एक जीवन, सात रिश्ते

मैं आज तक उसे सिर्फ एक ‘लड़ाकू’, ‘चिकचिक करने वाली’ और ‘अनपढ़ गृहणी’ समझता रहा। मैं अपनी झूठी शान, अपने पैसों और अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मैंने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि मेरे घर की उस चारदीवारी के अंदर, नमिता  मेरे लिए माँ, बहन, पिता, दोस्त और प्रेमिका—सब कुछ अकेले ही निभा रही थी।

मुझे खुद पर, अपनी सोच पर और अपनी मर्दानगी के उस झूठे गुरूर पर भयंकर शर्मिंदगी महसूस होने लगी। धिक्कार है मेरी ऐसी ऊंची पढ़ाई और ऐसी अमीरी पर, जो मुझे रिश्तों की असली पहचान भी ना करा सकी।

सुबह के आठ बज रहे थे और शहर की सड़कों पर गाड़ियों का शोर बढ़ना शुरू हो गया था। मैंने अपनी महंगी सेडान कार का दरवाज़ा ज़ोर से पटका और पिछली सीट पर धम्म से बैठ गया। मेरे चेहरे पर तनाव और गुस्से की लकीरें साफ़ देखी जा सकती थीं।

आज फिर सुबह-सुबह मेरी पत्नी नमिता  से मेरी तीखी बहस हो गई थी। मुद्दा वही पुराना था—घर के खर्चे, मेरे काम के घंटे, और उसका यह आरोप कि मैं उसे समय नहीं देता। मुझे नमिता  की बातें हमेशा एक ‘लड़ाकू’ और संकीर्ण सोच वाली महिला की बकवास लगती थीं। मुझे लगता था कि मैं दिन भर ऑफिस में खटता हूँ, लाखों रुपये कमाता हूँ,

और बदले में मुझे घर पर शांति भी नहीं मिलती। नमिता  ना तो मेरे कॉर्पोरेट दोस्तों की तरह फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोल पाती थी और ना ही उसे मेरे बिज़नेस की कोई समझ थी। मुझे अक्सर यह महसूस होता था कि हमारी शादी बस एक समझौता है जिसे मैं ढो रहा हूँ।

गाड़ी के स्टीयरिंग व्हील पर मेरे पुराने और भरोसेमंद ड्राइवर, रघुनाथ काका बैठे थे। उनकी उम्र लगभग साठ के पार रही होगी। पिछले दस सालों से वे मेरे साथ थे। उनके चेहरे की झुर्रियों में जीवन का एक लंबा अनुभव छिपा था। उन्होंने रियर-व्यू मिरर से मेरी तनी हुई भृकुटी देखी, लेकिन हमेशा की तरह बिना कुछ कहे चुपचाप गाड़ी स्टार्ट कर दी। हमें आज शहर से दूर एक साइट इंस्पेक्शन के लिए जाना था, जो लगभग तीन घंटे का सफर था।

गाड़ी शहर की भीड़भाड़ से निकलकर हाईवे पर आ चुकी थी। बाहर ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन मेरे अंदर का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। मेरे दिमाग में नमिता  की कही गई बातें गूंज रही थीं। मैं मन ही मन सोच रहा था कि आखिर औरतें इतनी आत्मकेंद्रित क्यों होती हैं? उन्हें सिर्फ अपनी दुनिया, अपने मायके, और अपनी शिकायतों से ही क्यों मतलब होता है?

सफर को लगभग दो घंटे बीत चुके थे। अचानक, एक छोटे से कस्बे के पास से गुज़रते हुए रघुनाथ काका ने गाड़ी की रफ्तार धीमी कर दी। उन्होंने संकोच भरे स्वर में मुझसे पूछा, “मालिक, अगर आपकी इजाज़त हो तो क्या मैं गाड़ी पाँच मिनट के लिए किनारे रोक लूँ? मुझे सामने वाली दुकान से एक छोटी सी चीज़ खरीदनी है।”

मैं पहले से ही चिढ़ा हुआ था, लेकिन मैंने बेमन से हामी भर दी। काका ने गाड़ी रोकी और तेज़ी से सड़क पार करके एक कॉस्मेटिक और चूड़ियों की छोटी सी दुकान पर चले गए। मैंने खिड़की से देखा कि वे दुकान वाले से कुछ लाल रंग की कांच की चूड़ियां और एक सस्ती सी लाल बिंदी का पत्ता खरीद रहे थे। मुझे यह देखकर बड़ी हैरानी हुई। इतनी उम्र में, इतने कम पैसों में गुज़ारा करने वाला इंसान अपनी पत्नी के लिए यह सब खरीद रहा था?

थोड़ी देर में काका चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए वापस आए। उन्होंने वो छोटी सी पन्नी बड़े जतन से डैशबोर्ड के एक कोने में रख दी, जैसे कोई बहुत कीमती खज़ाना हो।

मुझसे रहा नहीं गया। मेरे अंदर का फ्रस्ट्रेशन और कॉर्पोरेट वाला अहंकार बोल पड़ा। मैंने व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा, “क्या बात है रघुनाथ काका! इस उम्र में भी पत्नी का इतना डर? इतना कम कमाते हो, फिर भी उसकी फरमाइशें पूरी करने में लगे रहते हो। सच सच बताना, बहुत खौफ खाकर रहते हो ना चाची से?”

रघुनाथ काका ने गाड़ी गियर में डाली और बहुत ही शांत और सौम्य आवाज़ में बोले, “डर नहीं है साहब… यह तो उनकी कद्र है, उनका सम्मान है।”

मैं ज़ोर से हंस पड़ा। मेरा हंसना काका को बुरा लग सकता था, लेकिन मुझे परवाह नहीं थी। मैंने कहा, “अरे काका, इसमें कैसा सम्मान? मैंने तो देखा है चाची को। ना वो कोई बहुत खूबसूरत हैं, ना ही पढ़ी-लिखी हैं कि आपको कोई बड़ी सलाह दे सकें। हमेशा सूती साड़ी में सिर पर पल्लू रखे घर के काम में लगी रहती हैं। और आप हो कि उनकी कांच की चूड़ियों के लिए हाईवे पर गाड़ी रुकवा देते हो। इसे हमारी भाषा में ‘जोरू का गुलाम’ होना कहते हैं काका। क्या तुम्हारे लिए दुनिया के बाकी सारे रिश्ते कोई मायने नहीं रखते? बस एक पत्नी ही सब कुछ है?”

मेरी इस बात पर कोई और होता तो शायद गुस्सा कर जाता या चुप रह जाता। लेकिन रघुनाथ काका ने रियर-व्यू मिरर में मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर एक ऐसा ठहराव था, जिसने मुझे पल भर के लिए हैरान कर दिया।

उन्होंने बहुत ही इत्मीनान से अपनी बात शुरू की। “साहब जी, आप बहुत पढ़े-लिखे हैं, बड़े आदमी हैं। मैं तो एक अनपढ़ सा इंसान हूँ, लेकिन ज़िंदगी ने जो सिखाया है, वही बोलूंगा। आप कहते हैं कि बाकी रिश्ते क्या मायने नहीं रखते? साहब, माँ-बाप तो रिश्तेदार नहीं होते, वो तो साक्षात भगवान का रूप होते हैं। उनकी तो पूजा की जाती है, उनसे रिश्ते का हिसाब-किताब नहीं रखा जाता। भाई-बहन का रिश्ता तो खून का है, वो जन्म से ही जुड़ जाता है। और दोस्ती या दुनियादारी के जो रिश्ते होते हैं, वो कहीं ना कहीं मतलब या किसी फायदे की डोर से बंधे होते हैं। जैसे मेरा और आपका रिश्ता… आप मुझे पगार देते हैं, इसलिए मैं आपकी गाड़ी चलाता हूँ। जिस दिन आप मुझे काम से निकाल देंगे, यह रिश्ता भी ख़त्म हो जाएगा।”

काका ने एक गहरी सांस ली और आगे बोले, “लेकिन साहब, एक पत्नी का रिश्ता इन सबसे बिल्कुल अलग होता है। वो औरत, जो हमारे खून की नहीं होती, जिसे जन्म से हमारा कोई वास्ता नहीं होता, वो अचानक एक दिन अपना घर, अपना बचपन, अपने माँ-बाप, अपने सारे रिश्ते-नाते हमेशा के लिए पीछे छोड़कर हमारी हो जाती है। सिर्फ हमारे लिए। और फिर हमारी आख़िरी साँस तक, हमारे हर सुख में, हर दुख में, हर बीमारी में, हर हार और हर जीत में बिना किसी स्वार्थ के हमारी भागीदार बन जाती है।”

मैं चुपचाप सुन रहा था। मेरा व्यंग्य अब शांत हो चुका था।

काका की आवाज़ में एक अजीब सी कशिश थी, उन्होंने कहा, “आप कहते हैं कि मैं उनका गुलाम हूँ। साहब, पत्नी सिर्फ एक रिश्ता नहीं होती… वो तो रिश्तों का एक पूरा समंदर होती है, पूरा खज़ाना होती है। जब मैं कभी बीमार पड़ता हूँ, तो वो रात-रात भर जागकर मेरे माथे पर पट्टियां रखती है, मुझे दवा खिलाती है, तब उसमें मुझे मेरी ‘माँ’ नज़र आती है, जो अपने बच्चे की पीड़ा नहीं देख पाती।”

“जब मैं महीने की पगार उसके हाथ में रखता हूँ, और वो उसी थोड़े से पैसे में से कुछ पैसे मेरे बुढ़ापे के लिए और बच्चों की पढ़ाई के लिए बचा कर रख लेती है, जब वो मुझे दुनिया के फरेब और झूठे लोगों से आगाह करती है… तब वो मुझे मेरे ‘पिता’ जैसी लगती है, जो घर के भले-बुरे की ढाल होता है।”

“जब वो कभी मेरी किसी गलती पर मुझसे रूठ जाती है, मुझे सही राह दिखाने के लिए मुझसे लड़ती है, मेरे लिए बाज़ार से मोल-भाव करके मेरी पसंद की कमीज़ खरीद कर लाती है… तब वो मुझे मेरी ‘बड़ी बहन’ जैसी लगती है।”

“जब वो कभी-कभी बच्चों की तरह किसी छोटी सी चीज़ के लिए ज़िद करने लगती है, मेरी तवज्जो पाने के लिए नखरे दिखाती है, या जब मैं शाम को घर लौटता हूँ तो मेरे गले लगकर अपनी दिन भर की बातें सुनाती है… तब मुझे उसमें अपनी छोटी सी ‘बेटी’ नज़र आती है।”

गाड़ी की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई थी, मानो काका भी अपनी यादों के सफर पर निकल पड़े हों। “साहब जी, जब घर में कोई बड़ा फैसला लेना होता है, कोई मुसीबत आ जाती है, तब वो मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर बैठती है। मुझे सही और गलत का फर्क बताती है, मुझे हिम्मत देती है। तब वो मेरी सबसे पक्की ‘दोस्त’ बन जाती है।”

“और जब वो पूरे घर का हिसाब-किताब रखती है, रिश्तेदारों का आना-जाना संभालती है, राशन से लेकर रसोई तक का सारा प्रबंध अकेले अपने दम पर करती है, तब वो इस घर की असली ‘मालकिन’ और बॉस होती है।”

काका ने एक पल का मौन लिया। उनकी आँखें हल्की सी नम हो गई थीं, “और आख़िर में साहब… जब रात का अंधेरा होता है, जब सारी दुनिया सो जाती है, जब वो अपने बच्चों, अपने दिन भर की थकान, और अपने सारे दर्दों को भुलाकर सिर्फ मेरे पास आती है… तब वो मेरी पत्नी, मेरी जीवनसंगिनी, मेरी प्रेमिका और मेरी आत्मा बन जाती है, जो अपना वजूद मुझ पर न्योछावर कर देती है। जिस औरत ने एक उम्र मेरे लिए इतने रूप धरे हों, मेरे हर सुख-दुख को अपना मान लिया हो, अगर मैं उस औरत की कद्र करता हूँ, उसके लिए दो कौड़ी की चूड़ियां खरीद कर उसके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता हूँ, तो इसमें गलत क्या है साहब? अगर यह गुलामी है, तो मुझे यह गुलामी सौ जन्मों तक मंज़ूर है।”

गाड़ी में एकदम सन्नाटा छा गया था। बाहर हाईवे पर गाड़ियां फर्राटे से गुज़र रही थीं, लेकिन मेरे अंदर जैसे एक भयंकर तूफ़ान आकर थम गया था। मैं अवाक रह गया था। मेरे पास काका की किसी भी बात का कोई जवाब नहीं था। एक साधारण सा, कम पढ़ा-लिखा ड्राइवर, जो चंद हज़ार रुपये महीने कमाता है, उसने आज जीवन का वो फलसफा मुझे समझा दिया था, जो बड़ी-बड़ी डिग्रियां और कॉर्पोरेट सेमिनार मुझे आज तक नहीं सिखा पाए थे।

मेरे दिमाग में अचानक नमिता  का चेहरा घूमने लगा। वो नमिता , जिसने शादी के बाद मेरे लिए अपना करियर छोड़ दिया ताकि मैं अपने बिज़नेस पर फोकस कर सकूं। वो नमिता , जो मेरे टाइफाइड होने पर हफ्तों तक मेरी खाट के पास बैठी रही थी। वो नमिता , जो मेरे फालतू खर्चों पर मुझे इसलिए टोकती है ताकि भविष्य में हमें कोई आर्थिक संकट ना झेलना पड़े। वो नमिता , जो मेरी माँ के गुज़र जाने के बाद मेरे पूरे परिवार को एक धागे में पिरो कर रखे हुए है।

और मैं? मैं आज तक उसे सिर्फ एक ‘लड़ाकू’, ‘चिकचिक करने वाली’ और ‘अनपढ़ गृहणी’ समझता रहा। मैं अपनी झूठी शान, अपने पैसों और अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मैंने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि मेरे घर की उस चारदीवारी के अंदर, नमिता  मेरे लिए माँ, बहन, पिता, दोस्त और प्रेमिका—सब कुछ अकेले ही निभा रही थी। मुझे खुद पर, अपनी सोच पर और अपनी मर्दानगी के उस झूठे गुरूर पर भयंकर शर्मिंदगी महसूस होने लगी। धिक्कार है मेरी ऐसी ऊंची पढ़ाई और ऐसी अमीरी पर, जो मुझे रिश्तों की असली पहचान भी ना करा सकी।

मैंने चुपचाप अपना फोन निकाला। स्क्रीन पर नमिता  का एक मिस कॉल पड़ा था, जो उसने शायद मेरा गुस्सा शांत होने के बाद किया होगा। मैंने बिना एक पल सोचे उसे कॉल मिलाया।

फोन उठते ही नमिता  की डरी हुई सी आवाज़ आई, “हैलो… वो, मैं बस पूछ रही थी कि नाश्ता किया तुमने या आज भी गुस्से में भूखे ही…?”

उसकी आवाज़ सुनते ही मेरे गले में एक गांठ सी पड़ गई। मेरी आँखें भर आईं। मैंने अपनी आवाज़ को भरसक सामान्य रखने की कोशिश करते हुए कहा, “नमिता … मुझे माफ़ कर दो। मैं आज बहुत गलत था। बल्कि मैं इतने सालों से गलत था। शाम को लौटते हुए तुम्हारे लिए कुछ लाऊँ?”

दूसरी तरफ एक लंबी चुप्पी छा गई। शायद नमिता  को यकीन नहीं हो रहा था। फिर उसने बहुत ही धीमी और नर्म आवाज़ में कहा, “कुछ नहीं चाहिए… बस तुम जल्दी और संभलकर आ जाना। मैं इंतज़ार करूँगी।”

मैंने फोन काटा और एक गहरी सांस ली। मेरे दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतर चुका था। मैंने रियर-व्यू मिरर में देखा, रघुनाथ काका मुस्कुराते हुए अपनी नज़रें सामने सड़क पर टिकाए हुए थे।

आज मुझे एहसास हुआ कि खूबसूरती और पढ़ाई-लिखाई किसी रिश्ते की बुनियाद नहीं होते। सम्मान, समर्पण और एक-दूसरे की कद्र ही वो असली मोती हैं, जो शादी नाम के इस पवित्र धागे को हमेशा मज़बूत बनाए रखते हैं।

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 #एक जीवन, सात रिश्ते

लेखिका : मोहिनी मिश्रा

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