शादी को अभी महज़ डेढ़ साल ही बीता था, लेकिन इस छोटे से अरसे में ही नंदिनी ने विशाल के घर को पूरी तरह से अपना बना लिया था। विशाल के घर की परिस्थितियां आम घरों जैसी नहीं थीं। शादी से करीब एक साल पहले ही विशाल की माँ, सुशीला जी को लकवे का एक गंभीर दौरा पड़ा था, जिसके कारण उनके शरीर का बायां हिस्सा पूरी तरह से काम करना बंद कर चुका था। घर में विशाल के अलावा उसके बुजुर्ग पिता और दो छोटे भाई-बहन, पियूष और निम्मी थे, जो अभी स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे। सुशीला जी के बिस्तर पर पड़ जाने से घर की पूरी व्यवस्था चरमरा गई थी। ऐसे नाजुक वक्त में जब रिश्तेदारों के दबाव और परिवार की जरूरत को देखते हुए विशाल और नंदिनी की शादी हुई, तो नंदिनी ने उस घर की चौखट पर कदम रखते ही मानो अपने मायके की उस अल्हड़ और लाडली लड़की को वहीं पीछे छोड़ दिया था।
नंदिनी के आने से उस घर में जैसे फिर से प्राण लौट आए थे। सुबह की पहली किरण के साथ उठकर सबके लिए नाश्ता बनाना, सुशीला जी को दवाइयां देना, उन्हें नहलाना-धुलाना, पियूष और निम्मी के टिफिन तैयार करना और ससुर जी की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखना— ये सब नंदिनी की दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। वह किसी मशीन की तरह बिना थके काम करती, लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा एक मीठी सी मुस्कान खिली रहती। मायके में जो लड़की खुद अपनी माँ के बिना एक गिलास पानी नहीं पीती थी, वो आज पूरे ससुराल की धुरी बन चुकी थी।
विशाल एक बेहद समझदार और अपनी पत्नी से बेइंतहा प्यार करने वाला पति था। वह नंदिनी के इस निस्वार्थ समर्पण को बहुत करीब से देखता था। उसे इस बात की खुशी तो थी कि नंदिनी ने उसके पूरे परिवार को समेट लिया है, पियूष और निम्मी उसमें अपनी बड़ी बहन और माँ दोनों का अक्स देखने लगे हैं, और उसके माता-पिता उसे बहू नहीं बल्कि सगी बेटी मानते हैं। लेकिन विशाल के दिल के एक कोने में कहीं न कहीं यह अपराधबोध भी पलता था कि नंदिनी ने इस घर की जिम्मेदारियों के तले अपनी खुद की जवानी और अपने शौक पूरी तरह से दबा दिए हैं।
एक दिन की बात है। रात का खाना खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में सोने चले गए, नंदिनी अपने कमरे में बैठी एक ऊनी स्वेटर बुन रही थी। वह स्वेटर बहुत छोटा था। विशाल ने कमरे में आकर पूछा, “यह किसके लिए बना रही हो?” नंदिनी ने शरमाते हुए नजरें झुकाईं और कहा, “बस ऐसे ही… मोहल्ले में शर्मा जी के घर पोता हुआ है न, उसे देखकर मन किया तो बुनने लगी। वैसे भी हमारी शादी को डेढ़ साल हो गए हैं, माँ जी भी परसों कह रही थीं कि अब घर में एक नन्हे मेहमान की किलकारियां गूंजनी चाहिए।”
यह सुनकर विशाल खामोश हो गया। वह नंदिनी के पास बिस्तर पर बैठा और उसने नंदिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। कुछ पल की भारी खामोशी के बाद विशाल ने बहुत ही गंभीर और ठहरी हुई आवाज में कहा, “नंदिनी , मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ और मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी बात को पूरी गहराई से समझो।” नंदिनी ने हैरानी से विशाल की तरफ देखा।
विशाल ने कहना शुरू किया, “मैं जानता हूँ कि हर लड़की का एक सपना होता है माँ बनने का। लेकिन नंदिनी , मैंने फैसला किया है कि हम अगले पांच सालों तक अपना कोई बच्चा नहीं करेंगे।”
यह सुनते ही नंदिनी के हाथों से स्वेटर छूट गया। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। “ये तुम क्या कह रहे हो विशाल? क्या तुम्हें मुझसे…”
विशाल ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, “नहीं नंदिनी , ऐसा कुछ नहीं है। तुम मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी हो। लेकिन तुम खुद को देखो। सुबह छह बजे से रात के बारह बजे तक तुम इस घर को संभालने में जुटी रहती हो। माँ की हालत ऐसी नहीं है कि वो तुम्हारी कोई मदद कर सकें। पियूष और निम्मी अभी बहुत छोटे हैं। तुम पहले से ही इन दोनों की माँ बनकर उन्हें पाल रही हो। अगर अभी तुम्हारा अपना बच्चा हो गया, तो तुम पर जिम्मेदारियों का इतना भारी बोझ आ जाएगा कि तुम शारीरिक और मानसिक रूप से टूट जाओगी। मैं नहीं चाहता कि मेरा बच्चा तुम्हें सिर्फ एक थकी हुई और काम में उलझी हुई माँ के रूप में देखे। मैं तुम्हें पांच साल देना चाहता हूँ, ताकि तुम थोड़ा अपने लिए भी जी सको, पियूष और निम्मी अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, और जब हमारा बच्चा इस दुनिया में आए, तो हम दोनों बिना किसी तनाव के उसके बचपन का पूरा आनंद ले सकें।”
नंदिनी के लिए विशाल का यह फैसला किसी बड़े झटके से कम नहीं था। एक औरत के लिए अपनी कोख सूनी रखने का फैसला करना कभी आसान नहीं होता। उस रात दोनों के बीच कोई और बात नहीं हुई। नंदिनी कई रातों तक चुप-चुप रहने लगी। उसे लगा जैसे विशाल ने उससे उसका सबसे बड़ा अधिकार छीन लिया है। वह अंदर ही अंदर घुटने लगी थी, लेकिन उसने घर के कामों में कोई कमी नहीं आने दी।
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। एक रात भारी बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी। निम्मी, जो बचपन से ही बादलों की गरज से डरती थी, अचानक रोते हुए नंदिनी के कमरे में आई और उससे लिपट गई। “भाभी, मुझे बहुत डर लग रहा है, मुझे अपने पास सुला लो न,” निम्मी ने सुबकते हुए कहा। नंदिनी ने तुरंत उसे अपने सीने से लगा लिया, उसके बालों में हाथ फेरते हुए उसे लोरी सुनाने लगी। निम्मी कुछ ही पलों में नंदिनी की गोद में सुरक्षित महसूस करते हुए गहरी नींद में सो गई।
तभी नंदिनी की नजर दरवाजे पर खड़े विशाल पर पड़ी। विशाल की आंखों में एक अजीब सी नमी थी। वह खामोशी से नंदिनी को देख रहा था। उस एक पल में नंदिनी को सब कुछ समझ आ गया। उसने महसूस किया कि वह तो पहले से ही एक माँ है। निम्मी और पियूष का प्यार, माँ जी का आशीर्वाद और विशाल का वो फैसला जो सिर्फ और सिर्फ नंदिनी की फिक्र और उसके स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर लिया गया था— ये सब उसके लिए किसी भी अन्य खुशी से बढ़कर थे। विशाल उसे जिम्मेदारियों की चक्की में पीसना नहीं चाहता था, बल्कि वह उसे उस चक्की से बाहर निकालकर एक सुकून भरी जिंदगी देना चाहता था।
अगली सुबह नंदिनी उठी, तो उसके चेहरे पर वो पुरानी वाली खिलखिलाहट वापस आ चुकी थी। उसने विशाल के लिए चाय बनाई और उसके हाथ में कप देते हुए मुस्कुराकर बोली, “पांच साल बाद जब हमारा बच्चा होगा न, तो निम्मी और पियूष ही उसके सबसे अच्छे नैनी (आया) बनेंगे। तब तक मैं इनकी ही माँ बनकर बहुत खुश हूँ।” विशाल ने मुस्कुराते हुए अपनी समझदार पत्नी का हाथ चूम लिया। उस घर में कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ था, लेकिन ममता और प्यार ने एक नए और खूबसूरत आंगन का निर्माण जरूर कर लिया था।
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विशाल का नंदिनी की सेहत और पारिवारिक जिम्मेदारियों को देखते हुए बच्चे के लिए पांच साल इंतज़ार करने का फैसला आपको कैसा लगा? क्या सच्चे प्यार में पार्टनर की शारीरिक और मानसिक थकान को समझना सबसे जरूरी है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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लेखक :मुकेश पटेल