निहारिका को देखते ही वह अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और एक सौम्य मुस्कान के साथ बोला, “हेलो निहारिका, मैं शशांक। आपसे मिलकर अच्छा लगा।”
निहारिका ने हाथ मिलाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। वह कुर्सी खींचकर बैठी और अपने महंगे गॉगल्स टेबल पर पटकते हुए बोली, “देखिए शशांक, मैं यहाँ सिर्फ अपनी माँ की जिद की वजह से आई हूँ। मैं सीधी बात करने में यकीन रखती हूँ। आप और मैं, दो अलग-अलग दुनिया के लोग हैं।”
दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी ने शाम के छह बजने का इशारा किया। सुमित्रा जी के हाथों में चाय का प्याला था और आँखों में एक गहरी चिंता। सामने सोफे पर उनके पति, देवनाथ जी, अखबार के पन्ने पलट रहे थे, लेकिन उनका ध्यान भी अक्षरों पर नहीं था। दोनों की चिंता का एक ही कारण था—उनकी इकलौती बेटी निहारिका। निहारिका, जो शहर की एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट थी। खूबसूरती ऐसी कि देखने वाला बस देखता रह जाए, और दिमाग इतना तेज़ कि किसी भी मीटिंग में अपनी बातों से सबको चुप करा दे। लेकिन इन सब खूबियों के साथ निहारिका के भीतर एक ऐसी खामी भी पल रही थी, जिसने उसके माता-पिता की रातों की नींद उड़ा दी थी, और वह खामी थी—उसका बेतहाशा अहंकार।
निहारिका को अपनी सुंदरता, अपनी सफलता और अपने रुतबे पर इतना घमंड था कि उसे अपने आगे हर इंसान छोटा और मामूली लगता था। अठाईस साल की उम्र पार कर चुकी निहारिका के लिए अब तक दर्जनों रिश्ते आ चुके थे, लेकिन हर बार वह कोई न कोई ऐसी कमी निकाल देती, जिसे सुनकर सुमित्रा जी अपना सिर पकड़ लेतीं। किसी का बैंक बैलेंस उसकी उम्मीदों से कम होता, तो किसी के कपड़े पहनने का सलीका उसे ‘आउटडेटेड’ लगता। किसी की अंग्रेजी में उसे ‘देसीपन’ झलकता, तो किसी की शक्ल सूरत उसके ‘स्टैंडर्ड’ से मेल नहीं खाती।
उस शाम सुमित्रा जी ने हिम्मत जुटाकर निहारिका के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। निहारिका अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी। सुमित्रा जी ने एक तस्वीर उसकी टेबल पर रखते हुए कहा, “निहारिका बेटा, तुम्हारे मामा जी ने यह रिश्ता भेजा है। लड़का बहुत सुलझा हुआ है। अपना खुद का आर्किटेक्चर का काम है। परिवार भी बहुत संस्कारी है। एक बार फोटो तो देख ले।”
निहारिका ने बिना कोई दिलचस्पी दिखाए तस्वीर की तरफ एक सरसरी निगाह डाली। तस्वीर में एक साधारण सा दिखने वाला युवक था, जिसने एक हल्की नीली रंग की सूती शर्ट पहन रखी थी। चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी, लेकिन निहारिका की पारखी आँखों ने तुरंत उसका मूल्यांकन कर लिया। “मम्मा, प्लीज! आप लोग कभी मेरे लेवल का लड़का क्यों नहीं ढूंढते? इसकी शर्ट देखिए, ऐसा लग रहा है जैसे किसी सेल से खरीदी हो। बाल भी कितने अजीब ढंग से संवारे हैं। मुझे इसके साथ किसी पार्टी में जाना पड़ा, तो मेरे दोस्त क्या कहेंगे? मेरे स्टेटस का भी तो कोई खयाल कीजिए।”
सुमित्रा जी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “बेटा, इंसान की पहचान उसके कपड़ों से नहीं, उसके संस्कारों और उसकी काबलियत से होती है। लड़का बहुत होनहार है। मामा जी कह रहे थे कि वह अपने काम में बहुत नाम कमा रहा है। तुम बस एक बार मिल लो। अगर पसंद न आए, तो मना कर देना। मेरी खातिर, बस एक बार।”
माँ की मिन्नतों के आगे निहारिका को झुकना पड़ा, लेकिन उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह इस लड़के को ऐसा सबक सिखाएगी कि वह खुद ही रिश्ता वापस ले लेगा। रविवार की दोपहर, शहर के सबसे महंगे और आलीशान कैफे में मिलने का समय तय हुआ। निहारिका जानबूझकर अपने सबसे महंगे डिज़ाइनर कपड़े पहनकर और शानदार मेकअप करके वहाँ पहुँची, ताकि वह सामने वाले को उसकी ‘औकात’ का अहसास करा सके।
कैफे में जब वह अपनी टेबल की तरफ बढ़ी, तो उसने देखा कि वही लड़का, जिसका नाम शशांक था, पहले से वहाँ बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था। शशांक ने आज भी एक साधारण लेकिन साफ-सुथरा फॉर्मल लिबास पहना हुआ था। निहारिका को देखते ही वह अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ और एक सौम्य मुस्कान के साथ बोला, “हेलो निहारिका, मैं शशांक। आपसे मिलकर अच्छा लगा।”
निहारिका ने हाथ मिलाने की ज़हमत तक नहीं उठाई। वह कुर्सी खींचकर बैठी और अपने महंगे गॉगल्स टेबल पर पटकते हुए बोली, “देखिए शशांक, मैं यहाँ सिर्फ अपनी माँ की जिद की वजह से आई हूँ। मैं सीधी बात करने में यकीन रखती हूँ। आप और मैं, दो अलग-अलग दुनिया के लोग हैं।”
शशांक थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन उसने अपनी शालीनता नहीं छोड़ी। उसने वेटर को बुलाकर दो कॉफी का ऑर्डर दिया और बड़ी शांति से पूछा, “अलग-अलग दुनिया से आपका क्या मतलब है? हम दोनों ही इसी शहर में रहते हैं, अपने-अपने करियर में मेहनत कर रहे हैं।”
निहारिका के होठों पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान तैर गई। उसने शशांक के जूतों से लेकर उसके चेहरे तक एक तिरस्कार भरी नज़र डाली और कहा, “करियर? आपका वो छोटा-मोटा आर्किटेक्ट का काम मेरे कॉर्पोरेट पैकेज के सामने कुछ भी नहीं है। मेरा लाइफस्टाइल, मेरा सोशल सर्कल, मेरे ब्रांड्स… आप इन सब चीजों को कभी समझ ही नहीं पाएंगे। आपके बात करने के तरीके और आपके पहनावे से ही पता चलता है कि आप बहुत ‘मिडिल क्लास’ सोच वाले इंसान हैं। मैं ऐसी लड़की हूँ जो हमेशा लाइमलाइट में रहती है, और मुझे एक ऐसा पार्टनर चाहिए जो मुझे कॉम्प्लीमेंट करे, न कि ऐसा जिसे मुझे हर जगह अपने साथ ले जाने में शर्मिंदगी महसूस हो। बुरा मत मानिएगा, लेकिन आपका और मेरा कोई मैच नहीं है। आप मेरे स्टैंडर्ड के आस-पास भी नहीं फटकते।”
कैफे के शांत माहौल में निहारिका की तेज़ आवाज़ कुछ लोगों के कानों तक पहुँच गई थी। आस-पास बैठे लोग अब उन्हें ही देख रहे थे। कोई और लड़का होता तो शायद शर्म से पानी-पानी हो जाता या गुस्से में तमाशा खड़ा कर देता। लेकिन शशांक के चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी करुणा थी। उसने अपनी कॉफी का एक घूंट लिया, नैपकिन से अपने होंठ पोंछे और बहुत ही शांत, लेकिन चुभने वाली आवाज़ में बोला—
“निहारिका जी, मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगा। बल्कि मुझे खुशी है कि मैंने आपसे शादी करने की कोई जल्दबाजी नहीं की। आपकी सुंदरता वाकई लाजवाब है, लेकिन मुझे अफसोस है कि आपका मन उतना ही बदसूरत और खोखला है। आप ब्रांड्स और पैसों के जिस गुरूर में जी रही हैं, वह बहुत ही कच्चा धागा है, जो वक्त की एक छोटी सी चोट से टूट सकता है। आपको लगता है कि कपड़े और जूते इंसान का स्टैंडर्ड तय करते हैं? असली स्टैंडर्ड तो इंसान की सोच और उसके व्यवहार से तय होता है, जो आपमें बिल्कुल नहीं है। आप खुद को बहुत ऊंचे दर्जे का समझती हैं, लेकिन सच कहूँ तो आप जैसी घमंडी और अभिमानी लड़की के साथ मैं एक दिन भी नहीं गुज़ार सकता। मुझे एक जीवनसाथी चाहिए था, कोई ‘शोपीस’ नहीं, जिसे मैं दुनिया को दिखाकर अपनी हैसियत साबित करूँ। आपका यह घमंड एक दिन आपको बहुत रुलाएगा। मेरी तरफ से इस रिश्ते को पूरी तरह से ‘ना’ समझिएगा। अपना ख्याल रखिएगा।”
शशांक ने बिल के पैसे टेबल पर रखे और बिना पीछे मुड़े वहाँ से चला गया। निहारिका सन्न रह गई। उसे लगा जैसे किसी ने भरे बाज़ार में उसे तमाचा मार दिया हो। आज तक किसी ने उससे इस लहज़े में बात नहीं की थी। उसका अहंकार बुरी तरह आहत हुआ था। घर लौटकर उसने अपनी माँ पर सारा गुस्सा उतार दिया और साफ कह दिया कि वह अब कभी किसी साधारण लड़के से नहीं मिलेगी।
वक्त अपनी रफ्तार से गुज़रता रहा। महीने सालों में तब्दील होने लगे। निहारिका के लिए रिश्ते आते रहे, लेकिन उसकी आँखों पर चढ़ी ‘परफेक्ट मैच’ और ‘हाई स्टैंडर्ड’ की चर्बी कभी नहीं उतरी। कोई उसे अपने से कम पढ़ा-लिखा लगता, तो किसी की शक्ल उसे पसंद नहीं आती। किसी का परिवार उसे गँवार लगता, तो किसी की आमदनी उसे कम लगती। इस बीच, निहारिका की अपनी सहेलियाँ, जो उससे कहीं कम सुंदर थीं, वे अपने-अपने घरों में बस चुकी थीं। उनके बच्चे हो गए थे और वे अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी खुशहाल पारिवारिक तस्वीरें डालती रहती थीं।
धीरे-धीरे निहारिका की उम्र पैंतीस के पार हो गई। कॉर्पोरेट दुनिया की दौड़-भाग, तनाव और अकेलेपन ने उसकी उस सुंदरता को भी फीका करना शुरू कर दिया, जिस पर उसे कभी इतना गुमान था। उसके चेहरे पर बारीक लकीरें उभरने लगी थीं। माता-पिता अब बूढ़े और बीमार रहने लगे थे। उन्होंने भी अब बेटी के लिए रिश्ते खोजना लगभग बंद कर दिया था, क्योंकि अब समाज के लोग निहारिका में कमियां निकालने लगे थे। जो लोग कभी उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ते थे, अब उसकी बढ़ती उम्र और उसके अड़ियल स्वभाव को लेकर ताने मारते थे। “लड़की में ही कोई खोट होगा, तभी तो आज तक बैठी है,” जैसी बातें अब आम हो गई थीं।
अब जो रिश्ते आते, वे या तो विधुर होते या बहुत ही बेमेल। निहारिका का अहंकार अब टूटकर दरकने लगा था। वह हर रात अपने शानदार, लेकिन खाली पड़े फ्लैट में लौटती, तो सन्नाटा उसे काटने दौड़ता। बीमार पड़ने पर कोई उसे एक गिलास पानी देने वाला या प्यार से उसका माथा सहलाने वाला नहीं था। उसके लाखों रुपये के ब्रांडेड कपड़े और महंगे परफ्यूम उसके अकेलेपन की बदबू को नहीं छिपा पा रहे थे।
एक दिन, निहारिका को अपनी कंपनी की तरफ से एक बहुत बड़े रियल एस्टेट अवार्ड फंक्शन में जाना पड़ा। वह अब भी सज-धज कर गई थी, लेकिन उसके आत्मविश्वास में अब वो पहले वाली बात नहीं थी। फंक्शन के दौरान, जब ‘आर्किटेक्ट ऑफ द ईयर’ का अवार्ड घोषित हुआ, तो मंच पर जिस शख्स का नाम पुकारा गया, उसे सुनकर निहारिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह नाम शशांक था।
निहारिका की आँखें फटी की फटी रह गईं। मंच पर जो व्यक्ति खड़ा था, वह एक बेहद शानदार और महंगे टक्सीडो में था। उसके चेहरे पर वही पुरानी शांत मुस्कान थी, लेकिन आज उसके व्यक्तित्व में एक ऐसा ठहराव और रुतबा था, जो किसी भी नामी हस्ती को मात दे दे। पूरा हॉल उसके सम्मान में तालियां बजा रहा था। शशांक ने अपनी स्पीच में अपनी सफलता का श्रेय अपनी पत्नी को दिया, जो सामने की पंक्ति में बैठी मुस्कुरा रही थी। निहारिका ने उस महिला की तरफ देखा। वह निहारिका जितनी खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसा सुकून और शालीनता थी, जो निहारिका ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं की थी।
कार्यक्रम के बाद, डिनर के समय निहारिका की नज़रें शशांक से टकराईं। शशांक ने उसे पहचाना, उसके पास आया और उसी पुरानी, विनम्र मुस्कान के साथ बोला, “हेलो निहारिका, कैसी हैं आप? बहुत सालों बाद मुलाकात हुई।”
निहारिका की आवाज़ जैसे गले में ही अटक गई। “मैं… मैं ठीक हूँ। तुम… मेरा मतलब है, आप बहुत सफल हो गए हैं। बधाई हो।”
शशांक ने मुस्कुराते हुए अपनी पत्नी से उसका परिचय कराया। उसकी पत्नी ने बहुत ही गर्मजोशी और सम्मान के साथ निहारिका से बात की। उनके बीच कोई दिखावा, कोई झूठा ‘स्टैंडर्ड’ नहीं था। सिर्फ एक सच्चा और सुलझा हुआ इंसानियत का नाता था।
उस रात निहारिका जब अपनी कार में बैठकर घर लौट रही थी, तो उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह फूट-फूट कर रो रही थी। उसे याद आ रहा था कैफे का वह दिन, जब उसने एक हीरे को कांच का टुकड़ा समझकर ठुकरा दिया था। शशांक ने सही कहा था, ब्रांड्स शरीर को ढक सकते हैं, लेकिन इंसान की छोटी सोच को नहीं। निहारिका को आज अपनी पूरी ज़िंदगी एक मृगतृष्णा लग रही थी। उसने एक ऐसे ‘स्टैंडर्ड’ के पीछे भागते-भागते अपना पूरा जीवन दांव पर लगा दिया, जिसका असल में कोई वजूद ही नहीं था।
आज अड़तीस साल की उम्र में निहारिका करोड़ों की मालकिन तो थी, लेकिन दुनिया की सबसे गरीब औरत भी वही थी, जिसके पास अपने दुख बाँटने के लिए कोई अपना नहीं था। उसके अहंकार ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया था, और अब उसके पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचा था।
क्या आपको भी लगता है कि निहारिका ने अपनी झूठी शान के चक्कर में अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल की? क्या आज के समाज में हम रिश्तों को इंसान की अहमियत से ज्यादा उसकी हैसियत से तौलने लगे हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : नेहा पटेल