बारिश की हल्की-हल्की फुहारें खिड़की पर दस्तक दे रही थीं। रसोई में चाय बनाते हुए नंदिनी की नज़र दीवार पर टंगी अपनी डिग्रियों पर पड़ी। कभी इन्हीं डिग्रियों पर उसे गर्व हुआ करता था, लेकिन आज वे सिर्फ़ धूल से ढके हुए कागज़ लग रहे थे।
“तुम करती ही क्या हो? दिन भर घर में रहती हो…” पति के ये शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे।
उसने कभी शिकायत नहीं की। नौकरी छोड़ी ताकि बच्चों की परवरिश अच्छे से कर सके। सास-ससुर की सेवा की, घर संभाला, रिश्ते संभाले। लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा कि त्याग की आदत लोगों को उसका सम्मान करना नहीं सिखा पाई।
एक दिन बेटे ने मासूमियत से पूछा, “माँ, क्या आप कभी ऑफिस नहीं जाती थीं?”
नंदिनी मुस्कुरा दी। “जाती थी बेटा… लेकिन तुम्हारे बचपन को मैंने अपनी नौकरी से ज़्यादा ज़रूरी समझा।”
बेटा कुछ समझा, कुछ नहीं।
उसी रात उसने आईने में खुद को देखा। आँखों में आँसू थे, मगर इस बार आँसू कमज़ोरी के नहीं, एक नए संकल्प के थे।
अगले ही दिन उसने घर से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत सिर्फ़ दो बच्चों से हुई। फिर चार, फिर दस… कुछ ही महीनों में उसके पढ़ाने की चर्चा पूरे मोहल्ले में होने लगी।
पहली कमाई हाथ में आई तो उसने सबसे पहले अपनी माँ के लिए एक साड़ी खरीदी। माँ ने साड़ी को सीने से लगाकर कहा, “बेटी, आज मुझे तेरी कमाई से ज़्यादा तेरे आत्मविश्वास पर गर्व है।”
धीरे-धीरे नंदिनी की पहचान फिर बनने लगी। अब लोग उसे किसी की पत्नी या बहू कहकर नहीं, बल्कि “नंदिनी मैम” कहकर बुलाने लगे।
एक दिन वही पति, जो अक्सर उसकी मेहनत को नज़रअंदाज़ कर देता था, उसके पास आया और धीमे स्वर में बोला, “शायद मैं तुम्हारी कीमत समझ नहीं पाया। मुझे माफ़ कर दो।”
नंदिनी मुस्कुराई और बोली, “माफ़ी की ज़रूरत नहीं है। बस इतना याद रखिए… रिश्ते प्यार से चलते हैं, लेकिन सम्मान से टिकते हैं।”
उस दिन उसने महसूस किया कि स्वाभिमान किसी से लड़कर नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को पहचानकर पाया जाता है।
वह बरामदे में खड़ी आसमान को देख रही थी। बारिश थम चुकी थी। बादलों के पीछे से सूरज झाँक रहा था, जैसे कह रहा हो—
“त्याग करना महानता है,
पर स्वयं को मिटा देना नहीं।
झुकना संस्कार है,
पर अपना सम्मान खो देना नहीं।
मैं औरत हूँ… मेरी सहनशीलता मेरी पहचान है,
लेकिन मेरा स्वाभिमान भी उतना ही ज़रूरी है।”
उसने अपनी डायरी बंद की और अंतिम पंक्ति लिखी—
“मैं किसी से ऊँची नहीं बनना चाहती,
बस इतनी मज़बूत बनना चाहती हूँ कि कोई मुझे छोटा समझने की भूल न करे।
क्योंकि… स्वाभिमान मेरा भी है।”
सीमा सिंघी