ज़िंदगी की दूसरी सुबह

सुमित्रा देवी ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। उनके होंठ कांप रहे थे। उन्होंने माइक को बिना छुए ही अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे… मुझे कोई पैसा या ज़ायदाद नहीं चाहिए। मैं बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं हूँ,

बस रामचरितमानस पढ़ लेती हूँ। मुझे बस… बस एक ऐसा कोना चाहिए जहाँ मैं बिना किसी ताने के दो रोटी खा सकूँ। कोई ऐसा इंसान, जो मुझे बोझ न समझे। अगर वो बीमार भी रहेंगे, तो मैं उनकी जीवन भर सेवा करूँगी। मुझे बस एक छत चाहिए, जहाँ मैं चैन से रो सकूँ और कोई मुझे चुप कराने वाला हो।”

बनारस के उस पुराने, विशाल पुश्तैनी मकान में हर सुबह सूरज तो निकलता था, लेकिन रोशनी जैसे कहीं खो सी गई थी। पैंसठ वर्षीय रघुनाथ प्रताप सिंह, जो शहर के सबसे प्रतिष्ठित इंटर कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल थे, आज आईने के सामने खड़े खुद को निहार रहे थे। एक समय था जब उनकी एक आवाज़ से पूरा कॉलेज परिसर शांत हो जाता था। उनका अनुशासन और उनकी रौबदार शख्सियत पूरे शहर में मशहूर थी।

लेकिन आज, आईने में उन्हें एक ऐसा बूढ़ा आदमी नज़र आ रहा था जिसकी आँखों में सिर्फ सन्नाटा और कांपते हाथों में एक अजीब सी बेबसी थी। पत्नी को गुज़रे आठ साल हो चुके थे। दोनों बेटे अमेरिका में बस गए थे और साल में एक-आध बार वीडियो कॉल पर रस्म-अदायगी कर लिया करते थे। घर की दीवारें अब उन्हें काटने को दौड़ती थीं।

आज उनके परम मित्र और पड़ोसी, दीनानाथ जी, उन्हें लगभग ज़बरदस्ती एक ऐसे आयोजन में ले जाने के लिए तैयार कर चुके थे, जिसके बारे में सोचकर ही रघुनाथ जी को पसीना आ रहा था— ‘वरिष्ठ नागरिक जीवनसाथी परिचय सम्मेलन’।

“अरे रघुनाथ! कब तक इन निर्जीव दीवारों से बातें करते रहोगे? ज़िन्दगी अभी बाकी है मेरे दोस्त, इसे घुट-घुट कर मत मारो,” दीनानाथ जी ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था।

रघुनाथ जी ने सफेद कुर्ते-पजामे पर अपनी पुरानी जवाहर कट बंडी पहनी। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। समाज क्या कहेगा? पूर्व छात्र क्या सोचेंगे? उनके अपने बेटे क्या कहेंगे? ये तमाम सवाल उनके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। लेकिन उस भयानक अकेलेपन का डर, जहाँ रात को सीने में दर्द उठने पर पानी देने वाला भी कोई न हो, उन सभी सवालों पर भारी पड़ गया। भारी कदमों से वे दीनानाथ जी के साथ कार में बैठ गए और शहर के टाउन हॉल की ओर निकल पड़े।

टाउन हॉल का नज़ारा उनके लिए बिल्कुल नया और विचित्र था। वहाँ कोई युवा या जवान चेहरे नहीं थे। वहाँ ऐसे लोग बैठे थे जिनके बालों में सफेदी, चेहरों पर झुर्रियां, लेकिन आँखों में ज़िंदगी को एक और मौका देने की दबी हुई सी आस थी। हॉल खचाखच भरा हुआ था। मंच पर एक संचालक महोदय उत्साह से माइक पर बोल रहे थे। पुरुषों के परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। एक-एक करके वृद्ध और अधेड़ उम्र के लोग मंच पर जा रहे थे और अपने एकाकीपन की दास्तान, अपनी आमदनी और अपनी ज़रूरतों का ब्यौरा दे रहे थे।

जब रघुनाथ प्रताप सिंह का नाम पुकारा गया, तो उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में हज़ारों छात्रों को भाषण दिया था, कई बड़े-बड़े सम्मेलनों का नेतृत्व किया था, लेकिन आज मंच तक जाने के वे चंद कदम उन्हें मीलों लंबे लग रहे थे। पैर कांप रहे थे और माथे पर सर्दियों के बावजूद पसीने की बारीक बूंदें छलक आई थीं। दीनानाथ जी ने उन्हें हौसला दिया, “जाओ रघुनाथ, संकोच मत करो।”

मंच पर पहुंचकर उन्होंने माइक को पकड़ा। माइक उनके कांपते हाथों की वजह से हल्का सा हिल रहा था। सामने बैठे सैकड़ों लोगों की नज़रें उन पर टिकी थीं। उनका गला पूरी तरह से सूख चुका था। वही आवाज़, जिससे लोग कभी खौफ खाते थे, आज गले में ही कहीं अटक कर रह गई थी। उन्होंने एक घूंट पानी पिया और खुद को समेटते हुए बड़ी मुश्किल से टूटे-फूटे शब्दों में बोलना शुरू किया।

“मेरा नाम… रघुनाथ प्रताप सिंह है। उम्र पैंसठ वर्ष। मैं एक रिटायर प्रिंसिपल हूँ। बनारस में मेरा अपना तीन मंज़िला पुश्तैनी मकान है। पेंशन अच्छी खासी आती है… पैसों की कोई कमी नहीं है। मेरे दो बेटे हैं, जो अपनी-अपनी दुनिया में अमेरिका में मगन हैं। मुझे… मुझे बस एक ऐसा साथी चाहिए, जिसके साथ मैं सुबह की चाय पी सकूँ। जिसके बीमार पड़ने पर मैं दवा ला सकूँ और मेरे खांसने पर जो मुझे पानी का गिलास थमा सके। मुझे कोई गंभीर बीमारी नहीं है, बस… बस ये अकेलापन मुझे खाए जा रहा है।”

अपनी बात कहकर वे तेज़ी से मंच से उतरे और अपनी कुर्सी पर आकर लगभग धड़ाम से बैठ गए। उनका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था। उम्र के इस पड़ाव पर दुनिया के सामने ये स्वीकार करना कि वे अंदर से कितने अकेले और असहाय हैं, किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। दीनानाथ जी ने उनका हाथ थाम लिया।

अब महिलाओं के परिचय की बारी थी। एक के बाद एक कई महिलाएं मंच पर आईं। ज़्यादातर महिलाएं ऐसी थीं जो आर्थिक रूप से बहुत संपन्न थीं। कोई रिटायर्ड शिक्षिका थी, तो कोई किसी बड़े अधिकारी की विधवा। ज़्यादातर को ऐसा साथी चाहिए था जिसके साथ वे तीर्थयात्रा कर सकें, विदेश घूम सकें, या जो उनके स्तर का हो। रघुनाथ जी हर महिला को देखते, दीनानाथ जी उनकी ओर सवालिया नज़रों से देखते, और रघुनाथ जी धीरे से ना में सिर हिला देते। रघुनाथ जी किसी ऐसी महिला को नहीं ढूँढ रहे थे जिसे सिर्फ एक हमसफ़र चाहिए था; उनकी आँखें किसी ऐसी ज़रूरतमंद आत्मा को तलाश रही थीं, जिसके जीवन के खालीपन को वे अपने बड़े से घर और अपनी पूरी पेंशन से भर सकें। वे किसी को सहारा देना चाहते थे, ताकि बदले में उन्हें जीने का एक मकसद मिल सके।

तभी संचालक ने एक नाम पुकारा— “सुमित्रा देवी।”

हॉल के एक कोने में हलचल हुई। एक पचपन वर्षीय महिला अपनी कुर्सी से आधी उठी और फिर वापस बैठ गई। उसकी सूती, साधारण सी साड़ी और उसकी आँखों में बसा हुआ अथाह डर बता रहा था कि वह यहाँ आने के लिए मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं थी। वह बार-बार अपने साथ आई एक युवा लड़की का हाथ पकड़ रही थी। वह लड़की उस महिला की पड़ोसन थी, जो उसे बहुत समझा-बुझाकर यहाँ लाई थी।

“मौसी, उठो ना। यहाँ सब अपने जैसे ही हैं, डरने की कोई बात नहीं है,” उस युवा लड़की ने सुमित्रा को ढांढस बंधाते हुए कहा और उनका हाथ पकड़कर उन्हें धीरे-धीरे मंच की ओर ले जाने लगी। सुमित्रा देवी के कदम ऐसे पड़ रहे थे जैसे वे किसी अपराध के लिए कटघरे में जा रही हों। मंच पर पहुंचकर वे माइक से काफी दूर खड़ी हो गईं। उनकी नज़रें ज़मीन में गड़ी थीं और वे अपने साड़ी के पल्लू को अपनी उंगलियों में कसकर लपेट रही थीं।

लड़की ने माइक अपने हाथ में लिया और बोली, “ये मेरी मुँहबोली मौसी हैं, सुमित्रा देवी। इनकी उम्र पचपन साल है। पिछले दस सालों से ये अपनी ज़िंदगी के सबसे बुरे दौर से गुज़र रही हैं। इनके पति एक लंबी बीमारी के बाद इन्हें छोड़कर चले गए। पति के इलाज में घर, जेवर सब कुछ बिक गया। इनका एक इकलौता बेटा था, जो तीन साल पहले एक कारखाने में हुए हादसे का शिकार हो गया। तब से ये बिल्कुल अकेली हैं। अभी ये अपने एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ रहती हैं, जहाँ इन्हें सिर्फ एक वक्त की रोटी के बदले दिन भर नौकरों की तरह खटना पड़ता है।”

लड़की की बातें सुनकर पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया था। रघुनाथ जी की नज़रें सुमित्रा देवी के झुके हुए चेहरे पर टिक गई थीं। उस चेहरे पर दुख की इतनी गहरी लकीरें थीं, जिसे देखकर कोई भी पत्थर दिल इंसान पिघल जाए।

संचालक ने माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश करते हुए सुमित्रा देवी से कहा, “सुमित्रा जी, आप भी अपने बारे में कुछ कहिए। आपको कैसा साथी चाहिए?”

सुमित्रा देवी ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। उनके होंठ कांप रहे थे। उन्होंने माइक को बिना छुए ही अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे… मुझे कोई पैसा या ज़ायदाद नहीं चाहिए। मैं बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं हूँ, बस रामचरितमानस पढ़ लेती हूँ। मुझे बस… बस एक ऐसा कोना चाहिए जहाँ मैं बिना किसी ताने के दो रोटी खा सकूँ। कोई ऐसा इंसान, जो मुझे बोझ न समझे। अगर वो बीमार भी रहेंगे, तो मैं उनकी जीवन भर सेवा करूँगी। मुझे बस एक छत चाहिए, जहाँ मैं चैन से रो सकूँ और कोई मुझे चुप कराने वाला हो।”

ये चंद शब्द हॉल में गूंजे और सीधे रघुनाथ प्रताप सिंह के सीने में उतर गए। सुमित्रा की आँखों से बहते आंसू उनके गालों को भिगो रहे थे। वे बिना और कुछ कहे मंच से उतरीं और तेज़ कदमों से अपनी कुर्सी की तरफ जाकर बैठ गईं, जैसे उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा अपराध कर दिया हो।

रघुनाथ जी एकटक सुमित्रा को देख रहे थे। इतने सालों के बाद उनके अंदर का खालीपन जैसे किसी आवाज़ को सुनकर भर गया था। उन्होंने उस महिला में अपनी ज़िंदगी का नया मकसद देख लिया था। उनकी বিশাল हवेली, जो बरसों से किसी के कदमों की आहट को तरस रही थी, आज उसे उसकी मालकिन मिल गई थी।

“दीनानाथ,” रघुनाथ जी ने अपने मित्र का हाथ कसकर पकड़ते हुए, दृढ़ लेकिन भावुक आवाज़ में कहा, “मुझे मेरी मंज़िल मिल गई है। ज़रा संचालक महोदय से कहकर उस बेटी को इधर बुलाओ। मैं सुमित्रा जी के खाली जीवन में अपने घर की छत और अपने दिल का पूरा कोना देना चाहता हूँ।”

दीनानाथ जी के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान फैल गई। उस दिन, उस साधारण से हॉल में दो टूटे हुए, अकेले और समाज के सताए हुए लोगों ने एक दूसरे के दुखों पर मरहम लगाने का जो मूक समझौता किया, उसने साबित कर दिया कि बहार सिर्फ पेड़ों पर नहीं लौटती, बल्कि इंसान के जीवन में भी किसी भी उम्र में दस्तक दे सकती है। जब रघुनाथ जी ने सुमित्रा जी के पास जाकर पहली बार अपनेपन से कहा, “क्या आप मेरे घर के सन्नाटे को अपनी पायल की आवाज़ से तोड़ना पसंद करेंगी?” तो सुमित्रा जी के आंसुओं में पहली बार दुख की जगह, एक नए और सुरक्षित जीवन की चमक थी।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या बुढ़ापे में इस तरह अपने लिए साथी चुनना समाज के नियमों के खिलाफ है या ये हर उस इंसान का हक़ है जो अकेलेपन की मार झेल रहा है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं।

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#ज़िंदगी की दूसरी सुबह

लेखिका : रीता शर्मा

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