औरत का दिल

थोड़ी सी शर्म कर! तू एक जानवर से भी बदतर है। जिस बाप ने तुझे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, आज जब उसे तेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तो तूने उसे मरने के लिए छोड़ दिया। और जिस औरत पर तू ये हाथ उठा रहा है, आज उसी की वजह से तेरे पिता की सांसें चल रही हैं।”

शर्मा अंकल की पत्नी ने आगे बढ़कर सुधा को अपने गले से लगा लिया और अपने पल्लू से उसका खून पोंछने लगीं। वे रोते हुए बोलीं, “तुझे अंदाजा भी है इस बच्ची ने क्या किया है? जब तू ताश के पत्तों में अपनी ज़िंदगी हार रहा था, तब ये बच्ची दर-दर भटक रही थी। इसने न सिर्फ अपने गहने बेच दिए, बल्कि दिन-रात अस्पताल में बिना सोए तेरे बाप की सेवा की है। आज दीनानाथ जी का ऑपरेशन सफल हो गया है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर ये बेटी ना होती, तो आज तेरा बाप ज़िंदा ना होता।”

“बताती है या आज तेरी जान ले लूँ? कहाँ छुपाए हैं वो ज़ेवर? किस यार को देकर आई है तू मेरी तिजोरी की चाबी?” सुरेश की आवाज़ में शराब का नशा और हारने की बौखलाहट साफ़ झलक रही थी। उसकी आँखें लाल अंगारे जैसी हो रही थीं और उसके हाथ में एक मोटा चमड़े का बेल्ट था।

सुधा ज़मीन पर बैठी थी। उसके माथे से खून की एक पतली धार रिस कर उसके गालों तक आ गई थी। उसके होंठ सूख चुके थे, लेकिन उसकी आँखों में कोई खौफ नहीं था। वहाँ सिर्फ एक गहरी शून्यता थी। शादी के इन सात सालों में उसने सुरेश के हर जुल्म को सहा था। जब वो ब्याह कर इस घर में आई थी, तो उसने भी एक आम लड़की की तरह ढेरों सपने देखे थे। लेकिन सुरेश की जुए और शराब की लत ने उन सारे सपनों को बहुत जल्दी राख कर दिया। अगर इस घर में सुधा को किसी ने बेटी का प्यार दिया था, तो वो थे उसके ससुर, दीनानाथ जी। दीनानाथ जी एक रिटायर्ड हेडमास्टर थे, जो उसूलों और संस्कारों की जीती-जागती मूरत थे। उन्होंने हमेशा सुधा को अपनी सगी बेटी से बढ़कर माना। जब भी सुरेश शराब पीकर सुधा पर हाथ उठाता, दीनानाथ जी अपनी लाठी लेकर सुधा के सामने ढाल बनकर खड़े हो जाते।

लेकिन पिछले छह महीनों से दीनानाथ जी बिस्तर पर थे। उन्हें दिल की एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया था। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि अगर जल्द ही उनका ऑपरेशन नहीं हुआ, तो उनका बचना नामुमकिन है। इसके लिए करीब पांच लाख रुपये की ज़रूरत थी। सुधा ने सुरेश के आगे हाथ जोड़े, उसके पैरों में गिरी कि वो अपने पिता के इलाज के लिए कुछ इंतज़ाम करे। लेकिन जुए की लत में डूबा इंसान भला किसी का दर्द क्या समझेगा? सुरेश ने घर की रही-सही बचत भी ताश के पत्तों पर उड़ा दी थी। उलटा वो दीनानाथ जी की बीमारी को एक बोझ समझने लगा था।

आज जब सुरेश अपना सब कुछ जुए में हार कर लौटा, तो उसे याद आया कि उसकी माँ के कुछ पुश्तैनी गहने तिजोरी में रखे हैं। वो उसी नीयत से तिजोरी की तरफ लपका, लेकिन तिजोरी खाली थी। वहाँ न तो वो भारी सोने का हार था और न ही वो पुश्तैनी कंगन। इसके बाद कमरे में जो तांडव शुरू हुआ, वो रुकने का नाम नहीं ले रहा था।

“तू सोचती है कि तू चुप रहेगी और मैं तुझे छोड़ दूँगा? आज या तो तू सच उगल देगी या फिर तेरी लाश इस घर से बाहर जाएगी!” सुरेश ने बेल्ट को हवा में लहराते हुए सुधा की पीठ पर एक और वार किया।

सुधा की आँखों से एक आंसू तक नहीं गिरा। उसने बहुत ही शांत, लेकिन चुभने वाली आवाज़ में कहा, “मार लो सुरेश… आज जितना मारना है मार लो। क्योंकि आज के बाद शायद तुम्हें मुझ पर हाथ उठाने का कोई बहाना ना मिले। तुम्हें लगता है कि मैंने वो गहने किसी और को दे दिए? हाँ, दे दिए मैंने! और मुझे इसका कोई पछतावा नहीं है।”

सुधा की ये बात सुनते ही सुरेश का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। “तू इतनी बेशर्म हो गई है? मेरे ही घर में रहकर, मेरा ही नमक खाकर मेरे साथ गद्दारी? कौन है वो, नाम बता उसका!” उसने सुधा के बाल पकड़ कर उसे झकझोरते हुए कहा।

“हाँ… गद्दार हूँ मैं। क्योंकि मैंने एक ऐसे इंसान को अपनी ज़िंदगी मान लिया था, जिसे रिश्तों की कोई कद्र नहीं। तुम जानना चाहते हो ना कि वो गहने कहाँ गए? वो गहने उस इंसान के पास गए हैं, जिसने मुझे इस घर में कभी पराया महसूस नहीं होने दिया। जिसने मेरे सम्मान के लिए अपने ही सगे बेटे से दुश्मनी मोल ले ली। उस इंसान के पास, जो आज अस्पताल के बिस्तर पर मौत से लड़ रहा है!” सुधा की आवाज़ में अब एक ऐसी दहाड़ थी, जिसने पल भर के लिए सुरेश को भी सन्न कर दिया।

सुधा हांफ रही थी, लेकिन आज वो रुकना नहीं चाहती थी। “तुम तो भूल गए थे ना कि तुम्हारे एक पिता भी हैं? जब वो दर्द से तड़पते थे, तब तुम शराब के ठेके पर पड़े रहते थे। डॉक्टर ने कहा था कि बिना पैसों के वो इलाज नहीं करेंगे। मैं क्या करती? मैं उन्हें तुम्हारी तरह घुट-घुट कर मरते हुए नहीं देख सकती थी। हाँ, मैंने बेच दिए वो सारे गहने। वो तुम्हारी माँ के थे, लेकिन उन्हें तुम्हारे पिता की जान बचाने के लिए इस्तेमाल करने का हक़ मुझे दीनानाथ जी की उस बेटी ने दिया है, जिसे तुमने कभी अपनी पत्नी नहीं माना।”

सुरेश कुछ समझ पाता या कुछ बोल पाता, तभी दरवाज़े पर एक ज़ोरदार खटखटाहट हुई। दरवाज़ा खुला तो सामने पड़ोस में रहने वाले रिटायर्ड फौजी, शर्मा अंकल और उनकी पत्नी खड़ी थीं। उनके पीछे अस्पताल का एक वॉर्ड बॉय भी था। शर्मा अंकल का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था।

वे तेज़ी से कमरे के भीतर आए और सुरेश को धक्का देते हुए बोले, “शर्म कर सुरेश, थोड़ी सी शर्म कर! तू एक जानवर से भी बदतर है। जिस बाप ने तुझे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, आज जब उसे तेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तो तूने उसे मरने के लिए छोड़ दिया। और जिस औरत पर तू ये हाथ उठा रहा है, आज उसी की वजह से तेरे पिता की सांसें चल रही हैं।”

शर्मा अंकल की पत्नी ने आगे बढ़कर सुधा को अपने गले से लगा लिया और अपने पल्लू से उसका खून पोंछने लगीं। वे रोते हुए बोलीं, “तुझे अंदाजा भी है इस बच्ची ने क्या किया है? जब तू ताश के पत्तों में अपनी ज़िंदगी हार रहा था, तब ये बच्ची दर-दर भटक रही थी। इसने न सिर्फ अपने गहने बेच दिए, बल्कि दिन-रात अस्पताल में बिना सोए तेरे बाप की सेवा की है। आज दीनानाथ जी का ऑपरेशन सफल हो गया है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर ये बेटी ना होती, तो आज तेरा बाप ज़िंदा ना होता।”

वॉर्ड बॉय ने आगे आकर कुछ कागज़ात सुरेश के मुंह पर मारते हुए कहा, “ये रहे अस्पताल के बिल और डिस्चार्ज के पेपर। बाबूजी होश में आ गए हैं। और होश में आते ही उन्होंने सबसे पहले अपनी इसी बेटी को याद किया है।”

कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। बाहर की बारिश की आवाज़ अब और भी तेज़ लग रही थी। सुरेश के हाथ से वो बेल्ट छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसका नशा जैसे एक झटके में उतर गया था। उसकी आँखों के सामने अपने पिता का वो चेहरा घूमने लगा, जब वो बचपन में उसे अपने कंधों पर बिठाकर मेला घुमाने ले जाते थे। उसे याद आया कि कैसे उसकी माँ के मरने के बाद दीनानाथ जी ने अकेले उसे पाल-पोस कर बड़ा किया था। और आज, उसी पिता को उसने मरने के लिए छोड़ दिया था।

उसे सुधा का वो चेहरा याद आया, जब वो लाल जोड़े में सजी, ढेरों उम्मीदें लेकर इस घर में आई थी। उसने क्या दिया था उसे? सिर्फ आंसू, ताने और मार। और बदले में उस लड़की ने क्या किया? उसने अपना सब कुछ लुटाकर उसके पिता की जान बचा ली।

सुरेश की टांगें कांपने लगीं। वो धीरे-धीरे घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा था। ये आंसू गुस्से या हार के नहीं थे, बल्कि उस शर्मिंदगी और पश्चाताप के थे, जिसकी आग में वो अब ज़िंदगी भर जलने वाला था। उसने कांपते हुए हाथों से सुधा के पैर पकड़ लिए और फफक-फफक कर रोने लगा।

“मुझे माफ़ कर दे सुधा… मैं सच में एक जानवर हूँ। मैं बेटा कहलाने के लायक नहीं हूँ। तूने आज सिर्फ मेरे पिता की जान नहीं बचाई है, तूने मुझे भी एक बहुत गहरी नींद से जगा दिया है। मैं अपनी सारी गलतियों की सज़ा भुगतने को तैयार हूँ, बस मुझे एक बार बाबूजी से माफ़ी मांगने का मौका दे दे।” सुरेश का सिर सुधा के पैरों पर रखा था और उसकी हिचकियां बंध गई थीं।

सुधा ने अपने पैर पीछे नहीं खींचे। वो बस उसे देखती रही। एक औरत का दिल बहुत विशाल होता है, लेकिन जब उस पर लगी चोट बहुत गहरी हो, तो उसे भरने में वक़्त लगता है। शर्मा अंकल और उनकी पत्नी भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो गए थे। शर्मा अंकल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “बेटा होने का फर्ज़ तो तूने नहीं निभाया सुरेश, लेकिन इस घर की बहू ने एक सच्ची बेटी होने का जो फर्ज़ निभाया है, उसे ये समाज और तेरा परिवार कभी नहीं भूल पाएगा।”

उस रात बारिश बहुत देर तक होती रही, लेकिन उस पुरानी हवेली के अंदर का तूफ़ान शांत हो चुका था। अहंकार, नशे और गैर-ज़िम्मेदारी की दीवारें ढह चुकी थीं, और उनके मलबे से एक नए रिश्ते और एक नए एहसास का जन्म हो रहा था।

क्या आपको इस कहानी को पढ़ते हुए अपने आस-पास के किसी रिश्ते की याद आई? आपके विचार में क्या सुधा का कदम सही था? कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : रमा शुक्ला

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