के आगे शरीर का हर दर्द बौना हो जाता है। धीरे-धीरे उसका लाल सुर्ख खून उस पारदर्शी थैली में भरने लगा। जैसे-जैसे खून शरीर से बाहर निकल रहा था, रामदीन की सांसें उखड़ने लगी थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। यह चमक थी उस पैसे की, जो मुनीम ने खून निकालने से ठीक पहले उसके हाथ में थमा दिए थे।

कुछ देर बाद, जब वह अस्पताल की सीढ़ियों से नीचे उतरा, तो उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। सिर चकरा रहा था और ऐसा लग रहा था मानो धरती आसमान की तरफ उठ रही हो। मुट्ठी में दबे हुए वो कुछ सौ के कड़कड़ाते नोट उसे किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं लग रहे थे। अचानक उसके उस निर्जीव से हो चुके शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया। उसने अपनी धोती के छोर से माथे का पसीना पोंछा और तेज कदमों से अपने घर की ओर चल पड़ा। वह बस्ती, जहां उसका टूटा-फूटा खपरैल का घर था, अस्पताल से लगभग चार किलोमीटर दूर थी।

रास्ता पार करते समय रामदीन के पेट में उठने वाली मरोड़ अब असहनीय होती जा रही थी। सड़क के दोनों ओर सजी हुई खाने-पीने की दुकानें, हलवाई की कड़ाही से उठती हुई देसी घी की जलेबियों की महक, और ढाबों पर तंदूर में सिकती हुई रोटियों की सोंधी खुशबू उसके कदमों को बार-बार रोक लेना चाहती थी। एक ढाबे के बाहर रखे हुए पकौड़ों को देखकर उसके मुंह में पानी भर आया। उसकी आंतें जैसे चीख-चीख कर कह रही थीं कि पहले वह खुद कुछ खा ले, ताकि शरीर में कुछ तो जान आ सके। उसने एक पल के लिए ढाबे की तरफ कदम बढ़ाया भी, लेकिन तभी उसके कानों में अपने आठ साल के बेटे बिरजू और पांच साल की बेटी मुनिया के रोने की आवाजें गूंजने लगीं। उसने सोचा, “मैं यहां अकेला कैसे निवाला निगल सकता हूं? मेरे बच्चे वहां भूख से तड़प रहे हैं। जानकी ने चार दिन से सिर्फ पानी पीकर गुजारा किया है। नहीं, मैं यह पैसा लेकर सीधा घर जाऊंगा। हम सब आज एक साथ बैठकर पेट भर खाना खाएंगे।”

अपने मन को इस फौलादी इरादे से बांधकर रामदीन ने अपनी चाल और तेज कर दी। वह दौड़ने लगा। उसके दौड़ते कदमों के बीच ढाबे और मिठाइयों की दुकानें पीछे छूटती जा रही थीं। वह अपनी कमजोरी को भूलकर सिर्फ उन रुपयों को अपनी मुट्ठी में भींचे हुए उस संकरी गली में दाखिल हुआ, जहां उसका घर था।

घर के दरवाजे के नाम पर लगे टीन के एक जंग लगे टुकड़े को जैसे ही उसने धकेला, अंदर का दृश्य देखकर उसका कलेजा मुंह को आ गया। घर में एक अजीब सी मनहूसियत और घुटन भरा सन्नाटा पसरा था। मिट्टी के फर्श पर एक पुरानी सी दरी बिछी थी। उस दरी पर उसके दोनों बड़े बच्चे, बिरजू और मुनिया, एक दूसरे से लिपटे हुए गहरी नींद में सो रहे थे। उनके चेहरों पर अभी भी आंसुओं के सूख चुके निशान साफ दिखाई दे रहे थे। कमरे के दूसरे कोने में जानकी बैठी थी। उसकी हालत ऐसी थी मानो किसी ने उसके शरीर से सारा जीवन ही निचोड़ लिया हो। उसकी गोद में उनका सबसे छोटा, महज तीन महीने का नवजात शिशु चिंटू था।

चिंटू अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी मां की छाती से चिपका हुआ था। वह बार-बार अपना छोटा सा मुंह अपनी मां के स्तनों पर मार रहा था, इस उम्मीद में कि शायद उसकी क्षुधा शांत करने के लिए वहां से दूध की कोई बूंद छलक पड़े। लेकिन एक मां, जिसके अपने ही पेट में पिछले कई दिनों से अन्न का कोई अंश न गया हो, उसकी छाती में दूध की धारा कहां से फूटती? जानकी की धंसी हुई आंखें अपने बच्चे की इस व्यर्थ की जद्दोजहद को देखकर पथरा सी गई थीं। वह बेबस थी। एक मां के लिए इस दुनिया में सबसे बड़ा दर्द यही होता है कि वह अपने बच्चे को भूख से तड़पता हुआ देखे और कुछ न कर सके।

कवि की वह पंक्तियां उस जर्जर झोपड़ी में बिल्कुल सच साबित हो रही थीं कि एक अबला नारी का जीवन कितना क्रूर हो सकता है, जिसके आंचल में अपने बच्चे के लिए अथाह प्रेम तो है, लेकिन उस प्रेम को सींचने के लिए शरीर में दूध नहीं, सिर्फ आंखों में आंसुओं का समंदर है। चिंटू चूसते-चूसते थक कर अब सिर्फ धीमी आवाज में कराह रहा था। उसकी कराहटें रामदीन के सीने में किसी खंजर की तरह उतर रही थीं।

रामदीन ने भारी गले से पूछा, “जानकी… बच्चे सो गए क्या?”

जानकी ने अपनी सूनी आंखों को रामदीन की तरफ उठाया। उसकी आवाज में एक अजीब सा खोखलापन था। उसने धीरे से कहा, “हां… रो-रोकर बुरा हाल था दोनों का। भूख के मारे पेट पकड़े बैठे थे। पड़ोस की काकी ने थोड़ी सी गुड़ की डली दी थी। मैंने उसी गुड़ को पानी में घोलकर दोनों को पिला दिया। वो मीठा पानी पीकर ही दोनों के पेट को शायद थोड़ी तसल्ली मिली और वो निढाल होकर सो गए। लेकिन ये छोटा… ये तो पानी भी नहीं पी सकता। ये तो जन्म से ही भूखा है। इसे कैसे समझाऊं कि इसकी मां का शरीर अब बंजर हो चुका है। भूखे पेट भला इसे नींद कैसे आएगी?”

रामदीन की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने अपनी वह मुट्ठी खोली, जिसे वह अस्पताल से लेकर अब तक कसकर बांधे हुए था। मुट्ठी खुलते ही पसीने में भीगे हुए कुछ सौ-सौ के नोट जानकी के सामने आ गए। “ये देखो जानकी,” रामदीन ने कांपती आवाज में कहा, “आज मैंने शहर के उस बड़े अस्पताल में जाकर एक पैसे वाले सेठ के बेटे को अपना खून दिया है। ये उसी खून की कीमत है। भगवान ने हमारी सुन ली है। मैं अभी दौड़कर बाजार जाता हूं। बच्चों के लिए ताजी रोटियां, दाल और सबसे जरूरी… चिंटू के लिए गाय का दूध लेकर आता हूं। आज कोई भूखा नहीं सोएगा।”

पैसे देखकर जानकी की आंखों में एक पल के लिए चमक तो आई, लेकिन जब उसने सुना कि उसके पति ने अपनी रगों का खून निकालकर ये पैसे जुटाए हैं, तो उसका दिल कांप उठा। उसने रामदीन के पीले और थके हुए चेहरे को देखा। लेकिन भूख की विवशता ऐसी थी कि वह उसे रोक भी न सकी। उसने बस इतना कहा, “जल्दी जाना और सबसे पहले दूध लेकर आना। मैं अब चिंटू की ये तड़प और नहीं देख सकती। मेरी तो जैसे जान ही निकल रही है।”

“तू बस थोड़ी देर और हिम्मत रख, जानकी। मैं अभी हवा की तरह गया और वापस आया।” यह कहकर रामदीन बिना एक पल रुके, वापस उसी रास्ते पर दौड़ पड़ा, जिस रास्ते से वह अभी-अभी लौट कर आया था। उसके कानों में अब सिर्फ अपने नवजात बेटे के रोने की आवाज गूंज रही थी।

लेकिन नियति को शायद गरीबों के साथ लुकाछिपी खेलने में ज्यादा मजा आता है। रामदीन जब बस्ती से निकलकर मुख्य बाजार के चौराहे पर पहुंचा, तो वहां का नजारा देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। कुछ घंटे पहले जो बाजार पूरी तरह से गुलजार था, जहां हर तरफ खाने-पीने की दुकानों पर भीड़ थी, वहां अब एक भयानक सन्नाटा और अफरा-तफरी का माहौल था। चारों तरफ पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाते हुए घूम रही थीं। हर तरफ लोग बदहवास होकर भाग रहे थे। दुकानें धड़ाधड़ बंद हो रही थीं। शटर गिराने की तेज आवाजें पूरे माहौल को और भी डरावना बना रही थीं।

रामदीन कुछ समझ नहीं पा रहा था। उसने भागते हुए एक व्यक्ति को रोककर पूछा, “भाई साहब, ये क्या हो रहा है? सब दुकानें क्यों बंद हो रही हैं?” उस व्यक्ति ने बिना रुके भागते हुए जवाब दिया, “अरे पागल है क्या, शहर के दूसरे हिस्से में भयानक दंगा भड़क गया है। पुलिस ने तुरंत कर्फ्यू लगा दिया है। जो जहां है, वहीं छिप रहा है। तू भी भाग जा यहां से वरना गोली मार दी जाएगी!”

कर्फ्यू? दंगा? रामदीन के लिए इन शब्दों का कोई अर्थ नहीं था। उसके लिए तो सबसे बड़ा दंगा उसके बच्चों के पेट में चल रहा था। उसका दिमाग सुन्न हो गया। वह पागलों की तरह बंद हो चुकी दुकानों के शटर पीटने लगा। “अरे कोई तो खोलो! लाला जी, मुझे सिर्फ एक पैकेट दूध दे दो! मेरा बच्चा मर जाएगा। पैसे ले लो, मुझे सिर्फ थोड़ा सा खाना और दूध दे दो!” लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। डर के मारे सबने अपने आप को कैद कर लिया था।

रामदीन की मुट्ठी में दबे हुए वो खून से सने हुए पैसे अब उसे किसी रद्दी कागज के टुकड़े से ज्यादा नहीं लग रहे थे। वह चीख-चीख कर उस निर्दयी बाजार में दूध और रोटी मांग रहा था, लेकिन उसकी आवाज उस सायरन के शोर में दब कर रह गई। काफी देर तक इधर-उधर भटकने के बाद, जब उसे कोई उम्मीद नजर नहीं आई, तो वह थक हार कर चौराहे के एक नुक्कड़ पर बैठ गया। तभी उसकी नजर सामने पड़ी।

सड़क के किनारे कूड़े का एक बहुत बड़ा ढेर था। उस ढेर के पास, एक व्यक्ति, जिसकी उम्र लगभग रामदीन के बराबर ही होगी और जिसकी हड्डियां भी रामदीन की तरह ही शरीर से बाहर झांक रही थीं, घबराहट में जल्दी-जल्दी कूड़े में गिरे हुए कुछ जूठे समोसों और रोटियों के टुकड़ों को अपने एक फटे हुए थैले में भर रहा था। वह व्यक्ति डर से चारों तरफ देख रहा था कि कहीं कोई पुलिस वाला उसे डंडे न मार दे, लेकिन उसकी भूख और उसके घर का इंतजार उसे उस सड़े हुए कूड़े में से जीवन तलाशने पर मजबूर कर रहा था।

रामदीन उस दृश्य को पत्थर की मूरत बने हुए देखता रहा। एक तरफ उसके हाथ में उसके खून की कमाई थी, जो इस वक्त पूरी तरह से बेमानी हो चुकी थी, और दूसरी तरफ वह कूड़े का ढेर था, जहां एक और मजबूर पिता अपनी इज्जत को मारकर अपने बच्चों के लिए जूठा खाना बटोर रहा था। रामदीन की आंखों से आंसुओं की एक अंतहीन धार फूट पड़ी, जो उसके हाथों में रखे उन रुपयों को भिगो रही थी। वह आसमान की तरफ देखकर खामोशी से चीख रहा था कि आखिर गरीबी की यह रात कब खत्म होगी।

क्या आपको लगता है कि समाज में आज भी रामदीन जैसे अनगिनत पिता हर दिन अपने परिवार के लिए अपने अस्तित्व तक को दांव पर लगा देते हैं? एक गरीब की विवशता पर आपके क्या विचार हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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