ख़ुशियों की पासबुक

पार्वती देवी का जीवन किसी तपस्या से कम नहीं था। शादी के महज पांच साल बाद ही उनके पति का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। उस वक्त उनकी बेटी शिखा बमुश्किल तीन साल की थी। ससुराल वालों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि पार्वती के भाग्य में ही खोट है। उस दिन पार्वती ने अपनी नन्ही सी बच्ची को सीने से लगाया और फैसला किया कि वह किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगी। पार्वती के पास एक ही हुनर था—सिलाई। उसने दिन-रात सिलाई मशीन चलाई। मशीन की वह खटर-पटर ही शिखा के लिए लोरी बन गई थी। लोगों के कपड़े सिल-सिलकर, अपनी रातों की नींद और आँखों की रोशनी दांव पर लगाकर पार्वती ने शिखा को कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। उसकी बस एक ही ख्वाहिश थी कि शिखा पढ़-लिखकर एक आत्मनिर्भर और काबिल इंसान बने।

शिखा भी अपनी माँ के संघर्ष को समझती थी। वह पढ़ाई में बेहद होशियार थी और उसने अपनी मेहनत के दम पर शहर के एक नामी कॉलेज में नर्सिंग कोर्स में दाखिला ले लिया। माँ के हाथों में सुई चुभने से पड़े निशानों को देखकर शिखा अक्सर रो पड़ती थी और कहती थी, “माँ, बस कुछ साल और, फिर मैं नौकरी करूंगी और तुम्हें इस सिलाई मशीन से हमेशा के लिए आराम दे दूंगी।” शिखा का कॉलेज का जीवन बहुत सादगी भरा था। जहाँ दूसरी लड़कियाँ फिल्मों और फैशन की बातें करती थीं, वहीं शिखा का ज्यादातर समय लाइब्रेरी या प्रैक्टिकल वॉर्ड में बीतता था।

उसी कॉलेज के फार्मेसी विभाग में एक लड़का पढ़ता था—आकाश। आकाश की कहानी भी संघर्षों से भरी थी। वह अनाथ था और एक स्थानीय अनाथालय में पला-बढ़ा था। पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए आकाश दिन में कॉलेज अटेंड करता और रात में एक 24-घंटे खुलने वाले मेडिकल स्टोर पर काम करता था। साथ ही, वीकेंड पर वह छोटे बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता था। शिखा और आकाश की पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई थी, जब दोनों एक ही मेडिकल रेफरेंस बुक की तलाश में थे। धीरे-धीरे उनकी बातचीत शुरू हुई। शिखा को आकाश की सादगी, उसकी मेहनत और जीवन के प्रति उसकी ईमानदारी ने बहुत प्रभावित किया। आकाश को भी शिखा के रूप में एक ऐसा इंसान मिला जो उसे उसकी हैसियत से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत से तौलता था। दोनों के विचार मिलते थे, दोनों ने जीवन के अभावों को करीब से देखा था, और यही वजह थी कि उनका आकर्षण जल्द ही एक गहरे और परिपक्व प्रेम में बदल गया।

नर्सिंग की पढ़ाई पूरी होने के बाद शिखा को एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई और आकाश को भी एक फार्मा कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की जॉब मिल गई। जब शिखा ने अपनी माँ पार्वती को आकाश के बारे में बताया, तो पार्वती पहले थोड़ी चिंतित हुईं। एक माँ होने के नाते वह अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित देखना चाहती थीं। लेकिन जब पार्वती आकाश से मिलीं, तो उसकी नम्रता, बड़ों के प्रति आदर और आँखों में दिखने वाली सच्चाई ने उनका दिल जीत लिया। पार्वती ने जान लिया था कि जो लड़का बिना माता-पिता के साये के भी इतना संस्कारी और मेहनती बन सकता है, वह उनकी बेटी को दुनिया की हर खुशी देगा। पार्वती ने बिना किसी देरी के इस रिश्ते को अपनी मंजूरी दे दी।

दोनों की शादी बहुत ही सादगी से, एक मंदिर में संपन्न हुई। न कोई दहेज, न कोई दिखावा। बस कुछ करीबी लोगों की मौजूदगी में शिखा और आकाश हमेशा के लिए एक-दूसरे के हो गए।

विदाई की घड़ी हर माँ-बेटी के लिए भावुक होती है। पार्वती ने अपनी बेटी को गले लगाया और फूट-फूट कर रो पड़ीं। शिखा भी माँ को छोड़कर जाने के ख्याल से बिलख रही थी। तभी पार्वती ने अपने आँसू पोंछे और अपने सूटकेस से एक लाल रंग का लिफाफा निकालकर शिखा और आकाश के हाथों में रख दिया।

“यह क्या है माँ?” शिखा ने रुंधे गले से पूछा।

पार्वती ने मुस्कुराते हुए कहा, “इसे खोलो बेटी।” शिखा ने लिफाफा खोला तो उसमें एक बैंक की पासबुक थी। यह एक जॉइंट अकाउंट की पासबुक थी जो शिखा और आकाश के नाम पर खोला गया था। उसमें केवल ग्यारह सौ रुपये जमा थे।

आकाश ने संकोच करते हुए कहा, “माँ जी, इसकी क्या जरूरत थी? आपका आशीर्वाद ही हमारे लिए सबसे बड़ी दौलत है।”

पार्वती ने आकाश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, यह कोई दहेज या शगुन नहीं है। यह तुम दोनों के लिए मेरा एक छोटा सा सबक है। मैंने इस खाते में ग्यारह सौ रुपये डाले हैं। मेरी तुम दोनों से बस एक ही शर्त है… जीवन में जब भी तुम दोनों के बीच कोई बहुत खुशी का पल आए, जब तुम्हें लगे कि आज का दिन बहुत खास है, तो तुम दोनों इस खाते में कुछ न कुछ रकम जरूर जमा करना। चाहे वो पचास रुपये हों या पांच सौ। और हाँ, इस पासबुक के आखिरी कुछ पन्ने जो खाली हैं, वहाँ उस तारीख के साथ अपनी उस खुशी का कारण जरूर लिखना। जब भी तुम दोनों खुश हो, तभी इस खाते में पैसे डालना। उदासी या गुस्से के पलों में इसे भूल जाना।”

शिखा और आकाश ने माँ की इस अजीब लेकिन प्यारी सी शर्त को सहर्ष मान लिया और एक नई जिंदगी की शुरुआत करने अपने छोटे से किराए के घर में आ गए।

शुरुआती दिन बहुत ही संघर्ष भरे लेकिन बेहद खूबसूरत थे। दोनों नौकरी पर जाते, शाम को साथ मिलकर खाना बनाते और भविष्य के सपने बुनते। शादी के करीब एक महीने बाद आकाश को अपनी पहली पूरी सैलरी मिली। उस दिन वह घर लौटते हुए शिखा के लिए उसकी पसंदीदा चॉकलेट और एक गुलाब का फूल लेकर आया। दोनों बहुत खुश थे। अगले दिन दोनों बैंक गए, खाते में पांच सौ रुपये जमा किए और पासबुक के आखिरी पन्ने पर लिखा— “12 मार्च: आकाश की पहली सैलरी, हमने साथ में छत पर बैठकर चाय पी और बहुत सारी बातें कीं।”

यह सिलसिला चल पड़ा। जब शिखा ने अपनी सैलरी से पहली बार घर के लिए एक नया पंखा खरीदा, तो उन्होंने खाते में दौ सौ रुपये जमा किए और लिखा— “18 अप्रैल: आज हमारे घर में नया पंखा आया, अब हमें गर्मी नहीं लगेगी।” जब आकाश ने एक पुरानी सेकंड-हैंड बाइक खरीदी ताकि शिखा को बस के धक्के न खाने पड़ें, तो उन्होंने खुशी-खुशी खाते में आठ सौ रुपये जमा किए। जब वे अपनी पहली शादी की सालगिरह पर पहली बार किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने गए, तब भी उन्होंने खाते में कुछ पैसे डाले। हर छोटी-बड़ी खुशी, हर सुखद पल, पासबुक के उन पन्नों पर दर्ज होता गया। समय बीतता गया और वह पासबुक उन दोनों के प्यार, उनके संघर्ष और उनकी छोटी-छोटी जीतों का गवाह बन गई।

देखते ही देखते शादी को पांच साल बीत गए। जीवन हमेशा एक सा नहीं रहता। समय ने करवट ली और उनके जीवन में एक बहुत बड़ा तूफान आ गया। देश में अचानक आई एक आर्थिक मंदी के कारण आकाश की कंपनी घाटे में चली गई और छंटनी के दौरान आकाश की नौकरी चली गई। उसी दौरान शिखा के अस्पताल के मैनेजमेंट में भी बदलाव हुआ और उसकी सैलरी आधी कर दी गई। खर्चे बढ़ चुके थे, घर का किराया, बिजली का बिल, राशन—सब कुछ पहाड़ सा लगने लगा।

आकाश दिन भर नई नौकरी की तलाश में भटकता और रात को निराश होकर लौटता। लगातार मिल रही असफलता ने आकाश को चिड़चिड़ा बना दिया था। शिखा भी डबल शिफ्ट करके थक जाती थी। दोनों के बीच जो वक्त पहले प्यार भरी बातों में बीतता था, वह अब खामोशी या पैसों की किचकिच में बीतने लगा। धीरे-धीरे नौबत यहाँ तक आ गई कि दोनों छोटी-छोटी बातों पर बुरी तरह झगड़ने लगे। “तुमने बिजली का बिल क्यों नहीं भरा?”, “तुमने इतना महंगा राशन क्यों मंगवा लिया?”, “मैं दिन भर धक्के खाता हूँ, तुम्हें मेरी कोई फिक्र नहीं है”—ऐसे ताने उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गए। वो दोनों भूल गए कि वे एक-दूसरे से कितना प्यार करते थे। तनाव और हताशा ने उनके रिश्ते की बुनियाद को हिला कर रख दिया था।

एक रात, बात इतनी बिगड़ गई कि आकाश ने गुस्से में आकर पानी का गिलास ज़मीन पर दे मारा। “मैं थक गया हूँ इस रोज-रोज की किचकिच से! शायद हमारी शादी एक गलती थी,” आकाश ने चीखते हुए कहा और दरवाज़ा धड़ाम से बंद करके बाहर चला गया।

शिखा वहीं ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे लगा कि अब उनके रिश्ते में कुछ नहीं बचा है। उसने फैसला कर लिया कि वह सुबह होते ही अपनी माँ के घर चली जाएगी। रोते-रोते उसने अपना सूटकेस निकाला और अपने कपड़े पैक करने लगी। अपने ज़रूरी कागज़ात निकालने के लिए जब उसने अलमारी का लॉकर खोला, तो अचानक एक लाल रंग का लिफाफा फिसल कर नीचे गिर पड़ा।

शिखा ने लिफाफा उठाया। यह वही पासबुक थी जो उसकी माँ ने विदाई में दी थी। पिछले कुछ महीनों से, जब से उनकी जिंदगी में परेशानियां शुरू हुई थीं, उन्होंने इस पासबुक को खोलकर देखा तक नहीं था। शिखा के हाथ कांप रहे थे। उसने पासबुक खोली और सीधे आखिरी पन्नों की तरफ गई।

वहाँ उनकी अपनी ही लिखावट में उनके प्यार की दास्तान दर्ज थी।

“10 मई: आकाश तेज बारिश में भीगता हुआ मेरे लिए भुट्टा लेकर आया।”

“15 अगस्त: आज शिखा ने पहली बार मेरे लिए स्वेटर बुना, जो थोड़ा ढीला है, पर दुनिया में सबसे खूबसूरत है।”

“22 नवंबर: आज हमने अपनी पहली टीवी खरीदी, अब हम साथ बैठकर फिल्में देखेंगे।”

“5 जनवरी: आज आकाश को प्रमोशन मिला, हमने घर पर ही हलवा बनाकर जश्न मनाया।”

एक-एक पन्ना, एक-एक लाइन शिखा की आँखों के सामने उनके खूबसूरत अतीत को ज़िंदा कर रही थी। उसे याद आने लगा कि कैसे अभावों के बावजूद वे दोनों कितने खुश थे। खुशी पैसों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ से थी। शिखा को एहसास हुआ कि वे एक बुरे वक्त को अपनी पूरी जिंदगी मान बैठे हैं। परेशानी पैसों की थी, लेकिन उन्होंने निशाना अपने रिश्ते को बना लिया था।

तभी दरवाज़े की आवाज़ हुई। आकाश वापस आ गया था। उसका गुस्सा शांत हो चुका था और वह अपराधबोध से भरा हुआ लग रहा था। उसने शिखा को ज़मीन पर सूटकेस के पास बैठे और रोते हुए देखा, तो वह भागकर उसके पास आया। “शिखा, मुझे माफ कर दो। मैं फ्रस्ट्रेशन में पता नहीं क्या-क्या बोल गया। मैं सच में बहुत…”

इससे पहले कि आकाश अपनी बात पूरी करता, शिखा ने वह पासबुक आकाश के हाथों में रख दी। आकाश ने नम आँखों से उन पन्नों को पढ़ा। वो पल, वो तारीखें, वो खुशियां—सब कुछ जैसे एक फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने घूमने लगा। उसने पासबुक का बैलेंस चेक किया। पिछले पांच सालों में उन छोटी-छोटी खुशियों ने जुड़कर लगभग अस्सी हज़ार रुपये का रूप ले लिया था।

दोनों एक-दूसरे के गले लगकर बहुत देर तक रोते रहे। उन्होंने अपने उन कड़वे शब्दों के लिए एक-दूसरे से माफी मांगी।

आकाश ने शिखा के आँसू पोंछते हुए कहा, “माँ जी ने सही कहा था शिखा। इंसान बुरे वक्त में अक्सर अपनी अच्छी यादों को भूल जाता है। यह पासबुक सिर्फ पैसों का खाता नहीं है, यह तो हमारी खुशियों की वसीयत है। हमने कितनी खूबसूरत ज़िंदगी जी है, और मैं एक नौकरी जाने से इतना टूट गया।”

शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारे पास एक-दूसरे का साथ है, यही हमारी सबसे बड़ी दौलत है। हम मिलकर इस मुश्किल से भी निकल जाएंगे।”

अगले दिन, उन्होंने उस खाते से कुछ पैसे निकाले। उन पैसों से आकाश ने एक दोस्त के साथ मिलकर मेडिकल सप्लाय का एक छोटा सा काम शुरू किया। चूँकि वह बाजार को समझता था और मेहनती था, उसका काम धीरे-धीरे चल पड़ा। शिखा ने भी उसका पूरा साथ दिया। कुछ ही महीनों में उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ गई।

लेकिन इस बार एक बदलाव था। अब वे समझ चुके थे कि जीवन में चाहे कितना भी अंधेरा क्यों न छा जाए, उनके पास उनकी खुशियों का एक ऐसा खाता है, जिसकी रोशनी से वे किसी भी तूफ़ान का सामना कर सकते हैं। पार्वती देवी की उस छोटी सी पासबुक ने सिर्फ उनके पैसे नहीं बचाए थे, बल्कि उनका घर, उनका प्यार और उनका रिश्ता बचा लिया था।

आज भी, जब उनके जीवन में कोई खुशी का पल आता है, तो वे दोनों सबसे पहले बैंक जाते हैं और उस खाते में कुछ पैसे जमा करके पासबुक के आखिरी पन्ने पर अपनी नई खुशी का कारण लिखना कभी नहीं भूलते।

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