असली पूँजी

“मौसा जी, आप देखिए इन चेहरों को। इनमें से कोई भी आज यहाँ रस्म अदायगी के लिए नहीं आया है। ये सब वो लोग हैं जिनके घरों का चूल्हा पापा की वजह से जला है, जिनकी ज़िंदगियां पापा ने बचाई हैं। मेरे बैंक अकाउंट में करोड़ों रुपये हैं, लेकिन मेरे मरने पर शायद ही कोई मेरे लिए इस तरह रोएगा, जैसे आज ये लोग पापा के लिए रो रहे हैं। पापा ने जो कमाया है, वो इन गरीबों के दिलों में सुरक्षित है। आज मुझे एहसास हो रहा है कि शहर के सबसे अमीर इंसान मेरे पिता थे, क्योंकि उनके पास दुआओं की वह अनमोल पूँजी थी जिसे कोई चोर चुरा नहीं सकता और कोई टैक्स वाला छीन नहीं सकता।”

शहर के सबसे पुराने और तंग मोहल्ले में स्थित ‘संजीवनी औषधालय’ के बाहर आज अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। हमेशा मरीजों की चहल-पहल और डॉ. विद्यासागर की आत्मीय आवाज़ से गूंजने वाला वह कोना आज एक भारी उदासी में डूबा था। बीती रात दिल का दौरा पड़ने से डॉ. विद्यासागर का अचानक निधन हो गया था। उनके निधन की खबर जैसे ही शहर में फैली, उनके पुराने घर के बाहर लोगों का हुजूम उमड़ने लगा। यह भीड़ कोई आम भीड़ नहीं थी; इसमें रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाने वाले, मज़दूर और कई ऐसे चेहरे थे जिनके कपड़े भलें ही मैले हों, लेकिन उनकी आँखों से बहते आँसू एकदम साफ और सच्चे थे।

दरवाजे पर खड़ी इस अथाह भीड़ को देखकर डॉ. विद्यासागर के साढ़ू भाई, जो एक बड़े व्यापारी थे, थोड़े असहज हो गए। उन्होंने पास ही नम आँखों से खड़े डॉ. विद्यासागर के इकलौते बेटे, कुणाल के कंधे पर हाथ रखा। कुणाल खुद शहर के एक बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल में एक नामी सर्जन था।

“बेटा कुणाल,” साढ़ू भाई ने धीमी आवाज़ में पूछा, “ये सब कौन लोग हैं? ये तो ना तुम्हारे रिश्तेदार लगते हैं, ना ही तुम्हारे इस पॉश इलाके के रहने वाले। कहीं कोई किसी यूनियन का हंगामा तो नहीं? तुम्हारे पिता तो एक साधारण से डॉक्टर थे, फिर इतनी भीड़ क्यों जमा हो गई है?”

कुणाल ने अपनी लाल हो चुकी आँखों से उस भीड़ की तरफ देखा, जहाँ एक बूढ़ी औरत अपनी मैली साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछ रही थी। कुणाल ने एक गहरी साँस ली और रुंधे हुए गले से कहा, “ये कोई हंगामा करने वाले नहीं हैं मौसा जी। ये मेरे पापा की जीवन भर की कमाई है… उनकी असली और अनमोल पूँजी।”

मौसा जी और पास खड़े कुछ अन्य रिश्तेदार कुणाल के इस जवाब को सुनकर हैरान रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि एक साधारण से क्लिनिक में बैठने वाला डॉक्टर, जिसने अपने परिवार के लिए कोई बड़ा बैंक बैलेंस या महल नहीं छोड़ा, उसकी ‘पूँजी’ ये गरीब लोग कैसे हो सकते हैं।

कुणाल समझ गया कि मौसा जी क्या सोच रहे हैं। वह एक पल के लिए अतीत की यादों में खो गया और बोला, “आप लोगों को हैरानी हो रही होगी, लेकिन एक समय था जब मैं भी आपकी ही तरह सोचता था। मुझे भी पापा का यह तरीका कभी समझ नहीं आया था।”

कुणाल ने अपनी यादों का पिटारा खोलते हुए बताना शुरू किया—

“बात कुछ सालों पहले की है। मैंने जब मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और एक सर्जन के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू की, तो मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही धुन सवार थी—पैसा और नाम। मैंने अपने कॉर्पोरेट अस्पताल के काम के साथ-साथ सोचा कि पापा के इस पुराने ‘संजीवनी औषधालय’ को एक आधुनिक रूप दूँ। एक दिन छुट्टी वाले दिन, मैं पापा का हाथ बंटाने और उन्हें अपना नया ‘बिज़नेस मॉडल’ समझाने के लिए उनके क्लिनिक पहुँच गया।”

“दिन भर मैंने उनके साथ काम किया। मैंने देखा कि पापा पुराने तरीके से ही मरीजों को देख रहे थे। शाम ढलने लगी थी, तभी मैंने एक अजीब सी चीज़ नोटिस की। शाम 7 बजे के बाद क्लिनिक में जो मरीज़ आ रहे थे, वे ज्यादातर दिहाड़ी मज़दूर या गरीब तबके के लोग थे। पापा उन्हें दवाइयाँ तो दे ही रहे थे, लेकिन जब वो पैसे देने लगते, तो पापा मुस्कुरा कर मना कर देते। किसी से कहते, ‘अरे रामू, तेरी बेटी की फीस जानी है ना इस महीने, ये पैसे उधर लगा देना।’ तो किसी से कहते, ‘काकी, पहले अपने घुटनों का दर्द ठीक कर लो, पैसे तो आते-जाते रहेंगे।’ और तो और, जो महंगी दवाइयाँ क्लिनिक में नहीं होती थीं, वो पापा पास के मेडिकल स्टोर से अपने खाते में लिखवा कर उन्हें मुफ़्त में मँगवा कर दे रहे थे।”

कुणाल ने आगे बताया कि यह सब देखकर उसका कॉर्पोरेट दिमाग झल्ला उठा। जब क्लिनिक बढ़ा और आख़िरी मरीज़ चला गया, तो वह अपने पिता पर भड़क गया।

“पापा, यह आप क्या कर रहे हैं?” कुणाल ने झुंझलाते हुए कहा था। “आप डॉक्टर हैं या कोई खैराती संस्था चला रहे हैं? आप सुबह से शाम तक खटते हैं, और शाम को अपनी आधी कमाई इन लोगों की दवाइयों पर लुटा देते हैं। क्या फायदा ऐसी प्रैक्टिस का?”

डॉ. विद्यासागर ने अपनी ऐनक उतारी, उसे तौलिये से साफ किया और बहुत ही शांत स्वर में बोले, “बेटा, ये लोग दिन भर मज़दूरी करते हैं। इनके पास जो थोड़े बहुत पैसे होते हैं, उससे या तो ये अपने बच्चों का पेट पाल सकते हैं या फिर अपना इलाज करवा सकते हैं। अगर मैंने इनसे फीस ले ली, तो इनके घर का चूल्हा नहीं जलेगा।”

“पर पापा, ये तो सरासर बिज़नेस में नुकसान है!” कुणाल ने अपनी एमबीए की किताबें मानो उनके सामने खोल दी थीं। “हमारे दादा जी ने यह औषधालय शुरू किया था, तब ज़माना अलग था। आज के ज़माने में अगर आप प्रोफेशनलिज़्म नहीं दिखाएंगे, तो हम पीछे रह जाएंगे। मैं चाहता हूँ कि यहाँ का कायाकल्प हो, एक फिक्स कंसल्टेशन फीस हो और ये मुफ्त की दवाइयाँ बंद हों। आप अपने ही हाथों अपना नुकसान क्यों कर रहे हैं?”

पिता जी कुणाल की बातें सुनकर मुस्कुराए थे। वो मुस्कान जो आज भी कुणाल की आँखों के सामने तैर रही थी।

“बेटा,” डॉ. विद्यासागर ने कुणाल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था, “तूने किताबों से इंसानी शरीर को चीरना और सिलना सीख लिया है, लेकिन शायद इंसानियत पढ़ना अभी बाकी है। हमारे दादा-परदादा ने यह जगह इसलिए नहीं खोली थी कि हम लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर अपनी तिजोरियां भरें। उन्होंने मुझे यही सिखाया था कि चिकित्सा कोई व्यापार नहीं, बल्कि ईश्वर की दी हुई एक ज़िम्मेदारी है।”

“लेकिन नुकसान…” कुणाल फिर बीच में बोला था।

“नुकसान कहाँ है मेरे बच्चे?” विद्यासागर जी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “जब वह बूढ़ी काकी मेरे दी हुई दवा खाकर चैन की नींद सोती है और अगले दिन आकर मुझे दुआएं देती है, तो वो मेरे लिए किसी बड़े मुनाफे से कम नहीं होता। जब कोई लाचार पिता अपने बीमार बच्चे को ठीक होता देखकर मेरे हाथ जोड़ता है, तो मुझे लगता है कि मैंने दुनिया की सबसे बड़ी दौलत कमा ली है। कुणाल, बैंक के खाते का बैलेंस एक दिन खत्म हो सकता है, लेकिन दुआओं का खाता कभी खाली नहीं होता। तू कहता है कि मैं बिज़नेस में नुकसान कर रहा हूँ? तो सुन, मुझे ऐसा नुकसान मंज़ूर है। पैसा तो हर कोई कमा लेता है, लेकिन लोगों का प्यार, उनका विश्वास और उनकी दुआएं कमाना हर किसी के बस की बात नहीं। मैं चाहता हूँ कि एक दिन तू भी इस दौलत की अहमियत को समझे और इसे कमाए।”

कुणाल की आवाज़ अचानक भारी हो गई। उसने मौसा जी और बाकी रिश्तेदारों की तरफ देखते हुए कहा, “उस दिन मुझे पापा की बातें बहुत पुरानी और अव्यवहारिक लगी थीं। मुझे लगा था कि वो कभी तरक्की नहीं कर पाएंगे। लेकिन आज… आज जब मैं यहाँ खड़ा हूँ, तो मुझे समझ आ रहा है कि मैं कितना गलत था।”

कुणाल ने आँसुओं से भरी आँखों से उस भीड़ की ओर इशारा किया, जो अब अंतिम दर्शन के लिए कतारबद्ध हो रही थी।

“मौसा जी, आप देखिए इन चेहरों को। इनमें से कोई भी आज यहाँ रस्म अदायगी के लिए नहीं आया है। ये सब वो लोग हैं जिनके घरों का चूल्हा पापा की वजह से जला है, जिनकी ज़िंदगियां पापा ने बचाई हैं। मेरे बैंक अकाउंट में करोड़ों रुपये हैं, लेकिन मेरे मरने पर शायद ही कोई मेरे लिए इस तरह रोएगा, जैसे आज ये लोग पापा के लिए रो रहे हैं। पापा ने जो कमाया है, वो इन गरीबों के दिलों में सुरक्षित है। आज मुझे एहसास हो रहा है कि शहर के सबसे अमीर इंसान मेरे पिता थे, क्योंकि उनके पास दुआओं की वह अनमोल पूँजी थी जिसे कोई चोर चुरा नहीं सकता और कोई टैक्स वाला छीन नहीं सकता।”

कुणाल ने अपने आँसू पोंछे और मौसा जी से हाथ जोड़कर बोला, “मौसा जी, आज तक मैं सिर्फ एक डॉक्टर था जो सिर्फ शरीर का इलाज करता था और फीस लेता था। लेकिन आज मैं अपने पापा का बेटा बनने जा रहा हूँ। मैं यह संकल्प लेता हूँ कि पापा की इस ‘संजीवनी’ को कभी बंद नहीं होने दूँगा। मैं भले ही कॉर्पोरेट अस्पताल में काम करूँ, लेकिन हर शाम मैं उसी कुर्सी पर बैठूंगा जहाँ पापा बैठते थे, और उनकी कमाई हुई इस अनमोल पूँजी को और आगे बढ़ाऊंगा।”

इतना कहकर कुणाल आगे बढ़ा और उसने उस भीड़ के सामने हाथ जोड़ लिए, जो अब डॉ. विद्यासागर की अर्थी को कांधा देने के लिए आगे बढ़ रही थी। उस दिन कुणाल ने सिर्फ अपने पिता को ही विदा नहीं किया, बल्कि अपने अंदर के उस स्वार्थी इंसान को भी हमेशा के लिए विदा कर दिया जो सिर्फ पैसों में ही अमीरी ढूंढता था।

क्या आपको भी लगता है कि इंसान की असली कमाई वो दुआएं हैं जो उसके जाने के बाद भी उसके नाम को ज़िंदा रखती हैं? अपनी राय हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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