पूर्वी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने अपना पूरा गुस्सा अपने भाई पर उतार दिया। “अनिकेत भैया, आपको शर्म नहीं आती? पापा ने हमें पालने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी और आप उन्हें यहाँ छोड़ने आ गए?
और सिमरन भाभी कहाँ हैं? मुझे पता है, ये सब उसी का किया धरा होगा। वो तो जॉब भी नहीं करती, घर पर ही रहती है। फिर उसे पापा से क्या दिक्कत हो गई? आप लोगों की हिम्मत कैसे हुई मेरे पापा को घर से निकालने की? मैं अभी जाकर सिमरन को बताती हूँ कि हम कोई लावारिस नहीं हैं…”
रविवार की उस गुनगुनी सुबह में एक अलग ही सुकून था। पूर्वी अपने अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी होकर कॉफी की चुस्कियां ले रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी आज़ादी और जीत की चमक थी। पिछले तीन हफ़्तों से उसकी ज़िंदगी एकदम बदल गई थी। घर में अब कोई सुबह-सुबह भजन की तेज़ आवाज़ नहीं गूंजती थी,
किसी के खांसने की आवाज़ से उसकी नींद नहीं टूटती थी, और सबसे बड़ी बात, उसे अपने ही घर में किसी के सामने दुपट्टा संभालने या धीमे स्वर में बात करने की पाबंदी नहीं थी।
पूर्वी एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर थी और उसका पति शशांक एक आईटी इंजीनियर । दोनों की ज़िंदगी बहुत तेज़ रफ़्तार से भाग रही थी, और इस रफ़्तार में शशांक के बूढ़े माता-पिता, पंडित रमाकांत और सुशीला देवी, पूर्वी को किसी स्पीड-ब्रेकर की तरह लगने लगे थे।
आज पूर्वी और शशांक को शहर के बाहरी इलाके में स्थित ‘आनंदवन सीनियर लिविंग रिज़ॉर्ट’ (जो असल में एक आलीशान वृद्धाश्रम ही था) जाना था। तीन हफ़्ते पहले ही पूर्वी ने बड़ी चतुराई से अपने सास-ससुर को वहाँ शिफ्ट करवाया था। पूर्वी मन ही मन अपनी योजना की सफलता पर मुस्कुरा रही थी।
उसने सोचा था कि सास-ससुर से मिलने के बाद, लौटते समय वह अपने मायके भी जाएगी। मायके में उसका बड़ा भाई अनिकेत, भाभी सिमरन और उसके अपने पिता, श्री देवदत्त जी रहते थे। देवदत्त जी ने जीवन भर संघर्ष करके दोनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया था और अब रिटायरमेंट के बाद बेटे के साथ रह रहे थे।
“पूर्वी, तुम तैयार हो गई? हमें निकलना चाहिए, रास्ता काफी लंबा है,” शशांक ने कमरे में आते हुए कहा।
“बस दो मिनट शशांक, मैंने पापा के लिए वो कश्मीरी कार्डिगन निकाल लिया है जो मैंने कल मॉल से लिया था। आनंदवन से लौटते हुए हम पापा को सरप्राइज़ देंगे,” पूर्वी ने चहकते हुए कहा।
गाड़ी हाईवे पर सरपट दौड़ रही थी। पूर्वी ने कार का स्टीरियो ऑन किया और अपनी पसंद के अंग्रेज़ी गाने सुनने लगी। खिड़की से आती ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने शशांक को अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने के लिए राज़ी किया था। पूर्वी ने सीधे तौर पर कभी लड़ाई नहीं की। उसने बहुत ही शातिर तरीके से ‘मीठा ज़हर’ घोला था। वह रोज़ शशांक के सामने घर के माहौल को लेकर रोती, डिप्रेशन का नाटक करती और कहती कि सास-ससुर की पुरानी सोच की वजह से वह अपने करियर पर ध्यान नहीं दे पा रही है। उसने शशांक के दिमाग में यह बात डाल दी थी कि ‘आनंदवन’ में उन्हें चौबीसों घंटे मेडिकल सुविधा मिलेगी, उनके हमउम्र लोग होंगे, और यह उनके लिए एक ‘लग्ज़री रिटायरमेंट’ जैसा होगा। शशांक, जो दिन-रात काम में डूबा रहता था, घर की रोज़-रोज़ की कलह से तंग आ चुका था और आख़िरकार उसने अपनी पत्नी के आगे घुटने टेक दिए थे।
आनंदवन का परिसर बहुत बड़ा और हरा-भरा था। बड़े-बड़े लॉन, फव्वारे और शांत वातावरण। पूर्वी जब वहाँ पहुँची तो उसने देखा कि उसके सास-ससुर एक बेंच पर बैठे हैं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ामोशी थी, जिसे पूर्वी ने ‘सुकून’ मान लिया। उसने आगे बढ़कर औपचारिकता निभाते हुए उनके पैर छुए और फल की टोकरी उनके सामने रख दी। शशांक अपने माता-पिता से बात करने लगा। पूर्वी कुछ देर वहाँ खड़ी रही, फिर बोर होकर उसने कहा, “शशांक, आप बात कीजिए, मैं ज़रा रिसेप्शन से होकर आती हूँ, मुझे पापा के घर जाने के लिए कुछ रास्ते की जानकारी लेनी है।”
पूर्वी रिसेप्शन की तरफ बढ़ ही रही थी कि उसकी नज़र पार्किंग एरिया में आकर रुकी एक नीले रंग की एसयूवी पर पड़ी। वह कार अनिकेत, उसके भाई की थी।
“अरे! भैया यहाँ क्या कर रहे हैं?” पूर्वी के मन में सवाल कौंधा। उसे लगा शायद अनिकेत को पता चल गया होगा कि वो लोग आनंदवन आए हैं, इसलिए वो भी रास्ते में मिलने आ गया होगा।
पूर्वी खुशी से कार की तरफ दौड़ी। लेकिन जैसे ही वह करीब पहुँची, उसके कदमों में जैसे ब्रेक लग गए। कार का दरवाज़ा खुला और अनिकेत ने सहारा देकर एक बुज़ुर्ग को बाहर निकाला। वो बुज़ुर्ग कोई और नहीं, बल्कि पूर्वी के अपने पिता, देवदत्त जी थे। अनिकेत कार की डिक्की से दो बड़े-बड़े सूटकेस निकाल रहा था और देवदत्त जी के चेहरे पर वही अजीब सी ख़ामोशी थी जो कुछ देर पहले पूर्वी ने अपने सास-ससुर के चेहरे पर देखी थी।
पूर्वी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वह हक्की-बक्की सी रह गई। उसके हाथ से कश्मीरी कार्डिगन वाला बैग छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह लगभग दौड़ती हुई अपने पिता के पास पहुँची और उन्हें गले से लगा लिया।
“पापा! आप यहाँ? और ये सूटकेस… ये सब क्या है भैया?” पूर्वी ने घबराहट और गुस्से से अनिकेत की तरफ देखते हुए पूछा।
अनिकेत कुछ बोल पाता, उससे पहले ही देवदत्त जी ने पूर्वी के सिर पर हाथ रखा और एक फीकी सी मुस्कान के साथ बोले, “मैं यहाँ रहने आया हूँ मेरी बच्ची। अब से यही मेरा घर है।”
पूर्वी के कानों में जैसे किसी ने खौलता हुआ सीसा डाल दिया हो। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह चीख पड़ी, “क्या बकवास है ये? आप यहाँ क्यों रहेंगे? आपका इतना बड़ा घर है, आपका बेटा है, बहू है… आप यहाँ वृद्धाश्रम में क्यों रहेंगे?”
अनिकेत ने अपनी नज़रें चुराते हुए ज़मीन की तरफ देखा।
पूर्वी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने अपना पूरा गुस्सा अपने भाई पर उतार दिया। “अनिकेत भैया, आपको शर्म नहीं आती? पापा ने हमें पालने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी और आप उन्हें यहाँ छोड़ने आ गए? और सिमरन भाभी कहाँ हैं? मुझे पता है, ये सब उसी का किया धरा होगा। वो तो जॉब भी नहीं करती, घर पर ही रहती है। फिर उसे पापा से क्या दिक्कत हो गई? आप लोगों की हिम्मत कैसे हुई मेरे पापा को घर से निकालने की? मैं अभी जाकर सिमरन को बताती हूँ कि हम कोई लावारिस नहीं हैं…”
“रुक जाओ पूर्वी!” देवदत्त जी की शांत लेकिन भारी आवाज़ ने पूर्वी को वहीं रोक दिया। “सिमरन को कुछ मत कहना। गलती उसकी नहीं है।”
“तो फिर किसकी गलती है पापा? वो दोनों मिलकर आपको यहाँ छोड़ने आए हैं और आप उसी का पक्ष ले रहे हैं?” पूर्वी रोने लगी थी।
देवदत्त जी ने पास ही रखी एक सीमेंट की बेंच पर बैठते हुए एक गहरी सांस ली। “जिस दिन शशांक के माता-पिता के इस आनंदवन में आने की ख़बर हमारे घर पहुँची थी ना पूर्वी, उसी दिन से मेरे घर से निकाले जाने की पटकथा लिख दी गई थी।”
पूर्वी को लगा जैसे किसी ने उसे ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया हो। वह सुन्न खड़ी रह गई।
देवदत्त जी ने आगे कहा, “तुम तो जानती हो, सिमरन और अनिकेत के बीच अक्सर छोटी-मोटी नोकझोंक होती थी। लेकिन परिवार के लिहाज़ में, और मेरे वहां होने की वजह से बात कभी घर से बाहर नहीं जाती थी। सिमरन अक्सर अनिकेत से कहती थी कि उसे अपनी आज़ादी चाहिए, उसे मेरे खांसने से, मेरे बार-बार चाय मांगने से चिढ़ होती थी। लेकिन अनिकेत हमेशा ये कहकर उसे चुप करा देता था कि ‘पिताजी को कहाँ छोड़ दूँ, लोग क्या कहेंगे।’ समाज का डर और अकेलेपन का खौफ़ मेरे लिए एक बहुत बड़ा सुरक्षा कवच था पूर्वी।”
पिता की आँखों में आंसू आ गए थे, लेकिन वो पलकें झपकाकर उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे थे। “लेकिन बेटी, तुमने अनिकेत और सिमरन की वो मुश्किल बहुत आसान कर दी। तुमने उनका वो डर हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया।”
“म..मैंने? मैंने क्या किया पापा?” पूर्वी के होंठ कांप रहे थे।
“सिमरन ने अनिकेत से साफ़ शब्दों में कह दिया पूर्वी, कि जब इस घर की पढ़ी-लिखी, समझदार और एचआर हेड बेटी… अपनी आज़ादी, अपनी शांति और अपनी सहूलियत के लिए अपने सास-ससुर को वृद्धाश्रम भेज सकती है, तो मैं इस घर की बहू होकर अपनी जवानी एक बुज़ुर्ग की तीमारदारी में क्यों बर्बाद करूँ? अगर पूर्वी के लिए उसकी शांति उसके सास-ससुर से बड़ी है, तो मेरी शांति मेरे ससुर से बड़ी क्यों नहीं हो सकती?”
पूर्वी के सीने में जैसे किसी ने खंजर घोंप दिया। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी। उसका बुना हुआ पूरा जाल, उसकी सारी चालाकियां, उसके ही गले का फंदा बन गई थीं।
“पापा… ये… ये कैसे…” पूर्वी फफक-फफक कर रो पड़ी।
“खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है पूर्वी। कल तक जो सिमरन मेरी सेवा करते नहीं थकती थी, उसे तुमने एक नया रास्ता दिखा दिया। जब तुमने शशांक के माता-पिता को यहाँ भेजा, तो मैं अनिकेत और सिमरन से किस मुँह से बहस करता? किस हक से उन्हें रोकता? तुमने ही तो ये नज़ीर पेश की है। अब मुझे यहीं, अपने समधी-समधिन के साथ अपनी बची हुई ज़िंदगी काटनी होगी।” देवदत्त जी ने कांपते हाथों से अपना चश्मा उतारा और अपने आंसू पोंछे।
तभी शशांक भी वहाँ आ गया। उसने अनिकेत और देवदत्त जी को देखा और पूर्वी को फूट-फूट कर रोते हुए। उसे स्थिति समझने में देर नहीं लगी। पूर्वी ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गई और अपने पिता के पैरों से लिपट गई।
“मुझे माफ़ कर दीजिए पापा… मैं बहुत बड़ी स्वार्थी हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे एक गलत फैसले की सज़ा आपको भुगतनी पड़ेगी। मैं अंधी हो गई थी अपनी सहूलियत में। मैं अभी शशांक के मम्मी-पापा को भी यहाँ से वापस घर ले जा रही हूँ। आप भी मेरे साथ चलिए पापा, मैं अनिकेत भैया के भरोसे आपको नहीं छोडूंगी।” पूर्वी रोते हुए गिड़गिड़ा रही थी।
शशांक ने पूर्वी को कंधे से पकड़कर उठाया और देवदत्त जी की तरफ देखते हुए कहा, “पापाजी, पूर्वी सही कह रही है। हम अपने माता-पिता को यहाँ छोड़कर कभी खुश नहीं रह पाएंगे। ये हमारी सबसे बड़ी भूल थी।”
उस दिन पूर्वी की वो ‘आज़ादी’ और ‘जीत’ की चमक हमेशा के लिए आंसुओं में धुल गई। उसे ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच समझ में आ गया था कि हम जैसा बीज बोते हैं, हमें फल भी वैसा ही काटना पड़ता है। अगर हम दूसरों के लिए स्वार्थ और तिरस्कार की खाई खोदते हैं, तो एक दिन हमारे अपने ही उस खाई में गिरते हैं।
क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता और ‘प्राइवेसी’ के नाम पर आज हम अपने ही रिश्तों की जड़ें खोखली कर रहे हैं? पूर्वी के फैसले और उसके अंजाम पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।
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#बोया पेड़ बबूल का
लेखिका : आर्या विनोद