सच्चाई का आईना

इंसानियत और संस्कारों से बड़ी कोई जात नहीं होती। उनके घर में भी वही संस्कार हैं, जो हमारे यहाँ हैं। अगर अद्विका ने कोई गलत रास्ता चुना होता या किसी गलत इंसान का हाथ पकड़ा होता, तो मैं खुद उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता। लेकिन जब मेरी बेटी ने एक नेक और सच्चे इंसान को अपना जीवनसाथी चुना है, तो सिर्फ ‘गैर-बिरादरी’ का होने के कारण मैं उसका दिल कैसे तोड़ दूँ?”

“तो क्या तुम इस शादी को ऐसे ही धूमधाम से करोगे? सबको यह बताओगे कि देवेंद्र तिवारी ने अपनी नाक कटा ली है?”

बनारस की उन संकरी और पुरानी गलियों में आज भी वही जानी-पहचानी खुशबू थी, जो बरसों पहले हुआ करती थी। अगरबत्ती, ताज़े गेंदे के फूल और पुरानी इमारतों की वो सोंधी महक। इसी शहर की एक पुरानी और भव्य हवेली में देवेंद्र का बचपन बीता था। आज वह अपनी पत्नी सुजाता के साथ उसी हवेली की चौखट पर खड़ा था, लेकिन आज उसके कदमों में बचपन वाली वह बेफिक्री नहीं थी। आज उसके हाथों में अपनी इकलौती बेटी, अद्विका की शादी का पहला कार्ड था। कार्ड बहुत ही खूबसूरत था, सुनहरे और लाल रंग का, जिस पर भगवान गणेश की वंदना लिखी थी। लेकिन देवेंद्र जानता था कि इस कार्ड के अंदर लिखे दो नाम हवेली की शांति को एक भयानक तूफान में बदल सकते हैं।

हवेली के दालान में देवेंद्र के बड़े भाई, सूर्यकांत जी, अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। सूर्यकांत जी सिर्फ इस परिवार के ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और अपनी बिरादरी के एक सम्मानित व्यक्ति थे। उनके उसूल, उनके नियम और उनकी परंपराएं पत्थर की लकीर की तरह थीं, जिन्हें काटना किसी के बस की बात नहीं थी। देवेंद्र ने आगे बढ़कर बड़े भाई के चरण स्पर्श किए। सुजाता ने भी सिर पर पल्लू रखकर जेठ का आशीर्वाद लिया।

“अरे देवेंद्र, सुजाता! आओ, आओ, बैठो। बिना बताए अचानक कैसे आना हुआ? सब कुशल-मंगल तो है?” सूर्यकांत जी ने चश्मा उतारते हुए थोड़ी हैरानी से पूछा।

“सब आपकी कृपा है भईया। दरअसल, एक बहुत ही शुभ काम से आना हुआ है। हमारी अद्विका, आपकी भतीजी, अब बड़ी हो गई है। हमने उसकी शादी तय कर दी है और अगले महीने की पच्चीस तारीख का मुहूर्त निकला है। यह रहा पहला निमंत्रण पत्र, जो हम अपने कुलदेवता और आपको सौंपने आए हैं। शादी की पूरी ज़िम्मेदारी आपको ही उठानी है, क्योंकि आपके बिना हमारे परिवार का हर शुभ कार्य अधूरा है।” देवेंद्र ने बहुत ही आदर और विनम्रता के साथ वह सुनहरा कार्ड अपने बड़े भाई के हाथों में रख दिया।

सूर्यकांत जी के चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान आ गई। भतीजी की शादी की बात सुनकर वह खुश हुए। उन्होंने कार्ड खोला। उनकी नज़रें कार्ड पर छपे अक्षरों पर दौड़ने लगीं। लेकिन अचानक, उनकी वह गर्व भरी मुस्कान किसी सर्द हवा के झोंके की तरह गायब हो गई। उनकी आँखों में एक कठोरता आ गई और माथे पर सिलवटें गहरी हो गईं।

“अद्विका संग… सिद्धार्थ मेनन?” सूर्यकांत जी ने कार्ड से नज़रें उठाकर सीधे देवेंद्र की आँखों में देखा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी गूँज थी, जो किसी खतरे की घंटी से कम नहीं थी। “यह मेनन कौन हैं? हमारे ब्राह्मण समाज में तो यह गोत्र या उपनाम नहीं होता। यह लड़का कौन है देवेंद्र? और तुमने बिना मुझसे सलाह लिए, बिना बिरादरी में बात किए यह रिश्ता कैसे तय कर दिया?”

देवेंद्र ने एक गहरी साँस ली। वह इस सवाल और इस प्रतिक्रिया के लिए मानसिक रूप से पहले ही तैयार होकर आया था। सुजाता ने घबराहट में अपने हाथ कसकर बाँध लिए।

“भईया, सिद्धार्थ एक बहुत ही सुलझा हुआ और होनहार लड़का है। वह और अद्विका पिछले चार साल से एक ही मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे हैं। सिद्धार्थ मूल रूप से केरल का रहने वाला है, लेकिन उसका परिवार पिछले बीस सालों से दिल्ली में ही बसा हुआ है। दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं। लड़का बहुत अच्छे स्वभाव का है, कोई दहेज़ की माँग नहीं है, और सबसे बड़ी बात, वह हमारी अद्विका का बहुत सम्मान करता है।” देवेंद्र ने बहुत ही शांत स्वर में अपनी बात रखी।

लेकिन यह बात सूर्यकांत जी के गले नहीं उतरी। उन्होंने वह शादी का कार्ड पास रखी लकड़ी की तिपाई पर लगभग फेंकते हुए कहा, “सम्मान करता है? और उस सम्मान का क्या जो तुमने आज इस कार्ड के ज़रिए मिट्टी में मिला दिया है? तुम जानते भी हो कि तुम क्या कह रहे हो? हमारे परिवार का एक रुतबा है। कई पीढ़ियों से हमारा खानदान अपनी शुद्धता और अपनी परंपराओं के लिए जाना जाता है। और तुम अपनी बेटी की शादी एक दूसरे राज्य, दूसरी बिरादरी और एक बिल्कुल अलग संस्कृति के लड़के से कर रहे हो? क्या पूरे उत्तर प्रदेश में या हमारे ब्राह्मण समाज में कोई पढ़ा-लिखा लड़का नहीं बचा था, जो तुमने हमारी कुल-मर्यादा की धज्जियां उड़ाने का फैसला कर लिया?”

सूर्यकांत जी की आवाज़ इतनी तेज़ हो गई थी कि अंदर रसोई से उनकी पत्नी, विमला भाभी, भी बाहर दालान में आ गईं। हवेली का माहौल एकदम से भारी हो गया था।

“भईया, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ,” देवेंद्र ने अपने लहज़े को नर्म ही रखा, “लेकिन मैं एक पिता हूँ। मेरे लिए मेरी बेटी की खुशी से बढ़कर कोई कुल-मर्यादा या कोई झूठी शान नहीं हो सकती। मैंने भी शुरुआत में अद्विका को समझाने की कोशिश की थी। मैंने भी वही समाज और बिरादरी की दुहाई दी थी, जो आज आप दे रहे हैं। लेकिन जब मैंने अद्विका की आँखों में वह उदासी देखी, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी किसी झूठी प्रतिष्ठा के लिए अपने ही बच्चे की हँसी छीन रहा हूँ। फिर मैं खुद सिद्धार्थ और उसके परिवार से मिला। यकीन मानिए भईया, इंसानियत और संस्कारों से बड़ी कोई जात नहीं होती। उनके घर में भी वही संस्कार हैं, जो हमारे यहाँ हैं। अगर अद्विका ने कोई गलत रास्ता चुना होता या किसी गलत इंसान का हाथ पकड़ा होता, तो मैं खुद उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता। लेकिन जब मेरी बेटी ने एक नेक और सच्चे इंसान को अपना जीवनसाथी चुना है, तो सिर्फ ‘गैर-बिरादरी’ का होने के कारण मैं उसका दिल कैसे तोड़ दूँ?”

“तो क्या तुम इस शादी को ऐसे ही धूमधाम से करोगे? सबको यह बताओगे कि देवेंद्र तिवारी ने अपनी नाक कटा ली है?” सूर्यकांत जी गुस्से से काँप रहे थे। “तुम्हें शहर की हवा क्या लगी, तुम तो अपनी जड़ें ही भूल गए। तुम्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि जब यह खबर समाज में फैलेगी, तो लोग हम पर कैसे हँसेंगे। हमारे उठने-बैठने वाले लोग क्या कहेंगे? तुम तो दिल्ली जाकर छिप जाओगे, लेकिन मुझे इसी शहर, इसी समाज में रहना है। मैं ताउम्र लोगों के ताने नहीं सुन सकता!”

देवेंद्र की आँखों में अब एक अजीब सी चमक आ गई थी—वह चमक जो एक मजबूर पिता की नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प वाले इंसान की थी।

“समाज? कौन सा समाज भईया?” देवेंद्र की आवाज़ अब थोड़ी ऊँची, लेकिन दर्द से भरी हुई थी। “वही समाज जो सिर्फ दूसरों के घरों में तांक-झांक करना जानता है? वही समाज जो शादी के पंडाल में सिर्फ खाने की कमियां निकालता है? माफ़ कीजिएगा बड़े भईया, लेकिन जब हमारे घरों के दरवाज़े बंद होते हैं और हम अकेले में अपने आँसू पोंछते हैं, तब यह तथाकथित ‘समाज’ हमारा दर्द बाँटने नहीं आता। यह समाज सिर्फ नियम बनाना जानता है, रिश्ते निभाना नहीं।”

सूर्यकांत जी ने अपनी उंगली देवेंद्र की तरफ उठाते हुए दहाड़ लगाई, “बस कर देवेंद्र! बहुत सुन लिया मैंने तेरा यह आधुनिक ज्ञान। अगर तुझे अपनी बिरादरी की, अपने खानदान की इज़्ज़त की ज़रा भी परवाह नहीं है, तो तू शौक से यह पाप कर। लेकिन कान खोलकर सुन ले, हम इस पाप के भागीदार नहीं बनेंगे। इस घर से कोई भी तुम्हारी इस तथाकथित आधुनिक शादी में शिरकत नहीं करेगा। मेरे लिए समाज और परंपराएं आज भी सबसे ऊपर हैं!”

दालान में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। सुजाता की आँखों से आँसू छलक पड़े थे। वह जानती थी कि देवेंद्र अपने बड़े भाई से कितना प्यार करते हैं। लेकिन आज बात उनकी बेटी की ज़िंदगी की थी।

देवेंद्र अपनी जगह से उठा। वह गुस्से में नहीं था, बल्कि उसके चेहरे पर एक गहरा दुख और एक ऐसी सच्चाई थी, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता था।

“पाप? आप दो प्यार करने वाले और एक-दूसरे का सम्मान करने वाले बच्चों के मिलन को पाप कह रहे हैं भईया?” देवेंद्र ने सूर्यकांत जी की आँखों में सीधे देखते हुए कहा। “अगर आप सच में जानना चाहते हैं कि पाप क्या होता है, तो चलिए मैं आपको बताता हूँ। आज से ठीक आठ साल पहले की बात है। आपकी अपनी बेटी, मेरी भतीजी, पल्लवी… क्या आपको याद है? पल्लवी ने कॉलेज में पढ़ने वाले एक लड़के को पसंद किया था। लड़का बहुत ही साधारण परिवार का था, पढ़ा-लिखा था और पल्लवी से बेइंतहा प्यार करता था। लेकिन उसका गोत्र हमारी बिरादरी से नहीं मिलता था। वह हमारी तथाकथित ‘ऊँची जात’ का नहीं था। तब आपने क्या किया था भईया? आपने पल्लवी को इस हवेली के एक कमरे में बंद कर दिया था। आपने उसे मारा, उसे धमकाया और समाज की इज़्ज़त का वास्ता देकर उसे उस रिश्ते से तोड़ लिया।”

देवेंद्र की आवाज़ अब भारी हो चुकी थी। विमला भाभी, जो पास खड़ी थीं, उन्होंने अपने मुँह पर पल्लू रख लिया और सिसकने लगीं, क्योंकि एक माँ का घाव आज फिर हरा हो गया था।

“उसके बाद आपने क्या किया?” देवेंद्र बोलता रहा, “आपने बिरादरी में अपनी नाक ऊँची रखने के लिए, खानदान की इज़्ज़त बचाने के लिए पल्लवी की शादी हमारे ही समाज के एक बहुत बड़े, रसूखदार और अमीर परिवार में कर दी। शादी में खूब पैसा बहाया, ताकि समाज आपकी वाहवाही करे। लेकिन उस इज़्ज़त का क्या अंजाम हुआ भईया? शादी के दूसरे ही महीने से उस रसूखदार, अपनी बिरादरी वाले दामाद ने पल्लवी पर हाथ उठाना शुरू कर दिया। जब पल्लवी रोते हुए आपके पास आई, तो आपने उसे यह कहकर वापस भेज दिया कि ‘बेटियों का घर तो ससुराल ही होता है, समाज क्या कहेगा अगर तू मायके में बैठ गई।’ उसी समाज के डर से मेरी बच्ची ने पाँच साल उस नरक में काटे। जब उसका पति उसे अधमरा करके अस्पताल में छोड़ गया, तब कहाँ था आपका यह समाज? कौन आया था उसका दर्द बाँटने?”

सूर्यकांत जी एकदम सुन्न पड़ गए थे। उनका गुस्सा जैसे किसी ठंडे पानी की बाल्टी के नीचे दब गया था। उनके होंठ काँप रहे थे, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे। देवेंद्र ने जो सच कहा था, वह हवेली की हर दीवार में गूँज रहा था। आज भी पल्लवी हवेली के अंदरूनी हिस्से में अपनी ज़िंदगी के दिन काट रही थी—तलाकशुदा, टूटी हुई और खामोश।

“मैंने अपनी भतीजी को उस दर्दनाक दौर से गुज़रते हुए देखा है भईया,” देवेंद्र की आँखों से भी अब आँसू बहने लगे थे। “मैंने पल्लवी की उस मुस्कान को मरते देखा है, जो कभी इस हवेली की जान हुआ करती थी। और यह सब किसने किया? उस झूठी इज़्ज़त ने, उस खोखले समाज ने! मैंने उसी दिन कसम खाई थी कि मैं अपनी अद्विका को दूसरी पल्लवी नहीं बनने दूँगा। मेरे बच्चों को किसी समाज ने नहीं पाला है, उन्हें मैंने और सुजाता ने अपनी मेहनत, अपने प्यार और अपने संस्कारों से पाला है। उनके सुख-दुख का ज़िम्मेदार मैं हूँ, कोई समाज नहीं।”

देवेंद्र ने अपने आँसू पोंछे और खुद को सँभाला। उसने अपनी पत्नी सुजाता की तरफ देखा और उसे चलने का इशारा किया।

“अद्विका की शादी पूरी धूमधाम से होगी भईया, और सिद्धार्थ ही मेरा दामाद बनेगा। मेरी बेटी ने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला लेने से पहले मुझ  पर भरोसा किया है, उसने मुझसे कुछ नहीं छिपाया, तो मैं एक पिता होने के नाते उसके उस भरोसे को कभी टूटने नहीं दूँगा। मैं उसे घुट-घुट कर जीने के लिए किसी नरक में नहीं धकेल सकता।”

देवेंद्र आगे बढ़ा और उसने फिर से झुककर सूर्यकांत जी के पैर छुए।

“मैंने निमंत्रण कार्ड हमारे कुलदेवता की मूर्ति के पास रख दिया है। मैं आज भी आपका उतना ही सम्मान करता हूँ, जितना बचपन में करता था। अगर आप अपनी भतीजी को अपनी बेटी मानते हैं और उसकी खुशियों को अपनी इज़्ज़त से ऊपर रख सकते हैं, तो शादी में ज़रूर आइएगा। हमें आपका इंतज़ार रहेगा। और अगर आपको लगता है कि समाज की बातें आपकी भतीजी की मुस्कान से ज़्यादा कीमती हैं… तो यह आपकी मर्ज़ी है।”

बिना कोई और शब्द कहे, देवेंद्र और सुजाता हवेली के मुख्य द्वार से बाहर निकल गए। पीछे छूट गया था एक ऐसा पिता, जिसने अपनी झूठी शान के लिए अपनी ही बेटी की ज़िंदगी तबाह कर दी थी, लेकिन आज उसके छोटे भाई ने उसे उस सच्चाई का आईना दिखा दिया था, जिससे वह सालों से भाग रहा था। हवेली में अब सिर्फ एक खामोशी थी—शायद वह खामोशी जो किसी बड़े बदलाव से पहले आती है।

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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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