इस विचार मात्र से ही प्रकाश की रूह काँप उठी। उसे अपने बाबूजी के वो आखिरी शब्द याद आने लगे—’जब ठोकर लगेगी तब समझ आएगा’। आज उसे वो ठोकर लग चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि जिस पेड़ से टूटकर वह खुद को आज़ाद समझ रहा था, असल में वह सूख रहा था। जड़ से कटकर कोई भी टहनी हरी नहीं रह सकती।
उस रात प्रकाश एक पल के लिए भी सो नहीं पाया। वह करवटें बदलता रहा। उसके अंदर पश्चाताप की एक ऐसी आग जल रही थी जिसे सिर्फ उसके माँ-बाप की माफी ही बुझा सकती थी। उसने फैसला कर लिया था। उसे अपनी भूल सुधारनी थी। उसे वापस जाना था।
क्या दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी माँ-बाप के उस सुकून भरे आँचल की कीमत चुका सकती है? पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देगी कि ज़िंदगी की आपाधापी और पैसे की अंधी दौड़ में हमने पीछे क्या छोड़ दिया है।
“रोको मत कौशल्या, जाने दो उसे। जब पंछी को अपने ही घोंसले से घुटन होने लगे और उसे आसमान की झूठी चमक असली लगने लगे, तो उसे उड़ जाने देना चाहिए।” रघुनाथ जी ने अपनी पत्नी के काँपते हाथों को थामते हुए भारी आवाज़ में कहा था।
“लेकिन जी, हमारा प्रकाश… वह तो हमारा इकलौता है। उसे रोक लीजिए ना, शहर जाकर वह हमें भूल जाएगा।” कौशल्या देवी आँसुओं से भीगे चेहरे के साथ अपने पति के सामने गिड़गिड़ा रही थीं।
“जो पैसों की चकाचौंध में अंधा हो चुका हो, उसे तुम्हारी ममता और मेरे बुढ़ापे की लाठी का क्या वास्ता दिखेगा? इंसान को जब दौलत का नशा चढ़ता है, तो उसे अपने ही बोझ लगने लगते हैं। जाने दो उसे। ज़िंदगी जब अपने तरीके से हिसाब मांगेगी और ठोकर लगेगी, तब उसे समझ आएगा कि उसने क्या खोया है।” रघुनाथ जी की आँखों में एक पिता की बेबसी और एक टूटे हुए इंसान की पीड़ा साफ झलक रही थी।
और उसी दिन प्रकाश अपनी पत्नी मीरा और तीन साल के बेटे रोहन को लेकर अपना पुश्तैनी गाँव और अपने बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर मुंबई जैसे महानगर की ओर निकल पड़ा था। उसका मानना था कि गाँव में रहकर वह कभी तरक्की नहीं कर सकता और उसे दुनिया की सारी सुख-सुविधाएँ चाहिए थीं।
मुंबई की उस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में प्रकाश ऐसा रमा कि गाँव बस एक धुंधली याद बनकर रह गया। शुरुआत में एकाध बार फोन पर बात हो जाती थी, लेकिन फिर तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते प्रकाश के पास अपने माँ-बाप के लिए समय ही नहीं बचा। कभी-कभार दिवाली या होली पर मीरा और रोहन गाँव जाकर मिल आते थे, लेकिन प्रकाश के लिए दफ्तर की मीटिंग्स और विदेशी क्लाइंट्स उसके अपने जन्मदाताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए थे। उसका पूरा जीवन बस पैसा कमाने, बड़ा घर खरीदने और समाज में रुतबा बनाने के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया था।
समय पंख लगाकर उड़ गया। पच्चीस साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। प्रकाश अब एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। लेकिन कल रात जो कुछ हुआ, उसने प्रकाश की पूरी दुनिया और उसके उसूलों को झकझोर कर रख दिया था।
कल शाम घर में जश्न का माहौल था। उनके बेटे रोहन ने मेडिकल की पढ़ाई में ना सिर्फ टॉप किया था, बल्कि उसे अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल से न्यूरोसर्जन के तौर पर एक ऐसा ऑफर मिला था, जिसके सपने हर डॉक्टर देखता है। प्रकाश खुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसने अपने तमाम दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन करके यह खुशखबरी सुना दी थी।
रात को डाइनिंग टेबल पर खाना खाते हुए प्रकाश ने बड़े गर्व से रोहन से कहा, “बेटा रोहन, तुमने मेरा सीना चौड़ा कर दिया है। इतनी कम उम्र में अमेरिका के इतने बड़े अस्पताल का ऑफर, यह कोई मामूली बात नहीं है। मैंने सुना है कि उनका शुरुआती पैकेज ही करोड़ों में होता है। कंपनी तुम्हें वहाँ एक आलीशान घर, गाड़ी और ना जाने क्या-क्या सुख-सुविधाएँ दे रही है। बस अब बिना समय गँवाए, तुम कल ही इस ऑफर को साइन कर दो। तुम्हारी तो पूरी लाइफ सेट हो गई बेटा। करोड़ों में खेलोगे तुम, और हमारा नाम भी रोशन करोगे।”
प्रकाश अपने ही ख्यालों में बुने हुए सुनहरे भविष्य को रोहन के सामने रख रहा था, लेकिन रोहन का चेहरा एकदम शांत था। उसने पानी का गिलास मेज पर रखा और बहुत ही धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोला, “पापा, मैंने वह ऑफर ठुकरा दिया है। मैं अमेरिका नहीं जा रहा हूँ।”
यह सुनते ही प्रकाश के हाथ से निवाला छूट गया। वह चौंककर बोला, “क्या बकवास कर रहे हो रोहन? तुम्हें पता भी है तुम क्या कह रहे हो? ऐसा मौका ज़िंदगी में बार-बार नहीं आता। भारत में रहकर तुम पूरी ज़िंदगी भी रगड़ते रहोगे, तो भी इतना पैसा नहीं कमा पाओगे जितना वह तुम्हें एक साल में दे रहे हैं। पागलपन मत करो!”
रोहन ने बहुत ही धैर्य के साथ अपने पिता की आँखों में देखते हुए कहा, “पापा, मैं इसी देश में रहकर प्रैक्टिस करना चाहता हूँ। यहाँ भी काबिलियत की कमी नहीं है और मैं मेहनत करूँगा तो यहाँ भी पैसे कमा ही लूँगा। लेकिन मेरे लिए पैसा इतना बड़ा नहीं है कि मैं उसके लिए अपने परिवार को छोड़ दूँ।”
“लेकिन अमेरिका में जो लाइफस्टाइल मिलेगी, वो यहाँ कैसे मिलेगी?” प्रकाश झल्लाते हुए बोला।
“पापा, मुझे वह लाइफस्टाइल नहीं चाहिए जहाँ सब कुछ प्लास्टिक का हो।” रोहन की आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। “मैं आपसे और मम्मी से दूर नहीं जाना चाहता। मैं नहीं चाहता कि मेरे लिए बैंक बैलेंस इतना अहम हो जाए कि मैं यह ही भूल जाऊँ कि मेरे अपनों को मेरी ज़रूरत है। जब मैं थका हुआ अस्पताल से लौटूँ, तो मुझे मम्मी के हाथ का बना गरम खाना चाहिए। मुझे वीकेंड्स पर आपके साथ बैठकर कॉफी पीनी है और आपसे दुनियादारी सीखनी है। मुझे अपने उन दोस्तों के साथ वक़्त गुज़ारना है जिनके साथ मैं बड़ा हुआ हूँ।”
रोहन पल भर के लिए रुका और फिर बोला, “पापा, कागज़ के उन चंद टुकड़ों और एक विदेशी ठप्पे के लिए मैं अपनी ज़िंदगी की सबसे कीमती चीज़ें नहीं छोड़ सकता। मेरा देश, मेरा समाज, मेरे अपने… ये सब मेरे लिए किसी भी डॉलर से ज्यादा मायने रखते हैं। मुझे पता है पैसा कम होगा, लेकिन जब आप और मम्मी मेरे साथ होंगे, तो वो खुशी करोड़ों रुपये देकर भी नहीं खरीदी जा सकती। मेरे लिए आपकी छाँव में रहना ही सबसे बड़ी दौलत है।”
रोहन तो अपनी बात कहकर वहाँ से चला गया, लेकिन प्रकाश वहीं कुर्सी पर बुत बनकर बैठा रह गया। रोहन के एक-एक शब्द प्रकाश के कानों में किसी हथौड़े की तरह बज रहे थे। रोहन की बातों में कोई ताना नहीं था, लेकिन प्रकाश को महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे आईना दिखा दिया हो।
उसे अचानक पच्चीस साल पुरानी वो शाम याद आ गई। उसने भी तो बिल्कुल यही तर्क दिया था ना अपने बाबूजी को? उसने भी तो पैसों और रुतबे की खातिर अपने उन बूढ़े माँ-बाप को बेसहारा छोड़ दिया था, जिन्होंने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया था। प्रकाश को लगने लगा जैसे रोहन ने उसे नहीं, बल्कि प्रकाश की अपनी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा हो। उसने दौलत कमाने के चक्कर में उस असली दौलत को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया था जो बिना किसी स्वार्थ के उसे प्यार करती थी।
“मैं कितना अंधा हो गया था,” प्रकाश ने खुद से बुदबुदाते हुए कहा। “मैंने अपने माता-पिता के प्यार, उनके बुढ़ापे के सहारे को पैसों के तराजू पर तौल दिया। अगर आज रोहन भी मेरी ही तरह सोचता और मुझे बुढ़ापे में अकेला छोड़कर चला जाता, तो मेरा क्या होता?”
इस विचार मात्र से ही प्रकाश की रूह काँप उठी। उसे अपने बाबूजी के वो आखिरी शब्द याद आने लगे—’जब ठोकर लगेगी तब समझ आएगा’। आज उसे वो ठोकर लग चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि जिस पेड़ से टूटकर वह खुद को आज़ाद समझ रहा था, असल में वह सूख रहा था। जड़ से कटकर कोई भी टहनी हरी नहीं रह सकती।
उस रात प्रकाश एक पल के लिए भी सो नहीं पाया। वह करवटें बदलता रहा। उसके अंदर पश्चाताप की एक ऐसी आग जल रही थी जिसे सिर्फ उसके माँ-बाप की माफी ही बुझा सकती थी। उसने फैसला कर लिया था। उसे अपनी भूल सुधारनी थी। उसे वापस जाना था।
अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही प्रकाश बिना किसी को कुछ बताए घर से निकल पड़ा। उसने सीधा अपनी जन्मभूमि की ओर जाने वाली ट्रेन पकड़ी।
गाँव की उस पगडंडी पर चलते हुए प्रकाश के कदम अजीब सी बेचैनी और खुशी से काँप रहे थे। हवा में आज भी वही मिट्टी की सोंधी महक थी। उसे वो सब कुछ याद आने लगा—वो आम के बगीचे जहाँ वह बचपन में छुपम-छुपाई खेलता था, वो तालाब जहाँ उसने तैरना सीखा था, बाबूजी के कंधों पर बैठकर रामलीला देखने जाना, और चोट लगने पर माँ का दौड़कर आना और हल्दी का लेप लगाना। हर एक याद उसके दिल के किसी बंद दरवाज़े को खोल रही थी।
चलते-चलते वह उस पुराने और थोड़े खस्ताहाल हो चुके मकान के सामने आकर खड़ा हो गया। दरवाज़ा आधा खुला था। प्रकाश ने काँपते हाथों से दरवाज़े को धक्का दिया। आँगन में एक पुरानी खटिया पर रघुनाथ जी लेटे हुए थे और पास ही ज़मीन पर बैठकर कौशल्या देवी उनके पैरों में तेल की मालिश कर रही थीं। दोनों बहुत कमज़ोर और बूढ़े हो चुके थे।
किसी की आहट सुनकर कौशल्या देवी ने अपनी धुंधली आँखों से दरवाज़े की तरफ देखा। उनके हाथ ठिठक गए।
“प्रकाश? मेरे लाल… तू?” कौशल्या देवी की आवाज़ में अविश्वास और ममता का एक ऐसा सैलाब था जो पच्चीस सालों के इंतज़ार के बाद फूटा था।
रघुनाथ जी भी हड़बड़ा कर उठ बैठे।
प्रकाश से अब और नहीं रुका गया। वह दौड़कर गया और फूट-फूट कर रोते हुए सीधे अपने माँ-बाप के पैरों में गिर पड़ा। “मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी… मुझे माफ कर दो माँ। मैं भटक गया था। दौलत के लालच ने मुझे अंधा कर दिया था।”
कौशल्या देवी ने रोते हुए प्रकाश का माथा चूमा और उसे सीने से लगा लिया।
प्रकाश सुबकते हुए बोला, “बाबूजी, मैं सब कुछ छोड़कर आ गया हूँ। आज मुझे समझ में आया कि मैं जिस दौलत के पीछे भाग रहा था, वह तो महज़ एक धोखा थी। मेरी असली दौलत, मेरी जन्नत तो आप दोनों के चरणों में है। मुझे अपने से दूर मत कीजिएगा बाबूजी, मैं वापस लौट आया हूँ… हमेशा के लिए।”
रघुनाथ जी, जिनकी आँखों में पच्चीस सालों से एक सूखापन था, आज आंसुओं से भीग गई थीं। उन्होंने काँपते हाथों से अपने बेटे को उठाया और गले से लगा लिया। बरसों से सूने पड़े उस आँगन में आज फिर से वात्सल्य और पश्चाताप के मिलन का एक नया सवेरा हो रहा था।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
#दौलत का अंधापन