सुरेखा भाभी ने आगे कहा, “वही तो! अगर इतना ही प्यार है अपनी माँ से, तो ले क्यों नहीं जाता अपने साथ? वहां जाकर कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा! लेकिन नहीं, वहां तो साहब को अपनी आज़ादी चाहिए। यहाँ हम दिन-रात खटते रहें और नाम उसका होता रहे कि ‘छोटा बेटा बहुत होनहार है’। सच कहूँ ताई, मुझे तो इसके इस दिखावे वाले प्यार से बहुत चिढ़ होती है।”
बनारस की तंग गलियों से गुज़रती हुई एक टैक्सी जब पुराने से दिखने वाले एक पुश्तैनी मकान के सामने रुकी, तो उसमें से समीर बाहर निकला। कंधों पर भारी बैग और आँखों में महीनों बाद अपने घर को देखने की चमक थी। दरवाज़े पर आहट सुनते ही समीर की माँ, सावित्री देवी, अपने घुटनों के दर्द को भूलकर ऐसे दौड़ीं जैसे कोई छोटा बच्चा अपने खिलौने की तरफ भागता है। दरवाज़ा खुलते ही समीर ने अपना बैग ज़मीन पर रखा और सीधा माँ के गले लग गया। माँ की बूढ़ी आँखों से आँसू छलक पड़े और वे समीर का माथा चूमती हुई बोलीं, “आ गया मेरा लाल… कितनी कमज़ोर हो गई है तेरी काया। वहां ठीक से खाता-पीता नहीं है क्या?” समीर ने मुस्कुराते हुए माँ के आँसू पोंछे और कहा, “अरे माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। बस आपकी हाथ की बनी कचौड़ियों की याद आती थी, इसलिए थोड़ा दुबला हो गया हूँ।”
माँ-बेटे का यह भावुक मिलन चल ही रहा था कि तभी दालान से समीर की बड़ी भाभी, सुरेखा, बाहर आईं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी बनावटी मुस्कान थी। “अरे देवर जी, आ गए आप! हमें तो लगा था कि इस बार भी कोई न कोई मीटिंग आ जाएगी और आप अपनी माँ को फोन पर ही दर्शन दे देंगे। बड़े शहर के बड़े लोग, भई आपके पास हमारे जैसे छोटे लोगों के लिए वक़्त कहाँ होता है।” सुरेखा भाभी के इस तंज़ ने पल भर में घर के खुशनुमा माहौल में एक अजीब सी कड़वाहट घोल दी। समीर ने बात को संभालते हुए कहा, “नहीं भाभी, ऐसा नहीं है। काम का थोड़ा दबाव रहता है, लेकिन घर से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं है।” यह कहकर समीर अंदर चला गया, लेकिन उसके मन के किसी कोने में भाभी के वो शब्द चुभ गए थे।
समीर अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। जब बाबूजी का देहांत हुआ, तो घर पर कर्ज़ का बहुत बड़ा पहाड़ टूट पड़ा था। बड़े भाई, दिनेश की कमाई से घर का राशन तो आ जाता था, लेकिन कर्ज़ की किस्तें चुकाना और छोटी बहन की शादी के लिए पैसे जोड़ना असंभव था। समीर चाहता तो बनारस में ही कोई छोटी-मोटी नौकरी करके अपने परिवार के साथ सुकून की ज़िंदगी जी सकता था, लेकिन उसने अपने परिवार को उस दलदल से निकालने के लिए खुद को उस शहर से दूर कर लिया। वह बेंगलुरु चला गया। वहां उसने एक छोटे से कमरे में रहकर, दिन-रात एक करके मेहनत की। अपनी हर ख्वाहिश को मारकर, अपनी तनख्वाह का अस्सी प्रतिशत हिस्सा वह हर महीने घर भेजता था। उसी पैसे से बहन की शादी हुई और बाबूजी का सारा कर्ज़ उतरा। लेकिन इस त्याग की कीमत किसी ने नहीं समझी।
शाम का वक़्त था। समीर अपने कमरे में बैठा कुछ पुरानी किताबें देख रहा था। माँ मंदिर गई हुई थीं और भैया अभी दुकान से नहीं लौटे थे। समीर को प्यास लगी तो वह रसोई की तरफ पानी लेने गया। रसोई के पास वाले छोटे से आँगन में सुरेखा भाभी अपनी पड़ोसन, विमला ताई के साथ बैठकर मटर छील रही थीं। समीर के कदम वहीं रुक गए क्योंकि विमला ताई उसी के बारे में बात कर रही थीं।
विमला ताई कह रही थीं, “सुरेखा, तेरा देवर तो बहुत कमाता है। सुना है कंपनी ने उसे बहुत बड़ा ओहदा दे दिया है। सावित्री जी की तो किस्मत खुल गई, ऐसा बेटा मिला है जो उनका हर सपना पूरा कर रहा है।”
यह सुनते ही सुरेखा भाभी ने मुँह बनाते हुए और मटर के छिलकों को ज़ोर से टोकरी में फेंकते हुए कहा, “अरे काहे की किस्मत विमला ताई! पैसा ही सब कुछ थोड़ी होता है। असली सेवा तो हम कर रहे हैं। रात-बिरात माँ जी की तबीयत खराब होती है तो अस्पताल हम लेकर भागते हैं। इनके पैरों में दर्द होता है तो मालिश हम करते हैं। ये नवाबज़ादा तो बस साल में दस दिन के लिए मेहमान बनकर आता है, अपना हवा-पानी बदलता है और वापस चला जाता है।”
विमला ताई ने भी सुरेखा की बात में हामी भरते हुए आग में घी डालने का काम किया, “बात तो तुम्हारी बिल्कुल सौ आने सच है सुरेखा। दूर रहने वाले बच्चे बस अपना फर्ज़ पैसों से तौलते हैं। उन्हें क्या पता कि बुढ़ापे में माँ-बाप को पैसों से ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है। ये तो बस पैसे भेजकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। सारा बोझ तो पास रहने वालों के कंधों पर ही आता है।”
सुरेखा भाभी ने आगे कहा, “वही तो! अगर इतना ही प्यार है अपनी माँ से, तो ले क्यों नहीं जाता अपने साथ? वहां जाकर कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा! लेकिन नहीं, वहां तो साहब को अपनी आज़ादी चाहिए। यहाँ हम दिन-रात खटते रहें और नाम उसका होता रहे कि ‘छोटा बेटा बहुत होनहार है’। सच कहूँ ताई, मुझे तो इसके इस दिखावे वाले प्यार से बहुत चिढ़ होती है।”
समीर जो दीवार के पीछे खड़ा सब सुन रहा था, उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर उतार दिया हो। वह जिस परिवार की खुशियों के लिए अपनी जवानी, अपने शौक, अपनी नींद और अपना सुकून सब कुछ कुर्बान कर चुका था, उसी परिवार की नज़र में वह एक मतलबी, ज़िम्मेदारी से भागने वाला इंसान बन चुका था। उससे अब और नहीं रुका गया। वह गहरी साँस लेकर आँगन में आ गया।
समीर को अचानक वहां देखकर सुरेखा और विमला ताई दोनों सकपका गईं। सुरेखा के हाथ से मटर दाने छिटक कर ज़मीन पर गिर गए।
समीर ने बहुत ही शांत लेकिन गंभीर आवाज़ में कहा, “प्रणाम विमला ताई… कैसी हैं आप?”
“जी… जी बेटा, मैं ठीक हूँ। तू सुना…” विमला ताई ने नज़रें चुराते हुए कहा।
समीर अपनी भाभी की तरफ पलटा और बोला, “भाभी, एक बात पूछूं आपसे? हमारे इस आँगन में जो नीम का पेड़ लगा है, उसकी जड़ों और उसकी सबसे ऊंची टहनी में क्या फर्क है?”
सुरेखा कुछ समझ नहीं पाई और झिझकते हुए बोली, “यह कैसा बेतुका सवाल है समीर? जड़ें ज़मीन के अंदर रहती हैं और टहनी हवा में ऊपर रहती है। इसमें क्या फर्क बताना?”
समीर की आँखों में एक अजीब सी नमी थी, उसने कहा, “फर्क है भाभी। जड़ें ज़मीन में छुपकर सुरक्षित रहती हैं, उन्हें धूप नहीं लगती, उन्हें आंधी का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन जो टहनी सबसे ऊपर होती है, वो तेज़ धूप, बारिश और तूफ़ान के थपेड़े सहती है। वो टहनी ऊपर इसलिए जाती है ताकि वो पूरे पेड़ के लिए सूरज की रौशनी बटोर सके। लेकिन जब नीचे बैठे लोगों को वो टहनी दूर दिखती है, तो क्या वो पेड़ का हिस्सा नहीं होती? क्या टहनी का दर्द पेड़ की जड़ों से अलग होता है?”
सुरेखा खामोश रही। समीर ने अपनी बात जारी रखी, “भाभी, आपने कैसे सोच लिया कि जो दूर रहता है, वो अपनों से भी दूर हो गया है? आपको लगता है कि मैं सिर्फ पैसे भेजकर अपना पल्ला झाड़ लेता हूँ। लेकिन क्या आप जानती हैं कि जब यहाँ माँ को बुखार होता है और भैया मुझे फोन पर बताते हैं, तो मैं हज़ारों किलोमीटर दूर उस छोटे से कमरे में रात भर सो नहीं पाता? मैं वहां बिस्तर पर करवटें बदलता रहता हूँ और मन करता है कि उड़कर यहाँ आ जाऊं। जब आप लोग दीवाली पर घर में दीये जलाते हैं, तब मैं अपनी कंपनी में ओवरटाइम कर रहा होता हूँ ताकि भैया को अपनी दुकान के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।”
विमला ताई अब चुपचाप अपना पल्लू ठीक कर रही थीं, उनका सिर नीचे झुका हुआ था।
समीर का गला रुंध गया था, लेकिन उसने खुद को संभाला और कहा, “मैं भी चाहता था भाभी कि मैं इसी घर में रहूँ। मुझे भी अपनी भतीजी के साथ खेलना अच्छा लगता है। वो मेरी भी गुड़िया है। मुझे भी माँ के हाथ का रोज़ गरम खाना खाना था। लेकिन अगर मैं यहाँ रुक जाता, तो क्या बाबूजी का कर्ज़ कभी उतर पाता? क्या बहन की शादी उस धूमधाम से हो पाती? मैं अपने शौक पूरे करने के लिए घर से नहीं निकला था भाभी, मैं इस घर की नींव को मज़बूत करने के लिए अपनी जड़ों से दूर हुआ था। और आप कहती हैं कि मैं माँ को साथ क्यों नहीं ले जाता? मैंने सौ बार माँ से कहा है, लेकिन उनका मन इस घर, इस आँगन और बाबूजी की यादों में बसा है। मैं उन्हें ज़बरदस्ती उस कंक्रीट के जंगल में ले जाकर पिंजरे में नहीं कैद करना चाहता।”
सुरेखा की आँखें अब तक भर आई थीं। उसे अपनी बातों पर पछतावा होने लगा था।
समीर ने हाथ जोड़ लिए और कहा, “भाभी, पास रहने वाले सच में बहुत महान होते हैं। आप और भैया जो सेवा करते हैं, मैं जीवन भर उसका कर्ज़ नहीं चुका सकता। आप लोग इस घर के असली हीरो हैं। लेकिन आपसे बस इतनी विनती है, प्लीज़ दूर रहने वाले बच्चों को हमेशा विलेन मत बनाइए। हमारा भी दिल रोता है। हम भी अपनों की याद में अकेले बैठकर आंसू बहाते हैं। हमारा संघर्ष आपको दिखता नहीं, इसका मतलब यह नहीं कि हम स्वार्थी हैं। मैं पैसे किसी पर अहसान करने के लिए नहीं भेजता, वो मेरी ज़िम्मेदारी है, मेरा प्यार है, जो मैं मीलों दूर बैठकर इस घर के लिए महसूस करता हूँ।”
आँगन में एकदम सन्नाटा छा गया था। विमला ताई बिना कुछ कहे वहां से खिसक गईं। सुरेखा भाभी अपनी जगह से उठीं और रोते हुए उन्होंने समीर के दोनों हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ़ कर दे छोटे… मैं सच में कुछ नहीं समझ पाई। मुझे सिर्फ अपनी मेहनत दिखती थी, लेकिन तेरी वो खामोश तपस्या मैंने कभी नहीं देखी। तू विलेन नहीं है बेटा, तू तो इस घर की वो टहनी है जिसने हम सबको कड़ी धूप से बचा कर रखा है।”
समीर ने मुस्कुराकर अपनी भाभी को गले से लगा लिया। दूरियां जो अब तक केवल मीलों की थीं, आज दिलों से भी मिट गई थीं। नीम के पेड़ से छनकर आती हुई शाम की धूप आज आँगन में कुछ ज़्यादा ही सुकून दे रही थी।
दोस्तों, यह कहानी हर उस इंसान की है जो अपने परिवार के बेहतर कल के लिए आज उनसे दूर बैठा है। दूर रहने वाला हर व्यक्ति मतलबी नहीं होता, उसकी भी कुछ मजबूरियां होती हैं। आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपने भी कभी घर से दूर रहकर इस अकेलेपन और गलतफहमियों का सामना किया है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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लेखिका : गरिमा चौधरी