गलती इंसान से ही होती है

“भाभी, मेरे देवर की शादी है, आप सपरिवार आमंत्रित हैं।” मेरे पड़ोस में रहने वाली विनीता ने खुशी से चहकते हुए एक लाल रंग का निमंत्रण पत्र मेरे हाथों में थमा दिया। मैं विनीता के देवर, प्रतीक को जानती थी। वह एक बहुत ही होनहार और एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। मैंने मुस्कुराते हुए उसे बधाई दी और कार्ड खोलकर पढ़ने लगी।

“लड़की कहाँ की है विनीता?” मैंने कार्ड के पन्नों पर नज़र दौड़ाते हुए पूछा।

“भाभी, लड़की तो अपने इसी इलाके के पीछे वाली कॉलोनी की है… सुरभि नाम है, शायद आप जानती हों, मास्टर जी की बेटी है।” विनीता ने बहुत ही सामान्य भाव से कहा और फिर शादी की अन्य तैयारियों का ज़िक्र करके अपने घर चली गई।

विनीता के जाने के बाद मैं वहीं सोफे पर जड़ होकर बैठ गई। मेरे दिमाग में ‘सुरभि’ नाम किसी हथौड़े की तरह बजने लगा। क्या यह वही सुरभि है? हाँ, पीछे वाली कॉलोनी में मास्टर जी की एक ही तो बेटी है। मैं सोचने लगी कि इतना करीब का रिश्ता करना क्या उचित होगा? क्या प्रतीक के परिवार वाले सुरभि के अतीत से पूरी तरह अनजान हैं?

आज से चार साल पहले की बात है, जब सुरभि के नाम को लेकर पूरे मोहल्ले में कानाफूसी का बाज़ार गर्म था। सुरभि तब कॉलेज के पहले साल में थी। उम्र की नादानी और एक गलत इंसान के बहकावे में आकर वह घर से चली गई थी। लेकिन सच्चाई का सामना होते ही वह दो दिन बाद ही रोती-बिलखती घर लौट आई थी। उस लड़के ने उसे धोखा दिया था। उस एक घटना ने मास्टर जी के परिवार की इज़्ज़त को तार-तार कर दिया था। समाज ने उस अठारह साल की बच्ची को ‘कलंकिनी’ जैसे शब्दों से नवाज़ा था।

मैं मन ही मन उधेड़बुन में लगी थी। जब दो गली छोड़कर रहने वाली मैं यह सब जानती हूँ, तो भला लड़के वालों को पता नहीं होगा? कहीं दोनों का प्रेम विवाह तो नहीं? हो सकता है! प्रतीक और सुरभि कहीं मिले हों और प्रतीक ने उसका अतीत जानने के बावजूद उसे अपनाया हो। अगर ऐसा है, तब तो मेरा कोई भी सवाल या शंका बेमानी है।

लेकिन फिर मेरे अंदर की एक औरत, एक माँ जाग उठी। मैं खुद से ही तर्क करने लगी। मैं यह सुनकर खुश क्यों नहीं हो रही कि सुरभि का घर बसने वाला है? कहने को तो लोग कुछ भी कहते रहते हैं। माना कि उसने ऐसा किया था, लेकिन क्या उसे उम्र भर की नादानी नहीं कह सकते? जिस लड़की ने अपनी एक गलती की इतनी भारी कीमत चुकाई, जिसने पिछले चार सालों में दिन-रात एक करके अपनी पढ़ाई पूरी की और आज एक बैंक में अच्छी नौकरी कर रही है, क्या उसे खुश रहने का कोई हक नहीं? एक छोटी सी भूल के लिए सुरभि को हमेशा के लिए दंड देना कहाँ का न्याय है?

मैं सोचने लगी कि सुरभि के माता-पिता ने पिछले चार साल कैसे काटे होंगे। मुझे याद है कैसे मास्टर जी ने शाम को मोहल्ले के पार्क में जाना छोड़ दिया था। सुरभि की माँ ने मोहल्ले की शादियों में जाना बंद कर दिया था क्योंकि वहां औरतों की चुभती हुई निगाहें और फुसफुसाहटें उनका सीना छलनी कर देती थीं। सुरभि ने उन तानों को अपनी ढाल बनाया। उसने घर से ही पढ़ाई की, प्राइवेट परीक्षाएं दीं और अपनी मेहनत के बलबूते पर अपने माता-पिता के खोए हुए सम्मान को वापस लाने की हर मुमकिन कोशिश की। लेकिन हमारे समाज की याददाश्त केवल गलतियों को लेकर बहुत तेज़ होती है।

शादी का दिन आ गया। मेरा मन अब भी कौतूहल से भरा था। मैं तैयार होकर मैरिज हॉल पहुँची। वहाँ का माहौल बहुत ही खुशनुमा था। विनीता का परिवार, प्रतीक के माता-पिता सब बेहद खुश नज़र आ रहे थे। जब मैं शादी के मंडप में बैठी थी, तो मेरे आस-पास मोहल्ले की कई और औरतें भी थीं। मैं साफ सुन सकती थी कि वे अभी भी सुरभि के अतीत को लेकर कानाफूसी कर रही थीं। “अरे, लड़के वालों को पता नहीं होगा पक्का!”, “देखना, कुछ दिन में ही सच्चाई सामने आएगी तो क्या होगा।”

यह सब सुनकर मेरा खून खौलने लगा। मैंने पलट कर उन औरतों से कह ही दिया, “आप लोग किसी की खुशी में खुश क्यों नहीं हो सकते? लड़की ने अपनी जिंदगी संवार ली है, लड़का खुश है, तो आप लोगों को क्या परेशानी है? क्या आप लोगों ने कभी अपनी जिंदगी में कोई गलती नहीं की?” मेरी इस बात पर वे सब चुप हो गईं।

मैं महिलाओं के उस कमरे में गई जहाँ दुल्हन तैयार बैठी थी। सुरभि लाल जोड़े में बेहद खूबसूरत लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा डर और घबराहट थी। जैसे वह किसी भी पल किसी अनहोनी की आशंका से कांप रही हो। मैं उसके पास गई और उसके सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया। मैंने उसके कानों में धीमे से कहा, “तुम बहुत प्यारी लग रही हो सुरभि। आज से एक नई जिंदगी की शुरुआत है, तुम इस खुशी की हकदार हो।”

मेरे इतना कहते ही उसकी आँखों से दो आंसू छलक पड़े। तभी कमरे में प्रतीक की माँ (विनीता की सास) आईं। उन्होंने सुरभि के आंसू पोंछे और जो कहा, उसने मेरे सारे सवालों के जवाब दे दिए।

“रोती क्यों है मेरी बच्ची? मैंने और प्रतीक ने तुम्हें तुम्हारे आज के लिए चुना है, तुम्हारे उस कल के लिए नहीं जिसे तुम पीछे छोड़ आई हो। जिसने गिरकर उठना सीख लिया, वह दुनिया की सबसे मज़बूत लड़की है। हमारे घर को ऐसी ही मज़बूत बेटी चाहिए।”

मैं स्तब्ध रह गई। तो लड़के वालों को सब पता था! उन्होंने जानबूझकर, पूरी समझदारी के साथ एक ऐसी लड़की को अपनाया था जिसे समाज ने ठुकरा दिया था। मेरी सारी शंकाएं एक गहरे सम्मान में बदल गईं। सुरभि जब जयमाला के लिए स्टेज पर आई, तो प्रतीक ने बहुत ही प्यार से उसका हाथ थामा और उसे सहारा दिया। उस पल सुरभि के चेहरे की मुस्कान बता रही थी कि उसने एक ऐसा जीवनसाथी पाया है जो उसकी कमियों के साथ उसे स्वीकार कर रहा है।

अगर हर परिवार इसी तरह प्रगतिशील सोच अपना ले, तो कितनी ही बेटियों की जिंदगी नर्क बनने से बच जाए। गलती इंसान से ही होती है, लेकिन उस गलती को सुधार कर एक नेक इंसान बनने की प्रक्रिया को सम्मान मिलना चाहिए। आज सुरभि सिर्फ एक दुल्हन नहीं थी, बल्कि वो उन सभी रूढ़िवादी बेड़ियों पर एक करारी चोट थी, जो औरतों को उनके अतीत के पिंजरे में कैद रखना चाहती हैं।

दोस्तों, आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या हमारे समाज में भी लोग अक्सर दूसरों की पुरानी गलतियों को कुरेद कर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करते? क्या सच में इंसान को अपनी गलतियों को सुधारने का दूसरा मौका नहीं मिलना चाहिए? अपने विचार हमें ज़रूर बताएं।

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लेखिका : आरती देवी

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