निर्मला ने अपने पति को बड़े गौर से देखा। जैसे यह समझने की कोशिश कर रही हो कि यह आदमी आज अचानक यह कैसी बातें कर रहा है। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई और वह एक समझदार मां की तरह बोली, “आपको सच में बहुत फुर्सत मिल गई है बैठे-बैठे।
चाट पकौड़ी खाएंगे? कल रात से ही आपको हल्की-हल्की खांसी उठ रही है, भूल गए? ये अदरक की चाय से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है। फुर्सत है तो जाकर डॉक्टर माथुर को दिखा आइए। इस उम्र में बाहर का तला-भुना खाने की सूझ रही है।”
दीवार पर टंगी पेंडुलम वाली पुरानी घड़ी की ‘टिक-टिक’ आज पूरे घर में गूंज रही थी। कभी यह घर बच्चों की किलकारियों, मेहमानों की आवाजाही और त्योहारों की रौनक से इतना भरा रहता था कि इस घड़ी की आवाज किसी के कानों तक पहुंचती ही नहीं थी।
लेकिन आज, बासठ वर्षीय रिटायर सरकारी अधिकारी, श्रीकांत जी के लिए यह टिक-टिक समय के गुजरने का नहीं, बल्कि घर के सन्नाटे का अहसास करा रही थी। एक महीने पहले ही वे अपने विभाग से रिटायर हुए थे। विदाई समारोह में पहनाई गई फूल-मालाएं तो कब की सूख चुकी थीं, लेकिन उनके मन में एक खालीपन का एहसास अब भी हरा था।
घर में अब केवल दो ही प्राणी बचे थे—श्रीकांत जी और उनकी जीवनसंगिनी, निर्मला। ऐसा नहीं था कि उनका परिवार छोटा था या उनका कोई अपना नहीं था। भगवान की कृपा से वे एक भरे-पूरे परिवार के मुखिया थे। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। लेकिन जीवन का एक कड़वा सच यह भी है कि जब पेड़ पर फल पक जाते हैं,
तो वे अपनी नई जमीन तलाशने के लिए डाल से अलग हो ही जाते हैं। बेटी विवाह के बाद अपने ससुराल, एक दूसरे राज्य में जा बसी थी और वहां अपने पति और बच्चों की दुनिया में पूरी तरह रम गई थी। दोनों बेटे अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद महानगरों में बस गए थे।
बड़े बेटे को विदेश में एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई थी, तो छोटा बेटा मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था। दोनों की शादियां हो चुकी थीं और अब वे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अपने नए जीवन में व्यस्त थे। महीने-पंद्रह दिन में कभी व्हाट्सएप कॉल आ जाता, बच्चे ‘हैलो दादा-दादी’ बोलकर अपने वीडियो गेम में लग जाते, और बेटों से हाल-चाल पूछने की रस्म अदायगी हो जाती।
रिटायरमेंट के बाद के इन खाली और लंबे दिनों में श्रीकांत जी अक्सर अपनी आराम कुर्सी पर बैठकर अपने अतीत की परतों को उधेड़ते रहते थे। सुबह के अखबार से लेकर शाम की चाय तक, उनके पास सोचने के लिए अथाह समय था। वे सोचते कि इस दौलत, शोहरत और एक सुरक्षित भविष्य को कमाने की अंधी दौड़ में आखिर उन्होंने क्या खोया और क्या पाया?
जवानी के वो खूबसूरत दिन कब जिम्मेदारियों की चक्की में पिस गए, उन्हें पता ही नहीं चला। सुबह सात बजे की लोकल ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी से लेकर रात को नौ बजे थके-हारे घर लौटने तक की दिनचर्या ने उनके जीवन के तीस अमूल्य वर्ष निगल लिए थे।
इस पूरी यात्रा में अगर कोई एक शख्स उनके साथ बिना किसी शिकायत के खड़ा था, तो वो थीं निर्मला। लेकिन विडंबना देखिए, जिस पत्नी ने अपना पूरा जीवन उनके और उनके परिवार के नाम कर दिया, श्रीकांत जी उसे ही कभी समय नहीं दे पाए। जवानी के दिनों में कभी यह मौका ही नहीं मिला कि दोनों कहीं शांति से बैठकर दो पल प्यार की बातें कर सकें। जब शादी नई-नई हुई थी, तब संयुक्त परिवार का बोझ और माता-पिता का संकोच आड़े आता था। कभी बंद कमरे में अगर दो पल के लिए एक-दूसरे का हाथ थामने का मौका मिलता भी, तो बातचीत का विषय राशन का बिल, बिजली का खर्च या फिर बच्चों की स्कूल फीस और ट्यूशन ही हुआ करता था। कभी निर्मला कहती, “सुनिए, मुन्ने के जूते छोटे हो गए हैं,” तो कभी श्रीकांत जी कहते, “इस महीने थोड़ा हाथ खींचकर चलना निर्मला, बहन की शादी के लिए भी पैसे जोड़ने हैं।”
रोमांस, छुट्टियां, और एक-दूसरे के साथ वक्त बिताना—ये सब शब्द मध्यमवर्गीय परिवार की डिक्शनरी में वैसे भी बहुत बाद में आते हैं। श्रीकांत जी को याद आया कि कैसे एक बार उन्होंने निर्मला के लिए गजरा खरीदा था, तो निर्मला ने खुश होने की बजाय उन्हें दस रुपये बर्बाद करने पर मीठी सी डांट लगा दी थी। उन दोनों के बीच प्रेम कोई दिखावे की चीज नहीं थी, बल्कि वो एक-दूसरे की जिम्मेदारियों को बांटने का नाम था।
आज जब जिंदगी की सारी दौड़ खत्म हो चुकी थी, बैंक में पेंशन आ रही थी, बच्चों की पढ़ाई और शादी के कर्ज उतर चुके थे, और समय ही समय था, तब श्रीकांत जी को अहसास हो रहा था कि अब उन्हें वो फुर्सत मिल गई है जिसकी उन्हें उम्र भर तलाश थी।
नवंबर की एक खूबसूरत शाम थी। सूरज ढलने की कगार पर था और हवा में हल्की-हल्की ठंडक घुलने लगी थी। श्रीकांत जी बालकनी में बैठे अपनी अदरक वाली चाय की चुस्कियां ले रहे थे। उन्होंने देखा कि निर्मला अंदर रसोई में अब भी किसी काम में उलझी हुई है। निर्मला के घुटनों में अब गठिया का दर्द रहने लगा था। वह चलते समय हल्की सी लंगड़ाती थी और अक्सर काम करते-करते अपनी कमर पर हाथ रखकर गहरी सांसें छोड़ती थी। श्रीकांत जी का मन एक अजीब सी करुणा और प्रेम से भर उठा। उन्होंने सोचा, अब जब सारी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी हैं, तो क्यों न अपनी पत्नी के साथ वो पल जिएं जो जवानी में पीछे छूट गए थे।
उन्होंने प्यार से आवाज लगाई, “निर्मला… अरे ओ निर्मला, जरा यहां तो आना।”
निर्मला अपने हाथों को पल्लू से पोंछते हुए बाहर आई। माथे पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं और चेहरे पर वही पुरानी, बिना शिकायत वाली थकान थी। “क्या हुआ? चाय में चीनी कम है क्या? या फिर अखबार का दूसरा पन्ना नहीं मिल रहा?” उसने पास आते हुए पूछा।
श्रीकांत जी ने एकटक अपनी पत्नी के झुर्रियों वाले चेहरे को देखा। इन झुर्रियों में उनके बच्चों का भविष्य और इस घर की सफलता की कहानी लिखी थी। वे मुस्कुराए और बोले, “नहीं भाग्यवान, चाय बिल्कुल ठीक है। मैं तो बस यह कह रहा था कि आज मौसम बहुत सुहाना है। बहुत दिन हो गए हमने घर के बाहर का खाना नहीं खाया। चलो ना, आज शाम को पुराने बाजार वाले नुक्कड़ पर चाट पकौड़ी खाने चलते हैं। उसके बाद थोड़ी देर पार्क में टहलेंगे। अब तो कोई जल्दी नहीं है हमें।”
निर्मला ने अपने पति को बड़े गौर से देखा। जैसे यह समझने की कोशिश कर रही हो कि यह आदमी आज अचानक यह कैसी बातें कर रहा है। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई और वह एक समझदार मां की तरह बोली, “आपको सच में बहुत फुर्सत मिल गई है बैठे-बैठे। चाट पकौड़ी खाएंगे? कल रात से ही आपको हल्की-हल्की खांसी उठ रही है, भूल गए? ये अदरक की चाय से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है। फुर्सत है तो जाकर डॉक्टर माथुर को दिखा आइए। इस उम्र में बाहर का तला-भुना खाने की सूझ रही है।”
श्रीकांत जी थोड़ा झेंप गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। “अरे, मुझे कुछ नहीं हुआ है, जरा सा गला खराब है बस। और तुम अपनी बात क्यों नहीं करती? तुम भी तो चलो मेरे साथ। सारा दिन उस रसोई में खड़ी रहती हो। मैं देख रहा था, सुबह से घुटनों को पकड़कर ‘हाय-राम, हाय-राम’ कर रही थीं। थोड़ा बाहर चलोगी, खुली हवा लगेगी तो तुम्हारा दर्द भी कम होगा।”
निर्मला ने अपने घुटनों पर हाथ फेरते हुए बड़ी सहजता से कहा, “अरे मेरा क्या है, मैंने तो वो लाल वाला बाम लगा लिया है। अब काफी आराम है दर्द में। और डॉक्टर के पास आप अकेले ही चले जाइएगा, मेरे पास अभी बिल्कुल समय नहीं है।”
“समय नहीं है? अब कौन सी ट्रेन पकड़नी है तुम्हें निर्मला?” श्रीकांत जी ने हैरानी से पूछा।
निर्मला ने रसोई की तरफ इशारा करते हुए कहा, “मैंने गैस पर गोंद और मेवे के लड्डू भूनने के लिए रखे हैं। आपको याद है ना, हमारे बड़े वाले का जो दोस्त है, वो क्या नाम है उसका… हां, विकास! वो कल सुबह अमेरिका वापस जा रहा है। मैंने सोचा है कि उसके हाथ अपने बेटे के लिए एक डिब्बा लड्डू बनाकर भेज दूंगी। परदेस में बेचारी बहू भी तो सुबह-सुबह ऑफिस भागती है, उसे कहां फुर्सत मिलती है ये सब पारंपरिक चीजें बनाने की। बच्चे को मेरी हाथ की बनी चीजें खाए हुए कितना समय हो गया है। मैं बस उसी की तैयारी में लगी हूं।”
यह सुनकर श्रीकांत जी के होंठों पर आई बात वहीं रुक गई। उनका मन किया कि वो चीख कर निर्मला से कहें, “और तुम्हें? तुम्हें कहां फुर्सत मिलती है निर्मला? सारी जिंदगी तुमने सिर्फ दूसरों के लिए ही तो काम किया है। कभी अपने लिए भी तो कुछ समय निकालो!”
लेकिन वो कुछ कह नहीं पाए। बस खामोश ही रह गए।
उन्हें अचानक इस बात का गहरा अहसास हुआ कि इंसान की आदतें कभी नहीं बदलतीं। हम पूरी जिंदगी जिस ‘फुर्सत’ के इंतजार में रहते हैं, वो फुर्सत दरअसल एक छलावा है। जब हमें वो समय मिलता है, तो हम अपने ही मन से कोई नई जिम्मेदारी, कोई नया फिक्र गढ़ लेते हैं। निर्मला आज भी उसी वात्सल्य और ममता की डोर से बंधी थी, जिससे वो तीस साल पहले बंधी थी। उसके लिए बाहर जाकर चाट खाने या रोमांटिक सैर करने से ज्यादा सुकून अपने दूर बैठे बेटे के लिए लड्डू बांधने में था।
श्रीकांत जी ने एक गहरी सांस ली। वे अपनी जगह से उठे, रसोई में गए और चुपचाप गैस का चूल्हा थोड़ा धीमा कर दिया ताकि लड्डू का मिश्रण जले नहीं। फिर वे वापस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने समझ लिया था कि उनकी पत्नी की असली खुशी इसी त्याग में है। यही उसकी दुनिया है, और यही उसका प्यार जताने का तरीका है। प्यार सिर्फ झील किनारे बैठकर गोलगप्पे खाने का नाम नहीं है, प्यार तो वो लड्डू भी हैं जो एक मां अपने बीमार घुटनों के बावजूद अपने बेटे के लिए बना रही है। और प्यार वो खामोशी भी है, जो एक पति अपनी पत्नी की उस ममता का सम्मान करते हुए ओढ़ लेता है।
शायद जिंदगी के इसी फलसफे का नाम बुढ़ापा है, जहां फुर्सत तो बहुत है, लेकिन कुछ कहने-सुनने की मोहलत आज भी नहीं है।
क्या आपको भी ऐसा लगता है कि हमारे माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी हमारे लिए बिना थके कुर्बान कर देते हैं? उनके इस खामोश प्यार को समझने का समय हमें तब मिलता है, जब शायद बहुत देर हो चुकी होती है।
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#ज़िंदगी की ढलती शाम