सावन जब धरती पर उतरता है, तब वह केवल वर्षा नहीं लाता; वह स्मृतियों की भीगी हुई पोटली, लोकगीतों की गूँज, मेहंदी की महक और भारतीय स्त्री के मन का अनंत उत्सव भी साथ लाता है। पीपल की डाल पर पड़ा झूला केवल रस्सियों का सहारा नहीं होता, वह पीढ़ियों से चली आती संस्कृति का झूला होता है, जिस पर बैठकर हर बेटी अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ झूलते हुए देखती है।
उस वर्ष सावन कुछ अलग था।
बादलों के बीच से झाँकती धूप मानो बार-बार यह याद दिला रही थी कि कुछ ही दिनों बाद स्वतंत्रता दिवस आने वाला है। गाँव की गलियों में तीज के गीत भी गूँज रहे थे और विद्यालय में तिरंगे की तैयारियाँ भी चल रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे भारतीय संस्कृति और राष्ट्रप्रेम एक ही सुर में गा रहे हों।
इन्हीं दिनों नगर से फैशन डिज़ाइन की पढ़ाई पूरी करके नंदिनी अपने गाँव लौटी थी। उसकी आँखों में आधुनिकता के रंग थे, पर मन के किसी कोने में बचपन की मिट्टी अब भी साँस ले रही थी।
घर पहुँचते ही उसकी दादी ने एक पुरानी संदूकची उसके सामने रख दी।
“इसे खोलो।”
संदूकची खुली तो उसमें रेशमी कपड़ों के बीच तह करके रखी हुई एक पुरानी चुनरी दिखाई दी। समय ने उसके धागों को थोड़ा फीका कर दिया था, लेकिन उसके रंग अब भी जीवित थे—केसरिया, श्वेत और हरा। बीच में हाथ से काढ़ा हुआ नीला चक्र।
नंदिनी ठिठक गई।
“दादी… यह तो तिरंगे जैसी है!”
दादी ने चुनरी को अपनी हथेलियों पर फैलाया। उनकी झुर्रियों में जैसे पूरा इतिहास उतर आया।
“नहीं बेटी… यह तिरंगे जैसी नहीं है। यह उसी तिरंगे की छोटी बहन है।”
नंदिनी ने विस्मित होकर दादी की ओर देखा।
दादी की आवाज़ धीमी थी, पर शब्दों में समय की धड़कन थी—
“जब अंग्रेज़ों के शासन में तिरंगा फहराना अपराध माना जाता था, तब इस गाँव की स्त्रियों ने अपने साहस को चुनरियों में बुन लिया था। वे जानती थीं कि हाथों से झंडा छीन लिया जाएगा, लेकिन सिर से चुनरी कौन उतार सकता है? इसलिए उन्होंने अपने आँचल में ही भारत को ओढ़ लिया था।”
नंदिनी की उँगलियाँ उस चुनरी को छू रही थीं, पर उसे लग रहा था जैसे वह कपड़ा नहीं, इतिहास की धड़कन को स्पर्श कर रही हो।
दादी आगे बोलीं—
“बेटी, स्त्री का आँचल केवल घर नहीं सँभालता, वह सभ्यता सँभालता है। और जब वही आँचल तिरंगे के रंग ओढ़ ले, तब वह पूरे राष्ट्र की अस्मिता बन जाता है।”
उस रात नंदिनी देर तक सो नहीं सकी।
खिड़की से आती वर्षा की बूँदें उसे बार-बार यही कहती प्रतीत होती थीं कि संस्कृति केवल पुस्तकों में नहीं बचती; वह उन हाथों में बचती है जो परंपरा को सम्मान देते हैं, और उन हृदयों में जो राष्ट्र को परिवार मानते हैं।
अगली सुबह उसने निर्णय लिया।
इस बार तीज पर वह कोई फैशन शो नहीं करेगी। वह गाँव की महिलाओं और बच्चियों के साथ मिलकर ऐसी चुनरियाँ तैयार करेगी जिनमें तिरंगे के तीनों रंग हों—पर इस प्रकार कि वे राष्ट्रीय ध्वज का अनुचित रूप न बनें, बल्कि उसके आदर्शों का सांस्कृतिक प्रतीक बनें।
केसरिया रंग त्याग और साहस का संदेश देगा।
श्वेत रंग सत्य, शांति और पवित्रता का।
हरा रंग जीवन, प्रकृति और समृद्धि का।
और चुनरी के पल्लू पर काढ़ा गया नीला अशोक चक्र यह स्मरण कराएगा कि जीवन का सबसे बड़ा धर्म है—रुकना नहीं, निरंतर कर्म करते रहना।
उस दिन तीज के झूले झूल रहे थे।
लोकगीत गूँज रहे थे।
और विद्यालय के प्रांगण में तिरंगा लहरा रहा था।
नंदिनी ने जब अपनी दादी के कंधों पर वही चुनरी रखी, तो लगा मानो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को केवल वस्त्र नहीं, बल्कि विश्वास सौंप रही हो।
दादी की आँखें नम थीं।
उन्होंने आसमान की ओर देखा और कहा—
“जिस देश की बेटियाँ अपनी संस्कृति को चुनरी की तरह और अपने राष्ट्र को तिरंगे की तरह सम्मान देती हैं, उस देश की आज़ादी कभी बूढ़ी नहीं होती।”
उस क्षण सावन की हवा ने चुनरी के आँचल को भी छुआ और तिरंगे को भी।
दोनों एक साथ लहराए।
एक में संस्कृति थी।
दूसरे में राष्ट्र।
और दोनों में भारत बसता था।
सर्वथा अप्रकाशित एवं मौलिक रचना
लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’
खुर्जा 203131(बुलंदशहर),
उत्तर प्रदेश