रिश्तों का सूती धागा

 उस दिन मीरा ने चाय की ट्रे जैसे-तैसे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे वहां से अपने कमरे में चली गई। उसके दिल में एक अजीब सी खटास पैदा हो गई थी। जिस सास के साथ वह अपने दिल की हर बात साझा करती थी, अचानक वह उसे एक अजनबी और स्वार्थी औरत लगने लगी। उस एक वाक्य ने मीरा के सोचने का नजरिया ही बदल दिया।

मीरा की शादी जब अविनाश से हुई, तो उसके मन में ससुराल को लेकर वैसी ही आशंकाएं थीं, जो अमूमन हर नई नवेली दुल्हन के मन में होती हैं। उसने अपनी सहेलियों से सास-बहू के झगड़ों और तानों की अनगिनत कहानियां सुन रखी थीं। लेकिन जब उसने अपने ससुराल की दहलीज पर कदम रखा, तो उसकी सास, सुमित्रा देवी ने उसे एक बहू की तरह नहीं,

बल्कि एक दोस्त की तरह गले लगाया। सुमित्रा देवी एक बेहद सुलझी हुई, शांत और आधुनिक विचारों वाली महिला थीं। उन्होंने घर के माहौल को इतना सहज बना दिया था कि मीरा को कभी लगा ही नहीं कि वह अपना मायका छोड़कर किसी पराए घर में आई है।

घर में दोनों के बीच का रिश्ता ऐसा था जिसे देखकर आस-पड़ोस की औरतें भी रश्क किया करती थीं। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, दोनों सास-बहू एक साथ नजर आती थीं। सुमित्रा देवी जानती थीं कि मीरा को पेंटिंग का शौक है, इसलिए उन्होंने घर के एक छोटे से कमरे को मीरा के स्टूडियो में तब्दील करवा दिया था। जब भी घर में कोई रिश्तेदार आता, सुमित्रा देवी रसोई की जिम्मेदारी खुद ले लेतीं और मीरा को अपने साथ बिठाकर सबसे मिलवातीं।

उनका मानना था कि नई बहू को घर के लोगों के साथ घुलने-मिलने का पूरा मौका मिलना चाहिए। इसी तरह, जब सुमित्रा देवी की किटी पार्टी की सहेलियां घर आतीं, तो मीरा भी अपनी सास को पूरा वक्त देती। वह रसोई में तरह-तरह के पकवान बनाती और अपनी सास को सहेलियों के साथ गपशप करने का पूरा मौका देती। घर का हर कोना इन दोनों की हंसी-ठिठोली से गूंजता रहता था। अविनाश भी अपनी मां और पत्नी के बीच इस अद्भुत तालमेल को देखकर मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद करता था।

सब कुछ किसी खूबसूरत सपने की तरह चल रहा था। लेकिन कहते हैं ना कि जब हवा बहुत शांत हो, तो अक्सर किसी बड़े तूफान के आने का अंदेशा होता है। यह तूफान तब आया जब एक दिन सुमित्रा देवी की बड़ी बहन, यानी अविनाश की मौसी, सरला जी कुछ दिनों के लिए उनके घर रहने आईं। सरला जी स्वभाव से थोड़ी पुरानी सोच की थीं। घर में मेहमान के आने से रौनक और बढ़ गई थी। मीरा हमेशा की तरह रसोई में व्यस्त थी। वह चाहती थी कि मौसी जी को किसी भी तरह की कोई कमी महसूस न हो।

दोपहर का समय था। मीरा रसोई में मौसी जी के लिए उनकी पसंद की इलायची वाली चाय और बेसन के लड्डू तैयार कर रही थी। बाहर हॉल में सुमित्रा देवी और सरला जी अपने पुराने दिनों की यादें ताजा कर रही थीं। चाय की ट्रे तैयार करने के बाद, मीरा जैसे ही हॉल की तरफ बढ़ी, अचानक ठिठक गई। सरला जी की आवाज आ रही थी, “सुमित्रा, तेरी बहू तो बहुत ही गुणी है। आजकल की लड़कियां कहां इतना घर संभाल पाती हैं। लेकिन फिर भी, जो बात अपनी बेटी में होती है, वो बहू में कहां? बेटी तो बेटी ही होती है।”

मीरा वहीं दरवाजे के पीछे रुक गई। वह जानना चाहती थी कि इस पर उसकी सास का क्या जवाब होगा। उसे पूरी उम्मीद थी कि सुमित्रा देवी उसका पक्ष लेंगी और कहेंगी कि मीरा उनके लिए बेटी से कम नहीं है। लेकिन तभी सुमित्रा देवी की आवाज ने मीरा के कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया।

सुमित्रा देवी हंसते हुए कह रही थीं, “तुम बिल्कुल सही कह रही हो दीदी। सच कहूं तो बेटियां रेशम के धागे की तरह होती हैं… और बहुएं सूती धागे की तरह। मैंने भी मीरा के इस घर में आने के बाद ही इस बात को गहराई से महसूस किया है।” इसके बाद दोनों बहनें जोर से हंस पड़ीं।

मीरा के हाथ में पकड़ी हुई चाय की ट्रे कांपने लगी। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। ‘रेशम का धागा और सूती धागा?’ मीरा के मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ। रेशम का धागा यानी कीमती, कोमल, खूबसूरत और अनमोल, जिसे लोग सहेज कर रखते हैं। और सूती धागा? सस्ता, खुरदरा, आम और जिसे हर दिन के रफ इस्तेमाल के लिए रखा जाता है। क्या उसकी सास, जिसे वह अपनी मां से भी बढ़कर मानती थी, उसके बारे में ऐसी सोच रखती है? क्या उसके सारे प्रयास, उसका प्यार, उसका समर्पण सब कुछ सुमित्रा देवी की नजरों में केवल एक ‘सूती धागे’ जितना ही सस्ता था? क्या अब तक जो भी प्यार सुमित्रा देवी ने उसे दिया, वह केवल एक दिखावा था?

उस दिन मीरा ने चाय की ट्रे जैसे-तैसे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे वहां से अपने कमरे में चली गई। उसके दिल में एक अजीब सी खटास पैदा हो गई थी। जिस सास के साथ वह अपने दिल की हर बात साझा करती थी, अचानक वह उसे एक अजनबी और स्वार्थी औरत लगने लगी। उस एक वाक्य ने मीरा के सोचने का नजरिया ही बदल दिया।

अगले दिन से घर का माहौल बदलने लगा। मीरा सुबह उठती, रसोई में जाती, नाश्ता बनाती, लेकिन अब उसके काम में वो पहले जैसी खनक नहीं थी। वह मशीन की तरह काम करने लगी थी। जब सुमित्रा देवी उसे अपने पास टीवी देखने के लिए बुलातीं, तो वह ‘मुझे काम है’ कहकर टाल देती। डाइनिंग टेबल पर जहां पहले सास-बहू की हंसी गूंजती थी, वहां अब एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता था। मीरा सुमित्रा देवी की हर जरूरत का ख्याल तो रखती, समय पर उनकी दवाइयां भी देती, लेकिन अब उस देखभाल में प्यार की जगह केवल कर्तव्य ने ले ली थी। वह केवल खानापूर्ति कर रही थी।

अविनाश ने भी मीरा के इस बदलाव को महसूस किया, लेकिन जब उसने पूछने की कोशिश की तो मीरा ने ‘तबीयत ठीक नहीं है’ कहकर बात टाल दी। सुमित्रा देवी बहुत पारखी नजर वाली महिला थीं। उनसे अपनी बहू की ये खामोशी और बेरुखी ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रह सकी। उन्हें लगा कि शायद सरला जी के किसी ताने या बात का मीरा को बुरा लगा है।

एक हफ्ते बाद जब सरला जी वापस अपने शहर लौट गईं, तब सुमित्रा देवी ने तय किया कि वह इस चुप्पी को तोड़कर ही रहेंगी। शाम का वक्त था। मीरा रसोई में सब्जी काट रही थी। सुमित्रा देवी चुपचाप वहां आईं और मीरा के हाथ से चाकू ले लिया।

“क्या बात है मीरा?” सुमित्रा देवी ने बहुत ही गंभीर लेकिन शांत स्वर में पूछा।

“कुछ नहीं मां जी, बस रात के खाने की तैयारी कर रही हूं,” मीरा ने बिना उनकी तरफ देखे जवाब दिया।

सुमित्रा देवी ने मीरा का कंधा पकड़ा और उसे अपने तरफ घुमाया। “मीरा, मैं तुम्हारी सास बाद में हूं, एक मां पहले हूं। क्या मुझे नहीं दिख रहा कि पिछले एक हफ्ते से तुम मुझसे कटी-कटी सी रह रही हो? मेरे पास बैठने से कतराती हो। मेरी आंखों में नहीं देखती। अगर मैंने कुछ गलत कह दिया है या दीदी की किसी बात का बुरा लगा है, तो मुझे साफ-साफ बताओ। इस तरह घुट-घुट कर जीने से रिश्ते खराब होते हैं।”

मीरा ने अपने आंसुओं को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन सुमित्रा देवी का वो ममता भरा स्पर्श पाते ही उसका बांध टूट गया। वह फफक कर रो पड़ी।

“क्या हुआ मेरी बच्ची? अविनाश ने कुछ कहा है क्या?” सुमित्रा देवी घबरा गईं और उन्होंने मीरा को अपने सीने से लगा लिया।

मीरा ने रोते हुए खुद को थोड़ा अलग किया और भारी आवाज में बोली, “मां जी, जब मौसी जी आई थीं, तब मैंने दरवाजे के बाहर से आप दोनों की बातें सुन ली थीं। आप मौसी जी से कह रही थीं कि बेटियां रेशम के धागे की तरह होती हैं और बहुएं सूती धागे की तरह। और ये बात आपने मेरे इस घर में आने के बाद महसूस की है। मुझे बहुत दुख हुआ मां जी। मैं आपको अपनी सगी मां से भी बढ़कर मानती हूं, लेकिन आपकी नजर में मेरा मोल केवल एक सस्ते सूती धागे जितना है? रेशम की तरह कीमती तो केवल बेटियां ही होती हैं ना?”

सुमित्रा देवी मीरा की बात सुनकर अवाक रह गईं। कुछ पलों के लिए रसोई में एकदम सन्नाटा छा गया। फिर अचानक, सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई जो धीरे-धीरे एक स्नेह भरी हंसी में बदल गई।

मीरा हैरानी से उन्हें देखने लगी। उसे लगा कि शायद उसकी सास अब उसका मजाक उड़ा रही हैं।

“अरी पगली!” सुमित्रा देवी ने मीरा के गालों को थपथपाते हुए कहा, “तू मेरी इतनी समझदार बहू होकर भी इतनी सी बात का इतना गलत मतलब निकाल बैठी? और इस गलतफहमी को एक हफ्ते से अपने दिल में पाले हुए है? अगर तुझे बुरा लगा था तो तूने उसी वक्त आकर मुझसे झगड़ा क्यों नहीं किया? ये चुप्पी क्यों साध ली?”

मीरा अपनी नजरें झुकाए खड़ी रही।

सुमित्रा देवी ने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बिठाया। फिर वह खुद भी उसके सामने बैठ गईं। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक और गहराई थी।

“मीरा, मैंने उस दिन दीदी से जो कहा था, मैं आज भी उस बात पर पूरी तरह कायम हूं। हां, बेटियां रेशम के धागे की तरह ही होती हैं और बहुएं सूती धागे की तरह। लेकिन तूने इस बात का सिर्फ वो मतलब निकाला जो दुनिया निकालती है। तूने वो नहीं समझा जो एक मां का दिल समझता है।”

मीरा अब ध्यान से अपनी सास की तरफ देख रही थी।

सुमित्रा देवी ने समझाना शुरू किया, “देख बेटा, रेशम का धागा बहुत खूबसूरत होता है, चमकदार होता है, कीमती होता है। उसे खास मौकों पर पहना जाता है, और फिर बहुत हिफाजत से अलमारी में सजा कर रख दिया जाता है। बेटियां भी बिल्कुल वैसी ही होती हैं। वे घर की रौनक होती हैं, उन्हें लाड़-प्यार से पाला जाता है, लेकिन एक दिन वे किसी और के घर की अमानत बन जाती हैं। रेशम का धागा बहुत मुलायम होता है, लेकिन सच ये है कि उसमें गांठ नहीं टिकती। वो बहुत जल्दी फिसल जाता है।”

सुमित्रा देवी ने एक गहरी सांस ली और आगे बोलीं, “अब बात करते हैं सूती धागे की। सूती धागा देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन वो हर मौसम में, हर तकलीफ में काम आता है। जब भी कोई कीमती रेशमी कपड़ा फटता है, तो उसे रफू करने के लिए सूती धागे का ही इस्तेमाल किया जाता है। सूती धागा खुद को हर रंग में रंग लेता है, वो जिस कपड़े के साथ जुड़ता है, उसी का रंग अपना लेता है। घर की हर छोटी-बड़ी चीज, हर रिश्ते को मजबूती से बांध कर रखने की ताकत सिर्फ सूती धागे में होती है।”

मीरा की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे, लेकिन अब ये आंसू दुख के नहीं थे।

सुमित्रा देवी ने मीरा के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “मेरी बच्ची, तू वो सूती धागा है जिसने मेरे इस घर के हर रिश्ते को, हर इंसान को मजबूती से बांध कर रखा है। तूने अपना रंग, अपना मायका छोड़कर हमारे परिवार का रंग ऐसे ओढ़ लिया है जैसे तू हमेशा से यहीं की थी। रेशम जैसी बेटियां तो विवाह के बाद मेहमान बनकर आती हैं, लेकिन सूती धागे जैसी बहुएं घर की नींव बन जाती हैं, जो कभी फिसलती नहीं, कभी साथ नहीं छोड़तीं। और सबसे बड़ी बात… सूती धागे में पड़ी गांठ कभी नहीं खुलती। इसलिए मैंने कहा था कि तू मेरे लिए सूती धागे जैसी है, क्योंकि तेरे बिना मेरे इस परिवार का ताना-बाना बिखर जाएगा।”

यह सुनते ही मीरा के भीतर जैसे कोई बर्फ पिघल गई। उसे अपनी नासमझी पर बहुत पछतावा हो रहा था। उसने आगे बढ़कर अपनी सास के दोनों पैर छू लिए और फिर उनके गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी।

“मुझे माफ कर दीजिए मां, मैं कितनी मूर्ख हूं। मैंने आपके इतने गहरे और पवित्र शब्दों का कितना ओछा मतलब निकाल लिया। मेरे मन में जो भी मैल था, वो आज आपके इन आंसुओं के साथ पूरी तरह धुल गया है।”

सुमित्रा देवी ने मीरा की पीठ सहलाते हुए उसके माथे को चूम लिया। “भूल जा जो हुआ। बस एक बात हमेशा याद रखना, हमारे बीच कभी भी कोई सूती या रेशमी धागा नहीं टूटेगा, क्योंकि हमारा रिश्ता विश्वास की डोर से बंधा है।”

उस दिन के बाद से मीरा और सुमित्रा देवी का रिश्ता पहले से भी कहीं अधिक मजबूत और गहरा हो गया था। अब मीरा जान गई थी कि वह केवल एक साधारण धागा नहीं, बल्कि उस घर की सबसे मजबूत कड़ी है।

दोस्तों, क्या आपने भी कभी किसी की बात का गलत मतलब निकालकर अपने किसी करीबी रिश्ते में खटास महसूस की है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर बताएं।

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लेखिका : महक दुआ 

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