अतीत की यादें

विराज यह सब सुनकर भीतर तक हिल गया। उसे लगा जैसे सुहानी ने अपनी पूरी जिंदगी का सबसे भारी बोझ उसके सामने रख दिया हो। विराज ने बहुत ही संयम और कोमलता से सुहानी की तरफ देखते हुए कहा, “सुहानी, मैं आपके उस अतीत को तो नहीं बदल सकता, और न ही मैं आपसे यह कहूंगा कि आप अचानक से सब कुछ भूल जाएं। वो आपका सच है। लेकिन क्या किसी एक रिश्ते के टूट जाने से जिंदगी खत्म हो जाती है? 

विराज और सुहानी एक ही विज्ञापन कंपनी (एडवरटाइजिंग एजेंसी) में काम करते थे। सुहानी को इस ऑफिस में आए हुए करीब डेढ़ साल हो चुके थे। अपनी सादगी, गहरे रंग के सूती कपड़ों और चेहरे पर छाई एक अजब सी परिपक्व गंभीरता के कारण वह ऑफिस की बाकी लड़कियों से बिल्कुल अलग नजर आती थी। वह किसी से फालतू बात नहीं करती थी, बस अपने केबिन में बैठती, अपना काम पूरी लगन से खत्म करती और चुपचाप घर निकल जाती। ऑफिस की किसी गपशप या पार्टी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं होती थी। वहीं दूसरी ओर, विराज कंपनी का सीनियर ग्राफिक डिजाइनर था—हंसमुख, जिंदादिल और हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आने वाला।

पहली बार जब विराज ने सुहानी को ऑफिस के कॉफी मशीन के पास देखा था, तभी से वह सुहानी की उस शांत और ठहरी हुई शख्सियत पर अपना दिल हार बैठा था। सुहानी की बड़ी-बड़ी आंखों में एक ऐसी उदासी थी जिसे वह दुनिया से छुपाने की पूरी कोशिश करती थी, लेकिन विराज की गहरी नजरें उस दर्द को पढ़ लेती थीं। वह महसूस करता था कि सुहानी ने अपने चारों तरफ एक कांच की दीवार बना रखी है, ताकि कोई भी इंसान उसके करीब न आ सके। सुहानी कभी किसी को यह हक नहीं देती थी कि कोई उसकी निजी जिंदगी के बारे में एक भी सवाल कर सके।

ऐसा नहीं था कि सुहानी इतनी नासमझ थी कि वह विराज के दिल की बात न जान सके। एक औरत होने के नाते वह विराज की खामोश परवाह, उसके देखने के सलीके और उसके छोटे-छोटे बहानों से बात करने की कोशिशों को बहुत अच्छे से समझती थी। लेकिन उसने कभी अपने व्यवहार से यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह सब जानती है। उसने विराज के और अपने बीच एक बहुत ही सम्मानजनक लेकिन सख्त दूरी बना रखी थी। विराज अक्सर लंच के समय अपनी मां के किस्से, अपने बचपन की शरारतें और अपने दोस्तों की बातें सुहानी को सुनाता। वह अक्सर सुहानी के लिए घर से एक्स्ट्रा सैंडविच या मिठाई लेकर आता। सुहानी बहुत शांति से उसकी बातें सुनती, कभी-कभी उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान भी आ जाती, लेकिन बदले में वह अपनी जिंदगी का एक पन्ना भी विराज के सामने नहीं खोलती थी। विराज को कभी-कभी उलझन होती, लेकिन उसने सुहानी की उस निजता का हमेशा सम्मान किया और कभी उस पर कोई दबाव नहीं डाला।

कहानी में एक बड़ा और मार्मिक मोड़ तब आया जब एक दिन ऑफिस में बहुत जरूरी प्रोजेक्ट की वजह से सभी को देर रात तक रुकना पड़ा। रात के करीब दस बज चुके थे। बाहर भयंकर तूफान और बारिश शुरू हो गई थी। प्रोजेक्ट खत्म होने के बाद जब सब लोग जाने लगे, तो सुहानी परेशान सी अपनी सीट पर बैठी थी। उसकी कैब बारिश की वजह से कैंसिल हो गई थी और कोई ऑटो भी नहीं मिल रहा था। विराज ने अपना बैग उठाया और बहुत ही संकोच के साथ सुहानी के पास जाकर बोला, “अगर आपको ऐतराज न हो, तो मैं आपको घर ड्रॉप कर सकता हूँ। बारिश बहुत तेज है और इस वक्त कोई गाड़ी मिलना नामुमकिन सा है।”

सुहानी ने पहले तो अपनी आदत के अनुसार मना करना चाहा, लेकिन मजबूरी और रात के वक्त को देखते हुए उसने हामी भर दी। गाड़ी में बैठते ही एक अजीब सी भारी खामोशी छा गई। बाहर बारिश की बूंदें शीशे पर जोर-जोर से गिर रही थीं और अंदर कार के स्टीरियो पर पुराने गानों की एक हल्की सी धुन बज रही थी। अचानक रेडियो पर एक बेहद दर्द भरा गीत बजने लगा—‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’। विराज गाड़ी चला रहा था, तभी अचानक उसने देखा कि सुहानी ने अपना चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया है और उसकी आंखों से आंसुओं की एक खामोश धार बह रही है। वह अपने होंठों को भींचकर अपनी सिसकियों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। उसका पूरा शरीर उस रुंधे हुए रोने की वजह से कांप रहा था।

विराज ने बिना कुछ कहे गाड़ी सड़क के किनारे एक सुनसान जगह पर रोकी। उसने कोई बेतुका सवाल नहीं पूछा, बस डैशबोर्ड से टिशू पेपर निकाला और सुहानी की तरफ बढ़ा दिया। विराज की इस खामोश परवाह और उसके ‘कुछ न पूछने’ की समझदारी ने सुहानी के उस भारी बांध को तोड़ दिया जिसे उसने सालों से अपने सीने में रोक कर रखा था।

सुहानी अपने दोनों हाथों में चेहरा छुपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। वह सदियों का दर्द था जो आज आंसुओं में बह रहा था। जब वह थोड़ा शांत हुई, तो उसने पहली बार अपने उस दर्द को लफ्जों में पिरोया जिसे वह अपनी खामोशी में छुपाए रखती थी।

“विराज, आप एक बहुत अच्छे इंसान हैं, और मैं जानती हूँ कि आप मेरे बारे में क्या महसूस करते हैं। लेकिन मैं वो जला हुआ घर हूँ जहां अब कोई नया आशियाना नहीं बस सकता,” सुहानी ने गहरी सांस लेते हुए कांपती आवाज में बताया। उसने कहा कि उसकी शादी तीन साल पहले उसके कॉलेज के दोस्त से हुई थी, जिससे वह बेइंतहा मोहब्बत करती थी। लेकिन शादी के छह महीने बाद ही एक भयानक सड़क हादसे में उसके पति की दर्दनाक मौत हो गई। ससुराल वालों ने उस जवान बेटे की मौत का सारा दोष सुहानी के सिर मढ़ दिया। उसे ‘मनहूस’ कहा गया, उसके चरित्र पर उंगलियां उठाई गईं और घर से धक्के मारकर निकाल दिया गया। यहां तक कि इस मुश्किल वक्त में उसके कुछ अपने रिश्तेदारों ने भी उससे दूरी बना ली।

उस हादसे ने और अपनों के उस भयानक धोखे ने सुहानी के अंदर के विश्वास को मार दिया था। उसने तय कर लिया था कि वह अब कभी किसी से कोई रिश्ता नहीं जोड़ेगी, क्योंकि रिश्ते आखिर में सिर्फ दर्द, तोहमतें और अकेलापन ही देते हैं। इसीलिए वह ऑफिस में भी खुद को एक खोल में बंद रखती थी ताकि कोई उसके करीब न आए और उसे फिर से वह असहनीय दर्द न सहना पड़े।

विराज यह सब सुनकर भीतर तक हिल गया। उसे लगा जैसे सुहानी ने अपनी पूरी जिंदगी का सबसे भारी बोझ उसके सामने रख दिया हो। विराज ने बहुत ही संयम और कोमलता से सुहानी की तरफ देखते हुए कहा, “सुहानी, मैं आपके उस अतीत को तो नहीं बदल सकता, और न ही मैं आपसे यह कहूंगा कि आप अचानक से सब कुछ भूल जाएं। वो आपका सच है। लेकिन क्या किसी एक रिश्ते के टूट जाने से जिंदगी खत्म हो जाती है? आपको दूसरों के दिए गए तानों के लिए खुद को सजा देने की कोई जरूरत नहीं है। मैं आपसे कोई वादा, कोई प्यार या कोई नया रिश्ता नहीं मांग रहा। मैं बस इतना चाहता हूँ कि आप मुझे अपना एक सच्चा दोस्त समझें, जिसके सामने आप जब चाहें रो सकें, अपनी बात कह सकें और अपनी इस भारी खामोशी को तोड़ सकें। बस इस कांच की दीवार को गिरा दीजिए, यकीन मानिए बाहर की धूप आज भी बहुत खूबसूरत है।”

विराज के इन शब्दों में कोई बनावट, कोई जल्दबाजी या कोई स्वार्थ नहीं था। उसमें बस एक निस्वार्थ साथ और गहरा सम्मान था। सुहानी ने विराज की तरफ देखा, उसकी आंखों में अब तक जो अविश्वास और डर था, उसकी जगह अब एक हल्की सी राहत और भरोसे की एक छोटी सी किरण ने ले ली थी। उस रात बारिश तो नहीं रुकी, लेकिन सुहानी के मन के अंदर सालों से चल रहा वह तूफान जरूर शांत हो गया था। अगले दिन जब सुहानी ऑफिस आई, तो वह सीधे अपने केबिन में जाने के बजाय विराज की डेस्क के पास रुकी और मुस्कुराते हुए उसे कॉफी का एक कप थमा दिया। विराज के उस निस्वार्थ और सच्चे साथ ने सुहानी की खामोश दुनिया में एक नई सुबह की दस्तक दे दी थी।

क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्यार किसी पर अधिकार जताना नहीं, बल्कि उसके टूटे हुए हिस्सों को अपने निस्वार्थ साथ से समेटना है? इस कहानी पर अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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लेखिका : वर्षा मंडल

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