नेकी वापस लौटते हैं

“जी, आप किसे ढूँढ रहे हैं?” दीनानाथ जी ने अपनी कांपती हुई आवाज में पूछा।

नौजवान की आँखें दीनानाथ जी की जर्जर हालत देखकर छलक पड़ीं। वो बिना कुछ बोले सीधे उनके पैरों पर गिर पड़ा और फफक-फफक कर रोने लगा।

“ये क्या कर रहे हैं आप? उठिए… कौन हैं आप?” दीनानाथ जी पीछे हटते हुए बोले।

नौजवान ने अपने आँसू पोंछते हुए ऊपर देखा और रुंधे हुए गले से बोला, “मास्टर जी… आपने अपने इस नालायक बेटे को नहीं पहचाना? मैं रोहन हूँ… आपका रोहन। वो टपरी वाला बच्चा, जिसे आपने बारिश में छाता दिया था।”

दीनानाथ जी के हाथ से लाठी छूटकर जमीन पर गिर गई। उनका पूरा शरीर कांपने लगा। उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से उस नौजवान के चेहरे को गौर से देखा। हाँ, ये वही आँखें थीं, जिनमें बरसों पहले एक सपना पल रहा था।

मास्टर दीनानाथ जी अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे, खिड़की के बाहर गिरती बारिश की बूंदों को एकटक निहार रहे थे। पचहत्तर बसंत देख चुकी उनकी आँखें अब धुंधली होने लगी थीं, लेकिन अतीत की यादें आज भी उनके जहन में किसी ताज़ा घाव की तरह हरी थीं। उनकी पत्नी सुमित्रा को गुजरे हुए एक दशक से ज्यादा का समय हो चुका था और उनकी कोई अपनी संतान नहीं थी। रिटायरमेंट के बाद का जीवन बस किसी तरह कट रहा था। पेंशन के पैसों से गुजर-बसर तो हो जाती थी, लेकिन उस बड़े से पुश्तैनी मकान में पसरा सन्नाटा उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। बुढ़ापे की बीमारियाँ उनके शरीर को अपना घर बना चुकी थीं, और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। मोहल्ले वाले कभी-कभार हाल-चाल पूछ लेते, लेकिन अपनों का खालीपन कोई कैसे भर सकता था।

दीनानाथ जी की आँखें अक्सर उस बारिश में एक ऐसे चेहरे को ढूँढती थीं, जिसे उन्होंने बरसों पहले देखा था। वो यादों के पन्ने पलटते हुए आज से पच्चीस साल पीछे चले गए। उन दिनों दीनानाथ जी शहर के एक सरकारी स्कूल में गणित के वरिष्ठ शिक्षक हुआ करते थे। उनका नियम था कि स्कूल शुरू होने से एक घंटे पहले पहुँचना और बच्चों के आने से पहले ब्लैकबोर्ड पर कुछ प्रेरणादायक विचार लिखना। स्कूल के ठीक सामने एक छोटी सी चाय की टपरी हुआ करती थी, जिसे रामू काका चलाते थे। उसी टपरी पर एक दस-ग्यारह साल का लड़का जूठे बर्तन धोने और ग्राहकों को चाय पकड़ाने का काम करता था। उसका नाम रोहन था।

दीनानाथ जी ने कई बार गौर किया था कि जब भी स्कूल की घंटी बजती और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में बैठकर पढ़ना शुरू करते, रोहन बर्तन धोते-धोते रुक जाता। उसकी नजरें टपरी से स्कूल की खिड़कियों के पार उस दुनिया को निहारती रहतीं, जहाँ से मास्टर जी की आवाजें आती थीं। कई बार तो वो चाय देने में भी गलती कर बैठता, क्योंकि उसका पूरा ध्यान इस बात पर होता कि मास्टर जी आज कौन सा पहाड़ा या सूत्र सिखा रहे हैं।

एक दिन, जब स्कूल की छुट्टी हो गई और तेज बारिश होने लगी, दीनानाथ जी अपने छाते के नीचे खड़े होकर बस का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने देखा कि रोहन टपरी के एक कोने में सिकुड़कर बैठा है और बारिश से भीग चुके एक पुराने अख़बार को सुखाने की कोशिश कर रहा है, ताकि वो उसमें छपे अक्षरों को पढ़ सके। दीनानाथ जी से रहा नहीं गया। वे उसके पास गए और अपने छाते का साया उस पर करते हुए बोले, “अरे बेटा! तुम क्या कर रहे हो? अख़बार तो पूरा गल चुका है, इसमें तुम्हें क्या समझ आएगा?”

रोहन अचानक एक मास्टर को अपने सामने खड़ा देख घबरा गया। वो हड़बड़ा कर खड़ा हुआ और बोला, “साहब, मैं बस… मैं बस ये देख रहा था कि इसमें जो चित्र बना है, उसके नीचे क्या लिखा है।”

दीनानाथ जी ने अख़बार पर नजर डाली। वहाँ एक डॉक्टर की तस्वीर थी जो किसी गरीब मरीज का इलाज कर रहा था। दीनानाथ जी ने प्यार से रोहन के सिर पर हाथ फेरा और पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है बेटा? और तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं? तुम इस उम्र में बर्तन क्यों धोते हो? तुम्हें तो स्कूल में होना चाहिए।”

रोहन की आँखों में एक अजीब सी चमक और साथ ही एक गहरी उदासी छा गई। उसने धीमी आवाज में कहा, “मेरा नाम रोहन है। मेरे बापू मुझे और माँ को बहुत पहले छोड़कर चले गए थे। माँ लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करती थी। लेकिन पिछले साल उन्हें बहुत तेज बुखार आया। हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि किसी बड़े अस्पताल में उन्हें दिखा पाते। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर साहब मिले नहीं और… और मेरी माँ मुझे छोड़कर चली गई। रामू काका ने मुझे यहाँ काम पर रख लिया ताकि मुझे दो वक़्त की रोटी मिल सके।”

इतना कहते-कहते रोहन की आवाज भारी हो गई। दीनानाथ जी का हृदय यह सुनकर द्रवित हो उठा। उन्होंने पूछा, “तुम रोज स्कूल की तरफ ऐसे क्यों देखते हो? क्या तुम पढ़ना चाहते हो?”

रोहन ने तुरंत अपनी गर्दन हाँ में हिलाई और बोला, “हाँ साहब! मुझे पढ़ना है। मैं पढ़-लिखकर एक बहुत बड़ा डॉक्टर बनना चाहता हूँ। इतना बड़ा डॉक्टर कि कोई भी गरीब बिना इलाज के ना मरे। मैं ऐसा अस्पताल बनाऊँगा जहाँ कोई किसी से पैसे नहीं मांगेगा।”

एक दस साल के अनाथ बच्चे के मुँह से इतनी बड़ी बात सुनकर दीनानाथ जी स्तब्ध रह गए। उस बच्चे की आँखों में जो संकल्प था, वो उन्होंने किसी संपन्न घर के बच्चे में भी नहीं देखा था। उसी पल, दीनानाथ जी ने एक फैसला ले लिया। अगले ही दिन वे रामू काका के पास गए और उन्हें कुछ पैसे देकर रोहन को अपने साथ ले आए। उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल से बात करके रोहन का दाखिला करवा दिया। चूँकि दीनानाथ जी की अपनी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनकी पत्नी सुमित्रा ने भी रोहन को अपने बेटे की तरह ही स्नेह दिया। रोहन दिन भर स्कूल में पढ़ता और शाम को दीनानाथ जी उसे घर पर ट्यूशन देते। उसकी पढ़ाई का, किताबों का, कपड़ों का सारा खर्च दीनानाथ जी ने खुशी-खुशी उठा लिया।

रोहन भी असाधारण प्रतिभा का धनी निकला। वो हर साल अपनी कक्षा में प्रथम आता। उसकी मेहनत और लगन देखकर दीनानाथ जी को उस पर बहुत गर्व होता था। समय पंख लगाकर उड़ता रहा। रोहन ने बारहवीं बोर्ड की परीक्षा में पूरे राज्य में टॉप किया। उसकी इस सफलता पर सरकार की तरफ से उसे मेडिकल की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिल गई। रोहन का सपना सच होने जा रहा था। वो एमबीबीएस करने के लिए देश के एक बड़े मेडिकल कॉलेज में चला गया।

दीनानाथ जी और सुमित्रा उसे स्टेशन छोड़ने गए थे। रोहन ने जाते समय दोनों के पैर छुए और रोते हुए कहा था, “मास्टर जी, आपने और ताई जी ने मेरे लिए जो किया है, वो कोई सगा बाप भी शायद ना करे। मैं डॉक्टर बनकर सबसे पहले आपके पास आऊँगा। आपका ये कर्ज मैं कभी नहीं उतार पाऊँगा।”

दीनानाथ जी ने उसे सीने से लगाते हुए कहा था, “पागल बच्चे, पिता कभी बेटे पर कोई कर्ज नहीं चढ़ाता। तू बस एक अच्छा और सच्चा इंसान बनना, यही हमारी गुरुदक्षिणा होगी।”

रोहन मेडिकल कॉलेज चला गया। शुरुआत में खत आते रहे, फोन पर बातें होती रहीं। फिर वो उच्च शिक्षा और विशेष ट्रेनिंग के लिए विदेश चला गया। समय के साथ दूरियां बढ़ने लगीं। इसी बीच सुमित्रा का एक लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया। दीनानाथ जी पूरी तरह टूट गए। उन्होंने अपना पुराना घर छोड़कर शहर के दूसरे किनारे पर एक छोटा सा मकान ले लिया। शहर बदलने और टेलीफोन नंबर बदल जाने के कारण रोहन से उनका संपर्क पूरी तरह टूट गया। दीनानाथ जी ने भी उसे ढूँढने की कोशिश नहीं की, यह सोचकर कि वो अब अपनी एक बड़ी दुनिया में व्यस्त होगा, उसे क्यों परेशान करना।

और आज, पंद्रह साल बाद, दीनानाथ जी उसी अकेलेपन में अपनी ज़िंदगी के आखिरी दिन गिन रहे थे। बारिश रुक चुकी थी। तभी उनके दरवाजे पर एक बड़ी सी गाड़ी आकर रुकी। मोहल्ले के लोग हैरानी से उस चमचमाती गाड़ी को देखने लगे। गाड़ी से एक सूट-बूट पहने, बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला नौजवान उतरा। उसने आसपास के लोगों से कुछ पूछा और सीधे दीनानाथ जी के दरवाजे की तरफ बढ़ा।

दरवाजे पर दस्तक हुई। दीनानाथ जी ने अपनी लाठी के सहारे उठकर धीरे-धीरे दरवाजा खोला। सामने खड़े उस अजनबी नौजवान को देखकर वे कुछ समझ नहीं पाए।

“जी, आप किसे ढूँढ रहे हैं?” दीनानाथ जी ने अपनी कांपती हुई आवाज में पूछा।

नौजवान की आँखें दीनानाथ जी की जर्जर हालत देखकर छलक पड़ीं। वो बिना कुछ बोले सीधे उनके पैरों पर गिर पड़ा और फफक-फफक कर रोने लगा।

“ये क्या कर रहे हैं आप? उठिए… कौन हैं आप?” दीनानाथ जी पीछे हटते हुए बोले।

नौजवान ने अपने आँसू पोंछते हुए ऊपर देखा और रुंधे हुए गले से बोला, “मास्टर जी… आपने अपने इस नालायक बेटे को नहीं पहचाना? मैं रोहन हूँ… आपका रोहन। वो टपरी वाला बच्चा, जिसे आपने बारिश में छाता दिया था।”

दीनानाथ जी के हाथ से लाठी छूटकर जमीन पर गिर गई। उनका पूरा शरीर कांपने लगा। उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से उस नौजवान के चेहरे को गौर से देखा। हाँ, ये वही आँखें थीं, जिनमें बरसों पहले एक सपना पल रहा था।

“रोहन… मेरा बच्चा!” दीनानाथ जी ने अपने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया। दोनों बहुत देर तक ऐसे ही रोते रहे, जैसे बरसों का दर्द आज आँसुओं के रास्ते बह जाना चाहता हो।

जब दोनों शांत हुए, तो रोहन ने उन्हें बताया, “मास्टर जी, जब मैं विदेश से लौटा, तो सबसे पहले आपके पुराने घर गया। वहाँ पता चला कि आप वो घर बेचकर कहीं चले गए हैं। मैंने आपको हर जगह ढूँढा, हर रिश्तेदार, हर पुराने स्कूल के स्टाफ से पूछा, लेकिन कोई कुछ नहीं बता पाया। मैं दिन-रात एक ही बेचैनी में जीता था कि जिस इंसान ने मुझे फर्श से उठाकर अर्श पर बिठाया, मैं उनके बुढ़ापे का सहारा क्यों नहीं बन पाया। आज पंद्रह साल की तपस्या के बाद मुझे आपका पता एक पुराने बैंक कर्मचारी से मिला।”

दीनानाथ जी ने रोहन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, मुझे बहुत खुशी है कि तू एक बड़ा डॉक्टर बन गया। तेरी तरक्की देखकर मेरी सारी तकलीफें दूर हो गईं। मैं तो बस अपनी ज़िंदगी के बचे-खुचे दिन काट रहा हूँ।”

“अब आपको कोई दिन नहीं काटने मास्टर जी!” रोहन ने उनका हाथ अपने हाथों में लेते हुए दृढ़ता से कहा। “मैं आपको यहाँ इस हालत में छोड़कर नहीं जाने वाला। मैं विदेश की वो बड़ी नौकरी छोड़कर भारत वापस आ गया हूँ। मैंने इसी शहर के बीचों-बीच अपना एक बड़ा अस्पताल खोला है… ‘सुमित्रा-दीनानाथ मेमोरियल हॉस्पिटल’। वहाँ गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज होता है, बिल्कुल वैसा ही जैसा मैंने आपको बचपन में वचन दिया था। मैंने अपनी माँ को खो दिया था, लेकिन अब मैं अपने पिता को नहीं खोने दूँगा। आपको मेरे साथ चलना होगा, मेरे घर… जहाँ एक बेटे को अपने पिता की जरूरत है।”

दीनानाथ जी की आँखों से फिर आँसू बह निकले, लेकिन इस बार ये खुशी के आँसू थे। उन्हें लगा जैसे बरसों पहले बोया गया एक छोटा सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बनकर उन्हें अपनी घनी छांव दे रहा है।

उन्होंने अपना घर बंद किया और रोहन के साथ उसकी गाड़ी में बैठ गए। आज उनके दिल का सारा खालीपन भर चुका था। उन्हें एहसास हुआ कि निस्वार्थ भाव से किया गया कोई भी कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता, वो सही वक्त पर, सही रूप में आपके पास लौटकर जरूर आता है। उस दिन दीनानाथ जी को सिर्फ एक बेटा ही नहीं मिला था, बल्कि उनके द्वारा किए गए परोपकार ने ना जाने कितने ही और गरीब मरीजों की ज़िंदगी संवारने का रास्ता खोल दिया था।

क्या आपको लगता है कि रोहन ने जो किया, वह आज के स्वार्थी समाज में संभव है? अगर आप रोहन की जगह होते, तो क्या अपने मास्टर जी को ढूँढते? अपने विचार हमें जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

error: Content is protected !!