घर में भले ही फैसले रोहन और मीरा लेते थे, लेकिन उन पर आखिरी मुहर हमेशा सावित्री देवी की ही होती थी। ये एक कड़वा सच है कि बेटा चाहे अपनी माँ को कितनी भी कड़वी बात कह दे, माँ उसे भूल जाती है। लेकिन अगर बहू ज़रा सी भी ऊँची आवाज़ में बात कर ले, तो सास को अपना अपमान महसूस होने लगता है।
पर मीरा ने अपनी समझदारी और छोटे-छोटे सम्मान के ज़रिए उस पुरानी परंपरा को तोड़ दिया था। सावित्री देवी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि थोड़ा सा अधिकार सौंपने और बदले में सम्मान पाने से उनके घर का आँगन इतनी खुशियों से भर जाएगा।
शरद ऋतु की एक खुशनुमा शाम थी। रोहन ऑफिस से लौटा तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। आते ही उसने अपनी पत्नी मीरा को आवाज़ लगाई और जेब से एक मशहूर गज़ल गायक के कार्यक्रम के दो पास निकालकर उसके सामने रख दिए। मीरा पास देखकर खुश तो बहुत हुई, लेकिन अगले ही पल उसकी नज़र दालान में बैठी अपनी सास सावित्री देवी पर गई, जो अपने पोते आरव को कहानी सुना रही थीं।
मीरा ने तुरंत अपनी आवाज़ को थोड़ा ऊँचा करते हुए कहा, “देखिए, मैं आपके साथ तभी चलूँगी जब माँ जी भी हमारे साथ चलेंगी। वरना आप अकेले ही चले जाइए।” मीरा जानती थी कि सावित्री देवी को भीड़भाड़ और गज़ल के कार्यक्रमों में कोई खास दिलचस्पी नहीं है।
उनकी यह बातचीत सुनकर सावित्री देवी मुस्कुरा उठीं। उन्होंने बड़े ही शांत और स्नेह भरे स्वर में कहा, “अरे बहू, तुम दोनों जाओ। रोहन इतने मन से तुम्हारे लिए पास लाया है, तुम क्यों ज़िद कर रही हो? मैं आरव को संभाल लूँगी, तुम दोनों घूम आओ।”
मीरा और रोहन खुशी-खुशी कार्यक्रम में चले गए। जब वे रात को वापस लौटे तो घर में घुसते ही गाजर के हलवे और ताज़ी पूड़ियों की महक ने उनका स्वागत किया। डाइनिंग टेबल पर खाना करीने से लगा हुआ था। सावित्री देवी को पता था कि रोहन को उनके हाथ का बना हलवा बहुत पसंद है। मीरा ने जैसे ही देखा कि सावित्री देवी अभी भी रसोई में हैं, वह तुरंत उनके पास गई। रसोई की गैस जल रही थी और सावित्री देवी पूड़ियाँ तलने की तैयारी कर रही थीं।
“माँ जी, आप रहने दीजिए, आप दिन भर आरव के पीछे भाग-भाग कर थक गई होंगी। आप जाकर बैठिए, मैं अभी गरमागरम पूड़ियाँ तल कर लाती हूँ,” मीरा ने बड़ी ही आत्मीयता से कहा।
तभी रोहन भी रसोई के दरवाज़े पर आ गया और बोला, “हाँ माँ, आप जाकर बैठिए। हम सब एक साथ बैठकर ही खाना खाएंगे। मीरा सब सँभाल लेगी।”
डाइनिंग टेबल पर जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर हँसी-मज़ाक करते हुए खाना खा रहा था, तो अचानक सावित्री देवी की आँखें भर आईं। उनकी आँखों में नमी देख रोहन घबरा गया। “क्या हुआ माँ? आप रो क्यों रही हैं?”
सावित्री देवी ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटा, बस आज तुम्हारे पिताजी की बहुत याद आ गई। अगर आज वे होते, तो हम सबको इस तरह हँसते-मुस्कुराते देखकर कितने खुश होते।”
“माँ, ऐसे पुराने दिन याद करके मन छोटा मत किया कीजिए,” रोहन ने उनका हाथ थामते हुए कहा। फिर उसने हलवे का एक चम्मच खाया और मीरा की तरफ देखकर बोला, “मीरा, माँ के हाथ के इस हलवे का कोई जवाब नहीं। तुम्हें भी माँ से ये रेसिपी सीखनी चाहिए।”
मीरा ने भी हामी भरते हुए कहा, “सच में माँ जी, आप के हाथ में तो जैसे जादू है। आप मुझे भी ऐसा हलवा बनाना सिखाइए ना।”
सावित्री देवी मुस्कुराईं, “अरे बहू, खाना तो तू भी बहुत बढ़िया बनाती है। उस दिन तूने जो पनीर की सब्ज़ी बनाई थी, वो भी तो लाजवाब थी।”
“नहीं माँ जी,” मीरा ने प्यार से कहा, “आपके हाथ के खाने में जो ममता और अनुभव का स्वाद है, वो मेरे बनाए खाने में कहाँ!”
कुछ ही दिनों बाद दीवाली का त्योहार आने वाला था। रोहन को ऑफिस से बोनस मिला। वह खुशी-खुशी घर आया और एक लिफाफा लेकर मीरा को आवाज़ दी। मीरा रसोई से बाहर आई तो रोहन ने उसे बोनस के पैसों वाला लिफाफा देना चाहा। मीरा ने मुस्कुराते हुए लिफाफे को हाथ नहीं लगाया और बोली, “रोहन, ये लिफाफा आप सीधे माँ जी के हाथों में दीजिए ना।”
रोहन ने मीरा की बात मानकर वह लिफाफा सावित्री देवी के हाथों में रख दिया। लिफाफा हाथ में आते ही सावित्री देवी का रोम-रोम पुलकित हो उठा। पैसे उनके लिए मायने नहीं रखते थे, लेकिन इस छोटे से कदम ने उन्हें घर की सबसे सम्मानित और अहम सदस्य होने का अहसास करा दिया था। रोहन और मीरा दोनों इस बात को भली-भांति समझते थे कि सावित्री देवी को अपनी कोई व्यक्तिगत ज़रूरत नहीं है। उनकी पेंशन से उनका खर्च आराम से चल जाता था। उन्हें बस अपने बच्चों से थोड़ा सा मान-सम्मान और अपनत्व चाहिए था।
इस घटना के बाद से घर का माहौल और भी खुशनुमा हो गया। घर में कोई भी नया सामान आता या कोई भी बड़ा फैसला लेना होता, तो मीरा सबसे पहले सावित्री देवी से सलाह ज़रूर लेती। सावित्री देवी भी अपनी बहू को कभी निराश नहीं करती थीं। अब तो आस-पड़ोस की औरतों के सामने सावित्री देवी के मुँह से मीरा की तारीफों के पुल बंधते रहते थे।
दीवाली की साफ-सफाई जोरों पर थी। एक दिन जाले साफ करते वक्त मीरा का पैर स्टूल से फिसल गया। वह ज़मीन पर गिरी और उसकी कलाई में ज़ोरदार मोच आ गई। दर्द के मारे मीरा की चीख निकल गई। आवाज़ सुनकर सावित्री देवी दौड़ कर आईं। उन्होंने तुरंत मीरा को सहारा देकर उठाया और सोफे पर लेटाया। बिना एक पल की देरी किए उन्होंने रसोई से हल्दी और प्याज गर्म किया, उसका लेप मीरा की कलाई पर लगाया और गर्म पट्टी बाँध दी। पूरे दिन उन्होंने मीरा को बिस्तर से उठने नहीं दिया और सारा काम खुद सँभाला।
शाम को जब रोहन ऑफिस से आया और उसने ये नज़ारा देखा, तो हँसते हुए बोला, “माँ, दुनिया कहती है कि बहू सास की सेवा करती है, लेकिन हमारे घर में तो गंगा उल्टी बह रही है।”
सावित्री देवी ने रोहन को प्यार से डाँटते हुए कहा, “चुप कर शैतान! ज्यादा मत बोल। मीरा मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी जैसी है। क्या एक माँ अपनी बेटी की तकलीफ में उसका ध्यान नहीं रख सकती?”
मीरा की आँखें भर आईं। उसने भरे हुए गले से कहा, “माँ जी, बेटी जैसी नहीं, मुझे अपनी बेटी ही कहिए। मैं आपकी बेटी ही तो हूँ।”
मीरा की ये बात सुनकर सावित्री देवी ने वात्सल्य से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “तूने तो मेरी ज़िंदगी में बेटी की जो कमी थी, वो पूरी कर दी बहू।”
घर में भले ही फैसले रोहन और मीरा लेते थे, लेकिन उन पर आखिरी मुहर हमेशा सावित्री देवी की ही होती थी। ये एक कड़वा सच है कि बेटा चाहे अपनी माँ को कितनी भी कड़वी बात कह दे, माँ उसे भूल जाती है। लेकिन अगर बहू ज़रा सी भी ऊँची आवाज़ में बात कर ले, तो सास को अपना अपमान महसूस होने लगता है। पर मीरा ने अपनी समझदारी और छोटे-छोटे सम्मान के ज़रिए उस पुरानी परंपरा को तोड़ दिया था। सावित्री देवी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि थोड़ा सा अधिकार सौंपने और बदले में सम्मान पाने से उनके घर का आँगन इतनी खुशियों से भर जाएगा।
दीवाली अब बस दो दिन दूर थी। मीरा के हाथ में अब काफी आराम था और वह सावित्री देवी के साथ मिलकर दीवाली के पकवान बनाने में जुट गई थी। घर में हर तरफ दीयों और मिठाइयों की खुशबू फैली हुई थी।
रात को रोहन बिस्तर पर लेटा ही था कि अचानक उसका फोन बज उठा। स्क्रीन पर लंदन का नंबर फ्लैश हो रहा था। ये रोहन के बड़े भाई विक्रम का फोन था। रोहन ने जैसे ही फोन उठाया, विक्रम की रुंधा हुआ स्वर सुनाई दिया। विक्रम ने सावित्री देवी की सेहत के बारे में पूछा और फिर गहरी साँस लेते हुए कहा, “रोहन, जब पिछली बार माँ हमारे पास लंदन आई थीं, तो नेहा (विक्रम की पत्नी) और माँ के बीच काफी कहा-सुनी हो गई थी। माँ यहाँ से बहुत दुखी होकर गई थीं। उस दिन से मेरा मन बहुत अशांत है।”
यह सच था कि नेहा और सावित्री देवी के विचार कभी मेल नहीं खाते थे। दोनों की जीवनशैली अलग थी, पर बात इतनी बढ़ जाएगी कि वे एक-दूसरे से नाराज़ हो जाएँगे, ये रोहन ने कभी नहीं सोचा था।
विक्रम ने आगे जो कहा, वह सुनकर रोहन खुशी से उछल पड़ा। विक्रम ने बताया कि नेहा को अपनी गलती का एहसास हो गया है और वे दोनों अपनी गलती की माफ़ी माँगने और माँ के दिल का बोझ हल्का करने के लिए भारत आ रहे हैं। उनका प्लान बिल्कुल सीक्रेट था।
अगले दो दिन रोहन के लिए इंतज़ार करना बहुत मुश्किल हो रहा था। दीवाली के दिन मीरा ने घर को कुछ इस तरह सजाया था जैसे कोई महल हो। घर के हर कोने में रंगोली और फूलों की लड़ियाँ सजी थीं। रोहन को बार-बार मुस्कुराते देखकर मीरा ने टोका, “क्या बात है? आज आप मन ही मन बहुत खुश लग रहे हैं?”
रोहन ने अपनी असली खुशी छिपाते हुए कहा, “बस तुम दोनों सास-बहू का प्यार देखकर खुश हो रहा हूँ। भगवान करे हमारे घर की ये खुशियाँ हमेशा ऐसे ही बनी रहें।”
“नज़र मत लगाइए हमारे इस खूबसूरत रिश्ते को,” मीरा ने हँसते हुए जवाब दिया।
शाम घिर आई थी। लक्ष्मी पूजा का समय नज़दीक था। तभी सावित्री देवी ने अपने कमरे से मीरा को आवाज़ दी। “बहू, ज़रा इधर आना।”
मीरा जब कमरे में गई तो सावित्री देवी ने अपनी पुरानी अलमारी की चाबी देते हुए कहा, “अलमारी के लॉकर में एक नीले रंग का मखमली डिब्बा रखा है, ज़रा वो निकाल लाना।”
मीरा ने आज्ञा का पालन किया और डिब्बा लाकर सावित्री देवी को दे दिया। सावित्री देवी ने अपने कांपते हाथों से वह डिब्बा खोला। उसमें सोने के दो बेहद खूबसूरत और भारी पुश्तैनी कंगन रखे हुए थे। सावित्री देवी ने वे कंगन मीरा के हाथों में थमाते हुए कहा, “ये हमारे खानदान की निशानी है बहू। आज से ये तुम्हारी ज़िम्मेदारी हैं। आज दीवाली की पूजा में तुम यही पहनकर बैठना। तुम्हारे ससुर जी भी हमेशा यही चाहते थे।”
कंगन हाथों में लेते हुए मीरा की आँखें छलक पड़ीं। उसने झुककर अपनी सास के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया।
दूसरी तरफ, रोहन बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। मीरा ने दो-तीन बार पूछा भी कि वो किसका इंतज़ार कर रहे हैं, पर रोहन ने बात टाल दी। आँगन में दीये जलाए जा चुके थे। सावित्री देवी ने आवाज़ लगाई, “रोहन! जल्दी आओ, पूजा का मुहूर्त निकल रहा है। आरव भी पटाखे चलाने की ज़िद कर रहा है।”
रोहन आठ बजने का इंतज़ार कर रहा था। तभी बाहर एक गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई। रोहन समझ गया कि इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हो गई हैं। वह अनजान बनते हुए बोला, “चलिए माँ, पूजा शुरू करते हैं।”
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। सावित्री देवी जैसे ही पूजा की थाली उठाने के लिए मुड़ीं, अचानक नेहा ने आकर उनके पैर छू लिए। सावित्री देवी की आदत थी कि जो भी पैर छूता, उनके मुँह से अनायास ही आशीर्वाद निकल पड़ता। “खुश रहो, दूधो नहाओ, पूतो फलो…” कहते हुए उन्होंने नेहा के सिर पर हाथ रख दिया।
लेकिन जैसे ही नेहा ने सिर उठाया और सावित्री देवी ने उसका चेहरा देखा, वे बुत बनकर रह गईं। आश्चर्य के मारे उनकी पलकें झपकना भूल गईं। वे कभी नेहा को देखतीं, तो कभी दरवाज़े पर खड़े विक्रम को। तभी विक्रम आगे बढ़ा और उसने माँ के पैर छुए। सावित्री देवी की आँखों से आंसुओं का बाँध टूट पड़ा। उन्होंने विक्रम और नेहा को गले से लगा लिया। विक्रम की आँखों में भी पश्चाताप के आँसू थे।
माँ ने बिना कुछ कहे अपने बेटे और बहू की आँखों का सारा हाल पढ़ लिया था। गिले-शिकवे, दूरियाँ, सब उन आंसुओं में बह गए थे। उन्होंने रोहन और मीरा को भी अपने पास बुला लिया और चारों बच्चों को एक साथ गले लगा लिया।
उस रात सावित्री देवी की आँखों में जो खुशी की चमक थी, वह आँगन में जल रहे हज़ारों दीयों की रोशनी से भी कहीं ज़्यादा उज्ज्वल थी। एक छोटे से सम्मान से शुरू हुई इस कहानी ने आज पूरे परिवार को एक माला में पिरो दिया था। आज सच में उस घर में दीवाली मनाई जा रही थी, जहाँ न केवल मिट्टी के दीये जल रहे थे, बल्कि दिलों के रिश्ते भी जगमगा उठे थे।
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#प्रेम की छाँव
लेखिका : कृतिका भण्डारी