सुधा अपने शहर के उस बड़े से मकान में पिछले छह सालों से बिल्कुल अकेली रह रही थी। पति के गुजर जाने के बाद जिंदगी जैसे एक ठहरा हुआ पानी बन गई थी। उनकी इकलौती बेटी, शिखा, पिछले कुछ सालों से नौकरी के सिलसिले में बेंगलुरु में रह रही थी। सुधा का ज्यादातर समय पुरानी यादों में या फिर टीवी के सामने कटता था। इस अकेलेपन के बीच अगर उनके चेहरे पर कोई मुस्कान ला पाता था, तो वो थे सतीश जी। सतीश जी उनके पति के पुराने मित्र थे, जिनकी पत्नी का देहांत भी कुछ साल पहले हो गया था। दोनों अक्सर फोन पर घंटों बातें करते, एक-दूसरे का हालचाल लेते और अपने सुख-दुख साझा करते। लेकिन समाज के डर और उम्र की झिझक ने सुधा को कभी इस रिश्ते को दोस्ती से आगे कोई नाम देने की इजाजत नहीं दी।
शिखा काफी समय से सुधा को अपने पास बेंगलुरु बुला रही थी। इस बार जब शिखा का जोर ज्यादा बढ़ा, तो सुधा ने भी मन बना लिया कि वह कुछ दिन अपनी बेटी के साथ बिता कर आएगी।
बेंगलुरु पहुंचकर जब सुधा ने शिखा के बताए हुए पते पर कैब रुकवाई और उस फ्लैट के दरवाजे की घंटी बजाई, तो उनका दिल अपनी बेटी को देखने के लिए धड़क रहा था। लेकिन जैसे ही दरवाजा खुला, सुधा के पैरों तले जमीन खिसक गई। दरवाजे पर शिखा नहीं, बल्कि एक बेहद शालीन और सुदर्शन नौजवान खड़ा था। सुधा अवाक रह गई। उनके दिमाग में कई तरह के सवाल दौड़ने लगे। इससे पहले कि सुधा अपनी घबराहट में कुछ पूछ पातीं, उस लड़के ने बेहद नम्रता से हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते आंटी, अंदर आइए। शिखा यहीं रहती है।”
सुधा का दिल जोर से धड़क रहा था, लेकिन वह खुद को संभालते हुए अंदर दाखिल हुईं। हॉल बहुत ही सलीके से सजा हुआ था। सामने काउच पर शिखा बैठी थी और अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी। सुधा को देखते ही उसने लैपटॉप किनारे रखा और दौड़कर अपनी माँ के गले लग गई।
“सरप्राइज कैसा लगा माँ?” शिखा ने मुस्कुराते हुए पूछा, और फिर उस नौजवान की तरफ इशारा करते हुए बोली, “माँ, ये कबीर है। हम दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं और… हम एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। मैंने फैसला कर लिया है कि मैं इसी के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताऊंगी।”
सुधा अभी भी सकते में थीं। उनकी नजरें कबीर और शिखा के बीच झूल रही थीं। उन्होंने रुंधे हुए गले से पूछा, “पर बेटा, अगर तुम दोनों शादी करना चाहते हो तो यह सब क्या है? तुम दोनों एक साथ एक ही घर में… बिना शादी के? लोग क्या कहेंगे?”
शिखा ने सुधा का हाथ पकड़ा और उन्हें आराम से सोफे पर बैठाया। कबीर ने बहुत ही सत्कार के साथ सुधा के लिए एक गिलास पानी लाकर रखा और मुस्कुरा कर दूसरे कमरे में चला गया ताकि माँ-बेटी तसल्ली से बात कर सकें।
शिखा ने बहुत ही कोमलता लेकिन दृढ़ता से अपनी बात कहनी शुरू की। “माँ, मुझे पता है कि आपको यह सब देखकर बहुत अजीब लग रहा है। आपके जमाने में और हमारी आज की जिंदगी में बहुत फर्क आ गया है। मैं और कबीर शादी करना चाहते हैं, लेकिन सच कहूं तो अभी हम दोनों उस बहुत बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं हैं। शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं है, बल्कि वो अपने साथ ढेरों सामाजिक रस्में, दोनों परिवारों की उम्मीदें, आर्थिक जिम्मेदारियां और बच्चे की प्लानिंग का दबाव लेकर आती है। हम दोनों अभी अपने करियर के उस पड़ाव पर हैं जहाँ हमें खुद को साबित करना है। अगर हम अलग-अलग रहते, तो इस भागदौड़ भरे शहर में एक-दूसरे से मिलने के लिए घंटों ट्रैफिक में बर्बाद करते, बाहर रेस्टोरेंट में पैसे खर्च करते और फिर भी एक-दूसरे को पूरी तरह से समझ नहीं पाते। एक साथ रहकर हमने न सिर्फ अपना समय और पैसा बचाया है, बल्कि एक-दूसरे की कमियों और अच्छाइयों को बहुत करीब से जाना है। हम दोनों आर्थिक और मानसिक रूप से जब पूरी तरह परिपक्व हो जाएंगे, तब हम खुशी-खुशी उन रस्मों को भी निभा लेंगे। आप मुझ पर भरोसा रखिए माँ, मेरे इस फैसले से आपको कभी सिर झुकाने की नौबत नहीं आएगी।”
सुधा चुपचाप अपनी बेटी को सुन रही थीं। उन्हें महसूस हो रहा था कि उनकी वो छोटी सी शिखा अब कितनी बड़ी और समझदार हो गई है। उसके तर्कों में सच्चाई थी। आज की इस महंगाई और तनाव भरी जिंदगी में रिश्ते निभाना इतना आसान नहीं रहा।
सुधा ने एक गहरी सांस ली। शिखा ने अपनी माँ के चेहरे की लकीरों को पढ़ते हुए उनके हाथ को थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।
“और माँ,” शिखा की आवाज अब थोड़ी और भावुक हो गई थी, “मैं यह भी जानती हूँ कि पिछले छह सालों में आपने उस बड़े से घर में कितनी खामोशी और कितना अकेलापन झेला है। जब मैं आपको फोन करती हूँ, तो मैं आपके चेहरे की वो उदासी महसूस कर सकती हूँ। मैं यह भी जानती हूँ कि सतीश अंकल से बात करके आपको कितना सुकून मिलता है।”
सतीश जी का नाम सुनते ही सुधा झेंप गईं। उन्होंने हड़बड़ाहट में कहा, “अरे पगली, तू ये क्या कह रही है? वो तो बस तेरे पापा के दोस्त हैं। मेरी तो उम्र ढल गई है, अब इन बातों का क्या काम?”
शिखा ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ के गाल को छुआ। “क्या अकेलेपन और प्यार की कोई उम्र होती है माँ? हम क्यों हमेशा ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से अपनी खुशियों का गला घोंट देते हैं? सतीश अंकल बहुत अच्छे इंसान हैं और वो भी आपकी तरह ही अकेले हैं। आप दोनों एक-दूसरे का कितना अच्छा सहारा बन सकते हैं। जब मैं बिना किसी कागज की मुहर के अपने प्यार के साथ रह सकती हूँ, तो आप क्यों नहीं? आप भी सतीश अंकल के साथ रहिए, अपना अकेलापन दूर कीजिए। आपको कोई हक नहीं है खुद को इस तरह सजा देने का। अगर आप अपनी जिंदगी में एक सच्चा साथी चुन लेंगी, तो मुझे भी आपकी चिंता नहीं सताएगी।”
सुधा की आंखों से आंसू छलक पड़े। ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस सदियों पुरानी बेड़ियों के टूटने के थे, जिन्हें उन्होंने खुद अपने पैरों में बांध रखा था। उनकी बेटी ने आज उन्हें सिर्फ अपने जीवन की नई हकीकत से ही रूबरू नहीं कराया था, बल्कि अपनी माँ को भी एक नई जिंदगी जीने का हौसला दिया था। सुधा ने शिखा को कसकर गले लगा लिया। उस दिन उस फ्लैट में दो पीढ़ियों ने एक-दूसरे के फैसलों को न सिर्फ समझा था, बल्कि दिल से स्वीकार भी कर लिया था।
आपकी क्या राय है?
शिखा का अपनी माँ को उनकी खुशी के लिए प्रेरित करना आपको कैसा लगा? क्या उम्र के आखिरी पड़ाव में अकेलेपन को दूर करने के लिए उठाया गया ऐसा कदम सही है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद”
लेखिका : सविता गर्ग