दो आंगनों की धूप

स्वाति की आंखें नम हो गईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को होठों की मुस्कान से ढक लिया। वो एक झूठे, प्यार भरे गुस्से के अंदाज में बोली, “पापा! आप भी ना, हमेशा शिकायत करते रहते हैं। अरे, इसमें मेरी क्या गलती है? आप ही लोगों ने तो बचपन से कूट-कूट कर इतने अच्छे संस्कार दिए हैं कि ‘बेटा, ससुराल ही असली घर है, वहां सबका ध्यान रखना’। अब जब मैं आपकी दी हुई शिक्षा पर चल रही हूँ, ससुराल की जिम्मेदारी संभाल रही हूँ, तो आप ही शिकायत कर रहे हैं? अगर मैं सब काम छोड़कर कुछ दिनों के लिए सुस्ताने मायके आ गई, तो लोग क्या कहेंगे कि जानकी जी ने अपनी बेटी को क्या सिखाया है?”

बनारस के उस पुराने मोहल्ले में स्थित पंडित रमाकांत जी का घर आज भी वैसा ही था, बस उस घर के आंगन में चहकने वाली चिड़िया अब किसी और पेड़ की डाल पर जा बैठी थी। उनकी इकलौती बेटी, स्वाति, जिसकी शादी को अब चार साल हो चुके थे, लखनऊ में अपने पति सुमित और ससुराल वालों के साथ रहती थी। रमाकांत जी रोज सुबह उठकर आंगन में रखे उस झूले को देखते, जिस पर बैठकर स्वाति घंटों किताबें पढ़ा करती थी। पत्नी जानकी चाय का प्याला थमाते हुए कहतीं, “क्या हुआ, फिर बिटिया की याद आ रही है? फोन कर लीजिए।” रमाकांत जी गहरी सांस लेकर कहते, “अरे, अभी सुबह-सुबह घर के काम में लगी होगी। ससुराल की जिम्मेदारियां हैं उस पर, उसे टोकना ठीक नहीं।”

स्वाति की जिंदगी लखनऊ में एक मशीन की तरह हो गई थी। सुबह पांच बजे उठना, सास-ससुर के लिए बिना चीनी की चाय बनाना, पति सुमित का टिफिन तैयार करना, और अपनी दो साल की बेटी मिस्टी को नहला-धुला कर तैयार करना। इन सबके बीच वो खुद कब नाश्ता करती, यह उसे भी याद नहीं रहता था। कभी जो स्वाति घर में पानी का गिलास तक खुद उठकर नहीं लेती थी, वो आज पूरे घर की धुरी बन चुकी थी। हर रिश्ते को सहेजने और हर जिम्मेदारी को पूरी शिद्दत से निभाने में वो इस कदर डूब गई थी कि उसे अपने लिए फुर्सत ही नहीं मिलती थी।

दोपहर के करीब बारह बज रहे थे। स्वाति रसोई में रात के खाने के लिए सब्जियां काट रही थी। उसकी कमर में हल्का दर्द था, और रात भर मिस्टी के रोने की वजह से उसकी आंखें भी लाल थीं। तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘पापा’ लिखा देखकर उसके चेहरे पर एक पल के लिए थकान की जगह सुकून ने ले ली। उसने तुरंत अपने चेहरे के भाव बदले, गले को साफ किया और एक बेहद चहकती हुई आवाज़ में फोन उठाया, “हाँ पापा! कैसे हो आप? मम्मी की घुटनों का दर्द कैसा है अब?”

फोन के उस पार रमाकांत जी अपनी बेटी की वो खुशमिजाज आवाज़ सुनकर गदगद हो गए। “हम सब ठीक हैं बेटा। तू बता, तेरी तबीयत कैसी है? आवाज़ से लग रहा है जैसे सोई नहीं है ठीक से?” स्वाति ने तुरंत बात संभालते हुए कहा, “अरे नहीं पापा, वो तो बस मिस्टी रात में थोड़ा खेल रही थी, तो मैं भी उसके साथ जग गई। बाकी मैं बिल्कुल मजे में हूँ। अभी बस गाजर का हलवा बना रही हूँ, सुमित जी को बहुत पसंद है ना।” वो जानती थी कि अगर उसने अपनी थकान या परेशानी का एक भी शब्द कहा, तो उसके बूढ़े माता-पिता रात भर सो नहीं पाएंगे। मन करता था कि फोन में ही घुसकर पापा के गले लगकर खूब रोए, कहे कि उसे अपने उस पुराने कमरे की, माँ के हाथ के खाने की बहुत याद आती है। लेकिन शरीर ससुराल के कामों में बंधा था और मन मायके की फिक्र में।

बातों-बातों में रमाकांत जी के लहजे में एक हल्की सी शिकायत आ गई। “बेटा, पिछली दिवाली पर भी तू नहीं आ पाई थी। इस बार तो होली भी बीत गई। आखिर मायके आने का कोई इरादा है या भूल गई अपने बूढ़े मां-बाप को? हमेशा कोई ना कोई बहाना बना देती है।”

स्वाति की आंखें नम हो गईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को होठों की मुस्कान से ढक लिया। वो एक झूठे, प्यार भरे गुस्से के अंदाज में बोली, “पापा! आप भी ना, हमेशा शिकायत करते रहते हैं। अरे, इसमें मेरी क्या गलती है? आप ही लोगों ने तो बचपन से कूट-कूट कर इतने अच्छे संस्कार दिए हैं कि ‘बेटा, ससुराल ही असली घर है, वहां सबका ध्यान रखना’। अब जब मैं आपकी दी हुई शिक्षा पर चल रही हूँ, ससुराल की जिम्मेदारी संभाल रही हूँ, तो आप ही शिकायत कर रहे हैं? अगर मैं सब काम छोड़कर कुछ दिनों के लिए सुस्ताने मायके आ गई, तो लोग क्या कहेंगे कि जानकी जी ने अपनी बेटी को क्या सिखाया है?”

रमाकांत जी फोन पर ही ठहाका मारकर हंस पड़े। “अच्छा बाबा, हार गया मैं। तू तो अब बहुत सयानी हो गई है। सच में, हमारी वो चंचल और मासूम सी स्वाति अब एक बहुत समझदार औरत बन गई है।” फोन कटने के बाद स्वाति ने अपने आंसू पोंछे और फिर से रसोई के कामों में लग गई। मायका सिर्फ उसके मन में बसता था, लेकिन उसकी हकीकत अब उसका ससुराल था, जिसे वो अपना खून-पसीना देकर सींच रही थी।

समय अपनी रफ्तार से बीत रहा था। महीने गुजर गए, लेकिन स्वाति का बनारस जाना नहीं हो पाया। एक रात, बाहर तेज बारिश हो रही थी। करीब ढाई बजे स्वाति का फोन बजा। स्क्रीन पर ‘मम्मी’ का नाम देखकर उसका दिल जोरों से धड़कने लगा। इतनी रात गए माँ का फोन कभी नहीं आता था। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया।

उधर से जानकी जी की रोती हुई आवाज़ आई, “स्वाति… बेटा, तुम्हारे पापा को अचानक सीने में बहुत तेज दर्द उठा है। वो पसीने से लथपथ हैं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, पड़ोस के शर्मा जी को बुलाया है, हम अस्पताल जा रहे हैं।”

स्वाति के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जो लड़की पिछले एक साल से ससुराल के कामों का हवाला देकर मायके जाने का वक्त नहीं निकाल पा रही थी, उसने एक पल नहीं सोचा। उसने सुमित को जगाया, सारी बात बताई। सुमित ने भी बिना देर किए गाड़ी निकाली। रात के अंधेरे और तेज बारिश को चीरते हुए उनकी गाड़ी बनारस की ओर दौड़ पड़ी।

अगली सुबह जब रमाकांत जी ने आईसीयू में अपनी आंखें खोलीं, तो सबसे पहला चेहरा जो उन्होंने देखा, वो उनकी बेटी स्वाति का था। उसके बाल बिखरे हुए थे, आंखों में रात भर न सोने की थकान थी, लेकिन अपने पिता को होश में देखकर उसकी जान में जान आ गई। उसने तुरंत डॉक्टर को बुलाया, सारी रिपोर्ट्स चेक कीं, माँ को ढांढस बंधाया और अस्पताल की भागदौड़ अपने कंधों पर ले ली।

रमाकांत जी ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया। स्वाति ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया और फूट-फूट कर रो पड़ी। “पापा, आपने तो डरा ही दिया था। अगर आपको कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता?”

रमाकांत जी ने कांपती आवाज़ में कहा, “तू तो कहती थी कि तुझे फुर्सत नहीं मिलती? सब छोड़कर कैसे आ गई?”

स्वाति ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “फुर्सत तो मुझे कल भी नहीं थी पापा, लेकिन जब बात मेरे मायके की, मेरे भगवान की हो, तो दुनिया की कोई भी जिम्मेदारी मुझे आपसे दूर नहीं रख सकती। मैं भले ही वहां रहती हूँ, लेकिन मेरी जान हमेशा आपके ही इर्द-गिर्द बस्ती है।”

उस दिन रमाकांत जी को अहसास हुआ कि एक बेटी कभी अपने मायके से विदा नहीं होती। वो बस अपने प्यार का दायरा बढ़ा लेती है। वो ससुराल रूपी शरीर की धड़कन बन जाती है, तो मायके रूपी आत्मा की जान हमेशा बनी रहती है। बेटियां कभी पराई नहीं होतीं, वो तो बस दो घरों को जोड़ने वाला वो मजबूत पुल बन जाती हैं, जो खुद सारी तकलीफें सहकर भी दोनों तरफ खुशियां ही बांटता है।

क्या आपको भी लगता है कि एक बेटी का संघर्ष और उसका प्यार अक्सर इन रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के पीछे छिप जाता है? अपने विचार और अपने अनुभव हमारे साथ कमेंट्स में जरूर साझा करें।

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#दो आंगनों की धूप

 लेखिका :सरिता गोयल

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