लोगों की आँखों में आँसू आ गए थे। एक दोस्त गुस्से में बोल पड़ा, “लानत है ऐसे बेटे पर! ऐसे इंसान को तो सरेआम सजा मिलनी चाहिए। कौन था वो नरपिशाच?”
माधव ने एक गहरी साँस ली। उसकी नज़रें सीधे सुशांत पर जाकर टिक गईं। सुशांत, जो अब तक बड़े आराम से खड़ा था, अचानक असहज महसूस करने लगा। उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगीं।
“वो बेटा कोई अनपढ़ या गरीब इंसान नहीं है दोस्तों,” माधव की आवाज़ अब कठोर हो चुकी थी। “वो बहुत पढ़ा-लिखा है, बड़ी कंपनी में काम करता है, और बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमता है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि वो बेटा आज इसी हॉल में हमारे बीच मौजूद है,
सर्दियों की एक खूबसूरत शाम थी। शहर के सबसे प्रतिष्ठित इलाके में स्थित एक शानदार फार्महाउस में रोशनी और संगीत का अद्भुत संगम हो रहा था। यह पार्टी शहर के जाने-माने डॉक्टर, माधव ने अपने पुराने कॉलेज के दोस्तों के लिए आयोजित की थी। सालों बाद सभी दोस्त एक साथ मिल रहे थे, इसलिए उत्साह का माहौल था। कोई अपने बिजनेस की सफलता की कहानियाँ सुना रहा था, तो कोई अपने बच्चों की उपलब्धियों पर गर्व कर रहा था। इसी बीच, महफ़िल का ध्यान फार्महाउस के मुख्य द्वार की तरफ गया, जहाँ से एक चमचमाती मर्सिडीज कार आकर रुकी। कार से शहर का मशहूर कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव और माधव का पुराना दोस्त, सुशांत अपनी पत्नी मालविका के साथ उतरा।
सुशांत हमेशा से ही अपने दिखावे और शानौ-शौकत के लिए जाना जाता था। उसके कपड़े, उसकी घड़ी, यहाँ तक कि उसके बात करने का अंदाज भी चीख-चीख कर उसकी अमीरी का बखान कर रहा था। जैसे ही सुशांत अंदर आया, दोस्तों का झुंड उसके चारों तरफ इकट्ठा हो गया। हर कोई उसकी तरक्की की दाद दे रहा था।
गले मिलने और पुरानी यादें ताज़ा करने के बाद, बातों का सिलसिला परिवारों तक पहुँच गया। किसी ने पूछा, “यार सुशांत, तेरी नई कंपनी का टर्नओवर तो आसमान छू रहा है। लेकिन आज तू आंटी जी (सुशांत की माँ) को साथ नहीं लाया? पिछली बार जब हम कॉलेज के दिनों में तेरे घर जाते थे, तो उनके हाथ के बने राजमा-चावल खाए बिना कोई वापस नहीं लौटता था। बाबूजी के गुजर जाने के बाद तो वो बिलकुल अकेली हो गई होंगी।”
सुशांत के चेहरे पर एक पल के लिए अजीब से भाव आए, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभालते हुए एक गहरी सांस ली और अपने चेहरे पर एक आदर्श बेटे वाला उदास लेकिन गर्वित भाव ले आया।
“क्या बताऊँ यार,” सुशांत ने एक हल्की सी आह भरते हुए कहा, “माँ की उम्र अब काफी हो गई है। इस शहर का प्रदूषण और शोर-शराबा उनके स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल ठीक नहीं था। उन्हें अस्थमा की भी शिकायत रहने लगी थी। इसलिए मैंने फैसला किया कि उनके लिए कुछ ऐसा करूँ जो उन्हें मानसिक और शारीरिक शांति दे।”
सुशांत ने अपनी बात को और भी प्रभावशाली बनाते हुए कहा, “मैंने उन्हें केरल के एक बेहद महँगे और प्रीमियम ‘नेचर एंड वेलनेस रिसॉर्ट’ में भेज दिया है। वो कोई आम जगह नहीं है, बल्कि वहाँ 24 घंटे मेडिकल स्टाफ, सात्विक भोजन और प्राकृतिक चिकित्सा की सुविधा है। उनका पूरा एक साल का पैकेज लिया है मैंने। सच कहूँ तो लाखों रुपये खर्च हो गए, लेकिन यार, माँ-बाप से बढ़कर पैसा तो नहीं होता न? आखिर उन्होंने हमें पालने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, अब बुढ़ापे में उन्हें रानी बनाकर रखना मेरा फर्ज है।”
सुशांत की यह बात सुनकर वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखों में उसके लिए सम्मान की चमक आ गई। एक दोस्त ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “वाह मेरे भाई! आज के ज़माने में जहाँ लोग अपने माँ-बाप को बोझ समझते हैं, तूने तो श्रवण कुमार वाली मिसाल कायम कर दी।” मालविका भी गर्व से मुस्कुरा रही थी। सुशांत को लग रहा था जैसे उसने महफ़िल लूट ली हो।
पार्टी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी। अचानक, डीजे का संगीत धीमा हो गया और स्टेज पर लगी लाइटें जल उठीं। डॉक्टर माधव हाथ में माइक लिए स्टेज पर आ गए। उनके चेहरे पर एक गंभीर लेकिन शांत मुस्कान थी। पूरा हॉल शांत हो गया।
“दोस्तों,” माधव ने बोलना शुरू किया, “आज की यह शाम सिर्फ हमारे पुनर्मिलन के लिए नहीं है। मैंने आप सबको यहाँ एक खास मकसद से बुलाया है। जैसा कि आप जानते हैं, मैं पिछले कई सालों से चिकित्सा के क्षेत्र में हूँ, लेकिन पिछले महीने मैंने और मेरी टीम ने एक नई शुरुआत की है। हमने बेसहारा और अपनों द्वारा ठुकराए गए बुजुर्गों के लिए ‘आसरा’ नाम से एक वृद्धाश्रम और पुनर्वास केंद्र शुरू किया है।”
हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। सुशांत ने भी सबसे तेज़ तालियाँ बजाईं।
माधव ने हाथ के इशारे से सबको शांत किया और आगे कहा, “इन तालियों का हक़दार मैं नहीं हूँ। जब हम इस संस्था के लिए काम करने सड़कों पर निकले, तो हमने ऐसे-ऐसे दर्दनाक मंज़र देखे कि इंसानियत से भरोसा उठ जाए। लोग अपने उन माता-पिता को सड़कों पर, रेलवे स्टेशनों पर और मंदिरों की सीढ़ियों पर मरने के लिए छोड़ जाते हैं, जिन्होंने उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था।”
माधव की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई थी। “मैं आज आपको किसी और की नहीं, बल्कि अपने ही आश्रम में आई एक ऐसी माँ की कहानी सुनाना चाहता हूँ, जिसे देखकर मेरा दिल रो पड़ा। करीब बीस दिन पहले, कड़कड़ाती ठंड में, शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक बस स्टैंड के पास एक बुजुर्ग महिला हमें बेसुध हालत में मिली। वो तीन दिन से भूखी थीं। उनके शरीर पर ढंग के गर्म कपड़े तक नहीं थे और वो तेज़ बुखार में तप रही थीं। जब हमने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया और उन्हें होश आया, तो जानते हैं उनके हाथ में क्या था?”
पूरी महफ़िल में पिन-ड्रॉप साइलेंस था। हर कोई साँस रोके माधव की बात सुन रहा था।
“उनके हाथ में उनके बेटे की एक पुरानी तस्वीर थी,” माधव ने नम आँखों से कहा। “जब मैंने उनसे पूछा कि उनके साथ ऐसा किसने किया, तो वो रोने लगीं। उन्होंने बताया कि उनके बेटे ने एक दिन उन्हें यह कहकर गाड़ी में बिठाया कि वो उन्हें किसी रिश्तेदार के यहाँ ले जा रहा है, और फिर रास्ते में एक सुनसान जगह पर उन्हें यह कहकर उतार दिया कि वो अभी पाँच मिनट में कुछ लेकर आ रहा है। वो बेटा कभी नहीं लौटा। वो माँ तीन दिन तक उसी जगह खड़ी अपने लाडले का इंतज़ार करती रही कि शायद वो रास्ता भूल गया होगा।”
लोगों की आँखों में आँसू आ गए थे। एक दोस्त गुस्से में बोल पड़ा, “लानत है ऐसे बेटे पर! ऐसे इंसान को तो सरेआम सजा मिलनी चाहिए। कौन था वो नरपिशाच?”
माधव ने एक गहरी साँस ली। उसकी नज़रें सीधे सुशांत पर जाकर टिक गईं। सुशांत, जो अब तक बड़े आराम से खड़ा था, अचानक असहज महसूस करने लगा। उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगीं।
“वो बेटा कोई अनपढ़ या गरीब इंसान नहीं है दोस्तों,” माधव की आवाज़ अब कठोर हो चुकी थी। “वो बहुत पढ़ा-लिखा है, बड़ी कंपनी में काम करता है, और बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमता है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि वो बेटा आज इसी हॉल में हमारे बीच मौजूद है, और कुछ ही देर पहले अपनी माँ को केरल के किसी महँगे रिसॉर्ट में भेजने की डींगें हाँक रहा था।”
सुशांत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मालविका का चेहरा सफेद पड़ गया। हॉल में मौजूद सभी लोगों की नज़रें सुशांत पर घूम गईं। लोगों के चेहरों पर जो प्रशंसा कुछ देर पहले थी, वो अब घोर आश्चर्य और घृणा में बदल चुकी थी।
“ये तुम क्या बकवास कर रहे हो माधव?” सुशांत हड़बड़ाते हुए चिल्लाया। “तुम मेरी इज्ज़त उछालने के लिए ये झूठी कहानी गढ़ रहे हो!”
माधव ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस स्टेज के पीछे की तरफ इशारा किया। दो नर्सें एक व्हीलचेयर को धकेलते हुए स्टेज पर ले आईं। व्हीलचेयर पर एक कमज़ोर, सफेद बालों वाली बुजुर्ग महिला बैठी थीं। उनके चेहरे पर झुर्रियों का जाल था और आँखों में एक अजीब सी शून्यता थी।
यह कोई और नहीं, सुशांत की माँ, सुमित्रा देवी थीं।
जैसे ही सुशांत ने अपनी माँ को उस हालत में देखा, उसके मुँह से आवाज़ निकलनी बंद हो गई। वो मूर्ति की तरह अपनी जगह पर जड़ हो गया। जो दोस्त कुछ देर पहले सुशांत को गले लगा रहे थे, वो अब उससे ऐसे दूर हट गए जैसे उसे कोई छूत की बीमारी हो।
पूरे हॉल में एक भयानक सन्नाटा छा गया। सिर्फ सुमित्रा देवी के धीमे-धीमे रोने की आवाज़ आ रही थी। माधव ने उनके पास जाकर बड़े प्यार से उनके कंधे पर हाथ रखा और माइक उनके करीब किया। हर किसी को लगा कि अब वो माँ अपने उस कलयुगी बेटे को जी भरकर कोसेगी, उसकी असलियत पूरी दुनिया के सामने चीख-चीख कर बताएगी।
लेकिन माँ तो आख़िर माँ होती है। सुमित्रा देवी ने कांपते हाथों से माधव का सिर सहलाया और टूटी हुई आवाज़ में सिर्फ इतना कहा, “बेटा माधव, तूने मुझे नया जीवन दिया है, भगवान तुझे हमेशा सुखी रखे। मेरे सुशांत को कुछ मत कहना, वो नासमझ है। बस उसे मेरी तरफ से आशीर्वाद दे देना।” इतना कहकर उन्होंने अपना चेहरा साड़ी के पल्लू से ढँक लिया।
सुमित्रा देवी के इन शब्दों ने जैसे सुशांत के अस्तित्व को ही चीर कर रख दिया। वो माँ, जिसे उसने कचरे की तरह सड़क पर फेंक दिया था, भरे समाज में ज़लील होने के बावजूद भी अपने बेटे के लिए कोई बददुआ नहीं निकाल पाई।
सुशांत की सारी शान, उसका सारा रुतबा, उसका वो महँगा सूट और मर्सिडीज कार—सब कुछ उस एक पल में मिट्टी में मिल गया। वो लोगों से नज़रें नहीं मिला पा रहा था। जो महफ़िल थोड़ी देर पहले उसकी कामयाबी के कसीदे पढ़ रही थी, वही महफ़िल अब उस पर थू-थू कर रही थी। कई दोस्तों ने तो खुलेआम उसे गालियाँ देनी शुरू कर दीं।
“शर्म आनी चाहिए तुझे सुशांत!” विकास नाम के एक दोस्त ने चीखते हुए कहा। “तूने अपनी उस माँ के साथ ऐसा किया जिसने तुझे पढ़ा-लिखा कर इस काबिल बनाया? केरल का वेलनेस रिसॉर्ट? तू तो नरक में जाने लायक भी नहीं है!”
मालविका भी शर्म के मारे अपना मुँह छिपाकर हॉल से बाहर भाग गई। सुशांत वहीं घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। वह कुछ बोलना चाहता था, माफ़ी माँगना चाहता था, लेकिन उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसे एहसास हो गया था कि दिखावे की इस दुनिया में उसने अपनी सबसे कीमती चीज़, अपनी माँ को हमेशा के लिए खो दिया है। और साथ ही खो दी है अपनी वो झूठी इज़्ज़त, जिसका मुखौटा वो सालों से पहने हुए था।
आज उस शानदार फार्महाउस में सुशांत के पास दौलत तो बहुत थी, लेकिन वो इस दुनिया का सबसे गरीब इंसान बन चुका था।
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल