बचपन से ही काव्या के लिए उसकी माँ, सुमित्रा, किसी तानाशाह से कम नहीं थीं। जहाँ दूसरी लड़कियाँ अपनी माँ के आँचल में छिपकर लाड़ लड़ाती थीं, उनके साथ सहेलियों की तरह बातें करती थीं, वहीं काव्या के हिस्से में सिर्फ नियम, अनुशासन और सख्त हिदायतें आई थीं।
काव्या जब भी कोई नई फरमाइश करती, सुमित्रा का एक ही जवाब होता, “पहले खुद को इस काबिल बनाओ कि तुम्हें किसी से कुछ माँगना ना पड़े, चाहे वो तुम्हारे पिता ही क्यों ना हों।
” काव्या को लगता था कि उसकी माँ के सीने में दिल की जगह कोई पत्थर रखा है। पिता जी हमेशा बीच-बचाव की कोशिश करते, पर सुमित्रा के आगे उनकी एक नहीं चलती थी। काव्या की सहेलियाँ अक्सर कॉलेज के बाद घूमने जातीं, लेट नाईट पार्टीज करतीं, लेकिन काव्या के लिए शाम ढलने से पहले घर पहुँचना एक ऐसा अटल नियम था जिसे तोड़ने का मतलब था घर में तूफान आना।
काव्या को अपनी माँ से एक अजीब सी चिढ़ होने लगी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी माँ को उसकी खुशियों से नफरत है। कॉलेज के दिनों में ही काव्या की मुलाकात समीर से हुई। समीर एक बहुत ही सुलझा हुआ, शांत और समझदार लड़का था। दोनों एक ही प्रोजेक्ट पर काम करते थे और धीरे-धीरे उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई। समीर जानता था कि काव्या अपनी माँ की पाबंदियों से कितनी घुटन महसूस करती है।
वह अक्सर उसे समझाता कि शायद इसके पीछे कोई वजह हो, लेकिन काव्या हमेशा बात टाल देती। जब बात शादी तक पहुँची, तो काव्या बहुत डरी हुई थी। उसे लगा कि उसकी ‘हिटलर माँ’ कभी इस रिश्ते के लिए राजी नहीं होगी। लेकिन जब समीर के परिवार वाले काव्या के घर आए, तो एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला।
सुमित्रा ने समीर से ऐसे-ऐसे सवाल किए जो किसी आम सास-दामाद के बीच नहीं होते। उन्होंने समीर की आर्थिक स्थिति से ज्यादा उसकी मानसिक दृढ़ता को परखा। उन्होंने समीर से साफ कहा कि उनकी बेटी कोई नाज़ुक कली नहीं है जिसे कांच के महल में रखा जाए, बल्कि वो एक स्वतंत्र लड़की है और उसे अपने फैसले खुद लेने का अधिकार होना चाहिए।
समीर के परिवार वालों को सुमित्रा का यह बेबाक और सख्त अंदाज़ बहुत पसंद आया। उन्होंने तुरंत हाँ कर दी और शादी की तारीख पक्की हो गई। काव्या अंदर ही अंदर बहुत खुश थी। उसे लग रहा था कि आखिरकार उसे इस ‘जेल’ से हमेशा के लिए आज़ादी मिल रही है। अब कोई उस पर हुक्म चलाने वाला नहीं होगा, कोई उसे छोटी-छोटी बातों पर टोकने वाला नहीं होगा।
शादी की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। पूरा घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था, लेकिन सुमित्रा के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वो बस एक मशीन की तरह सारे काम निपटा रही थीं। न कोई उल्लास, न कोई भावुकता। हल्दी की रस्म हो या मेहंदी की, जहाँ बाकी औरतें मंगल गीत गा रही थीं और भावुक हो रही थीं,
सुमित्रा एक किनारे खड़ी बस सब कुछ अपनी तीखी नज़रों से देख रही थीं। काव्या को ये सब देखकर बहुत दुख होता था, लेकिन उसने भी अपने दिल को पत्थर कर लिया था। उसने सोच लिया था कि जिसे मेरी परवाह ही नहीं, उसके लिए मैं क्यों उदास होऊँ।
आखिरकार वो पल आ ही गया जिसका हर लड़की के जीवन में एक खास महत्व होता है—विदाई। घर का माहौल गमगीन था। काव्या के पिता फूट-फूट कर रो रहे थे। रिश्तेदारों की आँखें नम थीं। काव्या भी अपने पिता के गले लगकर रो रही थी, लेकिन जब सुमित्रा की बारी आई, तो वो एक बुत की तरह शांत खड़ी रहीं।
उनकी आँखों में एक बूँद भी आँसू नहीं था। उन्होंने बस आगे बढ़कर काव्या के हाथ में एक भूरे रंग का बंद लिफ़ाफ़ा थमा दिया और बिना कोई भाव दिखाए पीछे हट गईं। काव्या को एक बार फिर अपनी माँ की इस रूखाई पर भयंकर क्रोध आया। उसने लिफ़ाफ़ा अपने पर्स में ठूँस लिया और बिना पलट कर देखे गाड़ी में बैठ गई। उसे लगा कि रिश्ते की आखिरी डोर भी आज टूट गई है।
ससुराल पहुँचकर रस्मों-रिवाज़ों में पूरा दिन कैसे बीत गया, काव्या को पता ही नहीं चला। रात को जब वो अपने कमरे में पहुँची, तो उसे बहुत थकान महसूस हो रही थी। तभी उसकी नज़र अपने पर्स पर पड़ी, जिससे वो भूरा लिफ़ाफ़ा झाँक रहा था। काव्या ने झिझकते हुए उसे बाहर निकाला। लिफ़ाफ़े पर उसकी माँ की जानी-पहचानी, सधी हुई लिखावट में लिखा था, “मेरी काव्या के लिए… जब वो एक नए जीवन की शुरुआत कर रही हो।” काव्या ने गहरी साँस ली और लिफ़ाफ़ा खोल दिया। अंदर एक लंबी चिट्ठी थी। काव्या ने पढ़ना शुरू किया:
“मेरी प्यारी बच्ची काव्या,
मुझे पता है कि आज विदाई के वक्त तुम मुझे दुनिया की सबसे कठोर और पत्थरदिल माँ मान रही होगी। शायद आज ही नहीं, पिछले पच्चीस सालों से तुम्हारे मन में मेरी यही छवि रही है। तुमने हमेशा मुझे एक जेलर की तरह देखा, जिसने तुम्हारी आज़ादी छीनी, तुम्हारी हर छोटी खुशी पर पहरा बिठाया। मुझे कभी तुम्हारा वो प्यार नहीं मिला जो एक बेटी अपनी माँ को देती है, और इसका मुझे कोई पछतावा नहीं है, क्योंकि मैंने जानबूझकर यह कीमत चुकाई है।
आज जब तुम एक पत्नी और एक नई दुनिया का हिस्सा बन रही हो, तो मैं चाहती हूँ कि तुम उस औरत को जानो जो तुम्हारे जन्म से पहले सुमित्रा हुआ करती थी। बेटा, मेरी एक सगी बड़ी बहन थी—पूर्णिमा। पूर्णिमा बिल्कुल तुम्हारे जैसी थी। चुलबुली, बेपरवाह, दुनिया की हर बुराई से अनजान और हर किसी पर आँख मूँद कर भरोसा करने वाली। वो बहुत नाज़ुक थी और मेरे माता-पिता ने उसे कभी दुनिया की हकीकत का सामना नहीं करने दिया। उसे लगता था कि दुनिया एक परीकथा है जहाँ सब अच्छे होते हैं।
फिर उसकी शादी एक बहुत अमीर और प्रतिष्ठित परिवार में हुई। उसका पति, जो बाहर से एक आदर्श इंसान दिखता था, असल में एक बहुत ही शातिर और क्रूर व्यक्ति था। शादी के कुछ महीनों बाद ही पूर्णिमा की परीकथा एक भयानक दुःस्वप्न में बदल गई। उसका पति उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने लगा। चूँकि पूर्णिमा कभी आत्मनिर्भर नहीं रही, उसने कभी दुनियादारी नहीं सीखी थी, इसलिए वो सब कुछ चुपचाप सहती रही। उसे लगता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और एक औरत का धर्म सब कुछ सहना होता है। वो पूरी तरह से उस आदमी पर निर्भर थी—आर्थिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।
हम लोगों को इस बात की भनक तक नहीं लगने दी गई। जब पानी सिर से ऊपर चला गया और एक रात जब उस दरिंदे ने सारी हदें पार कर दीं, तो मेरी भोली बहन, जिसके पास लड़ने का कोई हुनर नहीं था, उसने इस दुनिया से ही भाग जाना बेहतर समझा। उसने अपने ही कमरे में फाँसी लगाकर अपनी जान दे दी। जब हम वहाँ पहुँचे, तो मैंने अपनी बहन के बेजान शरीर को देखा था काव्या। उस दिन वो सिर्फ एक शरीर नहीं था, वो एक कमज़ोर, निर्भर और मासूम लड़की की हार थी जिसे दुनिया ने नोंच खाया था।
उस दिन मैंने अपनी बहन की चिता के सामने एक कसम खाई थी। मैंने कसम खाई थी कि अगर मेरी कोई बेटी हुई, तो मैं उसे पूर्णिमा नहीं बनने दूँगी। मैं उसे कभी इतनी नाज़ुक नहीं होने दूँगी कि कोई भी हवा का झोंका उसे तोड़ दे। मुझे पता था कि एक अच्छी, मीठी और लाड़-प्यार करने वाली माँ बनना बहुत आसान है। लेकिन मुझे तुम्हारे लिए एक ढाल बनना था, भले ही उस ढाल की कठोरता तुम्हें ही क्यों न चुभे।
मैंने तुम्हें फैशन, लेट नाईट पार्टीज़ या आज़ादी से नहीं रोका, मैंने तुम्हें उस लापरवाही से रोका जो तुम्हें कमज़ोर बना सकती थी। मेरा मकसद तुम्हें दुनिया की बदसूरती दिखाना था, ताकि तुम उससे लड़ना सीख सको। मैं तुम्हारे सामने इसलिए सख्त बनी रही ताकि तुम भावनात्मक रूप से किसी पर इतनी निर्भर ना हो जाओ कि तुम्हारे बिना उसका वजूद ही खत्म हो जाए। मैं चाहती थी कि तुम आर्थिक और मानसिक रूप से इतनी मज़बूत बनो कि अगर कभी ज़िन्दगी तुम्हारे सामने कोई पूर्णिमा जैसी स्थिति लाकर खड़ी कर दे, तो तुम फाँसी का फंदा न चुनो, बल्कि उस परिस्थिति का गला घोंट सको।
बेटा, एक माँ के लिए इससे बड़ा दर्द कोई नहीं होता कि उसकी औलाद उससे नफ़रत करे। मैंने रोज़ तुम्हारी नफ़रत को पिया है। जब तुम मुझे गुस्से से देखती थीं, तो मेरा कलेजा कट जाता था, लेकिन मैं अपने आँसू पी जाती थी क्योंकि तुम्हारी सुरक्षा मुझे तुम्हारी नफ़रत से ज़्यादा प्यारी थी। आज समीर के रूप में तुम्हें एक बहुत अच्छा जीवनसाथी मिला है। मुझे समीर पर पूरा भरोसा है, लेकिन मेरी एक बात हमेशा याद रखना—अपनी पहचान, अपना आत्मसम्मान और अपनी आत्मनिर्भरता कभी मत खोना।
आज मेरा काम पूरा हुआ। मैंने अपनी बेटी को एक लोहे की तरह ढाल दिया है जिस पर अब कोई जंग नहीं लग सकता। अगर मेरी किसी भी बात से, मेरी किसी भी सख्ती से तुम्हें कभी तकलीफ हुई हो, तो अपनी इस ‘जेलर माँ’ को माफ़ कर देना। मैंने जो भी किया, अपनी बच्ची को ज़िंदा और मज़बूत रखने के लिए किया। सदा खुश रहना।
- तुम्हारी कठोर माँ”
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते काव्या के हाथ काँपने लगे थे। उसके गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली थी, जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी। हर एक शब्द उसके दिल में तीर की तरह चुभ रहा था। उसे अपना पूरा बचपन, कॉलेज के दिन और विदाई का वो पल याद आने लगा। वो याद करने लगी कि कैसे हर सख्ती के पीछे एक अदृश्य सुरक्षा घेरा था। कैसे जब वो बीमार होती थी, तो माँ दूर से ही सही, पर रात-रात भर जागती थी। कैसे उन्होंने समीर को परखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
आज काव्या को एहसास हुआ कि उसकी माँ ने उसके लिए कितना बड़ा बलिदान दिया था। एक माँ ने अपनी बेटी का प्यार ठुकरा दिया ताकि उसकी बेटी कभी दुनिया से न हारे। वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसका दिल पश्चाताप और एक अथाह प्रेम से भर गया था। रात के ढाई बज रहे थे, लेकिन काव्या से अब एक पल भी इंतज़ार नहीं हो रहा था। उसने तुरंत अपना फोन उठाया और घर का नंबर मिलाया।
फोन की सिर्फ एक घंटी बजी थी और दूसरी तरफ से आवाज़ आई, “हैलो… काव्या? सब ठीक है ना बेटा?” सुमित्रा की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट और बेताबी थी। वो शायद पूरी रात फोन के पास ही बैठी थीं।
ये सुनते ही काव्या का बाँध टूट गया। वो सिसकते हुए, भर्राई हुई आवाज़ में बोली, “माँ… मुझे माफ़ कर दो माँ! मैं बहुत बुरी हूँ। मैं आपकी आँखों के उस दर्द को कभी नहीं पढ़ पाई जो आप हमेशा मेरे लिए छिपा कर रखती थीं। आपके गुस्से के पीछे के उस समंदर जैसे प्यार को नहीं देख पाई। आपकी डांट के पीछे की उस ढाल को नहीं देख पाई माँ। आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो… प्लीज़ मुझे अपनी उस बच्ची की तरह एक बार गले लगा लो माँ जिसे आपने सालों से सीने से नहीं लगाया…”
दूसरी तरफ से पहली बार काव्या ने अपनी माँ के रोने की आवाज़ सुनी। वो पत्थर आज मोम बनकर पिघल गया था। सुमित्रा की सिसकियों में पच्चीस सालों का वो सारा दर्द, सारा अकेलापन और सारा प्यार बह निकला था, जिसे उन्होंने एक कठोर आवरण के नीचे दबा कर रखा था। उस रात, फोन के दो सिरों पर एक नई माँ और एक नई बेटी का जन्म हुआ था—जिनके बीच अब कोई गलतफहमी, कोई दीवार नहीं थी।
दोस्तों, क्या आपको भी कभी लगता है कि आपके माता-पिता की सख्ती के पीछे कोई ऐसा डर या परवाह छिपी हो सकती है जिसे आप आज नहीं समझ पा रहे? आपके हिसाब से एक बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सख्ती ज़रूरी है या सिर्फ लाड़-प्यार? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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# पत्थर की छाँव में
लेखिका : मंजू अग्रवाल