“अंकल… मुझे माफ कर दीजिए… अंजलि… अंजलि को लेबर पेन हो रहा है। कोई गाड़ी नहीं है, नेटवर्क नहीं है, मेरी कोई मदद नहीं कर रहा। वो मर जाएगी अंकल… प्लीज मेरी मदद कीजिए!” सिद्धार्थ फूट-फूट कर रोने लगा और उनके पैरों में गिर पड़ा।
तभी पीछे से कौशल्या जी हाथ में शॉल और कुछ जरूरी सामान लिए आ गईं। “अरे बेटे, इसमें रोने का क्या काम? हिम्मत रखो। दीनानाथ जी, आप जल्दी से अपनी वो पुरानी महिंद्रा जीप निकालिए।
सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और अंजलि एक नामी बैंक में मैनेजर। दोनों की जिंदगी में पैसों की कोई कमी नहीं थी। उनका मानना था कि उनकी प्राइवेसी सबसे बढ़कर है और पड़ोसियों से ज्यादा मतलब रखना पुराने जमाने के लोगों का काम है। उनके ठीक बगल वाले फ्लैट में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे – प्रोफेसर दीनानाथ और उनकी पत्नी कौशल्या। दीनानाथ जी यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए थे और कौशल्या जी एक सीधी-सादी, ममतामयी घरेलू महिला थीं।
प्रोफेसर साहब और उनकी पत्नी का दिन सुबह भजनों और बालकनी में पक्षियों को दाना डालने से शुरू होता था। उनके फ्लैट से अक्सर अगरबत्ती की महक और पुरानी गजलों की आवाज आती थी। सिद्धार्थ को यह सब बेहद नापसंद था। उसे लगता था कि ये बुजुर्ग लोग उसकी आधुनिक लाइफस्टाइल में एक दखलअंदाजी हैं। एक बार की बात है, जब अंजलि गर्भवती हुई, तो यह खबर सुनकर कौशल्या जी के मन का वात्सल्य उमड़ पड़ा। वे अंजलि के लिए अपने हाथों से गोंद के लड्डू बनाकर उनके दरवाजे पर पहुँच गईं।
दरवाजा सिद्धार्थ ने खोला। लड्डू देखकर बजाय खुश होने के, उसका अहंकार जाग उठा। उसने बेहद रूखेपन से कहा, “देखिए आंटी जी, हम लोग डाइट कॉन्शियस हैं और बाहर का ऐसा अनहाइजीनिक खाना नहीं खाते। और हाँ, आप लोगों के भजनों की आवाज से मेरी मीटिंग्स में डिस्टर्बेंस होता है। प्लीज, आप लोग अपनी हद में रहें और हमसे ज्यादा मतलब न रखें तो बेहतर होगा।”
यह सुनकर कौशल्या जी की आँखें भर आईं। पीछे खड़े प्रोफेसर दीनानाथ ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और बिना कुछ कहे उन्हें वापस अपने फ्लैट में ले गए। उस दिन के बाद से उन दोनों फ्लैट्स के बीच जैसे एक अदृश्य और मजबूत दीवार खड़ी हो गई थी। बुजुर्ग दंपत्ति ने कभी दोबारा उनकी तरफ मुड़कर नहीं देखा।
समय बीतता गया। अंजलि की गर्भावस्था का नौवां महीना चल रहा था। जुलाई का महीना था और शहर में मानसून अपने चरम पर था। एक दिन मौसम विभाग ने शहर में भारी चक्रवाती तूफान और मूसलाधार बारिश का ‘रेड अलर्ट’ जारी कर दिया। दोपहर से ही आसमान में काले डरावने बादल छा गए थे और शाम होते-होते तेज हवाओं के साथ भयानक बारिश शुरू हो गई। रात के दस बजते-बजते पूरा शहर मानो जलमग्न हो गया। सड़कों पर गाड़ियां आधी डूब चुकी थीं, पेड़ उखड़ गए थे और सुरक्षा के मद्देनजर प्रशासन ने पूरे इलाके की बिजली काट दी थी। ‘सिल्वर ओक्स अपार्टमेंट्स’ भी एक भयानक अंधेरे और खौफनाक सन्नाटे में डूब गया था।
रात के करीब ढाई बज रहे थे। बाहर तूफान की रफ़्तार और तेज हो गई थी, हवाएं खिड़कियों से ऐसे टकरा रही थीं मानो उन्हें तोड़कर अंदर आना चाहती हों। तभी अंजलि की एक तेज चीख ने सिद्धार्थ को नींद से झकझोर कर उठा दिया।
“सिद्धार्थ… मुझे बहुत तेज दर्द हो रहा है… शायद समय आ गया है…” अंजलि दर्द से तड़पते हुए बिस्तर पर दोहरी हो रही थी।
सिद्धार्थ के पसीने छूट गए। डिलीवरी की तारीख तो अभी पंद्रह दिन बाद की थी। उसने हड़बड़ाहट में अपना मोबाइल उठाया, लेकिन नेटवर्क का नामोनिशान नहीं था। लैंडलाइन फोन भी डेड पड़ा था। उसने टॉर्च जलाकर बालकनी से नीचे झांका, तो उसका दिल बैठ गया। बेसमेंट में पानी भर चुका था और उसकी महंगी सेडान कार आधी पानी में डूबी हुई थी। सड़कों का तो जैसे वजूद ही मिट गया था, हर तरफ सिर्फ गंदा तूफानी पानी बह रहा था।
सिद्धार्थ ने एक-दो अस्पतालों के इमरजेंसी नंबर डायल करने की कोशिश की, लेकिन कॉल नहीं लगी। उसने अपने कुछ दोस्तों को फोन मिलाना चाहा, पर सब बेकार। दर्द के मारे अंजलि की हालत खराब होती जा रही थी। सिद्धार्थ टॉर्च लेकर पागलों की तरह बाहर कॉरिडोर में भागा। उसने अपने सामने और नीचे वाले फ्लैट्स के दरवाजे पीटे। कुछ ने तो दरवाजा खोला ही नहीं, और जिन्होंने खोला, उन्होंने स्थिति देखकर हाथ खड़े कर दिए।
“यार सिद्धार्थ, बाहर बाढ़ जैसे हालात हैं। मेरी गाड़ी तो बेसमेंट में फंसी है और ऐसे मौसम में कोई एम्बुलेंस नहीं आ सकती। हम कुछ नहीं कर सकते,” एक युवा पड़ोसी ने साफ शब्दों में कह दिया और दरवाजा बंद कर लिया।
सिद्धार्थ वहीं कॉरिडोर के फर्श पर बैठ गया। उसे अपनी दौलत, अपने पद और अपनी आधुनिकता पर पहली बार घिन्न आ रही थी। लाखों रुपये बैंक में पड़े थे, लेकिन आज वे कागज के टुकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं थे। अंजलि की चीखें फ्लैट के अंदर से लगातार आ रही थीं। तभी सिद्धार्थ की नजर प्रोफेसर दीनानाथ के बंद दरवाजे पर पड़ी।
उसे अपना वह दिन याद आ गया जब उसने इन बुजुर्गों का अपमान करके उन्हें दरवाजे से लौटा दिया था। शर्म और पछतावे ने उसके कदम जकड़ लिए थे, लेकिन अंजलि की एक और दर्द भरी चीख ने उसके सारे अहम को तोड़ दिया। वह भागा और प्रोफेसर दीनानाथ के दरवाजे को जोर-जोर से पीटने लगा।
कुछ ही सेकंड में दरवाजा खुला। प्रोफेसर दीनानाथ हाथ में एक बड़ी टॉर्च लिए खड़े थे।
“क्या हुआ सिद्धार्थ बेटे? सब ठीक तो है?” प्रोफेसर साहब के चेहरे पर कोई गुस्सा या पुरानी कड़वाहट नहीं थी, बल्कि एक गहरी चिंता थी।
“अंकल… मुझे माफ कर दीजिए… अंजलि… अंजलि को लेबर पेन हो रहा है। कोई गाड़ी नहीं है, नेटवर्क नहीं है, मेरी कोई मदद नहीं कर रहा। वो मर जाएगी अंकल… प्लीज मेरी मदद कीजिए!” सिद्धार्थ फूट-फूट कर रोने लगा और उनके पैरों में गिर पड़ा।
तभी पीछे से कौशल्या जी हाथ में शॉल और कुछ जरूरी सामान लिए आ गईं। “अरे बेटे, इसमें रोने का क्या काम? हिम्मत रखो। दीनानाथ जी, आप जल्दी से अपनी वो पुरानी महिंद्रा जीप निकालिए। वो ऊँचाई पर खड़ी है और इस पानी में वही निकल पाएगी। मैं तब तक अंजलि को संभालती हूँ।”
कौशल्या जी बिना एक पल गंवाए सिद्धार्थ के फ्लैट में गईं। उन्होंने एक माँ की तरह अंजलि का सिर अपनी गोद में रखा, उसे सहलाया और हौसला दिया। “कुछ नहीं होगा मेरी बच्ची, मैं हूँ ना तुम्हारे पास। बस गहरी सांसें लो।”
प्रोफेसर दीनानाथ, जो गठिया के मरीज थे, उस तूफानी रात में बिना अपनी परवाह किए सीढ़ियों से नीचे उतरे। उनकी पुरानी ऊँची जीप सोसाइटी के बाहर एक ऊंचे चबूतरे पर खड़ी थी। कुछ ही देर में जीप स्टार्ट होने की आवाज आई। सिद्धार्थ और कौशल्या जी ने मिलकर अंजलि को सहारा दिया और उसे जीप की पिछली सीट पर लिटाया।
वह रात किसी भयानक सपने से कम नहीं थी। सड़कों पर छाती तक पानी था। बारिश इतनी तेज थी कि वाइपर चलने के बावजूद विंडस्क्रीन के पार कुछ नजर नहीं आ रहा था। प्रोफेसर दीनानाथ पूरे अनुभव और धैर्य के साथ जीप को पानी के बीच से निकाल रहे थे। पीछे कौशल्या जी लगातार अंजलि को हिम्मत बंधा रही थीं और भगवान का नाम ले रही थीं। सिद्धार्थ आगे की सीट पर बैठा बस भगवान से प्रार्थना कर रहा था और बार-बार उन दोनों बुजुर्गों को कृतज्ञता भरी नजरों से देख रहा था।
लगभग एक घंटे के खौफनाक सफर के बाद, वे लोग जैसे-तैसे शहर के एक बड़े मैटरनिटी अस्पताल पहुँचे। वहां भी बिजली कटी हुई थी और जनरेटर पर काम चल रहा था। अंजलि की हालत देखकर डॉक्टरों ने उसे तुरंत लेबर रूम में शिफ्ट कर दिया।
बाहर कॉरिडोर में सिद्धार्थ सिर पकड़े बैठा था। कौशल्या जी उसके पास गईं और उसके सिर पर हाथ रखकर बोलीं, “सब ठीक होगा बेटे, ईश्वर पर भरोसा रखो।”
कुछ ही देर बाद, लेबर रूम का दरवाजा खुला और एक नर्स ने बाहर आकर कहा, “बधाई हो, बेटा हुआ है! माँ और बच्चा दोनों पूरी तरह से सुरक्षित हैं। डॉक्टर कह रहे थे कि अगर पंद्रह मिनट भी और देर हो जाती, तो बच्ची की जान को खतरा हो सकता था।”
यह सुनते ही सिद्धार्थ की आँखों से आँसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसने जाकर अंजलि को देखा जो अब शांत और खुश थी, उसके बगल में एक नन्हा सा फरिश्ता सो रहा था।
सिद्धार्थ बाहर आया और सीधा प्रोफेसर दीनानाथ और कौशल्या जी के पैरों पर गिर पड़ा। वह बच्चों की तरह बिलखते हुए रोने लगा। “मुझे माफ कर दीजिए अंकल… आंटी जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आप लोगों का कितना अपमान किया था। मैंने आप लोगों को अछूतों की तरह अपने दरवाजे से भगा दिया था। मेरे पास पैसा, रुतबा, दोस्त सब कुछ था, लेकिन आज मेरे वो सो-कॉल्ड दोस्त और मेरा पैसा मेरे किसी काम नहीं आया। अगर आज आप लोग नहीं होते, तो मैं अपना सब कुछ खो देता। मैं कितना अंधा और अहंकारी था!”
प्रोफेसर दीनानाथ ने झुककर सिद्धार्थ को उठाया और उसे अपने गले से लगा लिया। उनकी भी आँखें नम थीं।
उन्होंने सिद्धार्थ के आंसू पोंछते हुए कहा, “पागल लड़के, पुरानी बातों को कौन याद रखता है? तुमने जो किया वह तुम्हारी उस वक्त की समझ थी। लेकिन आज इस तूफान ने तुम्हें एक बहुत बड़ा सबक दिया है। देखो बेटा, जब जिंदगी में मुसीबत का कोई तूफान आता है, तो दूर बैठे रिश्तेदार या तुम्हारे बैंक के पैसे तुरंत काम नहीं आते। उस वक्त ये पड़ोसी ही होते हैं जो सबसे पहले दौड़े चले आते हैं। पड़ोस ही इंसान का सबसे पहला और असली परिवार होता है। परिवार में कभी बर्तन खटकते हैं, कभी विचार नहीं मिलते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दरवाजे बंद कर लें।”
कौशल्या जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे छोड़िए भी पुरानी बातें! आज खुशियां मनाने का दिन है। चलिए, मेरे पोते का चेहरा तो दिखाइए मुझे।”
उस रात तूफान थम चुका था। बाहर आसमान साफ हो रहा था और सिद्धार्थ के मन पर छाया घमंड और स्वार्थ का काला बादल भी हमेशा के लिए छंट चुका था। उसे समझ आ गया था कि ऊँची इमारतों में रहने से कोई बड़ा नहीं होता, बड़ा वह होता है जो मुसीबत के समय किसी के लिए अपने घर और दिल के दरवाजे खोल देता है।
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल