मीरा को कहां मालूम था कि इस बार जब वह अपने बाबूजी, रमाकांत जी को लेकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रही है, तो वे सीढ़ियां वापसी का रास्ता कभी नहीं दिखाएंगी। पिछले चौदह महीनों से अस्पताल और घर के बीच मीलों का सफ़र तय करते-करते मीरा की ज़िंदगी एक मशीन बन गई थी। बाबूजी की तबीयत बिगड़ती, वह उन्हें भर्ती करवाती, कुछ दिन बाद वे मुस्कुराते हुए घर लौट आते। लेकिन इस बार हवाओं में एक अजीब सी उदासी थी। बाबूजी का शरीर अब दवाइयों से बगावत करने लगा था और उनका रोग उन्हें भीतर ही भीतर खोखला कर रहा था।
मीरा के भीतर एक तूफ़ान उठ रहा था, लेकिन वह अपनी पीड़ा किससे साझा करती? घर में एक बूढ़ी और कमज़ोर माँ थीं, जो खुद गठिया और ब्लड प्रेशर की मरीज थीं। माँ के सामने रोने का मतलब था उनकी भी सांसें अटका देना। उसकी एक बड़ी बहन शादी के बाद अपने ससुराल की जिम्मेदारियों में इस कदर उलझी थी कि चाह कर भी ज़्यादा समय नहीं दे पाती थी। और इकलौता भाई, रोहन… वह तो पिछले छह सालों से कनाडा की चकाचौंध में ऐसा खोया था कि उसके लिए बाबूजी की बीमारी बस वॉट्सऐप पर एक ‘गेट वेल सून’ का मैसेज बनकर रह गई थी। जिस पिता की उंगली पकड़कर मीरा ने चलना सीखा था, जिनसे वह दुनिया की हर बात साझा करती थी, आज वे ही पिता आईसीयू के सफेद बिस्तर पर बेसुध पड़े थे।
रमाकांत जी एक आदर्शवादी इंसान थे। उन्होंने अपने बच्चों को तालीम के साथ-साथ संस्कार भी दिए थे, लेकिन मीरा हमेशा उनके दिल के सबसे करीब रही। मीरा की रगों में अपने पिता का स्वाभिमान दौड़ता था। वह गलत बात पर चुप रहने वाली लड़कियों में से नहीं थी। उसकी यही स्पष्टवादिता और सच्चाई अक्सर रिश्तेदारों की आंखों में चुभती थी। लोग कहते कि लड़की होकर इतना बोलना अच्छा नहीं, लेकिन मीरा को कभी परवाह नहीं रही। उसका मानना था कि ईश्वर ने उसे जिन रिश्तों के साथ भेजा है, उनके प्रति पूरी ईमानदारी बरतना ही उसका धर्म है। विडंबना यह थी कि जिन रिश्तों को उसने खून से सींचा था, वही रिश्ते वक़्त आने पर खोखले साबित हो रहे थे, जिससे मीरा के मन में अपनों के ही खिलाफ एक मौन विद्रोह जन्म ले रहा था।
इसी विद्रोही स्वभाव ने मीरा को चट्टान जैसी मजबूती दी थी। जब डॉक्टर ने बाबूजी की हालत नाज़ुक बताई, तो मीरा ने बिना पलक झपकाए कहा, “डॉक्टर साहब, आप पैसों की चिंता मत कीजिए। मेरा सब कुछ बिक जाए तो भी मुझे मेरे बाबूजी वापस चाहिए। जब तक वे इस दुनिया में हैं, मैं गर्व से खुद को उनकी बेटी कहलवाना चाहती हूं।” एक लड़की के लिए उसका पिता सिर्फ एक रिश्ता नहीं होता, वह एक ऐसी छत होता है जो दुनिया की हर धूप और बारिश से उसे बचाता है।
अस्पताल के उस घुटन भरे माहौल में मीरा अपनी नौकरी, अपने बच्चों और अस्पताल की भागदौड़ अकेले ही संभाल रही थी। इस मुश्किल घड़ी में उसकी बड़ी बहन के दोनों बेटे, मयंक और सुजल, उसके साथ ढाल बनकर खड़े थे। मीरा एक ऐसी स्वाभिमानी स्त्री थी जिसने भगवान के सामने भी कभी हाथ फैलाकर कुछ नहीं मांगा था। वह मंदिर में हाथ जोड़कर सिर्फ इतना कहती, “हे ईश्वर, तुमने मेरी झोली में जो संघर्ष डाले हैं, मैं उन्हें स्वीकार करती हूं। बस मुझे टूटने मत देना। मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं इन परीक्षाओं से पार पा सकूं।” और अगले ही पल वह फिर से अस्पताल की कतारों में खड़ी नज़र आती।
डॉक्टरों ने जब जवाब दे दिया और कहा कि अब इन्हें किसी बड़े वेंटिलेटर सपोर्ट वाले अस्पताल में ले जाना होगा, तो मीरा ने शहर के ही सबसे अच्छे अस्पताल में व्यवस्था की, ताकि बूढ़ी माँ रोज़ अपने जीवनसाथी को देख सके। अमेरिका में बैठा भाई रोहन सिर्फ कभी-कभार फोन करता। वह न डॉक्टर से बात करता, न मीरा से कुछ पूछता। वह सीधे नर्स से फोन बाबूजी के कान पर लगाने को कहता और औपचारिक हालचाल पूछकर फोन काट देता। बाबूजी भी दर्द छुपाते हुए कह देते, “मैं ठीक हूं बेटा।” बाबूजी मरीज थे, लाचार थे, वे कैसे कहते कि बेटा अब तो आ जा!
मीरा भी रोहन से कुछ नहीं कहती। उसे लगता कि अगर वह मिन्नतें करेगी तो भाई शायद ताना मार दे कि ‘पिताजी सिर्फ मेरे नहीं, तुम्हारे भी हैं।’ अगर रोहन को ज़रा भी फिक्र होती, तो कनाडा जाने से पहले वह अपनी बहनों से कहता कि मेरी गैरमौजूदगी में मेरे माता-पिता का ख्याल रखना। लेकिन उसने ऐसा कभी नहीं किया। मीरा और रोहन के बीच हमेशा विचारों का टकराव रहता था। रोहन को लगता था कि इकलौता बेटा होने के नाते परिवार की हर चीज़ पर उसका विशेषाधिकार है, जबकि मीरा का मानना था कि अधिकार हमेशा कर्तव्यों के बाद आते हैं।
दिन-ब-दिन बाबूजी की हालत बिगड़ती जा रही थी। माँ रोज़ रोते हुए मीरा से कहतीं, “बेटा, अगर तू न होती तो तेरे पिता का क्या होता? कौन इन अस्पतालों के इतने धक्के खाता?” मीरा जानती थी कि बाबूजी धीरे-धीरे मौत की आगोश में जा रहे हैं, लेकिन फिर भी वह चमत्कार की उम्मीद में दौड़ रही थी। घर, दफ्तर और अस्पताल—इन तीनों पाटों के बीच पिसते हुए भी मीरा के चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक अजीब सा संकल्प था।
बाबूजी अक्सर इशारों में घर चलने की ज़िद करते। लेकिन मीरा डरी हुई थी। घर पर उन्हें वह मेडिकल सपोर्ट कैसे मिलता? घर में बीमार माँ और छोटे बच्चे, उस पर बाबूजी की यह नाज़ुक हालत। वह चाहकर भी उन्हें घर ले जाने का जोखिम नहीं उठा सकती थी। बाबूजी अब पूरी तरह ऑक्सीजन मास्क के सहारे थे। 15 सितंबर की वह मनहूस सुबह मीरा कभी नहीं भूल सकती। उसने मास्क हटाकर उन्हें जूस के दो चम्मच पिलाने की कोशिश की थी कि उनकी सांसें उखड़ने लगीं। मीरा के हाथ-पैर कांप गए और उसने तुरंत मास्क वापस लगा दिया। अब बाबूजी बोल नहीं पाते थे। संवाद का एकमात्र ज़रिया एक छोटी सी नोटपैड और पेन रह गया था।
मीरा ने अपने आंसुओं को रोकते हुए बाबूजी से वे बातें पूछीं, जो कोई भी संतान अपने जीवित पिता से पूछने की कल्पना भी नहीं कर सकती। उसका कलेजा मुंह को आ रहा था। जिस पिता ने उसे जन्म दिया, आज उसी से उसके अंतिम संस्कार की चर्चा करनी पड़ रही थी। मीरा ने खुद को पत्थर किया और सोचा—”नहीं, अगर बेटा होने का दावा करने वाला वहां चैन से बैठा है, तो मैं दिखाऊंगी कि बेटियां किसी से कम नहीं होतीं।”
उसने कांपते होंठों से पूछा, “बाबूजी, अगर किसी वजह से रोहन कनाडा से न आ पाया… तो आपकी मुखाग्नि कौन करेगा?” मरणासन्न पिता के लिए यह कितना हृदयविदारक प्रश्न रहा होगा! बाबूजी की आंखों से एक आंसू ढुलक कर तकिए में समा गया। उन्होंने कांपते हाथों से नोटपैड पर तीन नाम लिखे—मयंक, सुजल (बड़ी बहन के बेटे) और आर्यन (मीरा का बेटा)। इसके बाद मीरा ने एक और कठोर सवाल किया, “आपकी अंतिम क्रिया कहां होनी चाहिए? इसी शहर में या हरिद्वार में?” बाबूजी ने पेन से धीरे से ‘हरिद्वार’ लिख दिया। यह देखकर मीरा का सीना छलनी हो गया। अगर आज उसका भाई पास होता, तो उसे यह क्रूर भूमिका नहीं निभानी पड़ती। बाबूजी अक्सर कहते भी थे, “मीरा, तू बेटी क्यों बनी? बेटा होती तो जीवन भर मेरी आंखों के सामने रहती, तुझे किसी और के घर नहीं भेजना पड़ता।”
19 सितंबर की ढलती शाम अपने साथ रमाकांत जी की अंतिम सांसें लेकर आई। अंत समय में मीरा और उसकी माँ दोनों उनके सिरहाने थे। बेबस माँ फूट-फूट कर रो रही थी और मीरा अपने बाबूजी के कान में कह रही थी, “बाबूजी, यू आर माई हीरो।” बाबूजी ने धीरे से पलकें झपकाईं। मीरा ने अपना हाथ उनकी मुट्ठी में रखा और कहा, “बाबूजी, मेरे हाथ को ज़ोर से दबाइए, जैसे बचपन में भीड़ में दबाते थे।” बाबूजी अपनी पूरी ताकत लगा रहे थे, लेकिन उस निष्प्राण होते शरीर में अब वो ज़ोर कहां था। मीरा की पुकार अस्पताल के उस कमरे में गूंजती रही, “और ज़ोर से बाबूजी…” लेकिन बाबूजी हमेशा के लिए शांत हो चुके थे।
मीरा उस वक़्त कुछ ज़रूरी कागज़ात लाने रिसेप्शन तक गई थी जब वॉर्ड बॉय दौड़ता हुआ आया। जब तक वह पहुंची, सब खत्म हो चुका था। जिस पिता ने कभी उसकी उंगली नहीं छोड़ी, वे आज हमेशा के लिए उसका साथ छोड़ गए थे। मीरा को लगा जैसे किसी ने उसे अनाथ कर दिया हो। उसे इस बात का गहरा अपराधबोध था कि अंतिम क्षण में वह उनका हाथ नहीं पकड़ पाई।
अगली चुनौती बाबूजी की अंतिम इच्छा पूरी करने की थी। घनघोर बारिश के बीच मीरा ने अपने पिता के पार्थिव शरीर को हरिद्वार ले जाने का इंतज़ाम किया। जब एंबुलेंस हरिद्वार के घाट की ओर बढ़ रही थी, तो मीरा की धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गई थीं। उसे अहसास हो रहा था कि अब चंद घंटों में उसके बाबूजी राख हो जाएंगे। वह चीख-चीख कर रोना चाहती थी, लेकिन जिसके कंधे पर सिर रखकर वह रोती थी, वही उसे छोड़कर जा रहा था।
गंगा के तट पर बाबूजी के बचपन के मित्र, रिश्तेदार और उनके पुराने छात्र बारिश में भीगते हुए उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। मंत्रोच्चार के बीच जब आर्यन और मयंक ने उन्हें मुखाग्नि दी, तो मीरा की आंखों के सामने बाबूजी का पूरा जीवन किसी फिल्म की तरह घूम गया।
तेरहवीं और सभी कर्मकांड पूरे करने के बाद जब मीरा अपनी बिखरी हुई दुनिया समेटने घर लौटी, तो अचानक उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर कनाडा का नंबर था—रोहन।
मीरा ने भारी आवाज़ में फोन उठाया। उम्मीद थी कि भाई इस दुख की घड़ी में सांत्वना के दो शब्द कहेगा।
लेकिन दूसरी तरफ से रोहन की सपाट आवाज़ आई, “मीरा, मुझे वकीलों से पता चला है कि पिताजी अपनी ज़्यादातर वसीयत मेरे नाम कर गए हैं। और जो पुश्तैनी मकान का किराया तुम लोगों ने इस महीने लिया है, वो मेरे अकाउंट में ट्रांसफर कर देना, मेरी पत्नी को कुछ इन्वेस्टमेंट्स करने हैं।”
यह सुनते ही मीरा के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। यह कैसा बेटा था? बाबूजी पैंतालीस दिन अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ते रहे। लाखों रुपए पानी की तरह बहाए गए। इस भाई ने एक बार नहीं पूछा कि दवाइयों का खर्च कहां से आ रहा है। अगर वह अस्पताल की भागदौड़ के बीच एक बार फोन करके मीठे शब्द बोल देता, तो मीरा अपनी सारी थकान भूल जाती। लेकिन आज जब पिता की चिता की राख ठीक से ठंडी भी नहीं हुई थी, उसे वसीयत और किराए की याद आ गई। जबकि उस पुश्तैनी मकान की असली हक़दार, उनकी माँ, अभी ज़िंदा थी और अपने पति के वियोग में आंसू बहा रही थी।
मीरा ने शून्य में देखते हुए फोन काट दिया और मन ही मन सोचा—”वाह रे कलयुग! यहां रिश्ते खून से नहीं, बैंक अकाउंट और वसीयत के कागज़ों से तय होते हैं।”
सवाल आपके लिए:
दोस्तों, जब अपनों के बीच संपत्ति और वसीयत रिश्तों और भावनाओं से बड़े हो जाते हैं, तो एक इंसान क्या करे? क्या मीरा को अपने भाई को करारा जवाब देना चाहिए था या खामोशी ही सबसे बड़ा जवाब है? आपकी नज़र में मीरा की जगह आप होते तो क्या करते? कमेंट करके अपने विचार ज़रूर साझा करें।
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